Pages

Subscribe:

Sunday, November 21, 2010

इंसान के दो चेहरों के अलावा तीसरा चेहरा भी

पिछले दिनों मैं छठ पर्व के अवसर पर बिहार के मोतिहारी जिले के अरेराज प्रखंड में था| इसी प्रखंड में एक गांव है टिकुलिया| यह गोविन्दगंज विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत है| यहाँ से अभी जद यु की श्रीमती मीना दिवेदी विधायक हैं और वर्तमान में उम्मीदवार भी हैं| इसी टिकुलिया गाँव में मैंन ठहरा था| यहाँ जाने पर मुझे पहली बार ऐसा लगा कि इस वर्तमान परिवेश में जहाँ राजनेता अपने स्वार्थ को ही तरजीह देते हैं वहाँ वास्तव में जननेता भी हुए हैं जिनके अंदर लोगों के लिए, खास कर गरीब और पिछड़े हुए लोगों के लिए एक दर्द था| लोगों के दुःख से अपने अंदर पीड़ा महसूस होती थी| और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए हरसंभव प्रयास करना जिनका पेशा था| वो प्रयास चाहे बाहुबल से हो या समझा कर| वो 90 के दशक का काल था जब इस क्षेत्र में किसी का राज़ चलता था| उनका नाम था श्री देवेंद्रनाथ दुबे| श्री देवेंद्रनाथ दुबे टिकुलिया के ही रहने वाले थे| कहने को तो ये दबंग थे लेकिन इन्हें लोग दबंग के नाम से कम मसीहा के नाम से ज्यादा जानते है| 1995 ई. में ये विधायक चुने गए| इनके द्वारा किये गए कामों को लोग आज भी नहीं भूल पाए हैं| यह शायद इस क्षेत्र के लोगों का दुर्भाग्य था और इस प्रदेश की बदहाल व्यवस्था का परिणाम जिसने इस व्यक्तित्व को असमय ही काल के गाल में जाने को मजबूर कर दिया| १९९८ में जब यह ये सांसद का चुनाव लड़ रहे थे तो बेरहमी से पुलिस के वेश में अपराधियों ने इनकी हत्या कर दी| कहते हैं इनकी हत्या की खबर जैसे ही आसपास के इलाकों में पहुंची वैसे ही जो, जहाँ, जिस भी हालात में था घटनास्थल की ओर दौड पड़ा| यहाँ के लोग आज भी उस दृश्य को भूल नहीं पाए जब गाँव के आसपास लगी हजारों एकड़ की फसल सिर्फ इसलिए बर्बाद हो गयी कि सड़क पर चलने की जगह नहीं थी| कौन कहाँ चल रहा है इस बात का किसी को ध्यान नहीं था| आँखों में आंसू थे,ह्रदय क्षुब्ध था और चेहरे पर आक्रोश| इस आक्रोश को आज इस घटना के इतने दिनों के बाद भी महसूस किया जा सकता है| इस हत्या में तात्कालीन सरकार के मुखिया का नाम लेने से लोग ज़रा भी नहीं हिचकते| यह पुछने पर कि बिना सुरक्षा के वो कैसे निकल गए जब उनपर हमले की आशंका थी? “व्यवस्था नाम की कोई चीज़ नहीं थी भैया” गांव के लोगों के मुह से एक सुर से यह वाक्य निकलता है और बोलते-बोलते आँखें भींग जाती हैं| चाहे महिलाएं हो, बूढ़े हो या अधेड सभी की आँखें इनके नाम से ही डबडबा जाती है| वह एक व्यक्ति आज भी उस क्षेत्र की राजनीति को प्रभावित करता है इस बात को सभी स्वीकार करते हैं| इनकी ही भाभी वर्तमान में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रही हैं|

उनकी एक मूर्ति भी प्रखंड कार्यालय के सामने लगी हुई है| इंसान के इस तीसरे चेहरे से मेरी मुलाकात पहली बार हुई थी| आखिर यह चेहरा कैसे उत्पन्न होता है?

