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Friday, January 21, 2011

सरकार को सत्ता में रहने का कोई अधिकार नहीं है

स्विस बैंकों में इकठ्ठा काले धन में कौन लोग शामिल हैं, उनके नाम सार्वजनिक करने में प्रधानमन्त्री का असमर्थता ज़ाहिर करना लोकतान्त्रिक व्यवस्था के मूल्यों पर तमाचा है| इससे यह साफ ज़ाहिर होता है कि सरकार उन तमाम लोगों को बचाना चाहती है जो देश का पैसा देश से बाहर ले गए| सियासत में शामिल लोग इस मुद्दे को अपने फायदे के लिए भुनाना चाहते हैं जिससे इस पैसे के वापस लौटने की उम्मीद और धूमिल हो गयी है|

विदित हो कि स्विस बैंकों में भारत का ७०० खरब रुपया जमा है जो काली कमाई से इकठ्ठा किया गया है| इसे विडम्बना ही कहेंगे कि एक तरफ हम भूख, गरीबी, बेरोज़गारी जैसी समस्याओं से लड़ रहे हैं, उसके लिए विश्व बैंक और विकसित देशों से क़र्ज़ ले रहे हैं और दूसरी तरफ अनुमान से कहीं बड़ी रकम विदेशी बैंकों में जमा है| सरकार अपनी असमर्थता दिखाती है सर्वोच्च न्यायालय विवश है| किसी भी लोकतान्त्रिक देश का तीनों स्तंभ कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका इस तरह से अँधेरे में पहली बार दिखाई दे रही है| पूरी व्यवस्था आज सवालों के घेरे में आ गयी है| और यह सीधे सीधे सरकार और उसकी कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह खड़े कर रही है| मंहगाई पर सरकार का नियंत्रण नहीं है, भ्रष्टाचार रोकने में सरकार विफल है, काले धन के मुद्दे पर सरकार हाथ खड़े करती नज़र आती है तो फिर इस सरकार के सत्ता में रहने का औचित्य क्या है?

असलियत में पूंजीवादी व्यवस्था ने आम आदमी के पैरों में स्वार्थ परता और उपभोक्तावाद की ऐसी बेडियाँ डाली हैं जिससे वो कभी बाहर नहीं निकल सकता| यही कारण है कि पूंजीपति, और पूंजी इकठ्ठा करना चाहते है और इसके लिए देश, समाज और इंसानियत, सबको दाव पर लगाने से भी पीछे नहीं हटते| आम लोगो में आक्रोश तो है लेकिन कुछ करने में असमर्थ है| अगर देश की समाजिक,आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पर विचार किया जाये तो वो अंधेरों में कहीं अपना अस्तित्व तलाशती नज़र आती है|

आम आदमी लाचार है| शासन सत्ता में बैठे लोग उसका शोषण करते है| इसलिए देश के खून पसीने की कमाई विदेश में रहती है और जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा निर्वाचित सरकार इसे वापस लाने में अपनी विवशता दिखाती है| लाख टके का सवाल ये है कि इस घुन की तरह सड चुके इस पूंजीवादी व्यवस्था और पूंजीपतियों की रहनुमाई सरकार जनभावनाओं के साथ कबतक खिलवाड़ करती रहेगी?दोषी कौन है यह भी पता लगाना ज़रुरी है|

बहरहाल एक बात तो सरकार सहित तमाम लोगों को समझ लेनी चाहिए कि हर सवाल जो जनता के हित में है, उसका ज़वाब देना फ़र्ज़ ही नहीं उसका नैतिक कर्तव्य है और कोई भी सरकार अपने कर्तब्य से मुंह नहीं मोड सकती|

