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Wednesday, June 30, 2010

सपनों की शुरुआत से सफलता की सीढ़ी तक

सपने देखना किसे अच्छा नहीं लगता ? सभी के पास कुछ- न- कुछ सपने होते हैं और उसे पूरा करने के लिए एक प्लान | जब कोई अपनी जिंदगी की पहली सीढ़ी पर कदम रखता है तो एक नई सुबह उसका इंतज़ार करती है | और यही वो जगह होती है जहाँ लोग लड़खड़ाते भी हैं,संभलते भी | इस जगह पर फिसलकर भी जो खड़ा हो गया सफलता उसे ही मिलती है | लेकिन जिनके सपने अधूरे रह जाते हैं उनके लिए ?
आखिर सफलता के मायने क्या हैं ? हम किसे सफल कहेंगे ? ये सवाल हममें से हर किसी के दिमाग में उठता है और काफी उलझने के बाद भी शायद हम इसका सही ज़वाब नहीं दूंध पाते | छात्र ये सोचते हैं कि ८०-९० % मार्क्स लाने वाले बच्चे ही सफल हैं, और इस भागदौड में वो खुद अपनी निजी जिंदगी से दूर चले जाते हैं ,फिर शुरू होता है अवसाद का वो काला मंजर जिसकी जंजीरों में कैद बच्चे अपने आप को कभी मुक्त नहीं कर पाते | जबकि सच्चाई इससे कहीं अलग है |
आये दिन हम इस सच्चाई से रूबरू होते हैं| तो फिर दोष किसका है ? माता –पिता ,व्यवस्था या समाज | पूरी तरह मशीनी हो चुके इस समाज में जहाँ माँ बाप बच्चों पर अच्छा करने का दबाव डालते हैं वहीँ उनकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरने वाले बच्चे अपने आप को हीन भावना से ग्रसित पाकर डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं |
ऐसा नहीं है कि ये बातें सिर्फ छोटे बच्चों पर लागू होती हैं, उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्रों में भी ये प्रवृत्ति नज़र आती है | कई बार तो अपने किये पर हम खुद शर्मिंदगी महसूस करते हैं | तब सवाल है आखिर समाधान क्या हो ? हमारे पास दो रास्ते हैं एक तो हम चुपचाप आँख मूंदकर सबकुछ देखते रहें ,जो जिस तरह से चल रहा है चलने दें या फिर इसके खिलाफ एक ऐसी वैचारिक जागरूकता फैलाई जाये जिससे लोग खुद इस चीज़ को मानने से इंकार कर दे | वरना पता नहीं आने वाली पीढ़ी को हम किस दलदल में धकेल कर जायेंगे ?

Monday, June 28, 2010

फैशन की दुनिया का स्याह सच

ये दुनिया है बेदर्दों की , यहाँ हर राज़ छुपाना पड़ता है !
दिल में लाखों जख्म हों लेकिन,फिर भी, महफ़िल में मुस्कुराना पड़ता है !!
किसी शायर के द्वारा लिखी हुई ये पंक्तियाँ फैशन की दुनिया के मोडलों लिए बिलकुल फिट बैठती हैं | पहले नफीसा ,फिर कुलजीत रंधावा ,गीतांजलि और अब विवेका | एक लंबी फेहरिस्त है | रैम्प पर चल रहे इन माडलों के चेहरे पर तो मुस्कराहट रहती है लेकिन दिल उस आग में जलता रहता है जिसकी ओर कोई नज़र उठाकर भी नहीं देखता | हम अपनी दिलेरी पर चाहे जीतना भी इठला लें, सच तो यही है कि हम भी पश्चिमी सभ्यता के आदि हो चुके हैं |
विवेका बाबाजी के मौत के पीछे कि सच्चाई चाहे जो भी हो लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि एक और लड़की इस तथाकथित आधुनिक कहे जाने वाले समाज का शिकार हो गई | जहाँ लोग माडलों को उपभोग कि वस्तु समझते हैं |
हम पूछना चाहते हैं बात –बात पर आधुनिकता कि दुहाई देने वाले लोगों से कि आखिर एक सभ्य समाज में फैशन शो जैसे कार्यक्रमों का उद्देश्य क्या है ? जब किसी घटना से मनुष्य कि भावनाएं आहत होती हैं तो फिर सवाल उठाना लाजिमी हो जाता है | मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स प्रतियोगिताओं का औचित्य क्या है ? क्या वास्तव में प्रतिभागी के दिमाग कि परीक्षा होती है ? ज़वाब देने वाले चाहे कुछ भी कहें लेकिन सच यही है ऐसा कुछ भी नहीं होता | ताज पहनाने के बाद उस लड़की के हर अंग कि बोली लगाईं जाती है ,लिपस्टिक बनाने वाले उसके होठ की बोली लगाते हैं इस तरह हर कंपनी अपने ज़रूरत के हिसाब से उसके हर अंग की बोली लगाती है | और फिर वह लड़की उस कठपुतली के समान हो जाती है जिसे हर कोई मुस्कुराते हुए देखना चाहता है |भले ही उसकी निजी जिंदगी गम के समंदर में डूबी हुई हो | अपने स्वार्थ के लिए इंसानियत का गला दबाने वाली कंपनियां इस स्याह सच्चाई को कभी मानने को तैयार नहीं होंगी | और हम इतने निकम्मे हो चुके हैं कि अपने सामने हुए अन्याय का भी विरोध नहीं कर सकते | हमारी कानून व्यवस्था तो पूंजीपतियों और नेताओं की पहले ही रखैल बन चुकी है | ऐसे में विवेका बाबाजी जैसी लड़की के सामने क्या रास्ता बचता है ?