इस समाज में दो तरह के इंसान रहते हैं एक जो पुरे समाज के लिए पूजनीय होता है और दूसरा जिसकी निंदा समाज का हर एक व्यक्ति करता है| लेकिन इन दोनों चेहरों के अलावा एक चेहरा होता है जिसकी तरफ शायद हम सोच भी नही पाते| इसमें मनुष्य समाज में दबे कुचले लोगों के लिए देवता के समान होता है जबकि वही मनुष्य किसी के लिए राक्षस से भी ज्यादा खूंखार होता है| व्यक्ति का यह चेहरा समाज के लिए अच्छा है या बुरा ये विवाद का विषय हो सकता है लेकिन अगर हम इसके पीछे के कारणों की तलाश करें तो यह पता चलता है कि व्यवस्था के प्रति आक्रोश और अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए लोग ऐसा कदम उठाने को मजबूर होते हैं| भारत जैसे देश में जहाँ दबे कुचलों और गरीबों की संख्या ज्यादा है,ऐसा करना सही भी लगता है| क्योंकि जब सामाजिक व्यवस्था समाज को पीछे धकेलने की कोशिश करती हैं तो शायद ऐसे लोगों की ज़रूरत भी समाज को पड़ती है| इस दिखावे के लोकतंत्र में कहने को तो जनता मालिक है लेकिन असली चाबी पूंजीपतियों के हाथ है जो आम गरीब लोगों का शोषण करते हैं| इसके खिलाफ आम लोगों में गुस्सा तो रहता है लेकिन उसकी इतनी हिम्मत नहीं होती कि आवाज़ उठा सकें| इन्ही विपरीत परिस्थितियों में ऐसे नेतृत्वकरी लोग उभरते हैं जिनके अंदर अमीर और अमीरी के खिलाफ आग जलती रहती है और फिर वह उसे अपने हिसाब से इस सामाजिक कुरीति को खत्म करना चाहता है| यह अलग सवाल है कि सफलता कितनी मिलती है लेकिन निष्कर्ष के तौर पर यह तो कहा ही जा सकता है कि कुछ दिन के लिए ही सही लेकिन ऐसे लोगों की ज़रूरत इस समाज को है|

Friday, November 19, 2010

दिल्ली सरकार शर्म करो

किसी की मौत कब, कहाँ, और कैसे आएगी यह तो कोई नहीं जानता| लेकिन एक इंसान होने के नाते क्या यह सोचकर हम बैठे रह सकते हैं? पिछले दिनों दिल्ली के लक्ष्मीनगर इलाके में एक ४ मंजिला ईमारत गिरने से लगभग ७० लोग मारे गए| तो क्या इसके लिए यमुना नदी को दोषी ठहराया जा सकता है? आखिर नियम और कानूनों को ताक पर रखकर बिल्डिंग बनाने की इज़ाज़त कैसे दे दी गयी? उसपर विडंबना ये कि बिल्डिंग गिरने के ३ घंटे तक कोई रहत कार्य नहीं पहुँच सका| दिखावे और झूठे शान के नाम पर करोरों रूपये खर्च कर देने वाली दिल्ली सरकार उसी पैसे से ऐसी तकनीक नहीं खरीद सकी जिससे तत्काल मदद पहुंचाई जा सके|

अमेरिकी राष्ट्रपति कि सुरक्षा के लिए उतने पैसे खर्च कर दिए गए जितना उस दुर्घटना में मारे गए लोगों को मुआवजा भी नहीं दिया गया| हमें आश्चर्य होता है कि जब भी ऐसी घटना घटती है तो सभी एक दूसरे पर दोषारोपण करने में लग जाते हैं, जहाँ ज़रूरत इसकी नैतिक ज़िम्मेदारी लेकर पीडितों को हरसंभव मदद पहुंचाने कि थी वहीँ तमाम लोग अपना फायदा ढूँढने में लग गए| हमारी संवेदना उन लोगों के साथ जिन्होंने अपने परिजनों को खोया| हम उनके साथ सहानुभूति रखते हैं जो इस तथाकथित लोकतान्त्रिक व्यवस्था कि भ्रष्ट सरकार की लापरवाही के शिकार बने|

कॉमनवेल्थ गेम्स में हजारो करोर रूपये खर्च कर दुनिया के सामने अपना ग्लोबल इमेज दिखने वाले भारत और दिल्ली की सरकार का यह असली इमेज है जिसे जान बूझकर छुपाने की कोशिश होती है और जिसका खामियाजा आम निर्दोष लोग अपने जान की कीमत देकर चुकाते हैं| इनमे उनलोगों की संख्या ही ज्यादा होती है जो अपना और अपने परिवार के पेट के लिए दो जून की रोटी जुटाने के लिए इन महानगरों की खाक छानते हैं और जानवरों की तरह रहने को भी विवश होते हैं|

बहरहाल जांच के आदेश देने के बाद भी इन रसूख वाले लोगों के चंगुल से सच्चाई कितनी बाहर आ पाएगी इस बात का पता तो आने वाला वक्त ही बताएगा|

