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Monday, June 28, 2010

फैशन की दुनिया का स्याह सच

ये दुनिया है बेदर्दों की , यहाँ हर राज़ छुपाना पड़ता है !
दिल में लाखों जख्म हों लेकिन,फिर भी, महफ़िल में मुस्कुराना पड़ता है !!
किसी शायर के द्वारा लिखी हुई ये पंक्तियाँ फैशन की दुनिया के मोडलों लिए बिलकुल फिट बैठती हैं | पहले नफीसा ,फिर कुलजीत रंधावा ,गीतांजलि और अब विवेका | एक लंबी फेहरिस्त है | रैम्प पर चल रहे इन माडलों के चेहरे पर तो मुस्कराहट रहती है लेकिन दिल उस आग में जलता रहता है जिसकी ओर कोई नज़र उठाकर भी नहीं देखता | हम अपनी दिलेरी पर चाहे जीतना भी इठला लें, सच तो यही है कि हम भी पश्चिमी सभ्यता के आदि हो चुके हैं |
विवेका बाबाजी के मौत के पीछे कि सच्चाई चाहे जो भी हो लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि एक और लड़की इस तथाकथित आधुनिक कहे जाने वाले समाज का शिकार हो गई | जहाँ लोग माडलों को उपभोग कि वस्तु समझते हैं |
हम पूछना चाहते हैं बात –बात पर आधुनिकता कि दुहाई देने वाले लोगों से कि आखिर एक सभ्य समाज में फैशन शो जैसे कार्यक्रमों का उद्देश्य क्या है ? जब किसी घटना से मनुष्य कि भावनाएं आहत होती हैं तो फिर सवाल उठाना लाजिमी हो जाता है | मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स प्रतियोगिताओं का औचित्य क्या है ? क्या वास्तव में प्रतिभागी के दिमाग कि परीक्षा होती है ? ज़वाब देने वाले चाहे कुछ भी कहें लेकिन सच यही है ऐसा कुछ भी नहीं होता | ताज पहनाने के बाद उस लड़की के हर अंग कि बोली लगाईं जाती है ,लिपस्टिक बनाने वाले उसके होठ की बोली लगाते हैं इस तरह हर कंपनी अपने ज़रूरत के हिसाब से उसके हर अंग की बोली लगाती है | और फिर वह लड़की उस कठपुतली के समान हो जाती है जिसे हर कोई मुस्कुराते हुए देखना चाहता है |भले ही उसकी निजी जिंदगी गम के समंदर में डूबी हुई हो | अपने स्वार्थ के लिए इंसानियत का गला दबाने वाली कंपनियां इस स्याह सच्चाई को कभी मानने को तैयार नहीं होंगी | और हम इतने निकम्मे हो चुके हैं कि अपने सामने हुए अन्याय का भी विरोध नहीं कर सकते | हमारी कानून व्यवस्था तो पूंजीपतियों और नेताओं की पहले ही रखैल बन चुकी है | ऐसे में विवेका बाबाजी जैसी लड़की के सामने क्या रास्ता बचता है ?

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