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Thursday, July 29, 2010

संविधान का पुनर्लेखन: एक विचारणीय प्रश्न


किसी भी समाज और सामाजिक व्यवस्थाओं को सुचारू ढंग से संचालित करने के लिए नियम की आवश्यकता होती है| अगर समाज को एक कड़ी कहा जाये तो कड़ियों के मिलने से राज्य बने और राज्यों के मिलने से देश| इस देश को भी चलाने के लिए नियमों की एक किताब लिखी गयी जिसे हमने नाम दिया ‘संविधान’| पिछले दिनों बिहार विधानसभा,उत्तरप्रदेश विधानसभा सहित देश की संसद में जिस तरह से संसदीय लोकतंत्र की धज्जियां उडाई गई उससे आज यह एक विचारणीय प्रश्न है कि क्या हम पूर्णरूप से  संवैधानिक मूल्यों का पालन कर रहे हैं? वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जब देश के कर्णधार ही संविधान के नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं यह सवाल भी उठता है कि क्या भारतीय संविधान को पुनः लिखने की आवश्यकता है? आज यह एक ऐसा विषय है जिसपर देश के प्रत्येक नागरिक को गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है|
                                            कार्यपालिका,न्यायपालिका और विधायिका में सबसे महत्वपूर्ण काम विधायिका का है,क्योंकि कानून बनाने की जिम्मेदारी इन्ही के ऊपर है|इसलिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया का यह अंग अगर गैरजिम्मेदाराना व्यवहार करने लगे तो फिर उस देश का भविष्य ही अँधेरे में डूब जायेगा|यह इस देश का दुर्भाग्य है कि यहाँ इस स्थान पर ऐसे लोग बैठे हैं जो निहायत ही देश के चलाने के काबिल नहीं| वातानुकूलित कमरे में बैठकर ज़मीनी सच्चाई को नहीं जाना जा सकता|अगर हम पिछले ६३ सालों के संवैधानिक इतिहास पर नज़र डालें तो लगभग १०० बार संविधान में संशोधन किया गया| कुछ चीज़ें जोड़ी गयी ,कुछ चीजें हटाई गई|लेकिन हकीकत इस बात की चीख चीख कर गवाही दे रहा है कि आम जनता की समस्याएँ हल नहीं हुई|इसलिए लोग अब इन नियमों से मुह मोड रहे हैं|
                                         हमारा संविधान ऐसे लोगों को भी चुनने की आज़ादी देता है जिनके अंदर तार्किक क्षमता के नाम पर कुछ नहीं रहता| इसलिए ये लोग कभी गंभीर मुद्दों पर बहस में शामिल नहीं होते इनका काम सिर्फ और सिर्फ हंगामा करना रह जाता है|जों हमारे संविधान पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहा है|कहने को तो हमारा  देश धर्मनिरपेक्ष समाजवादी गणतंत्र है लेकिन  धर्म के नाम पर सबसे ज्यादा दंगे यहीं भडकते हैं| यह संबिधान सबको समानता का अधिकार देती है लेकिन वास्तविकता यह है कि यहाँ अमीर और गरीब के बीच इतनी गहरी खाई है जिसे कभी पाटा नहीं जा सकता| तब सवाल यह उठता ऐसे संविधान का क्या मतलब जिसकी अवहेलना हर कदम पर होती हो,जिसका उल्लंघन नेता  अपना बड़प्पन समझते हों| कोई भी व्यवस्था तब फेल कही जाती जब उसके सदस्य उससे कन्नी काटने लगे,इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि इन खामियों को दूर करते हुए संविधान को फिर से बुद्धिजीवियों और शिक्षाविदों के सहयोग से लिखा जाये और एक नए सिरे से इस पूरे व्यवस्था को परिवर्तित किया जाये जिससे सच में भारत एक संप्रभु समाजवादी गणराज्य बन सके और फिर कोई इस संविधान का मजाक बनाने की हिमाकत न कर सक|

                                           

2 comments:

Prabodh Kumar Govil said...

jab ham aazad hue tab desh mein teen dharaen theen,jinhe aazadi ka shrey diya gaya.ek ke agua gandhiji the, doosre ke nehru aur teesre ke subhash.sanvidhan banate samay keval nehru vali vichardhara ko prashray mila.aapki baat 100 pratishat sahi hai ki hamara samvidhan desh ki asmita aur garima ko puri tarah nahin sambhal pata.

Prabodh Kumar Govil said...

आपका विचार सटीक है

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