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Sunday, February 27, 2011

शहीद उपेक्षित क्यों हैं?

चंद्रशेखर आज़ाद भारतीय आज़ादी आंदोलन के महानायकों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं| देश की गुलामी और देशवासियों पर अंग्रेजी अत्याचार ने चंद्र्शेखर आज़ाद के अन्तःमन को झकझोरा था| जिंदगी भर अंग्रजों के चंगुल में ना आने की कसम खाने वाले चंद्रशेखर आज़ाद आज ही के दिन इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में शहीद हुए थे| अपनी निजी जिंदगी और स्वार्थपरता के कारण हम उन्हें याद करना भले ही भूल जाएँ लेकिन भारतीय परिवेश में उनके स्वर्णिम इतिहास को कभी भुलाया नहीं जा सकता| लेकिन अफ़सोस की देश के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर देने वाले ये शहीद आज इसी देश में उपेक्षित हैं|

23 जुलाई 1906 को मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भावरा गांव में जन्मे चंद्रशेखर आज़ाद एक शुद्ध परम्परावादी ब्राह्मण परिवार से आते थे| 1921 में महात्मा गांधी के द्वारा शुरू किये गए असहयोग आंदोलन में बढचढकर हिस्सा लेने वाले चंद्रशेखर आज़ाद को १५ वर्ष की अवस्था में अंग्रेजों के अत्याचार का शिकार होना पड़ा| हर बेंत पर महात्मा गांधी की जय का नारा लगाने वाले चंद्रशेखर आज़ाद को उस समय गहरी निराशा हुई जब उन्होंने यह आंदोलन वापस ले लिया| हालांकि आज उनकी पुण्यतिथि पर याद करने का यह मतलब नही है कि उनका जन्म कहाँ हुआ था या शिक्षा दीक्षा क्या हुई थी? दरअसल आज समाज जिस हालात में खड़ा में है उससे निकलने का रास्ता तलाशना ज्यादा ज़रुरी है| इस रास्ते को ढूंढने में चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह जैसे लोगों के विचार की प्रासंगिकता बढ़ जाती है|

आज़ादी के बाद देश की दशा और दिशा तय करने में अगर इन लोगों के द्वारा तैयार किये गए ढाँचे पर विचार किया गया होता तो शायद हम आज यह सवाल नहीं उठाते कि आज़ादी के छः दशकों बाद भी हम कहाँ है? गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी से क्यों जूझ रहे हैं? हर चेहरे पर खुशी और हर हाथ को रोजगार का जो सपना इन्होने देखा था वो आज भी अधूरा है|

सबसे आश्चर्यजनक तथ्य तो यह है आज़ादी आंदोलन के इन महानायकों को भुलाने की कोशिश हो रही है| पाठ्यपुस्तकों से इनकी जीवनी को जानबूझकर हटाया जा रहा है| कुछ देशभक्त सिर्फ़ जन्मदिवस और पुण्यतिथि पर कार्यक्रम आयोजन कर लंबे चौड़े भाषण देकर औपचारिकता पूरी कर लेते हैं| इन सबके बीच अगर कुछ छूट रहा है तो वह है आदर्श और विषमता रहित समाज की स्थापना जिसकी कल्पना इन्होने और इनके साथियों ने की थी|

क्या चंद्रशेखर आज़ाद ने सिर्फ़ अंग्रेजों को इस देश से भगाने के लिए अपने को देश सेवा में समर्पित किया था? कदापि नही| अंग्रेजों को भगाना उनका लक्ष्य ज़रुर था लेकिन दिमाग में एक स्वस्थ और सुन्दर भारत की रचना थी| लेकिन आज कितने लोग उनके इस व्यक्तित्व को जानना चाहते हैं? युवाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले चन्द्रशेखर आज़ाद को देश के युवा नहीं जानते हैं| उनके रोल मॉडल शाहरुख और कटरीना जैसे लोग हैं| आज इस स्थिति पर हमें खुद शर्मिंदगी महसूस हो रही है| अफ़सोस लेकिन कड़वा सच है कि देश का शासक वर्ग भी इन महापुरुषों को याद करना नहीं चाहता|

