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Wednesday, December 21, 2011

सामाजिक विभत्सता की कारुणिक दास्तान


“मेरे मम्मी-पापा हमारी शादी के लिए राज़ी नहीं थे। क्योंकि हमारी जाति अलग थी। उनकी इच्छा के विरुद्ध हमने मुंबई कोर्ट में शादी कर ली। उन्होंने मुझे यह कहकर बुलाया कि हमें तुम्हारी शादी मंजूर है। मैं बहुत ही साधारण लड़की हूँ। मैं उनकी चालों को नहीं समझ पायी। उन्होंने मुझे घर में ही किडनैप कर रखा है। मेरे मम्मी-पापा ने मेरे पति को जान से मार देने की धमकी दी है। वे मुझे किसी से बात भी नहीं करने दे रहे...(क्रमशः)“  इस कहानी की हर एक पंक्ति हमें अंदर तक झकझोरती है। दर्द की दास्ताँ पढ़ते-पढ़ते कब उसके दर्द से रिश्ता जुड़ जाता है, पता ही नहीं चलता? अकेले में रोते-रोते जब किसी की आँखे सूज़ जाती हैं तो दिल में छुपे गुबार किसी भी रास्ते बाहर आने को बेताब हो उठते हैं। यह बेताबी कभी इंसान को तोड़ देती है, तो कभी उसे विद्रोही बना देती है। हालाँकि उस इंसान के लिए दोनों ही स्थिति खतरनाक है, लेकिन भींगी आँखें, अगर सिलवटों से भी बहती आँसुओं का हिसाब माँगने लगे तो फिर आखिर भरोसा किसपर किया जाए? अपने ही जब दुश्मन बन जाएँ तो मदद किससे मांगी जाए, यह बड़ा सवाल बन जाता है?

बहरहाल, यह आपबीती है, बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की रहने वाली पल्लवी पल्लू की, जिसे उसने फेसबुक पर शेयर किया है। अंत में उसने अपने और अपने पति की ज़िन्दगी की रक्षा की गुहार लगायी है। विडंबना देखिये, जो उसका हक है, उसे उसको भीख के रूप में माँगना पड़ रहा है। उसकी गलती बस इतनी है कि उसने उस व्यक्ति से शादी कर ली जिससे वो प्यार करती थी। और दुर्भाग्य से वो उसकी जाति का नहीं है। आखिर किस आधुनिकता की फटी हुई चादर ओढ़े जी रहे हैं हम? जहाँ एक लड़की सिर्फ़ इसलिए नज़रबंद है, क्योंकि उसने अंतर्जातीय विवाह जैसी सामाजिक कुरीति के मुँह पर तमाचा मारा है।
वो पूछती है, कोई इंसान अगर जातिवाद की लड़ाई लड़ता है तो क्या वह देशद्रोही है? दरअसल, सवाल सिर्फ़ यही नहीं है, सवाल उस मानसिकता का भी है जो आधी आबादी को दोयम दर्जे की निगाह से देखता है, और उसके सारे फैसलों पर परिवारवालों का नियंत्रण रहता है। अगर इस नियंत्रण से आगे निकलने की किसी ने कोशिश की तो उसकी नैतिकता पर ही सवाल उठा दिए जाते हैं, फिर यही समाज उसे घटिया, बदचलन, बाजारी और न जाने कैसे-कैसे उपनाम से संबोधित करता है? सवाल, जातिवाद जैसी सामाजिक कुरीति का भी है जिसने कभी-न-कभी हमसब को अपनी जद में लिया और हम हैं कि फिर भी उस चोले को उतार फेंकना नहीं चाहते। इसीलिए अंतर्जातीय विवाह को हम झूठी शान-ओ-शौकत में पड़कर स्वीकार करना नहीं चाहते। सामाजिक बुराई को स्टेटस सिम्बल बनाकर हम खुद को ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को विनाश की ओर धकेल रहे हैं। पल्लवी जैसी न जाने कितनी ही लड़कियाँ इस तथाकथित आधुनिक समाज से अपनी ज़िन्दगी की भीख माँगने को विवश है?
हमारी सामाजिक संरचना में झूठी अस्मिता और दिखावेपन ने इतनी गहरी पैठ बना ली है कि अगर कोई उसे तोड़ने की कोशिश करे तो, या तो उसे तोड़ दिया जाता है, या उसकी आवाज़ उसके कमरे की दीवारों से ही टकराकर रह जाती है। कोई उसके अंतर्मन में झाँकने की कोशिश नहीं करता। हताशा, निराशा और कुंठा के ऐसे ही आलम में कोई आत्महत्या जैसे जघन्य कदम उठाने को मजबूर होता है। ज़रूरत इस बात की है कि हम खुद की सोच को परिपक्व बनायें। अपनी मानसिकता में थोड़ा बदलाव कर हम कई सामाजिक बुराइयों को दूर कर सकते हैं। दूसरों को दोष देने से पहले हमें खुद के दोषों पर भी विचार करना चाहिए। इसमें माता-पिता की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है।  ताकि फिर कोई पल्लवी ज़िन्दगी की भीख माँगने को विवश न हो।
गिरिजेश कुमार

