Pages

Subscribe:

Tuesday, January 26, 2010

Republic day:the truth

Published in 'hindustan dainik' on 30 jan 2010 आज देश ६१ वें गणतंत्र में प्रवेश कर गया |ये समय बढ़ता जायेगा और हम एक दिन सौवीं वर्षगांठ भी मनाएंगे |लेकिन इस सबके पीछे कुछ छुट जायेगा तो वो सवाल जो हर गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर दोहराया जाता है |जैसे क्या हमारा वो सपना पूरा हो पाया जो आजाद भारत के लिए हमारे महापुरुषों ने देखा था ? क्या वास्तव में भारत आज़ाद हो पाया है ?वगैरह ..वगैरह |संविधान निर्माताओं का कुछ सपना था |बुनियादी तौर पर आज़ाद भारत के लिए |यह हमारे देश के लोगों की मेहनत और इक्षाशक्ति का ही परिणाम है की विश्व आज भारत को एक महाशक्ति के रूप में देख रहा है | अरस्तु और प्लेटो हो या महात्मा गाँधी और नेल्सन मंडेला इन सबका का एक ही मत था की वंचितों के साथ न्याय हो |अरस्तु अगर सम्पत्तिवान के बदले निर्धनों के शासन की बात करते हैं तो महात्मा गाँधी को क़तर में खड़े अंतिम व्यक्ति की चिंता है | इन सबके सोच में एक ही समानता है और वह है आम आदमी की बेहतरी |ये ऐसे मूल्यों को लेकर चले जिन्हें कोई भी गणतंत्र अपना आदर्श मान सकता है |किसी भी समाज की सफलता इस बात पर निर्भर करती है की वह समाज कमजोरों को कितनी जगह देता है |हमारे यहाँ कमजोर कौन है -कमजोर है आर्थिक रूप से गरीब ,पिछड़े हुए दलित आदिवासी लोग |दुर्भाग्य से ऐसे लोगों की संख्या यहाँ ज्यादा है | हम गणतंत्र दिवस तो मना रहे हैं ,लेकिन क्या सिर्फ झंडे फहरा देने से ही हमारे कर्तव्यों की इति श्री हो जाती है |नहीं ,हमें यह तय करना होगा की क्या उस लक्ष्य को हम पा सके जिसे पाने की ख्वाहिस संविधान निर्माताओं की थी |अचानक ही यह सवाल मुझे विचलित कर देती है की यह कैसा स्वतंत्र गणतंत्र है जो संगीनों के सायों में रहने को विवश है ?यह कैसा वर्षगांठ है जो बन्दुक की नोक पर मनाई जा रही है ?याद आती मुझे ये पंक्ति -मिलकर वतन परस्तों से यह हाल हमरा कह देना ,जुबान हुई आज़ाद हमारी साँस के ऊपर पहरा है |यह कैसा गणराज्य जहाँ सिख विरोधी दंगे होते हैं और लगभग ३ दशक इस बात को लेकर आन्दोलन करने में बीत जाते हैं की दोषियों को सजा मिलनी चाहिए ?संविधान में लिखे धर्मनिरपेक्ष शब्द की धज्जियाँ बाबरी मस्जिद गिरकर उड़ा दी जाये यह कैसा गणतंत्र ? हम युवा आशावादी हैं ,इसलिए यह तो नहीं कहेंगे की समस्याएँ ख़त्म हो नहीं सकती |समस्याएँ हैं तो इसका समाधान भी है ,जरुरत है इसे धुंडने की |साहिर लुधियानवी ने बहुत अच्छी पंक्ति लिखी है - वो सुबह कभी तो आएगी ,वो सुबह कभी तो आएगी इन काली सदियों के सर से ,जब रात का आँचल ढलकेगा जब दुःख के बादल पिघलेंगे ,जब सुख का सागर छलकेगा , जब अम्बर झूम के नाचेगा ,जब धरती नगमे गाएगी , वो सुबह कभी तो आएगी ,वो सुबह कभी तो आएगी

Thursday, January 21, 2010

bhopal gas incident

भोपाल गैस त्रासदी के २५ साल पुरे हो चुके हैं |लेकिन अभी भी वो सारे सवाल अनसुलझे हैं जो उस समय उठे थे |जैसे- आखिर किसकी लापरवाही की वजह से यह हादसा हुआ ? इसके लिए जिम्मेदार कौन है ?और आज २५ साल के बाद भी यह सवाल मन को कचोट रहा है की अपनों को खोने के दर्द से जूझ रहे इन लोगों को इंसाफ़ मिल पाएगा?और मिलेगा भी तो कब ?यहाँ कुछ तस्वीरें हैं जो उस दिन के बाद की कहानी बता रही हैं |इसे देखकर आप सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं की स्थिति कितनी गंभीर थी | a href="http://3.bp.blogspot.com/_B8SAC_wBCok/S1hH4obO9OI/AAAAAAAAAB0/kSeKTszseh0/s1600-h/120309070904_10.jpg"> क्या कसूर था इस बच्चे का ? इंसाफ की लड़ाई ,विरोध में उठी आवाजें जान मॉल की क्षति मौत का वो कुआँ जहाँ से गैस का रिसाव हुआ