Sunday, November 7, 2010

आर्या की आत्महत्या: समाज के मुंह पर तमाचा

‘विवशता’ और ‘नाराज़गी’ ये दो ऐसे शब्द हैं जो इंसान को कुछ भी कर गुजरने को मजबूर करते हैं| इसीकि एक बानगी है आर्या की आत्महत्या| २५ अक्टूबर को पटना की रहने वाली २१ वर्षीय एम् बी ए की छात्रा आर्या ने आत्महत्या कर ली थी| अपने ८ पेज के सुसाईड नोट में उसने अपने ऊपर अपने ही प्रेमी और उसके दोस्तों द्वारा किये गए जुल्म की दास्ताँ लिखी है| साथ ही उसने क़ानून से न्याय की उम्मीद भी की है| आर्या के अनुसार उसके तथाकथित प्रेमी हर्ष और उसके ३ दोस्तों ने उसका शारीरिक और मानसिक शोषण किया जिससे तंग आकर उसने ये कदम उठाया| इस कांड में अभी तक चारों आरोपितों की गिरफ़्तारी हो चुकी है| लेकिन उसका कसूर क्या था? उसका कसूर तो सिर्फ इतना था कि उसने उस लड़के से प्यार किया था जिसकी नज़रों में इसकी कोई कीमत नहीं थी| उसका कसूर यह भी था कि वह उस समाज में रहती थी जहाँ लडकियां सिर्फ उपभोग की वस्तु समझी जाती हैं| उसपर जुल्म की इम्तहाँ ये कि प्रेम सम्बन्ध और आत्महत्या के ऐसे तमाम मामलों में यह समाज लड़कियों को ही दोषी ठहराता है| ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि क्या आधुनिकता की चकाचौंध में हम इतने अंधे हो गए हैं कि मानवीय मूल्य और इंसानी रिश्ते भी निरर्थक हो गए हैं? एक और सवाल जिसकी ओर शायद किसी का ध्यान भी नहीं जाता कि आखिर उस लड़की के पास क्या रास्ता बचता है जिसका इस तरह से शारीरिक और मानसिक शोषण किया जा रहा हो? आज आर्या ने आत्महत्या कर ली तो ये कहा जा रहा है कि उसे लड़ना चाहिए था अगर उसने आवाज़ उठायी होती तो यही समाज उसे न जाने क्या- क्या उपनाम से संबोधित करता| रिश्तों कि मर्यादा को ताक पर रखकर समाज के दरिंदों ने उसके साथ अन्याय किया|

इन विपरीत परिस्थितियों में जहाँ मानवीय संवेदनाएं दम तोड़ रही हैं क्या प्यार, प्रेम जैसे शब्दों का कोई स्थान नहीं है? अगर हाँ, तो इसकी कीमत लड़कियों को ही क्यों चुकानी पड़ती है?

आर्या ने अपने सुसाइड नोट में लिखा है कि उसे कानून से इन्साफ चाहिए लेकिन पूरी तरह से पूंजीवाद के चंगुल में कैद इस व्यवस्था में जहाँ हर चीज़ बिकाऊ है यह एक बड़ा सवाल है कि क्या उसकी अंतिम इच्छा पूरी होगी? और क्या हमारी न्यायिक व्यवस्था इतनी परिपक्व है? बहरहाल इन्साफ कि उम्मीद तो उसके मृत शरीर को भी है|

आर्या की मौत न सिर्फ उसके परिवारवालों के लिए गहरा सदमा है बल्कि यह इस समाज और सामाजिक व्यवस्था के मुंह पर तमाचा जहाँ लड़कियों और महिलाओं के मदद और उत्थान के बड़े बड़े दावे तो किये जाते हैं लेकिन हकीकत यही है कि हम अभी-भी उसी पुरुषप्रधान मानसिकता में जी रहे हैं जहाँ महिलाओं का काम पति ,परिवार और बच्चों की देखभाल करना माना जाता है| समाज में घटने वाली हर उस घटना जो मनुष्य के संबंधो पर प्रश्नचिन्ह लगाती है, के तह तक जाने की कोशिश कोई नहीं करता|

इस मार्मिक और व्यवस्था के प्रति आक्रोश से भर देने वाली घटना की तपिश को महसूस कर रहे हर सचेत नागरिक को एकजुट होकर एक सुर में यह प्रयास करना चाहिए कि ऐसे तमाम लोगों को जो ऊँचे पद का रौब दिखाकर रिश्तों का सौदा करते हैं और उसकी हत्या करते हैं कानून के कठघरे में लाया जाये और कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जाये ताकि फिर कोई ‘हर्ष’ इसे दोहराने की हिमाकत न कर सके|