Tuesday, December 13, 2011

बेबसी की चक्की में पिसता बचपन

“मैं पढ़ता था लेकिन जब से पापा बीमार हुए तब से पढ़ाई छोड़ दी” इस कंपकपाती ठण्ड में सड़क के किनारे दीये की रौशनी में अंडा बेच रहे बमुश्किल दस साल के बच्चे से जब मैंने यह सवाल किया कि तुम पढ़ते नहीं हो? तो उसका जवाब यही था। टूटी-फूटी  भाषा में दिए इस जवाब को सुनकर अनायास ही मन उस बच्चे के प्रति करुणा, दया और ममता से भर जाता है। लेकिन सवाल है इसे कहा क्या जाए? नियति का फेर,व्यवस्था की खामी या उस बच्चे की किस्मत का दोष?
दरअसल भाग्य और भगवान के  भरोसे जीने वाला यह समाज व्यवस्थागत खामियों को भी किस्मत और कर्म के फल के निगाह से देखता है। दो जून की रोटी की तलाश,बीमार बाप के ईलाज के लिए पैसों की ज़रूरत और इन सबके बीच पिसता बचपन। समस्याएं एक नही हैं। ज़िंदगी को मज़बूरी का नाम देकर आखिर कब तक जिया जाए?
२१ वीं सदी में भले ही हमने विकास के नए पैमाने गढ़ लिए हों लेकिन बुनियादी सवाल अब भी कायम हैं। देश का भविष्य कहे जाने वाले बच्चे आर्थिक असमानता,गरीबी,मज़बूरी,लाचारी और बेबसी की उस चक्की में पिसते रहते हैं जहां से बाहर निकलना उसके वश की बात नही होती। हर चौक-चौराहे और गली-नुक्कड़ पर हमें ऐसी विवश ज़िन्दगी देखने को मिल जाती है। स्थिति बदलने और बेहतरी के तमाम सरकारी दावे होते हैं लेकिन इन दावों की वास्तविकता धरातल पर नही दिखती। नतीजतन ज़िंदगी शब्द से भी अनजान बच्चे ज़िन्दगी का बोझ उठाने को मजबूर होते हैं। जो उम्र उसके दिमागी विकास और नयी कल्पनाओं को अंजाम देने की होती है उस उम्र में उसे आटा-चक्की का भाव मालुम करना होता है। एक सभ्य लोकतान्त्रिक समाज के लिए यह स्थिति वाकई चिंताजनक है। लेकिन निजीहित जिस समाज का अंतिम लक्ष्य बन जाए उस समाज में जनहित की बात बेईमानी ज़रूर लगती है, फिर भी यह सवाल तो उठता ही है कि आखिर दोषी कौन है?
हमारा संविधान समानता और समता पर जोर देता है लेकिन आज़ादी के छः दशकों बाद भी हम इसके निहितार्थ को नहीं समझ पाए। सरकारी नीतियाँ भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। मुनाफ़ा आधारित सोच हमें गरीबों और ज़रूरतमंदों के लिए बनायीं नीतियों का लाभ उनतक पहुँचाने से रोकते हैं। फलस्वरूप ये नीतियाँ कागजों में ही रहकर सरकारी कार्यालयों की शोभा बढ़ाती रहती हैं। इस विकट,विपरीत और दमघोंटू परिस्थितियों से लड़ने के लिए जो इच्छा शक्ति चाहिए वो सरकारों में नहीं दिखती। परिणामतः सारी सुविधाओं का लाभ चंद मुट्ठी भर लोगों तक सिमट कर रह जाता है। अमीर और अमीर होते जाते हैं गरीब और गरीब।
इसी देश में एक तरफ़ ऐसे बच्चे हैं जो तमाम सुख सुविधाओं से संपन्न हैं और दूसरी तरफ़ ये बच्चे हैं जिन्हें इन शब्दों का मतलब भी नहीं पता है। एक देश के इन दो चेहरों के कालांतर में झाँकने की कोशिश आखिर कब होगी? सवाल यह भी है कि जो व्यवस्था इस देश के बच्चों को उनका बचपन नहीं दे पाता क्या उस व्यवस्था को उखाड़ नहीं फेंकना चाहिए? इस शर्मनाक स्थिति से खुद में शर्मिंदगी महसूस करनेवाले हर व्यक्ति को इस दिशा में एकसाथ मिलकर प्रयास करने चाहिए। ताकि बचपन बचाया जा सके।  
गिरिजेश कुमार

Saturday, December 10, 2011

ज़िंदगी बचाने की जगह क्यों बना मौत की कब्रगाह?