गिरिजेश् कुमार

Wednesday, February 23, 2011

पत्रकारिता में बदलाव :कल, आज और कल

पत्रकारिता: मिशन,प्रोफेशन और अब कॉमर्स

पत्रकार और पत्रकारिता की बात जब कभी भी की जाती है तो का सीधा मतइमादारी, सच और निष्पक्ष विचार जैसे शब्दों से होता है| लोकतान्त्रिक व्यवस्था में पत्रकारक पूल कीरह होता है जो आम लोग और सरकार के बीच अटूट बंधन से जुड़ा रहता है| आजादी आंदोल में पत्रकारिता की भूमिका को कोई नज़रंदाज़ नहीं कर सकता| लेकिन पीछे कुछ सालों से संघर्षशील पत्रकार हाशिए पर दिखाई दे रहे हैं और पत्रकारिता चाटुकारिता का पर्याय ब गयी है| सवाल, उसकी निष्पक्षता पर भी उठाये जा रहे हैं| पत्रकारिता में हुए इस अप्रत्याशित बदलाव के कारण क्षति, कहीं ना कहीं उस समाज को पहुच रही है जिसकी बेहतरी के लिए इसकी शुरुआत हुई थी| एक बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर वो कौन से कारण हैं जिसने इसे अपने मूल उद्देश्य से भटका दिया? इसपर चर्चा करना ज़रुरी है|

इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि बालगंगाधर तिलक और महात्मा गांधी जैसे स्वतंत्रता संग्राम के नायकों ने पत्रकारिता को ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध एक अचूक हथियार की तरह इस्तेमाल किया था और लोगों में जागरूकता फैलाई थी| लेकिन आज पत्रकारिता अपनी आत्मा और आवाज़ दोनों खो चुकी है| अपनी आत्मा ना बेचने वाले चंद मुट्ठीभर लोग ही बचे रह गए हैं| दरअसल वर्तमान में पत्रकारिता का मतलब सरकार, पूंजीपति और मालिकों की जी हुजूरी करना रह गया है| पत्रकारिता की यह विकट और विपरीत स्थति पुरे समाज को विना के गहरे अन्धकार में धकेल सकता है| सरकार और मालिक की चापलूसी और जी हुजूरी की होड में अखबार और टी वी चैनल इतने आगे निकल गए हैं कि वो अपने सिद्धांत और आदर्श की बलि चढाने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं| कभी पत्रकारिता मिशन थी फिर प्रोफेशन हुई और आज यह कॉमर्स में तब्दील हो चुकी है जो समाज के लि बेहद ही खतरनाक है|

शुरुआत में पत्रकार समाज का एक सजग प्रहरी हुआ करते थे वे सिर्फ़ प्रशासन और सरकार ही नहीं समा में व्याप्त गडबडियों की ओर भी इशारा करते थे| सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता के प्रतीक के तौर पर पत्रकारों को देखा जाता था| लेकिन आज इन्हें भी भ्रष्टाचार का कीड़ा काट चुका है| लोभ और लालच ने इन्हें भी पूरी तरह जकड रखा है और समाज से खोजी पत्रकारिता जैसी चीजें गायब हैं| पेड न्यूज़ के कारण संपादक रूपी बाड़ ही पत्रकारिता रूपी खेत को खा रही है| संपादक की सत्ता को अनुकूलित किया जा रहा है जिससे मीडिया, कॉर्पोरेट और व्यवसायिक घरानों का पुर्जा बनकर रह गया है| संपादक, दरअसल उस आदमी की आवाज़ है जिसे अनसुना किया जा रहा है लेकिन बाजारवाद और व्यावसायिकता की इस अंधी दौड में यह एक कठपुतली बनकर रह गया है|

आनेवाले समय में निश्चित ही वेब पत्रकारिता एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है| क्योंकि अब किसी की आवाज़ को दबाना इतना आसान नहीं रह गया है| संपादक नाम की संस्था के क्षरण को रोकने के लिए संपादकों को ही आगे आना होगा| अगर पत्रकार अपने पेशे के प्रति सत्यनिष्ठ रहे तो परिवर्तन के वाहक बन सकते हैं|

गिरिजेश कुमार

Sunday, February 13, 2011

उच्च शिक्षा के स्तर में गिरावट: तोडनी होगी चुप्पी

शिक्षा से ही मनुष्य महान बनता है| एक शिक्षित मनुष्य पुरे समाज को शिक्षित कर सकता है और उसे विकास के रास्ते पर अग्रसर कर सकता है| लेकिन पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा को भी बाजारू माल में तब्दील कर दिया गया है जो बहुत ही दुखद है| इसकी जद में सबसे ज्यादा उच्च शिक्षा है, इसलिए वर्तमान में उच्च शिक्षा का स्तर लगातार गिर रहा है| अब इसका उद्देश्य चरित्रनिर्माण या मनुष्य निर्माण न रहकर मुनाफा अर्जन करना रह गया है जो वर्तमान ही नहीं आनेवाली पीढ़ियों के लिए भी घातक है| समय रहते अगर इसपर गंभीरता पूर्वक विचार नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में बुरे परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं|