गिरिजेश कुमार

मो 09631829853, 08409407857

Monday, January 17, 2011

स्कूल स्तर पर यौन शिक्षा: बचपन को विकृत करने की साज़िश

काले परदे के पीछे भूमंडलीकरण का निःशब्द कदम धीरे-धीरे सभ्यता का प्रकाश मलिन कर जिस अंधकारमय जगत की ओर लोगों को ले जा रहा है वह चित्र देखने लायक आँख, और समझने लायक मन आज कितने लोगों में है? प्रेम जैसी सुन्दर अनुभूति को भुलाकर, चकाचौंध रोशनी के बीच शरीर का विकृत प्रदर्शन और सेक्स के माध्यम से समाज को विषाक्त बनाने की कोशिश हो रही है| इसी परिकल्पित प्रयास का ही एक नाम ह|ै- स्कूल स्तर पर यौन शिक्षा|

विदित हो कि बिहार सरकार ने पिछले दिनों नौवीं कक्षा से ग्यारहवीं कक्षा के छात्रों को यौन शिक्षा देने का फैसला लिया है| इसके पीछे तर्क ये दिया जा रहा है कि इससे यौन विकृतियाँ कम होंगी तथा छात्रों के मन की जिज्ञासा शांत होगी जिससे वो गलत काम नही करेंगे साथ ही साथ एड्स जैसे भयावह रोगों पर भी रोक लगेगी|

कई सवाल खड़े होते हैं यहां| सबसे बड़ा सवाल तो ये उठता है कि आखिर इसकी ज़रूरत क्यों पड़ी? क्या हमारा समाज इतना सशक्त है कि हम ऐसी चीजों को सकारात्मक दृष्टिकोण से देख सकते हैं? क्या हमारी सभ्यता और संस्कृति हमें ऐसी चीजों को खुलेआम स्वीकार करने की इज़ाज़त देती है? एक और महत्वपूर्ण सवाल कि इससे पहले जितने भी देशों ने इसे लागू किया वहाँ क्या परिणाम सामने आए? यहाँ यह जानना ज़रुरी है कि उनके भी तर्क कमोबेश यही थे जो यहां दिए जा रहे है|

सरकार द्वारा यौन शिक्षा लागू किये जाने के पीछे दिए जा रहे आधारहीन तर्कों का दरअसल कोई मतलब नहीं है| इससे न तो यौन विकृतियाँ कम होंगी और न ही उनके मन की जिज्ञासा शांत होगी बल्कि वो और गलत कामों में लिप्त रहेंगे| और एड्स के रोकथाम जैसे घटिया तर्कों को देनेवाली सरकार से मैं यह पूछना चाहूँगा अभी तक कितने बच्चे एड्स से पीड़ित हैं? और क्या एड्स बच्चों से फैलता है? कदापि नहीं| इसे फ़ैलाने वाले वही तथाकथित पूंजीपति हैं जो ऐशो आराम की जिंदगी जीने के आदि है और पश्चिमी सभ्यता को अपनी जागीर समझते हैं| दूसरी बात ये कि चिकित्सा विज्ञान एड्स फैलने के ४ कारण बताता है| असुरक्षित यौन सम्बन्ध भी उसमे से एक कारण ज़रूर है लेकिन इसे ही आधार बनाकर बच्चों में यौन शिक्षा देने का औचित्य क्या है?

बच्चों को पढाने के लिए जो सिलेबस तैयार किया गया है उसमे भी शादी से पहले सेक्स न करने पर जोर देने के बजाये सुरक्षित सेक्स पर ज्यादा जोर दिया गया है जो उनकी मंशा को स्पष्ट कर देता है कि यौन शिक्षा के नाम पर वो बच्चों में कंडोम के ग्राहक की तलाश कर रहे हैं| और यही पूंजीवादी व्यवस्था का सबसे घिनौना चेहरा है|

मुझे नहीं लगता कि एक बच्चे यौन जिज्ञासाओं को उनके मा –बाप को छोड़कर कोई और अच्छी तरह शांत कर सकता है|

