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Monday, August 16, 2010

आज़ादी के मायने?

कल हमने आज़ादी की ६३वी वर्षगांठ मनाई| ये समय बढ़ता जायेगा और हम एक दिन सौवीं वर्षगांठ भी मनाएंगे |लेकिन इस सबके पीछे कुछ छुट जायेगा तो वो सवाल जो हर गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर दोहराया जाता है| जैसे क्या हमारा वो सपना पूरा हो पाया जो आजाद भारत के लिए हमारे महापुरुषों ने देखा था? क्या वास्तव में भारत आज़ाद हो पाया है ?वगैरह ..वगैरह |संविधान निर्माताओं का कुछ सपना था |बुनियादी तौर पर आज़ाद भारत के लिए| यह हमारे देश के लोगों की मेहनत और इक्षाशक्ति का ही परिणाम है की विश्व आज भारत को एक महाशक्ति के रूप में देख रहा है |

अरस्तु और प्लेटो हो या महात्मा गाँधी और नेल्सन मंडेला इन सबका का एक ही मत था की वंचितों के साथ न्याय हो |अरस्तु अगर सम्पत्तिवान के बदले निर्धनों के शासन की बात करते हैं तो महात्मा गाँधी को क़तार में खड़े अंतिम व्यक्ति की चिंता है | इन सबके सोच में एक ही समानता है और वह है आम आदमी की बेहतरी |ये ऐसे मूल्यों को लेकर चले जिन्हें कोई भी गणतंत्र अपना आदर्श मान सकता है |किसी भी समाज की सफलता इस बात पर निर्भर करती है की वह समाज कमजोरों को कितनी जगह देता है |हमारे यहाँ कमजोर कौन है -कमजोर है आर्थिक रूप से गरीब ,पिछड़े हुए दलित आदिवासी लोग| और दुर्भाग्य से ऐसे लोगों की संख्या हमारे यहाँ ज्यादा है |

आज हम स्वतंत्रता दिवस संगीनों के साये में मनाने को विवश हैं| स्वतंत्र भारत जहाँ एक तरफ गरीबी, मंहगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद जैसी समस्याओं से जूझ रहा है तो दूसरी तरफ नक्सलवाद और माओवाद इसे अंदर से खोखला करने का प्रयास कर रहे हैं| कमजोर इक्षाशक्ति और बिखरी हुई मानसिकता का परिणाम ये है की आजतक हमारे यहाँ अशिक्षा व्याप्त है| जागरूकता के अभाव का फायदा राजनेता उठाते हैं|

युवा पीढ़ी के अंदर सामाजिक जिम्मेदारी के अभाव में ज़रूरत इस बात की है कि हम अपने अंदर इस सवाल का ज़वाब तलाश करें कि पिछले ६३ सालों में हमने किन कमियों को नज़रंदाज़ किया? इस आज़ादी के मायने क्या हैं? बन्दूक की नोक और भय के साये में आखिर कब तक हम अपने आप को स्वतंत्र कहेंगे?

1 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

आप अच्छा लिखते हैं, ईमानदारी से लिखते हैं,ब्लॉग संसद पर आपके विचार देखकर ऐसा लगता है।
### सब आदमी एक आदम की औलाद हैं और एक पालनहार के बंदे हैं । उसने हर ज़माने में अपने दूतों के ज़रिये इनसान को यही शिक्षा दी है कि केवल मेरी उपासना करो और मेरे आदेश का पालन करो। खुद को पूरी तरह मेरे प्रति समर्पित कर दो। उसने अपने दूतों के अन्तःकरण पर अपनी वाणी का अवतरण किया। उसने हरेक तरह की जुल्म-ज़्यादती को हराम क़रार दिया और हरेक भलाई को लाज़िम ठहराया। उन सच्चे दूतों के बाद लोगों ने वाणी को छिपा दिया और अपनी कविता और अपने दर्शन को ही जनता में प्रचारित कर दिया। इससे लोगों के विश्वास और रीतियां अलग-अलग हो गईं। लोग मूर्तिपूजा और आडम्बर को धर्म समझने लगे। हर जगह यही हुआ, इसी वजह से आपको हिन्दू और मुसलमान अलग-अलग नज़र आ रहे हैं।
मुसलमानों की मिसाल से आप अच्छी तरह समझ सकते हैं। इसलाम में क़ब्र पक्की बनाना, उस पर चादरें चढ़ाना, रौशनी करना, म्यूज़िक बजाना, औरतों-मर्दों का मिलकर वहां क़व्वाली गाना और सुनना, मज़ार वाले से दुआ मांगना सब हराम है, यह तो है पवित्र कुरआन का हुक्म लेकिन आप ये सब होता हुआ देख ही रहे हैं। बहुत सी जगहों पर ये चीज़ें इसलाम धर्म का अंग समझी जाने लगी हैं। मालिक का हुक्म कुछ है और बंदों का अमल उसके सरासर खि़लाफ़। करोड़ों रूपये की आमदनी क़ब्रों के मुजाविरों को हो रही है। क्या ये अपनी आमदनी का दरवाज़ा खुद ही बंद कर देंगे ?
हिन्दुओं में भी ऐसे ही विकार जड़ पकड़ गये हैं। उनके धर्मग्रंथ भी मूर्तिपूजा और आडम्बर से रोकते हैं लेकिन लोग उनकी मानते कब हैं और जिनके पौ-बारह हो रहे हैं वे भला क्यों रोकेंगे ?
ईश्वर एक है, शाश्वत है और उसका धर्म सनातन है यानि सदा से है। सारी मानव जाति का कल्याण एक परमेश्वर के नाम पर एक होने में ही है। हरेक झगड़े का अंत इसी से होगा, इसी लिये मैं दोनों को एक मानता हूं और जिसे शक हो वह कुरआन शरीफ़ की सूर ए शूरा की 13 वीं आयत पढ़ लें।
http://vedquran.blogspot.com/2010/08/prophet-muhammed-saw.html

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