दरअसल हमें यह सोचना ज्यादा ज़रुरी है कि उच्च शिक्षा में गिरावट की इस वर्तमान स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है और क्यों उच्च शिक्षा से गुणवत्ता गायब है? भूमंडलीकरण और बाजारीकरण का प्रभाव सबसे ज्यादा उच्च शिक्षा पर पड़ा है| कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे शिक्षण संस्थानों से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कहीं गायब है और सिर्फ़ व्यापार हावी है| यहां सवाल शिक्षा व्यवस्था पर भी उठना लाजिमी है| हम आज भी १९३५ में बनाये गए लॉर्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति का अनुशरण कर रहे हैं जिसका उद्देश्य सिर्फ़ क्लर्क तैयार करना था| जिसकी परिणति आज यह है कि शिक्षण संस्थानों पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है और इसका नाजायज़ फायदा उठाकर संस्थान के मालिक छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करते हैं और मोटी रकम भी वसूल करते हैं| अब सवाल सिर्फ़ सोचने का नहीं कुछ करने का है| एक ठोस कार्य योजना और मजबूत नीति की ज़रूरत है जो इस समस्या को जड़ से उखाड़ सके|

उदारीकरण का सीधा असर भी शिक्षा पर ही पड़ा है| देश् और विदेश के पूंजीपतियों ने भारत में शिक्षा के रूप में बाजार को देखा और उन्होंने इसमें पूंजीनिवेश करना सुरक्षित समझा| देश में बड़े पैमाने पर खुल रहे निजी उच्च शिक्षण संस्थान इसके उदाहरण हैं, जो दूर दराज़ के भोले-भाले छात्रों को ऊँचे सपने दिखाकर अपनी ओर आकर्षित करते हैं और बदले में उन्हें कुछ नही मिलता| साथ ही सरकारी विश्वविद्यालयों को भी निजी हाथों में सौंपने और उसे ऑटोनोमस बनाने का कुत्सित प्रयास जारी है| उच्च शिक्षा में गिरावट का ये प्रमुख कारण है| आज उच्च शिक्षा आम लोगों की पहुँच से दूर होती जा रही है| गांव में रहने वाले गरीब किसानों के बेटे, मजदूरों के बेटों के सपने, पंख लगने से पहले ही टूट जाते हैं क्योंकि बड़े शिक्षण संस्थानों की मोटी फीस भरने में वो असमर्थ हैं| सवाल यह उठता है कि क्या उच्च शिक्षा पाने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है? क्या इंजीनियर और डॉक्टर की पदवी सिर्फ़ पैसे वालों के लिए है? दरअसल इस देश में कीमत, गरीबों को ही चुकानी पड़ती है| इस तथाकथित लोकतान्त्रिक व्यवस्था में कहने को तो जनता का राज चलता है लेकिन असलियत में इसकी चाबी उन चंद मुट्ठीभर पूंजीपतियों के हाथ में रहती है जो इस देश और संसाधनों को अपनी जागीर समझते हैं| इसलिए शिक्षा जैसी चीज़ भी व्यापार बन गया है|

हमें आश्चर्य तब होता है जब देश के शिक्षाविद, बुद्धिजीवी और समाज में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले लोग इस गंभीर मसलों पर चुप रहते हैं| क्या इस देश में नैतिकता नाम की कोई चीज़ नहीं बची है? समाज में इस गिरावट को देखकर भी वे चुप कैसे हैं? इस चुप्पी को तोडना ही होगा|

गिरिजेश कुमार

मो 09631829853

Monday, February 7, 2011

मिस्र से सबक लेने की ज़रूरत

महान क्रन्तिकारी शहीद भगत सिंह ने इन्कलाब को परिभाषित करते हुए कहा था- बम और पिस्तौल कभी इन्कलाब नहीं लाते, इन्कलाब की तलवार तो विचारों की शान पर तेज होती है|” और विचारें कभी मरती नहीं| सदियों पहले कही गयी यह बात आज भी कितनी प्रासंगिक है इसका ताज़ा उदाहरण मिस्र में देखने को मिल रहा है| ३० सालों के शासन से उब चुके वहाँ की जनता ने अब आर पार की लड़ाई का फैसला कर लिया है|