अमेरिका, ब्रिटेन सहित कई विकसित देशों में इसे पहले से लागू किया जा चूका है| अमेरिका में स्कूल स्तर से यौन शिक्षा १९६४ में लागू की गई थी और आज वहाँ आलम यह है कि हर सात में से एक लड़की १४ साल से कम उम्र में प्रेग्नेंट है और हर स्कूल में अबोर्शन सेंटर खोलना पड़ा है| क्या हम अपने देश को ऐसे ही गन्दी बस्तियों में तब्दील कर देना चाहते हैं? क्या हम स्कूलों को सेक्स का अड्डा बनाना चाहते हैं? यह यक्ष प्रश्न बनकर आज हमारे सामने खड़ा है|

गिरिजेश कुमार

एडवांटेज मीडिया एकेडेमी, पटना

मो 09631829853, 08409897857

Monday, January 10, 2011

कर्तव्य के निर्वहन पर जेल: चुप क्यों हैं पत्रकार संघठन?

बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने अभी-अभी ऐतिहासिक जनमत हासिल किया है| इस ऐतिहासिक जनमत के पीछे लोगों की बदलती सोच को कारण माना गया| यह बात सच भी है लेकिन शायद हम यह भूल गए इस सरकार में भी उसी पूंजीवादी व्यवस्था के रहनुमाएं हैं जिसने आम आदमी की जिंदगी नर्क बना दिया है| और अपने आप को जनता का सबसे बड़ा हितैषी बताने वाला मीडिया भी पूंजीवाद, पूंजीपति और उसके इशारों पर नाचने वाली सरकारों की पिछलग्गू बने रहना चाहता है| इसलिए जब नवलेश पाठक जैसा छोटा पत्रकार अन्याय के खिलाफ अपनी कलम का इस्तेमाल करता है तो उसे सलाखें मिलती हैं| उसपर आई पी सी की धारा ३०२ और १२०बी लगाया जाता है| और कोई भी पत्रकार या पत्रकार संगठन इसके खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोलता|

नवलेश पाठक का जुर्म सिर्फ इतना था कि उसने अपने अखबार में सत्ताधारी पार्टी के विधायक राजकिशोर केसरी की काली करतूतों को छापा था| उस विधायक के असली चेहरे को समाज के सामने लाया था| उसका कसूर यह भी था उसने एक महिला द्वारा यौन शोषण के आरोप को अपने अखबार में जगह दी थी| लेकिन पैसे और सत्ते के बल पर जब इस केस को दबाया गया तो इन्साफ की खातिर,प्रतिशोध की अग्नि में उसने उस विधायक की हत्या कर दी|

नवलेश पाठक और उसकी पत्नी को जिस ढंग से गिरफ्तार किया गया वह भी सवालों के घेरे में आता है| आधी रात को कुछ लोग सादे लिबास में घर घुसते हैं अपने को पुलिस बताकर दोनों पति- पत्नी को उठाकर शहर की ओर आते हैं|आधे रास्ते में पत्नी को दूसरी गाड़ी में बिठाकर ले जाया जाता है और पति को पूछताछ के लिए किसी अज्ञात स्थान पर ले जाया जाता है| सुनने में ये कहानी किसी फिल्म की लगती है लेकिन बिहार पुलिस ने ऐसा ही किया| सवाल उठता है क्यों? क्या नवलेश पाठक कोई पेशेवर अपराधी थे? क्या सच लिखने की सजा ये है कि उसके ऊपर हत्या का मुकदमा चले? मैं मानता हूँ कि रूपम पाठक ने सभ्य समाज के उसूलों के खिलाफ कदम उठाया लेकिन उस पत्रकार का क्या कसूर? वो तो सच लिखने की ही कमाई खाता है| फिर उसपर हत्या का मुकदमा क्यों?

