Pages

Subscribe:

Monday, July 25, 2011

उदारीकरण ने आम आदमी को क्या दिया?


                उदारीकरण के 20 साल, आखिर हासिल क्या हुआ?
          
विकास के लिए विदेशी पूँजी निवेश की चाह लिए तक़रीबन दो दशक पहले जिस उदारीकरण को तात्कालीन नरसिंह राव की कांग्रेस सरकार ने इस देश मे लागू किया उसने आम आदमी को आखिर दिया क्या? आज जब उदारीकरण को २० साल हो चुके हैं तो सबसे बड़ा सवाल यही उभरकर सामने आता है| उदारीकरण को लेकर न जाने कितने ही तर्क, वितर्क और कुतर्क दिए जाते हैं लेकिन वास्तविकता क्या है? यदि इस ‘उदारीकरण’ को आम आदमी के दृष्टिगत देखा जाए, जिसके लिए सारी योजनाएं बनती हैं और नीतियों का निर्धारण किया जाए जाता है भले ही उसकी हकीकत कुछ भी हो, तो यह सिर्फ़ एक धोखे के अलावा कुछ भी नही है| सच तो यह है कि उदारीकरण ने सीधे-सीधे पूंजीपतियों को लाभ पहुँचाया, आम आदमी की आर्थिक स्थिति तो और बिगड़ती चली गयी| अमीर और गरीब के बीच जो खाई दरअसल आज इस देश मे है उसकी जड़ मे भी उदारीकरण और पूंजीपतियों की पूँजीलोलुपता है| मुनाफे आधारित व्यवस्था की नींव पर विकास की लकीर खींची जाये तो वह किसके हित मे होगा यह सहज ही समझा जा सकता है?
20 साल पहले बजट पेश करते हुए तात्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने जो स्थिति देश के सामने रखी थी उससे बचने का रास्ता उदारीकरण के रूप मे ढूंढकर भले ही वाहवाही लूटी हो लेकिन इसके दुष्प्रभावों के दूरगामी परिणाम की फ़िक्र किसी को नहीं थी| उस समय वित्तीय असंतुलन के कारण देश के पास महज 15 दिनों के आयात के लायक विदेशी मुद्रा भण्डार बचा था सवाल है क्यों? पिछली कांग्रेस, संयुक्त मोर्चा और जनता दल सरकारों की गलत नीतियों के कारण हमें राष्ट्रीय शर्म भी झेलनी पड़ी और बैंक ऑफ इंग्लैंड से लोन लेने के लिए 47 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था| इसके अलावा मंहगाई का सवाल तब भी था| इन सबके बीच सवाल यह उठता है कि अगर इससे बचने का रास्ता उदारीकरण था तो आज वही सवाल उसी अवस्था मे या कहें की उससे भी बदतर अवस्था मे मुँहबाएं क्यों खड़ा है?
दरअसल सच यह है कि हमने जी डी पी रेट को अपने विकास का पैमाना मान लिया है और हमें लगता है कि हम विकसित हो रहे हैं| जबकि दूसरी तरफ कड़वा सच यह भी है कि देश बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी,बेकारी,असमानता, जो उदारीकरण की ही देन है, की गिरफ्त मे फँसा हुआ है| मशीनी युग ने आम आदमी से उसकी रोजी-रोटी छीन ली है| अमीरों को अमीर और गरीबों को और गरीब करना उदारीकरण का एकमात्र मकसद है| सवाल है जो देश मानव संसाधनों से परिपूर्ण है, जहाँ आत्मनिर्भर होने की असीम संभावनाएं थी और हैं भी वहाँ उदारीकरण की ज़रूरत क्यों पड़ी? उदारीकरण तो सिर्फ़ 10-15 प्रतिशत लोगों को सुख दे रहा है बाकी तो उसका अभिशाप ही झेल रहे हैं| फिर इस उदारीकरण के मायने क्या हैं?
 इस उदारीकरण को अगर आंकड़ों की नजर से  देखा जाए तो परिवहन  के क्षेत्र मे 1991 मे कुल 2296800 किमी सड़कें थी| एन एच 33690 किमी, रेल 62571 किमी और विद्युतीकृत रेल लाइन 10809 किमी थी| जबकि 2011 में कुल 33.4 लाख किमी सड़क है| जिसमे एन एच 65569 किमी और स्टेट हाईवे 130000 है| रेल लाइन की कुल लम्बाई 64215 किमी है जबकि विद्युतीकृत रेल लाइन 17811 किमी| वहीँ संचार के क्षेत्र मे 1991 मे कुल टेलीफोन कनेक्शन 50 लाख था जबकि अभी 6212.80 लाख है| 1991 मे कुल बेरोजगारी 9.02 मिलियन थी, 2004-05 में 10.51 मिलियन जबकि अभी 16.00 मिलियन है| यानी संचार क्षेत्र को छोड़ देन तो उदारीकरण से विकास की कुछ खास लकीर नहीं खींची जा सकी है| बेरोजगारी तो लगभग दो गुणी ज्यादा हो चुकी है| लेकिन जरा आज से ठीक 20 साल पहले चलते हैं जब तात्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने ऐतिहासिक बजट भाषण मे विक्टर ह्यूगो को उद्धृत करते हुए कहा था “दुनिया की कोई ताकत उस विचार को नहीं रोक सकती जिसका समय आ गया है”| आज यही सवाल तत्कालीन वित्तमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी से नही पूछा जाना चाहिए कि क्या उदारीकरण का वास्तविक समय आ गया था? फिर जब आज हालात ऐसे हैं तो आर्थिक सुधारों की शुरुआत की घोषणा को किस तरह संकट के भीतर से भविष्य की इबारत लिखना कहा जा सकता है?

