Pages

Subscribe:

Sunday, September 26, 2010

रियलिटी शो का उद्देश्य क्या है?

काले परदे के पीछे भूमंडलीकरण का निःशब्द कदम धीरे-धीरे सभ्यता का प्रकाश मलिन कर जिस अंधकारमय जगत की ओर लोगों को ले जा रहा है वह चित्र देखने लायक आँख, और समझने लायक मन आज कितने लोगों में है? प्रेम जैसी सुन्दर अनुभूति को भुलाकर, चकाचौंध रोशनी के बीच शरीर का विकृत प्रदर्शन और सेक्स के मध्यम से समाज को विषाक्त बनाने की कोशिश हो रही है| इसी परिकल्पित प्रयास का ही एक नाम है,”रियलिटी शो”| जिसका मतलब है “यथार्थ का प्रदर्शन”|

क्या मनोरंजन के नाम पर शिशु के शैशव को नष्ट किया जा सकता है? हमें अफ़सोस इस बात का होता है इस चकाचौंध के बीच अभिभावक भी खो जाते हैं| संगीत, नृत्य और अभिनय के नाम पर आज बहुत सारे कार्यक्रम टेलीविज़न चैनलों पर दिखाए जा रहे हैं| शब्द और सुर का मिलन ही संगीत है यह सुननेवाले के मन में एक अनुभूति पैदा करता है| संगीत और नृत्य भाव-अभिव्यक्ति के उन्नत माध्यम माने गए हैं| लेकिन वर्तमान में प्रसारित कार्यक्रमों में उन्नत कला तो दूर सिर्फ़ विकृत मानसिकता की झलक ही दिखाई देती है| जज की कुर्सी पर बैठे हुए लोग कलाकारों का मानसिक शोषण करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते|

ध्यान देने की बात है कि इन कार्यक्रमों से जितने भी प्रतिभावान लोगों को चुना जाता है वे बाद में कहाँ खो जाते हैं? क्या उन्हें वास्तव में कोई आधार मिलता है? ऐसा नहीं है प्रतिभावान लोग नहीं है लेकिन बाजारवाद के इस चकाचौंध में वे कहीं खो जाते है|दरअसल ऐसे कार्यकर्मों के आयोजन का उद्देश्य प्रतिभावान लोगों को ढूँढना है ही नहीं, और न ही वे इसके प्रति गंभीर हैं| बल्कि उन्हें सिर्फ़ अपने व्यापार से मतलब है|

इसलिए मनोरंजन के नाम पर ऐसे कार्यक्रमों को दिखाने की इज़ाज़त नहीं मिलनी चाहिए जिससे समाज में बेहतरी के बदले गलत चीज़ें न फैले|

Friday, September 24, 2010

बारिश, बाढ़ और विनाश: जिम्मेदार कौन?

प्राकृतिक आपदाओं पर इंसान का वश नहीं रहता है लेकिन क्या यह सोचकर हम यूँ ही हाथ पर हाथ धरे बैठे रह सकते हैं? आज देश की राजधानी दिल्ली सहित देश के कई राज्य बाढ़ की चपेट में हैं| मूसलाधार बारिश और बाढ़ से आम लोगों की ज़िंदगी नर्क बन गई है, लोग अपने जान माल की रक्षा के लिए त्राहि-त्राहि हैं| बारिश और बाढ़ ने विनाशकारी रूप धारण कर लिया है लेकिन क्या हमने कभी सोचने की कोशिश की है कि ऐसा क्यों हो रहा है? हमारी संवेदना उन लोगों के साथ है जो इससे प्रभावित हैं| हम उनके साथ सहानुभूति रखते हैं जिन्होंने अपने परिजनों को खोया| लेकिन इन सबके लिये क्या मनुष्य जिम्मेदार नहीं है?