हम यह सोचकर संतोष कर सकते हैं कि रूपम पाठक ने अपने ऊपर हुए अत्याचार के विरोध में एक चिंगारी जलाई और आज तमाम महिला संगठन उसके साथ खड़े हैं| लेकिन पत्रकार नवलेश पाठक के लिए कोई भी पत्रकार या पत्रकार संगठन आगे नही आया| और न ही एक शब्द बोलने की हिम्मत दिखाई| क्योंकि नवलेश पाठक एक छोटे से कस्बे में अखबार निकालते था| उसके पास पूंजी की ताकत नहीं थी और न ही उसका कोई ब्रांड था| टाटा और बिडला जैसे पूंजीपतियों का हाथ भी नही था| इसलिए देश का एक भी बड़ा अखबार या न्यूज़ चैनल उसके समर्थन में नहीं आया| लेकिन उसी बेशर्म, जनता के तथाकथित हितैषी मीडिया के तमाम बड़े अख़बारों और न्यूज़ चैनलों ने इस खबर पर टी आर पी बटोरने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी जब ६ महीने पहले विधायक के अत्याचार की ख़बरें छपी थी| लेकिन आज जब उसी खबर को छापने वाले के साथ गैरकानूनी कार्रवाई की गई तो कोई अखबार सामने नही आया| पूंजी के इस खेल में आम आदमी की तो कोई कीमत नही ही थी लेकिन सच के लिए लड़ने वालों के लिए सांत्वना के दो शब्द न बोलने वालों में पत्रकार भी हैं यह आज समझ में आया|

हमें आश्चर्य होता है कि जब वीर संघवी, बरखा दत्त, प्रभु चावला जैसे बड़े पत्रकार फंसते हैं, जिसके ऊपर सच छुपाने के आरोप लगे तो वह राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन जाता है और तमाम मीडिया संघठन आरोपियों को बचाने के लिए आगे आता है लेकिन एक छोटे पत्रकार को सच छापने के लिए सलाखों के पीछे जाना पड़ता है| सवाल उठता है क्या पत्रकारिता का मतलब सिर्फ चाटुकारिता रह गई है? क्या सरकार और उसके तंत्र की दलाली का मतलब ही पत्रकारिता हो गया है? और सबसे बड़ा सवाल कि चुप क्यों हैं पत्रकार संगठन? क्या सिर्फ इसलिए कि वो एक छोटा अखबार निकलते थे?

शयद हम भूल रहे हैं कि आज़ादी की लड़ाई हमने छोटे छोटे अख़बारों को निकालकर ही लड़ी थी? और लोगों को जागृत करने में इन छोटे अख़बारों की बड़ी भूमिका रही है लेकिन अफ़सोस की आज पत्रकारिता के मायने बदल गए हैं|

इतिहास गवाह है सच्चाई के खातिर कुछ चंद लोगों ने ही आवाज़ उठाई| भले ही उनकी आवाज़ को ताकत के बल दबा दिया गया लेकिन आजतक मिटाया नहीं जा सका| ये एक चिंगारी है जो भडके तो शोले का रूप ले सकती है फिर चाहे शासक कितना भी ताकतवर हो उसे दबा नहीं सकता| मीडिया को भी चाहिए कि वो आत्मालोचना करे| अपने फ़र्ज़ और कर्तव्य की सीमाएं फिक्स करे| तभी उसकी विश्वसनीयता बनी रह सकती है|

गिरिजेश कुमार

मो.09631829853

Saturday, January 8, 2011

क्या मिल पायेगा इन्साफ?