Wednesday, January 20, 2010

Bhopal gas incident

भोपाल गैस त्रासदी के २५ साल पुरे हो चुके हैं |लेकिन अभी भी वो सारे सवाल अनसुलझे हैं जो उस समय उठे थे |जैसे- आखिर किसकी लापरवाही की वजह से यह हादसा हुआ ? इसके लिए जिम्मेदार कौन है ?और आज २५ साल के बाद भी यह सवाल मन को कचोट रहा है की अपनों को खोने के दर्द से जूझ रहे इन लोगों को इंसाफ़ मिल पाएगा?और मिलेगा भी तो कब ?यहाँ कुछ तस्वीरें हैं जो उस दिन के बाद की कहानी बता रही हैं |इसे देखकर आप सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं की स्थिति कितनी गंभीर थी |

telangana issue

तेलंगाना को अलग राज्य बनाने को लेकर आँध्रप्रदेश सहित पुरे देश में राजनितिक भूचाल आया हुआ है,लेकिन अलग राज्य बनाने से जो लोग यह सोचते हैं की लोगों की समस्याएँ कम हो जाएगी वह बिलकुल ही निराधार है |मैं समझ नहीं पा रहा हूँ की आखिर देश को टुकड़ों में बांटकर हम कितने खुशहाल रह सकते हैं और क्या विकास के लिए यही एक रास्ता है?देश को छोटे -छोटे भाग में विभक्त कर दिया जाये |असलियत तो यही है की सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए कुछ नेता देश की एकता और अखंडता को दाँव पर लगाने से नहीं चुकते| अगर सर उठाकर देखा जाये तो देश के अन्दर भूख ,गरीबी ,बेरोजगारी ,मंहगाई जैसे मुद्दे मुन्हबाये खड़ी है इस तरफ किसी की निगाहें नहीं जाती|लोग भूख से मर रहे हैं ,भ्रस्टाचार पुरे देश में अपना पों पसर रहा है इसे दूर करने की जरुरत कोई महसूस नहीं करता ,शासन सत्ता में बैठे लोग अपनी कुर्सी बचाने के कोशिश करते रहते हैं तो विपक्ष कुर्सी हथियाने के फेर में रहता है,और इन सब के बीच दब जाती है उन करोड़ों लोगो की आवाज जो इन लोगों को अपना नेता मानकर संसद में भेजता है| अगर हम इससे पहले बने राज्यों पर नजर डालें तो वो सारे वादे अधूरी मिलेंगी जिनके लिए इन्हें अलग करने की मांग उठी थी|चाहे वह झारखण्ड हो ,छत्तीसगढ़ हो या उत्तरांचल किसी का भी विकास नहीं हुआ और अगर विकास हुआ तो उन नेताओं का जिन्होंने इसे अलग करने की मांग उठाई थी|विकास हुआ मधु कोड़ा का जिसे लोगों ने राज्य के विकास के लिए चुनकर भेजा था,क्या कोई बता सकता है की झारखण्ड के उन आदिवासियों का कितना विकास हुआ जो अभी भी जानवरों की तरह रह रहे हैं|और न सिर्फ झारखण्ड बल्कि पुरे भारत के किसी भी राज्य के बारे में यह नहीं कहा जा सकता|बिहार से झारखण्ड भी विकास और आदिवासियों की समस्या की मांग को लेकर अलग हुआ था लेकिन आज हकीकत हमारे सामने है| -- जबकि होना तो यह चाहिए था की देश की सारी राजनितिक पार्टियाँ एक साथ बैठकर देश को अपनी गिरफ्त में जकड लेने वाले मुद्दों को लेकर विचार विमर्श करती और उसके बाद सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया जाता जिससे सरकार,पार्टी सहित पुरे देश का भला होता|सरकार को चाहिए की वह अलग राज्य से सम्बंधित दिशा निर्देश जारी करे ताकि फिर कभी तेलंगाना जसी आग न भड़क सके |

Monday, January 18, 2010

ऑस्ट्रेलिया में पिछले दो महीनो से जारी भारतीय छात्रों पर हमला थमने का नाम नहीं ले रहा है |अब तो हालात यहाँ तक पहुँच गए हैं की छात्र वापस आने को मजबूर हैं |सबसे अहम् सवाल यह है की आखिर इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है ?वहां की सरकार ,हमलावर ,वहां के लोग या खुद भारतीय छात्र ?पढने गए छात्र वापस लौट रहे हैं लेकिन उनके चेहरे पर शिकन नहीं है|कोई इसे नस्लवाद बता रहा है तो कोई सरकार को दोष दे रहा है |कुछ लोगों की नज़र में भारत सरकार दोषी है |सरकार पर ये आरोप भी लगाये जा रहे हैं की वह छात्रों की रक्षा के लिए कुछ भी नहीं कर रही है |मेरा मानना है कि भारतीय छात्रों पर हमले के लिए भारत कि सरकार भी दोषी है|तब ये सवाल उठता है कि क्या भारत हमले रोक पाने में सक्षम है ?जवाब है -नहीं |यह सच है कि किसी भी सरकार कि ये जिम्मेदारी होतो है कि वह अपने देश के नागरिकों को सुरक्षा उपलब्ध कराये लेकिन भारत ऐसा नहीं कर पा रहा है |तो क्या हम यूँ ही अपने होनहारों को खोते रहेंगे ?