प्राकृतिक संसाधनों के असीमित दोहन से आज प्राकृतिक असंतुलन हो रहा है| आधुनिक होने कि चाह ने हमें अपने ज़मीन से अलग कर दिया है| प्रदुषण के कारण आज ग्लोबल वार्मिंग का खतरा मंडरा रहा है जो पूरी मानव सभ्यता को ही लील जाने को आतुर है| हमें अफ़सोस होता है कि अपना विनाश सामने देखकर भी हम सतर्क नहीं हैं| बिहार में बाढ़ से ज्यादा तरजीह चुनाव को दी जा रही है| सरकार से लेकर कोई भी इसके कारणों को जानने कि कोशिश नहीं कर रहा है जो सबसे दुखद है| विकसित राष्ट्र इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं|

इसकी नैतिक ज़िम्मेदारी मनुष्य को लेनी चाहिए| और पृथ्वी पर मंडरा रहे इस भयंकर खतरे के लिए एकजुट होकर प्रयास करना चाहिए| वरना मानव सभ्यता का विनाश हो जायेगा|

Tuesday, September 21, 2010

अयोध्या मसला:हँगामा क्यों है बरपा?

पूरे विश्व में मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम से जाने जानेवाले भगवान श्रीराम की धरती अयोध्या आज भय,आतंक, और संगीनों के साये में अपने अतीत को मुहँ चिढ़ा रही है| आगामी २४ सितम्बर को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा अयोध्या के रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक को लेकर फैसला आने वाला है लेकिन इम्तिहान की घड़ियाँ पहले से ही शुरू हो चुकी है| लेकिन एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य में ऐसा कहना क्या हास्यास्पद नहीं है? फिर किस धर्मनिरपेक्षता पर गर्व करते हैं हम जहाँ एक छोटे से फैसले के लिए संगीनों की दीवार खड़ी करनी पड़ती है?

सच तो यह है की इस देश को साम्प्रदायिकता की आग में धकेलने के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार राजनीतिक पार्टियां और उससे जुड़े संगठन रहे हैं| इसे न्यायालय में इतने दिनों तक लटकाने की ज़िम्मेदारी भी इनकी है| और अब जब न्यायपालिका इसका पटाक्षेप करने की तैयारी कर चुकी है, इसके विपरीत माहौल बनाने का कुत्सित प्रयास भी यही लोग कर रहे हैं| हम मानते हैं कि यह एक गंभीर और संवेदनशील मामला है| इसमें सहनशीलता बहुत ज़रुरी है| लेकिन परदे के पीछे क्या चल रहा है इसपर नज़र रखी जानी चाहिए|

धर्म किसी भी व्यक्ति का निजी मामला है इसपर राजनीति कतई जायज़ नहीं है| आमलोगों को भी चाहिए की वो सिर्फ़ भावनाओं में बहकर कोई फैसला न ले, अफवाहों के पीछे न भागकर सच और झूठ की तहकीकात करने के बाद ही कोई निर्णय लें| ताकि निर्दोष लोग बेवजह किसी हादसे का शिकार न हों| हम उम्मीद करते हैं कि भारतीय इस घडी में संयम से काम लेंगे|

Monday, September 20, 2010

...और मौत से हार गई जिंदगी!

...और मौत से हार गई जिंदगी! पटना नगर निगम कर्मचारी दयानंद अपने सपनों को सदा के लिए कुर्बान कर इस दुनिया से अलविदा हो गया| पिछले दिनों नगर निगम कर्मचारी दयान्द ने आत्मदाह करने कि कोशिश कि थी जिसमे वह ५० फीसदी जल गया था| कल उसने अस्पताल में दम तोड़ दिया| अपने पीछे बहुत सारे सवालों को छोड़कर| लेकिन इस मौत कि ज़िम्मेदारी कौन लेगा? सरकार, समाज या फिर सामाजिक व्यवस्था? क्या मिले उसे? वेतन, इज्ज़त, शोहरत, इनाम में मौत ज़रूर मिली| जिस बदहाली और तंगहाली से क्षुब्ध होकर उन्होंने मौत को गले लगाया क्या इससे उनका परिवार उबार पायेगा? ये वो दयानंद है जिसे आज हम जान रहे हैं क्योंकि वह इस भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ नहीं पाया, लेकिन इस देश में ऐसे कितने दयानंद हैं इसकी कोई जानकारी किसी के पास उपलब्ध नहीं है| हम बार बार ‘दयानंद’ शब्द उपयोग करने पर मजबूर हैं क्योंकि आज यह हमारे समाज के लिए एक उदाहरण बन गया है|