किसी भी सभ्य समाज में हत्या जैसे जघन्य अपराध को स्वीकार नहीं किया जा सकता लेकिन जब कोई अपनी मर्यादा भूलकर समाज के द्वारा बनाये गए नियमों को ज़बरदस्ती तोड़ता है और अपने झूठे अस्तित्व का रौब दिखाकर अपने आप को दुनिया की नज़रों में पाक साफ़ दिखाने की कोशिश करता है तो उस आम आदमी के पास आखिर क्या रास्ता बचता है जो इसका शिकार है? बिहार के पूर्णिया के विधायक राजकिशोर केसरी की हत्या भले ही सभ्य समाज के उसूलों के खिलाफ हो लेकिन यह एक मजबूर महिला का अपने स्वाभिमान की रक्षा में उठाया गया सही कदम है| लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि उस महिला के साथ क्या न्याय हो पायेगा? (उसी विधान सभा क्षेत्र की एक महिला रूपम पाठक ने ४ जनवरी को विधायक को उनके आवास पर चाकू से हमला कर हत्या कर दी थी| महिला ने विधायक पर यौन शोषण का आरोप लगाया था जिसे सत्ता और पैसे के बल पर विधायक ने दबा दिया| उसके बाद प्रतिशोध में उस महिला ने ये कदम उठाया|)उन परिस्थितियों में यह सवाल और भी जायज़ लगता है जब शासन सत्ता में बैठे लोग पक्षपात पूर्ण रवैया अपनाते हैं| एक लोकतान्त्रिक देश में लोकतान्त्रिक विधि से निर्वाचित सरकार जब दोहरी नीति अपनाने लगे तो प्रजातंत्र की साख पर ही प्रश्नचिन्ह लगता है| माननीय उपमुख्यमंत्री ने यह कैसे तय कर दिया कि विधायक दोषी नहीं हैं? ये नितीश सरकार की असली परीक्षा की घडी है| जहाँ उन्हें यह तय करना होगा कि वो किसके साथ रहेंगे? श्री सुशील कुमार मोदी से मैं एक और सवाल करना चाहूँगा कि अगर राजकिशोर केसरी उनकी सरकार में शामिल पार्टियों के विधायक न रहते तो क्या तब भी वो यही बयान देते?

वक्त इस घटना की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है| और वर्तमान में प्रशासनिक अधिकारियों और सरकार के रवैये से यह साफ़ हो चूका है कि रूपम पाठक को इन्साफ नहीं मिलेगा| इसलिए इसकी जांच किसी निष्पक्ष जांच एजेंसी से होनी चाहिए|

दूसरी तरफ यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि इस घटना को अंजाम देने वाला कोई पेशेवर अपराधी नहीं था बल्कि उसके ऊपर समाज को शिक्षित करने की ज़िम्मेदारी थी| तो फिर ऐसी कौन सी परिस्थितियाँ थी जिसने उसे अपराधी बनने को मजबूर किया? भारतीय नारी की मिसाल पुरे विश्व में दी जाती है लेकिन वही नारी जब रणचंडी की भूमिका में आये तो मतलब साफ़ है कि कहीं न कहीं उसके आत्मसम्मान और स्वाभिमान को ठेस पहुंची है| ये अलग बात है कि उसने विरोध का रास्ता गलत अख्तियार कर लिया|

किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधि का पद सम्मानीय होता है और समाज के विकास की प्राथमिक ज़िम्मेदारी भी उनके ही ऊपर होती है| एक जनप्रतिनिधि होने के नाते उनका भी कर्तव्य होता है कि वो जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ न करें| लेकिन अफ़सोस कि राजकिशोर केसरी ने इसका ख्याल नही रखा| सच को चाहकर भी छुपाया नहीं जा सकता| न्याय में देरी अन्याय है| और यही वो चीज़ है जो किसी आम आदमी को अपराध करने पर मजबूर करता है|

बहरहाल ये घटना हमारे समाज को तो झकझोरती ही है साथ ही साथ यह सरकार और उसके दावों की नाकामी की ओर भी संकेत करती है जिसमे महिला सशक्तिकरण और महिलाओं को आज़ादी देने की बातें की जाती है और दूसरी तरफ सरकार में शामिल मंत्री, विधायक ही उसका यौन शोषण करते हैं| हिंसा या हत्या किसी समस्या का समाधान नहीं है लेकिन एक चेतावनी ज़रूर है| समाज में थोड़ी सी भी रूचि रखनेवाले तमाम लोगों को जो सच और सत्य की कीमत जानते हैं इस मामले में खुलकर एक पक्ष लेना चाहिए|