Monday, June 21, 2010

समाज कि किस चुप्पी को तोडना चाहते हैं आप ?

मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार ने कोसी बाढ़ पीडितों के लिए दिया पैसा लौटाकर आपदा पीड़ित लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है | श्री नीतीश कुमार को यह समझना चाहिए था कि जो पैसा गुजरात से आया था वह वहाँ कि जनता का पैसा था न कि गुजरात सरकार का | उन्होंने ऐसा करके गुजरात की जनता के साथ भी मजाक किया है जिन्होंने अपना पेट काटकर बिहारियों की मदद की थी |
यह सच है कि बिहार की बिगड़ी हुई स्थिति को ठीककर पटरी पर लाने का प्रयास नीतीश कुमार ने किया है | लेकिन इस सफलता से वह इतने घमंडी हो जायेंगे यह किसी ने नहीं सोचा था | अगर वह पैसा बाढ़ पीडितों के लिए आया था तो नीतीश कुमार यह बताएं कि इतने दिनों से वह पैसा खर्च क्यों नहीं हुआ था ? एक तरफ केंद्र पर बार –बार नीतीश कुमार पीडितों कि मदद के लिए उचित सहायता राशि न दिए जाने कि बात करते हैं वही दूसरी तरफ वो मदद को वापस लौटा रहें हैं वह भी ओछी राजनीति का शिकार होकर ,जिसका कोई तुक ही नहीं बनता | सिर्फ एक पोस्टर विवाद को लेकर | माननीय मुख्यमंत्री ये भूल गए विपत्ति के समय इंसान ही इंसान की मदद के लिए खड़ा होता है ,इसी का उदहारण तो दिया था गुजरात कि जनता ने, फिर इसमें राजनीति क्यों हो रही है ?
नीतीश कुमार यह समझ लेना चाहिए कि जनता सब समझती है | उनको इस पद पर इसलिए बैठाया गया था ताकि वह उनकी समस्याओं कि गहरी खाई को पाट सकें | इसलिए नहीं कि वो घमंड में इतने चूर हो जाएँ कि सही और गलत में अंतर ही न समझ में आये |
इस बात को हम मानते हैं उनकी तस्वीर छापने के पहले उनकी अनुमति लेनी चाहिए थी लेकिन नीतीश कुमार ने जो किया अपने दिल पर हाथ रखकर वो बताएं कि क्या यह सही है ? राजनीति अपनी जगह है ,वैचारिक मतभेद अपनी जगह है , इसमें आम भोली भाली जनता कि भावनाओं के साथ मजाक नहीं होना चाहिए | श्री नीतीश कुमार से मैं पूछना चाहता हूँ कि आखिर समाज की किस चुप्पी को तोडना चाहते हैं आप ? यह समाज हर सही गलत का फैसला कर सकता है |आप अच्छा कर रहे हैं इसका मतलब यह नहीं कि आपके हर सही गलत फैसले को लोग आँख मूंदकर मान लेंगे |