गिरिजेश कुमार


  

Sunday, July 17, 2011

पूंजीपतियों पर हमला हो, तब हिलती है सरकार

 कह सकते हैं कि धमाकों के सिर्फ बारह घंटे बाद ही जिस तरह से मुंबई अपने रंग मे आ गई और लोग सड़कों पर उसी तरह से दौड़ने लगे जैसे कुछ हुआ ही नहीं, वो हमारी जिजीविषा, मुश्किलों से लड़ने की हमारी शक्ति और इंसानियत के हत्यारों के खिलाफ़ हमारी एकजुटता को प्रदर्शित करती है| हम यह भी कह सकते हैं कि चूँकि मुंबई के लिए यह कोई नई बात नहीं थी इसलिए वापस पटरी पर आने में उसे अपेक्षा से भी कम समय लगे, लेकिन क्या हम इतने से ही संतुष्ट हैं?

दरअसल हर आतंकी घटना इतिहास के पन्नों मे अपना अमिट नाम दर्ज कराती है और उन लोगों के लिए न भूलने वाली यादें छोड़ कर जाती है जो ऐसी घटनाओं मे मारे जाते हैं| अफ़सोस तब होता है जब जनता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध प्रशासनिक तंत्र और सरकारें गैरजिम्मेदाराना रवैया अपनाती हैं| मुंबई हादसों के बाद जनता के इन तथाकथित हिमायती नेताओं का बयान उन पीड़ितों पर नमक छिडकने जैसा है, जो इसके शिकार हुए हैं| लेकिन सवाल है हर आतंकी घटनाओं के बाद या किसी हादसे के बाद जो राजनीतिक समीकरण दरअसल इस देश मे बनाये जाते हैं और सियासी फ़ायदे ढूंढने की जो कुत्सित कोशिश होती है वह एक सभ्य लोकतान्त्रिक समाज के लिए कहाँ तक जायज है? सच मानिए तो लोकतान्त्रिक समाज कहने का भी मन नहीं करता| आखिर ऐसी परिस्थितियाँ क्यों बनी?
 इस देश के नेताओं की राजनीतिक समझ इसी बात से ज़ाहिर होती है कि वो ३१ महीने तक बम विस्फोट न होना अपने सरकार की उपलब्धि मानते हैं तो दूसरे नेता क्षेत्रवाद के तराजू पर इसे तौलते हैं| मीडिया भी इसे मसाला मारकर प्रस्तुत करता है और बजाये आलोचना के उसे अख़बारों के पहले पन्ने पर जगह मिलती है और न्यूज़ चैनलों की पहली खबर बनती है| जो लोग मारे गए या जो घायल हुए उनके प्रति हमदर्दी या संवेदना के दो शब्द किसी ने नहीं कहे| क्योंकि इसमें आम लोग मारे गए थे| उनकी न तो कोई राजनीतिक पहुँच थी और न ही वे पूंजीपति थे| आम जनता की तथाकथित हितैषी सरकारों की दोहरी मानसिकता का अंदाज़ा सिर्फ इस घटना से लगाया जाता है| जब 26 नवंबर 2008 को