गिरिजेश कुमार

एडवांटेज मीडिया एकेडेमी, पटना

मो 09631829853

Friday, January 7, 2011

तस्वीर का दूसरा पहलु ज्यादा सच और आईने की तरह साफ़ है

पूर्णिया के विधायक राजकिशोर केसरी की हत्या से इस कंपकपा देने वाली ठण्ड में भी बिहार के राजनीतिक गलियारों का पारा गर्म हो गया है| बिहार की राजनीति हमेशा ही विवादों में रही है| लेकिन वर्तमान व्यवस्था में राजनीति अपने राजनीतिक उसूलों को भूलकर किस तरह से स्वार्थ सिद्धि का पर्याय बन चुकी है इस हत्या के बाद माननीय उपमुख्यमंत्री श्री सुशील कुमार मोदी के बयानों से स्पष्ट हो जाता है| किसी भी सभ्य समाज में हत्या जैसे जघन्य अपराध को स्वीकार नही किया जा सकता| और लोकतान्त्रिक व्यवस्था में तो हिंसा का कोई स्थान ही नहीं है| हम इसकी घोर निंदा करते हैं| लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलु भी ये है कि मारनेवाला कोई पेशेवर कातिल नहीं है| और न ही मानसिक रूप से विक्षिप्त है| वो एक ऐसा व्यक्ति है जिसके ऊपर समाज को शिक्षित करने की ज़िम्मेदारी थी| तो फिर एक शिक्षक जिसकी भूमिका समाज को दिशा देने की है, देश के भविष्य को सँवारने की है, उसने ऐसा कदम क्यों उठा लिया? ये जांच का विषय है| कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी| लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि इसके पीछे हताशा, निराशा, और क्रोध का वो काला मंजर था जिसकी कल्पना भी शायद हम नहीं कर सकते| इस घटना के सिक्के का दूसरा पहलु शायद ज्यादा सच और आईने की तरह साफ़ है|

आरोपों के जिन घेरों में दिवंगत विधायक हैं वो न सिर्फ एक जनप्रतिनिधि की मर्यादा का उल्लंघन है बल्कि एक जागरूक समाज में जनभावनाओं के साथ खिलवाड़ है| हमारी संवेदनाएं बेशक दिवंगत विधायक के परिवार साथ हैं| हम उनके साथ सहानुभूति रखते हैं| लेकिन उनकी छवि दागदार थी इससे इनकार नहीं किया जा सकता|

लोकतान्त्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधि का पद बहुत बड़ा होता है और समाज के विकास की प्राथमिक ज़िम्मेदारी भी उनके ही ऊपर होती है| एक जनप्रतिनिधि होने के नाते उनका भी कर्तव्य होता है कि वो जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ न करें| लेकिन क्या दिवंगत विधायक ने अपना कर्तव्य याद रखा? सच को चाहकर भी छुपाया नहीं जा सकता|

न्याय में देरी अन्याय है| और यही वो चीज़ है जो किसी आम आदमी को अपराध करने पर मजबूर करता है| विधायक हत्याकांड के पीछे कहीं न कहीं यही अपराधबोध, और शोषित होने की मनःस्थिति नज़र आती है|

कानून व्यवस्था में सुधार और अपराधीमुक्त समाज समाज के बनाने के जिस वादे के साथ सरकारें सत्ता में आती हैं अगर उस सरकार के ज्यादातर सहयोगी ही आरोपों से घिरे हों तो शायद पूरा सिस्टम ही सवालों के दायरे में आ जाता है| बिहार में ही २४३ विधायकों में १४२ विधायकों पर कोई न कोई मुकदमा दायर है| बहरहाल ये घटना हमारे समाज को तो झकझोरती ही है साथ ही साथ यह सरकार और उसके दावों की नाकामी की ओर भी संकेत करती है जिसपर बिहार की जनता ने भरोसा किया था| हम यह नहीं कहते कि भरोसा टूट गया लेकिन इतना ज़रूर है ऐसी घटनाएँ यह सोचने पर भी मजबूर करती है लोगों के अंदर व्यवस्था की खामियों के प्रति कितना गुस्सा है| साथ यह एक चेतावनी भी है कि अगर समय रहते इसे गंभीरता से नहीं लिया गया ऐसे ही भयानक परिणाम सामने आ सकते है फिर शायद हम अफ़सोस व्यक्त करने के अलावा कुछ भी नहीं कर पाएंगे|