जन संचार माध्यमों से जो ख़बरें मिल रही हैं उसे देखकर जनसमूह की ताकत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है| मिस्र के हालात पूरी दुनिया के लिए सबक है| और यह साबित करती है कि जनशक्ति के सामने कोई भी ताकत टिक नहीं सकती| लेकिन बड़ा सवाल ये है कि इस घटना से भारत का क्या ताल्लुक हो सकता है? ताल्लुक ज़रूर है| किसी भी देश में लोकतंत्र का होना बड़े गर्व की बात होती है लेकिन इसकी कमजोरियों को नजरंदाज करना उतने ही बड़े शर्म की बात है और दुर्भाग्य से हमारे देश में यही हो रहा है| देश में होने वाले ज्यादातर अपराध उन चारदीवारियों के अंदर होते हैं जिसके अंदर जाने के लिए आम आदमी को इज़ाज़त नहीं है और जिन्हें हम सरकारकहते हैं| इन अपराधों में भ्रष्टाचार से लेकर घूसखोरी और नियमों के उल्लघन से लेकर निजी स्वार्थ की पूर्ति और उसके लिए देशहित की बलि तक शामिल है|

मध्य पूर्व में चल रहे इस आंदोलन में एक और बात गौर करने वाली है वह यह कि इसमें ज्यादातर युवाओं और छात्रों की संख्या है| यहां यह सवाल लाजिमी है कि क्या हमें इनसे सीख नहीं लेनी चाहिए? देश में बड़े पैमाने पर फैले समस्याओं से आखिर हम कब उबेंगे? हमारे यहां तो ६० सालों से लोकतंत्र की आड़ में लोगों का शोषण हो रहा है| हिंसा, उपद्रव या अशांति किसी समस्या का सामाधान नहीं है लेकिन जनांदोलन भी ज़रुरी है| ताकि सरकार को जनता की ताकत का अंदाज़ा लग सके और और उन्हें यह आभास हो सके जनशक्ति किसी भी सैन्यशक्ति से बढ़कर है| इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा हुआ है|

हम उम्मीद करते हैं इन आंदोलनों से शासक वर्ग कुछ सबक ज़रूर लेगा|

Friday, February 4, 2011

मिस्र से सबक लेने की ज़रूरत

महान क्रन्तिकारी शहीद भगत सिंह ने इन्कलाब को परिभाषित करते हुए कहा था- “बम और पिस्तौल कभी इन्कलाब नहीं लाते, इन्कलाब की तलवार तो विचारों की शान पर तेज होती है|” और विचारें कभी मरती नहीं| सदियों पहले कही गयी यह बात आज भी कितनी प्रासंगिक है इसका ताज़ा उदाहरण मिस्र में देखने को मिल रहा है| ३० सालों के शासन से उब चुके वहाँ की जनता ने अब आर पार की लड़ाई का फैसला कर लिया है|

जन संचार माध्यमों से जो ख़बरें मिल रही हैं उसे देखकर जनसमूह की ताकत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है| मिस्र के हालात पूरी दुनिया के लिए सबक है| और यह साबित करती है कि जनशक्ति के सामने कोई भी ताकत टिक नहीं सकती| लेकिन बड़ा सवाल ये है कि इस घटना से भारत का क्या ताल्लुक हो सकता है? ताल्लुक ज़रूर है| किसी भी देश में लोकतंत्र का होना बड़े गर्व की बात होती है लेकिन इसकी कमजोरियों को नजरंदाज करना उतने ही बड़े शर्म की बात है और दुर्भाग्य से हमारे देश में यही हो रहा है| देश में होने वाले ज्यादातर अपराध उन चारदीवारियों के अंदर होते हैं जिसके अंदर जाने के लिए आम आदमी को इज़ाज़त नहीं है और जिन्हें हम ‘सरकार’ कहते हैं| इन अपराधों में भ्रष्टाचार से लेकर घूसखोरी और नियमों के उल्लघन से लेकर निजी स्वार्थ की पूर्ति और उसके लिए देशहित की बलि तक शामिल है|

मध्य पूर्व में चल रहे इस आंदोलन में एक और बात गौर करने वाली है वह यह कि इसमें ज्यादातर युवाओं और छात्रों की संख्या है| यहां यह सवाल लाजिमी है कि क्या हमें इनसे सीख नहीं लेनी चाहिए? देश में बड़े पैमाने पर फैले समस्याओं से आखिर हम कब उबेंगे? हमारे यहां तो ६० सालों से लोकतंत्र की आड़ में लोगों का शोषण हो रहा है| हिंसा, उपद्रव या अशांति किसी समस्या का सामाधान नहीं है लेकिन जनांदोलन भी ज़रुरी है| ताकि सरकार को जनता की ताकत का अंदाज़ा लग सके और और उन्हें यह आभास हो सके जनशक्ति किसी भी सैन्यशक्ति से बढ़कर है| इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा हुआ है|

हम उम्मीद करते हैं इन आंदोलनों से शासक वर्ग कुछ सबक ज़रूर लेगा|

गिरिजेश कुमार

मो 09631829853