उसी मुंबई मे आतंकी हमला हुआ था तो राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री समेत केन्द्रीय गृहमंत्री तक को जाना पड़ा था क्योंकि वह हमला पूंजीपतियों की छाती पर हुआ था| और कहना न होगा कि इस देश मे पूंजीपतियों का अघोषित राज है| आतंक के विरोधी हम भी हैं लेकिन आतंकी घटनाओं पर जनता के साथ दोहरे व्यवहार का कतई समर्थन नहीं किया जा सकता| वह भी आम जनता के द्वारा चुनी गई सरकारों द्वारा|

इस घटना के लिए क्या सरकार जिम्मेदार नहीं है? जिस मुंबई मे ए टी एस, मुंबई पुलिस सहित कई आतंक निरोधी एजेंसियां काम करती हैं वहाँ बार-बार हमला करने मे आतंकी सफल कैसे हो जाते हैं? आखिर आतंकी घटनाओं को रोकने मे हमारा सुरक्षा तंत्र नाकाम क्यों रहता है? क्या यह सवाल जायज नहीं है कि बिना किसी घरभेदिये के किसी भी आतंकी वारदातों को अंजाम नहीं दिया जा सकता? तो फिर वह घरभेदिया कौन है? उसे ढूंढने की जिम्मेदारी किसकी है? आतंक के आकाओं को उसके घर मे घुसकर मारने की राजनीतिक इच्छाशक्ति हमारे अंदर क्यों नहीं है? बाहर की तो छोडिये जो हमारे घर के अंदर हैं उन्हें क्यों जिंदा रखा गया है? अफजल गुरु और कसाब अब तक जिन्दा क्यों है? एक बड़ा सवाल यह भी है कि सुरक्षा एजेंसियों और जाँच एजेंसियों के बीच आपसी तालमेल क्यों नही है? इन  सवालों के जवाब आज हर भारतीय तलाश रहा है| लेकिन जवाब के बदले उसे निराशा हाथ लगती है| इस हताशा और निराशा से विचलित होकर आज का युवा वर्ग अगर अनापेक्षित कदम उठा ले तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? यह इस देश की विडंबना है कि यहाँ कसाब और अफजल जैसे मानवता के हत्यारों के लिए भी मानवीय संवेदनाएं आड़े आती हैं| लेकिन वही मानवीय संवेदना अकाल मौत के शिकार हुए लोगों के लिए नहीं दिखती|
इसलिए सवाल सिर्फ आतंकी घटनाओं मे मारे जाने वाले लोगों का नहीं है सवाल उस नजरिये का भी है जो सरकारों का आम लोगों के प्रति होता है| देश भ्रष्टाचार, काले धन और सियासी चालों मे कौन कितना ताकतवर है, मे फँसा हुआ है राजनीतिक शुचिता की परवाह किसी को नहीं है| आखिरी सवाल ये कि 11 जुलाई 1993,26 नवंबर 2008,13 जुलाई 2011 के बाद अगली तारीख कौन सी होगी?

