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Friday, June 24, 2011

भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लोगों का गुस्सा पैदा कर सकता है अराजक स्थिति

  कल आधी रात के बाद मेरे मोबाईल पर एक मेसेज आया –“मेरे पापा के ऑफिस का क्लर्क, जी पी एफ अकाउंट खोलने का 300 रूपये मांग रहा है| क्या करें?” मैंने जवाब दिया “उस क्लर्क के मुँह पर थप्पड़ मारिये और निगरानी विभाग, पटना को सूचित कर दीजिए|” थोड़ी देर बाद उसी व्यक्ति का पुनः मेसेज आया “आप उसे 300 रूपये दे दीजिए, क्योंकि जी पी एफ अकाउंट खोलने का रेट अभी यही चल रहा होगा” ये उसी सवाल का किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा दिया गया जवाब था| जी , हमारे देश में ज्यादातर लोगों की मानसिकता ऐसी ही हो चुकी है| उन्होंने इस अपनी जिंदगी का हिस्सा मान लिया है| भ्रष्टाचार की जड़ दरअसल यहीं से शुरू होती है| ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि अन्ना हजारे जिस घुन के  दवा की मांग कर रहे हैं, जंतर-मंतर के घोषित अनशन को आजादी की दूसरी लड़ाई कह रहे हैं क्या वह इस मानसिकता को बदल सकती है? ऐसे में अगर अन्ना हजारे जंतर-मंतर पर अनशन करते हुए मर भी जाएँ तो क्या भ्रष्टाचार खत्म हो पायेगा? सीधा और टका सा ज़वाब है- नहीं| सवाल यह भी है कि जिस तरह से पूरी व्यवस्था घुन की तरह सड़ चुकी है उसकी दुर्गन्ध को सिर्फ एक कानून बनाकर कैसे दूर किया जा सकता है?
एक तरफ ये सारे मुद्दे हैं, अंतर्विरोध है आशंकाएं हैं तो दूसरी तरफ केन्द्र सरकार का तानाशाही रवैया सामने आ रहा है| भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उसकी गंभीरता जगज़ाहिर हो चुकी है| इसलिए सवाल सिर्फ यही नहीं है कि केन्द्र सरकार को अन्ना हजारे और उनकी टीम की बात मान लेनी चाहिये या नहीं सवाल यह भी है कि भ्रष्टाचार को रोकने के जिस विधेयक की मांग आज अन्ना हजारे सहित देश के तमाम लोग कर रहे हैं, ऐसा ही कोई ठोस कानून पिछले बयालीस सालो में क्यों नहीं बन सका?
समझना यह भी पड़ेगा कि भ्रष्टाचार के आखिर मायने क्या हैं? 2G, सी ए जी, राष्ट्रमंडल खेल और आदर्श सोसायटी जैसे बड़े घोटाले, जिसमे सरकार के बड़े-बड़े मंत्री सहित कई अफसर शामिल पाए गए, या निचले स्तर से छोटे मोटे घोटाले, जिसमे एक दलाल से लेकर लाल बत्ती वाले अफसरों की भागीदारी होती है? इसे परिभाषित करने की ज़रूरत है| क्योंकि आम लोगों को काम सुरेश कलमाड़ी और कनिमोंझी जैसे लोगों से नहीं प्रखंड स्तर, या पंचायत स्तर पर छोटे सरकारी दफ्तरों से पड़ता है|
भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी खामी यह है कि वह सिर्फ अपने हित देखता है, जनहित या राष्ट्रहित बाद में और शायद देखता भी नही है| भ्रष्टाचार और सशक्त लोकपाल जैसे मुद्दों पर दलीय राजनीति से ऊपर उठकर इसलिए हमारे देश की राजनीतिक पार्टियां सोच नहीं  पा रही| सरकार और सिविल सोसायटी के बीच की बातचीत का हश्र पहले ही बैठक के बाद से लगभग नजर आने लगा था| सरकार की मंशा को समझना ज़रुरी है| भला अपने लिए कोई कब्र खोदता है क्या? हम यह नही समझ पा रहे कि भ्रष्टाचार के खिलाफ इस लड़ाई को कांग्रेस विरोधी क्यों समझा जा रहा है? एक लोकतान्त्रिक समाज में सिविल सोसायटी और सरकार बार बार सामने आये यह ज़रुरी नहीं है लेकिन यह ज़िम्मेदारी सरकार की भी है वह ऐसी नौबत न आने दे|
दूसरी तरफ़ सरकार के विरोध में जो गुस्सा आम लोगों में है व उग्र रूप लेकर कहीं ऐसा न हो कि हिंसक और अराजक स्थिति में पहुँच जाए|अन्ना हजारे ने जो भरोसा दिलाने की कोशिश की है उसके टूटने में अगर केन्द्र सरकार आड़े आती है तो निश्चित ही वह स्थिति एक सभ्य समाज के लिए ठीक नहीं होगी| बाकी बहस तो बाद में भी हो सकती है लेकिन पहले एक कानून बनने दिया जाने चाहिए था|
हालाँकि जिस तरह से तक़रीबन दो महीने पहले हुए आंदोलन में संसदीय राजनीति के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे उससे यह सवाल भी उठता है कि कहीं लोग इस वर्तमान लोकतान्त्रिक संसदीय व्यवस्था से उब तो नहीं चुके हैं? अगर ऐसा है तो वाकई चिंता की बात है| 

डेली न्यूज़ एक्टीविस्ट मे प्रकाशित



गिरिजेश कुमार

9 comments:

Anita said...

जब तक लोग अपने काम निकालने के लिये रिश्वत देते रहेंगे तब तक भ्रष्टाचार से मुक्ति नहीं मिल सकती, आज किसी के पास समय नहीं है फटाफट काम कराने के बदले यदि सौ-पचास देने पड़ें तो कोई हर्ज नहीं... ऐसे ही लोग भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते है...

manaskhatri said...

कोई हमसे घूस के रूप में पैसा खा रहा है क्योंकि हम खिला रहे हैं| यदि हर कोई कार्य के short-cut तरीके(घूसखोरी) को छोड सीधा रास्ता अपनाये और इस प्रकार से किसी भी कार्य के लिए घूस रूपी अपनी Commission मांगने वाले व्यक्ति का विरोध/ कानूनी कारवाही करे तो इस समस्या का समाधान हो सकता है|

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

हालात यूँ ही बने रहें तो यक़ीनन परिणाम घातक होंगें..... जनता का आक्रोश जायज भी है..... सटीक विश्लेषण किया आपने.....

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

यथार्थपरक , विचारणीय लेख.....

भ्रष्टाचार समाप्त करने के पहले कदम पर हमें स्वयं को दुरुस्त करना होगा...न रिश्वत लें और न दें

Rahul Singh said...

यह गतिशीलता अच्‍छे परिणाम लाएगी, आशा है.

शालिनी कौशिक said...

girijesh ji sahi bat kahi hai aapne ki vyavastha jo sad chuki hai ek kanoon banne se kaise sudhar jayegi?sarthak aalekh.
aapke blog ko rajiv ji ne ye blog achchha laga par liya hai.unki bahut tammana hai ki aap bhi vahan aayen aur unki mehnat ki sarahna karen .link hai-
[http://yeblogachchhalaga.blogspot.com]
aap unki ye ichchha avashay poori karenge hame pata hai.aur aasha bhi..

Chandra Bhushan Mishra 'Ghafil' said...

आपकी सोच अनावश्यक नहीं है गिरिजेश जी!

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

इस देश का कुछ नहीं होगा

Vivek Jain said...

एक दिन सब सही हो जायेगा,

विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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