हर तरफ चुनावी माहौल और ५ साल तक लूट करने के छूट के जुगाड में तमाम राजनीतिक पार्टियां लगी हुई हैं,ऐसे में दयानंद और उसके परिवार की आवाज़ कहीं गुम हो जायेगी| कोई भी इस तरफ ध्यान शायद नहीं देगा| लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि सरकारी उदासीनता ने एक इंसान को हैवान बनने पर मजबूर कर दिया| भले ही कीमत उसने खुद चुकाई हो| जब किसी घटना से दिल आहत होता है तो असहनीय दर्द होता है| फिर चाहे दोष व्यक्ति का हो या व्यवस्था का| लेकिन पता नहीं हम, हमारी तथाकथित लोकतांत्रिक सरकार और यह व्यवस्था, दयानंद जैसे कितने लोगों कि आहुति लेगी?

Sunday, September 19, 2010

ऐसा लड़कियों के साथ ही क्यों होता है ?

जिस राज्य में ३ दशकों से मजदूर पार्टी का राज है उस राज्य में पिछले १ साल में २५०० नाबालिग लड़कियों के गायब होने की खबर न सिर्फ़ उस सरकार बल्कि उस पार्टी के विचारधारा पर भी प्रश्नचिन्ह लगाती है| पश्चिम बंगाल में कल इस खबर का खुलासा हुआ| मार्क्सवादी विचारधारा से लैस ये मजदूर वर्ग की तथाकथित पार्टी की सरकार क्या इसका स्पष्टीकरण देगी? आखिर ऐसा लड़कियों के साथ ही क्यों होता है? भ्रूण हत्या हो या सामाजिक भेदभाव| सबसे ज्यादा प्रभावित इन्हें ही होना पड़ता है| क्या सच में लडकियां व महिलाएं उपभोग की वस्तु हैं जिसे यह तथाकथित आधुनिक समाज सिर्फ़ उपयोग के लिए इस्तेमाल करता है?

प्राचीन काल से महिलाओं को देवी की प्रतिमूर्ति कहा जाता है| जिस देश में शक्ति स्वरुप माँ दुर्गा सहित विभिन्न देवियों की पूजा की जाती है उस देश के लिए इससे बढ़कर शर्म की बात और क्या होगी? दिखावे की पूजा के लिए तो हम अरबों रूपये खर्च कर देते हैं लेकिन अपने गिरेबान में कभी झांककर देखने की कोशिश नहीं करते जहां लड़कियों और महिलाओं के साथ सरेआम दुर्व्यवहार होता है, जबरन वेश्यालयों में देह व्यापर को मजबूर होना पड़ता है| किस भ्रष्ट सामाजिक व्यवस्था में जीने को विवश हैं हम, जहाँ आधी आबादी अपने हक से वंचित है? उसकी ज़िंदगी गम और अंधियारों के उस तबेलों में जलती रहती है जिसके नीचे आग तो है लेकिन उसकी ज्वाला की लौ इतनी धीमी है कि वह इसे जलाकर राख करने में असक्षम है|

आखिर ढाई हज़ार लडकियां किन परिस्थितियों में गायब हुई, शायद इसका ज़वाब देने कि कोई जुर्रत नहीं करेगा| हमारी सामाजिक संवेदना इतनी मर चुकी है हमें इन सवालों पर सोचने का समय ही नहीं है इसलिए यह खबर मीडिया से भी गायब रही| हम भूल जाते हैं वो लडकियां भी हममे से किसी कि बेटी है किसी कि बहन है| तो फिर जिंदगी की सीढ़ी पर कदम रखने के पहले इन लड़कियों के साथ ऐसा बर्ताव क्यों हो रहा है? कौन देगा इसका ज़वाब?