गिरिजेश कुमार


Wednesday, July 13, 2011

आम जनता में बनी नकारात्मक छवि बदलें देश के नेता

 समाज और देश का नेतृत्व करना सब के वश की बात नहीं होती| यह काम नेताओं का होता है, एक नेता वह होता है जिसके दिमाग मे समाज के विकास की दूरदर्शी योजनाएं होती हैं| उसकी जिंदगी का हर एक मिनट अपने देश की तरक्की और नए मुकाम हासिल करने के रास्तों पर विचार करने मे बीतता है| नेता जी सुभाष चन्द्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आजाद,सरदार बल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री इसी श्रेंणी के अंतर्गत आते हैं| और भी ऐसे कई नाम हैं जो इस श्रेंणी मे आते हैं| लेकिन अफ़सोस कि विरासत मे सौंपी गई इन नेताओं के नेतृत्वरूपी कृतित्व पर चलने वाला आज कोई नेता इस देश मे नहीं है| आज जितने भी नेताओं का चोला पहनकर अपने आप को नेता समझे बैठे हैं उनमे से एक भी ऐसे नहीं हैं  जिन्हें हम नेता कह सकें| ये सभी कुर्सीधारक हैं जो वक्त की नजाकत को देखकर पाला बदल लेते हैं| निजिहित को तवज्जो देने वाले कभी नेता नहीं कहला सकते| त्याग, बलिदान और जनता के दुःख-दर्द मे भागीदार बनना कोई नहीं चाहता इसलिए वर्तमान मे इन चोला धारक नेताओं के हर काम को लोग शक की निगाह से देखते हैं| सवाल है आखिर आम लोगों मे नेताओं की ऐसी छवि क्यों बनी?
दरअसल इसके लिए जिम्मेदार खुद यहीं लोग हैं| नेताओं ने जनता के विश्वासों का ऐसा मजाक बनाया कि जिससे लोग नेता शब्द से ही घृणा करने लगे| राजनीति, समाजिक ढाँचे को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करने का जरिया है लेकिन वर्तमान राजनीतिक पार्टियों और उसके कर्ताधर्ता कुछ नेताओं ने से इसे व्यवसाय बना दिया| ऐसे मे जनहित की बात सोचने वाला कौन है? देश मे 545 सांसदों मे 300 करोड़पति हैं| जिस देश की 70 प्रतिशत आबादी 20 रूपये से कम की रोज की आमदनी पर जिंदा हो उस देश की उसी आबादी का जन प्रतिनिधि करोड़पति है, इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे?
यहाँ हर नेता एक दूसरे की लोकप्रियता का दुश्मन है| कोई नेता अगर आगे बढ़कर जनता के लिए कुछ करना चाहता है, उसके सुख-दुःख का साझीदार बनना चाहता है तो विपक्षी पार्टियों को उसमे सियासी फ़ायदे के लिए सस्ती लोकप्रियता दिखाई देती है| उन्हें लगता है कि इससे उनकी पार्टी का बंटाधार हो जायेगा इसलिए उल जलूल बयान देकर किसी तरह ध्यान हटाया जाये| यहाँ हमाम मे सब नंगे वाली कहावत चरितार्थ होती है ऐसे मे ज़मीन और जनता के लिए संघर्ष करने वाली पार्टी या नेता दिखाई नहीं देते| चुनावी सभाओं मे बड़े-बड़े शब्दों का प्रयोग कर जनता को बरगलाने की कोशिश सभी करते हैं लेकिन हकीकत मे राजनीति की गन्दी चाल चलकर कुर्सी पाना मूल मकसद होता है|
आज देश जिस तरह से अराजक स्थिति मे पहुँच गया है ऐसा कौन दूरदर्शी नेता है जो भविष्य की वास्तविकता को बता सके? जबकि मौलाना अबुल कलाम आजाद ने 1946 मे ही भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के सुगबुगाहट के समय ही पाकिस्तान की स्थिति और भारत पर पड़ने वाले असर की विवेचना कर दी थी| मौलाना कोई ज्योतिषी या भविष्यद्रष्टा नहीं थे लेकिन दरअसल कुर्सीधारकों और नेता मे यही फर्क होता है|  लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान का नारा दिया था, उस समय जब सरकार पर संकट आई तो इन्ही किसानों ने अपने खुद के कमाए पैसे और गहनों से सरकार की मदद की थी लेकिन आज सरकारें खुद किसानों को लूट रहीं हैं,बदले मे  हक मांगने पर  लाठी और गोली मिलती है| इस सच को चाहे आज हम स्वीकार करें या न करें लेकिन जो स्थिति इस देश मे बनी हुई है वह कतई एक सभ्य समाज मे स्वीकार करने योग्य नहीं है|
सवाल यह भी है कि एक दूसरे के नुक्ताचीनी करने मे फंसे देश के नेताओं को  आम जनता मे बनी नकारात्मक छवि को बदलने के प्रयास नहीं करने चाहिए? सच मानिए तो इसी मे उनका और देश का भला है|