वो अस्पताल जिसमें आग लगी (तस्वीर-एपी)
ज़िंदगी बचाने की जगह मौत की कब्रगाह बन गया और किसी को इस बात का अफ़सोस नहीं है। पश्चिम बंगाल सरकार अपनी सफाई दे रही है तो अस्पताल प्रशासन भी नहीं चाहता कि उसकी साख पर बट्टा लगे। ऐसे में व्यवस्था पर भरोसा करने वाले लोग व्यवस्था की खामियों से असहज होकर अपना आपा खो दें और फिर वही सरकार यह कहे कि देश के लोगों को शान्ति व्यवस्था भंग नहीं करनी चाहिए तो समझना यह भी पड़ेगा कि आखिर ये माजरा है क्या? 
विदित  हो कि पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के ए एम् आर आई अस्पताल में 9 दिसम्बर की सुबह अचानक आग लग गयी थी जिसमे 89 लोगों के मरने की पुष्टि हो चुकी है। राहत कार्य अभी जारी है।  
अपने रिश्तेदारों की बेहतरी के लिए जो लोग अस्पताल आए थे उन्होंने यह सपने में भी नहीं सोचा होगा कि ठीक होने से पहले ही अस्पताल प्रशासन की व्यवस्थागत खामियां उनकी कब्र खोद चुकी हैं। ज़िन्दगी जीने की आस कब मौत के आशियाने में शरण ले लेती है यह तो कोई भी नहीं जानता लेकिन इसके लिए जिम्मेदार अगर इंसानी लापरवाही हो तो ह्रदय क्षुब्ध हो जाता है। सवाल उठता है कि क्या अस्पताल चलाने वाले लोग सिर्फ़ मुनाफ़े के लिए अस्पताल चला रहे थे? ईलाज करा रहे दूर दराज से आए लोगों की सुरक्षा उनके लिए कोई मायने नहीं रखती थी? सवाल यह भी है कि आखिर अस्पताल में इतना बड़ा हादसा हुआ कैसे?
हादसे के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कहती हैं कि दमकल विभाग के अधिकारियों ने अस्पताल को इस बात को लेकर चेताया था कि अस्पताल में आग से निबटने के पर्याप्त प्रबंध नहीं है। वहीँ अग्निशमन मंत्री जावेद खान कहते हैं कि आग की शुरुआत अस्पताल के तहखाने से हुई और यह तहखाना पूरी तरह अवैध है। ये बयान हादसे के कुछ ही घंटों बाद आए हैं। ज़ाहिर है सरकार से लेकर मंत्री तक को इस बात की जानकारी थी कि अस्पताल में आग जैसे हादसे से निबटने की तैयारी नहीं है फिर क्यों नहीं उसपर पहले कार्रवाई की गई? क्या पश्चिम बंगाल सरकार ऐसे ही किसी हादसे का इंतज़ार कर रही थी?
दरअसल हमारी मशीनरी इतनी अपरिपक्व है कि हम चाहकर भी ऐसे किसी घटना के अंजाम तक नहीं पहुंच पाते। इस घटना की परिणति भी तय है। सरकार ने जाँच के आदेश दिए हैं लेकिन इन जाँच रिपोर्टों की वास्तविकता फाइलों में कहीं गुम होकर अपना दम तोड़ देगी। ऐसे में जिन्होंने अपने परिजनों को खोया, अपने रिश्तेदारों को बेमौत मरते देखा उनकी सुननेवाला कौन है? सवाल यही है।  
प्रशासनिक लापरवाही, सरकारी अकर्मण्यता और सेवाओं पर भारी व्यक्तिवादी सोच हर बार आम निर्दोष लोगों की जान लेता है। यहाँ इंसान की ज़िंदगी की कीमत तय होती है जो फूटपाथ पर बिकने वाले किसी सस्ते और घटिया सामान से भी कम है। हर ऐसी घटना जो सीधे व्यवस्था की खामियों पर सवाल उठाते हैं, उसके रहनुमा अपने आप को पाक साफ बताने की कोशिश करते हैं। कोई भी उस मातमी सन्नाटे के पीछे झाँकने की कोशिश नहीं करता जहां उसके परिजनों की आँखे दर्द, गम और रुसवाई से सूज चुकी होती हैं। कोई उसके दिल का हाल जानने की कोशिश नहीं करता जिनके पास अब सिर्फ़ यादें बची हुई हैं। वर्तमान विकसित, समृद्ध और आत्मनिर्भर भारतीय व्यवस्था की यही सबसे बड़ी खामी है।
सवाल यह नही है कि जो हादसे हो चुके हैं उनपर कितना आंसू बहाया जाए और व्यवस्था को कितना कोसा जाए? सवाल यह है कि जिन हालातों में ऐसी घटनाएँ होती हैं उन पर गंभीरता पूर्वक विचार करके क्या कोई ठोस हल निकालने की कोशिश की जायेगी ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएँ दोबारा न घटे? और आम निर्दोष लोग बेवजह काल के गाल में न समायें?
गिरिजेश कुमार