 गिरिजेश कुमार

Monday, July 11, 2011

रेल हादसा: मुआवजों से तय होती है जिंदगी की कीमत

 दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क रेल हादसे रोकने मे नाकाम है| जिस रेल से भारत मे प्रतिदिन करीब सवा करोड़ लोग सफ़र करते हैं उनकी सुरक्षा राम भरोसे है और रेलवे उनकी जिंदगी की कीमत मुआवजों से तौलता है| गौरतलब है कि एक ही दिन मे दो बड़े रेल हादसों ने रेलवे की कार्यशैली को एक बार फिर कठघरे मे खड़ा कर दिया है| उत्तरप्रदेश मे मालवां स्टेशन के पास कालका एक्सप्रेस काल बन गई तो असम मे पुरी-गुवाहाटी एक्सप्रेस दुर्घटना ग्रस्त हो गई| कालका एक्सप्रेस दुर्घटना मे  69 लोग मारे जाने की पुष्टि हो चुकी है और तक़रीबन 245 घायल हैं तो पुरी-गुवाहाटी एक्सप्रेस से 70 लोगों के घायल होने की सूचना है| ये आंकड़े बढ़ सकते हैं| लेकिन याद कीजिये तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी ने फ़रवरी मे जब रेल बजट पेश किया था तो कहा था –“रहा गुलशन तो तब फूल खिलेंगे, रही ज़िंदगी तो कामयाबी मिलेगी” लेकिन कालका मेल दुर्घटना मे न तो गुलशन रहा न जिंदगी| इस भयानक मंजर की जो तस्वीरें टेलीविजन स्क्रीन पर आ रही हैं ज़ाहिर है स्थिति उससे भी बुरी है| लेकिन सवाल है हर हादसों के बाद जांच आयोग गठित कर दोषियों को सजा देने की घोषणा करने वाला और लोगों के उजड़े गुलशन को कागज के चंद नोटों से आबाद करने की असफल कोशिश करने वाला रेल मंत्रालय आखिर चेतेगा कब?
एक अनुमान के अनुसार देश में हर साल औसतन 300 छोटी-बड़ी रेल दुर्घटनाएँ होती हैं| आश्चर्य यह कि हर बार जांच के लिए टीम गठित होती है, रिपोर्ट भी आती है लेकिन सबक लेने की कोशिश नहीं होती और न ही दोषियों को सजा मिलती है| दर्द और त्रासदी की इस भयावहता को भुक्तभोगी ही समझ सकता है| सवाल यह भी है कि आम आदमी की सुरक्षा के लिए इस देश मे दरअसल जो रणनीति बनायीं जाति है और जो बजट आवंटित किया जाता है क्या उससे पूर्ण सुरक्षा उपलब्ध कराई जा सकती है? सोचने वाली बात यही है फिर चाहे वह रेल मंत्रालय हो या गृह मंत्रालय|
अपने आप को दुनिया के विकसित देशों की श्रेणी मे खड़ा करने की महत्वाकांक्षा लिए यह देश इंसानी लापरवाही को रोकने मे अबतक सक्षम नहीं हो सका| जबकि यह प्रमाणित तथ्य है कि ज्यादातर रेल हादसे रेलवे कर्मचारियों और अधिकारीयों की लापरवाही से होते हैं| विडंबना यह भी है कि गुलाम देशों के जमघट जिस कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए करोड़ों रूपये की हीलियम गैस गुब्बारों मे भरकर उड़ा दी गई और करोड़ों का घोटाला कर लिया गया उसी पैसों से आजादी के 64 साल बाद भी वह तकनीक इस देश नहीं आ सकी जिससे दुर्घटना के समय तत्काल राहत कार्य चलाकर पीडितों को मदद पहुंचाई जा सके| यहाँ सवाल सिर्फ कालका मेल का नहीं है सवाल रेलवे के उस उदासीनता का है जिससे सबक नहीं लिया जाता और जिसका शिकार हर बार आम निर्दोष लोग होते हैं| एक इंसान की ज़िंदगी की कीमत उसके परिवारजनों के लिए कहीं बड़ी होती है वनिस्पत 5 लाख रूपये के|
हर घटना की तरह ये घटना भी कुछ दिनों के बाद भुला दी जायेगी लेकिन जिन परिवारों मे मौत का मातम फ़ैल चुका है और जिनकी जिंदगी ज़िदा लाश मात्र बनकर रह गयी है उन परिवारों की तरफ देखने की कोशिश कौन करेगा? जिस उत्तरप्रदेश मे यह घटना हुई वहाँ राजनीतिक अराजकता का आलम है, एक तरफ महिलाओं की आबरू सुरक्षित नहीं है तो दूसरी तरफ़ सियासी दाँवपेंच खेला जा रहा है ऐसे मे हादसे के शिकार हुए लोगों की दास्ताँ गम और अफ़सोस के समंदर तले दब जाएँ तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी| लेकिन बड़ा सवाल यही है कि यात्रियों के पैसों से मुनाफे का बाजार खड़ा करने वाला रेलवे यात्रियों की सुरक्षित यात्रा आखिर कब सुनिश्चित करेगा?
ठीक दो दिन पहले मानवरहित फाटक पर ट्रेन और बस की टक्कर की भयावह तस्वीरें अभी लोगों के दिमाग से उतरीं भी नहीं थी कालका मेल हादसा हो गया| यह सच है कि हादसों को पूर्णतः  रोका नहीं जा सकता लेकिन क्या उन्हें कम भी नहीं किया जा सकता? रेल दुर्घटनाओं पर ममता बनर्जी की टिप्पणी थी “हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती” लेकिन जब पूरी अंगड़ाई ही ले ली जाए तो बदनामी से कितने दिनों तक बचा जा सकता है? रेल मंत्रालय सहित रेलवे के तमाम अधिकारी, कर्मचारी इस बात का मंथन करें|

(तस्वीरें livehundustan.com से)

 गिरिजेश कुमार


Wednesday, July 6, 2011

भ्रष्टाचार पर छिड़ी बहस मे कहाँ है आम आदमी?


 भ्रष्टाचार पर जितनी बहस और चर्चाएँ हाल के दिनों मे हुई उतनी देश के इतिहास मे शायद कभी नहीं हुई| लोकपाल, जनलोकपाल, सरकार और सिविल सोसायटी के बीच मतभेद इन तमाम मुद्दों पर पिछले चार महीनों से लगातार चर्चा-बहस हो रही है लेकिन सवाल है जिस आम जनता के लिए ये लड़ाई लड़ी जा रही है वो कितना समझ पाया है? और इस दिशा मे ठोस प्रयास क्या वास्तव मे किये जा रहे हैं? आम जनता जब हम कहते हैं तो उसका सीधा मतलब उन लोगों से होता है जो दूर दराज के क्षेत्रों मे, सुदूर गांवों मे दैनिक मजदूरी या किसी तरह अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं| यकीं मानिये तो भ्रष्टाचार से सबसे ज्यादा प्रभावित यही लोग हैं या कहें कि भ्रष्टाचार का सबसे ज्यादा खामियाजा इन्ही लोगों को भुगतना पड़ता है| लेकिन सच तो यह है कि ये बहस दिल्ली और बड़े शहरों के सुविधासंपन्न और परदे के पीछे से भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले लोगों तक ही सिमित है,आम लोगों तो अभी भी नहीं पता लोकपाल और जन लोकपाल क्या है?  ऐसे मे जड़ से भ्रष्टाचार खत्म करने की और भ्रष्टमुक्त समाज बनाने की जो काल्पनिक रूपरेखाएँ खींची गयी हैं उसके मायने क्या है?
दरअसल विषमताओं और विविधताओं मे बंटा हुआ यह समाज सामाजिक सरोकारों से जुड़े ऐसे तमाम मुद्दों पर ऐसे ही अंतर्विरोध मे फंस जाता है| सियासत, सियासी फायदे और निजी हित के चक्कर मे खुलकर एक पक्ष कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं ले पाती है| सरकार की उदासीनता और गैरजवाबदेह होना इसीकी अगली कड़ी है| ऐसे मे यह साफ है कि लोकतान्त्रिक सरकार अपने कर्तव्यों को भूल चुकी है|   
हालाँकि सच यह भी है कि पिछले बयालीस साल से  जो विधेयक संसद और कार्यालयों की धुल फाँक रहा था अन्ना हजारे ने जब उसकी धुल साफ़ करनी चाही तो बीच मे सरकार ने अड़ंगा लगा दिया| एक तरफ कांग्रेस चीख-चीख कर यह कह रही है कि हम भ्रष्टाचार के विरुद्ध हैं और दूसरी तरफ उसकी सरकार एक ठोस कानून नहीं बनने देना चाह रही क्योंकि उसे लगता है इससे उसके अपने ही हाथ बंध जायंगे लेकिन बहाना संसदीय लोकतंत्र पर खतरे का है| सरकार की इस दोहरी नीति को बेनकाब करने और जनता को उसकी चालों को समझाने की जिम्मेदारी विपक्षी पार्टियों का होता है लेकिन देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी भाजपा अपने स्वार्थ के कारण बिल पर अपनी राय भी स्पष्ट नहीं कर पायी है| इसलिए  सवाल सिर्फ भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए जनलोकपाल बिल लाने या सरकार और सिविल सोसायटी के बीच असहमति का नही  है सवाल है आम जनता को राहत देने का या कहें कि उसकी समस्याओं को दूर करने का या भ्रष्टमुक्त समाज बनाने का जो हुनर इस देश मे अपनाया जा रहा है, उसमे आम आदमी फिट होता कहाँ है?
 
आशंकाएं सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों से भी हैं| तक़रीबन ४ महीने पहले इसी आंदोलन को राजनेताओं और राजनीतिक पार्टियों से बिल्कुल दूर रखा गया था और यह नजारा पूरी दुनिया ने देखा था कि किस तरह नेताओं को हूट किया जा रहा है लेकिन वही अन्ना हजारे आज राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं की शरण मे देखे जा रहे हैं| सवाल है क्यों? मुझे लगता है जितना समय निहित स्वार्थी पार्टियों पर खर्च किया जा रहा है उतना ही समय आम जनता के बीच खर्च किया जाए तो हम उस उद्देश्य को प्राप्त कर सकते हैं जिसके लिए ये कवायद हो रही है| हर आंदोलन के विरोधी होते ही हैं लेकिन यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम उनको कितना स्पेस देते हैं| इसलिए ज़रूरत इस बात की भी है अपने विरोधियों मे न उलझ कर उस आम जनता को इसका वास्तविक अर्थ समझाया जाये जो अभी तक इससे महरूम है बाकी बहस बाद मे भी हो सकती है|

गिरिजेश कुमार