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Sunday, September 12, 2010

नीतीश सरकार के ५ साल: उपलब्धियाँ तो हैं लेकिन नाकामी भी है

पांच साल पहले बदलाव की जिस आस को लिए बिहार के लोगों ने सत्ता परिवर्तन किया, बात जब उसके मूल्यांकन की आती है तो निश्चित ही हम इसे महसूस करने पर विवश होते हैं| शुरुआत से ही बिहार की गिनती पिछड़े राज्यों में होती रही है| हालाँकि उद्योग और खनिज के मामले में बिहार सबसे धनी राज्य रहा है| झारखण्ड के अलग होने से थोडा असर ज़रूर पड़ा है| लेकिन सबसे दोषी यहाँ की सरकार रही है| १५ सालों तक राजद की सरकार ने इस प्रदेश को बैकफूट पर ला दिया था| जब सवाल विकास का उठता है तो हम थोडा ठहर जाते हैं|

इसमें कोई संदेह नहीं है कि पिछले पांच सालों में बिहार ने तरक्की की उन उचाईयों को छुआ है जिसे छूना आसान न था| शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार में अभूतपूर्व उपलब्धि हासिल हुई है| मुख्यमंत्री पोशाक योजना, और साईकिल योजना ने न सिर्फ सूबे के लड़कियों में आत्मविश्वास की भावना जगाई है बल्कि इसका परिणाम भी नज़र आने लगा है| प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से लेकर राज्य के अस्पतालों की स्थिति सुधरी है| पहले जहाँ सरकारी अस्पतालों से लोगों का विश्वास उठ चुका था वहीँ अब उनका रुझान इस ओर होने लगा है| रोज़गार की दिशा में भी इस सरकार ने काफी महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है|

सड़कों की हालत ठीक हुई है, इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित हुआ है| कानून व्यवस्था की हालत में सुधार हुआ है| आर्थिक विकास दर देश में सबसे अधिक विकास दर वाला राज्य गुजरात को भी पार कर गया है| कुल मिलाकर अगर देखा जाये तो विकास हुआ है इसे कोई नकार नहीं सकता| और सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार सजग है| अपने कार्यकाल के दौरान मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि सरकार ने अपनी ज़िम्मेदारी से पीछा छुड़ा लिया|

लेकिन इस सच्चाई से हम इनकार नहीं कर सकते कि इस सरकार ने उपलब्धि हासिल की तो इसकी कुछ नाकामियां भी है| गुजरात के द्वारा बाढ़ पीडितों को दिया गया पैसा वापस लौटाना सबसे बड़ी असफलता है इस सरकार की| यहाँ श्री नीतीश कुमार राजनीति के गंदे विचार और छिछोलेपन के फेर में फंस गए| और इन सबके बीच आम आदमी कहीं गुम हो जा रहा है| गावों में रहने वाले लोग, जो आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं आज भी गरीबी और अभाव में जीने को विवश हैं| भ्रष्टाचार जैसी समस्या से लोग अभी भी परेशान हैं| उद्योग जो सरकारी उदासीनता का शिकार हैं उन्हें फिर से चालू करने की ज़रूरत है| अफसरशाही पर लगाम लगाने की ज़रूरत है| बच्चे स्कूल जा ज़रूर रहे हैं लेकिन हम अपने आप को सफल तभी मान सकते जब खुद उनकी प्रतिभा निखर कर सामने आएगी| सच में बच्चे ज्ञान हासिल करेंगे| ये ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता|

कोई भी सरकार या व्यवस्था परफेक्ट नहीं होती| इसे परफेक्ट बनाना पड़ता है| हमारा प्रयास बहुत मायने रखता है| जो लोग सवाल उठाते हैं उनसे मैं एक सवाल पूछना चाहूँगा कि समस्याएँ कब नहीं थी? जब रामराज्य था तब भी असामाजिक प्रवृत्ति के लोग थे, अन्यथा सीता जी को वनवास नहीं जाना पड़ता| कृष्ण भगवान जब साक्षात् पृथ्वी पर मौजूद थे तब भी दुर्योधन जैसे कुछ लोग सच्चाई को मानने से इनकार करते थे| इसलिए समाज जब तक है समस्याएँ तब तक रहेंगी| ज़रूरत है इसका ज्यादा से ज्यादा समाधान निकालने की| कहते हैं संसदीय लोकतंत्र में विपक्षी पार्टियां भी सरकार के ही अंग होती हैं| लेकिन अफ़सोस तब होता है जब विपक्षी पार्टियां गन्दी राजनीति कर आम लोगों में जहर भरने का काम करती है| सच को दरकिनार कर सिर्फ अपना उल्लू सीधा करना ही वर्तमान लोकतंत्र का मतलब रह गया है| इसलिए ज़रूरत इस बात की है हम सही चीज़ों को आत्मसात करते हुए वक्त की नजाकत को समझे और अपने लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन करते हुए अपने मताधिकार का सही प्रयोग करें| नीतीश सरकार पर भरोसा ज़रूर किया जा सकता है|

2 comments:

ujjwal agrain said...

बिहार सरकार का आंकलन तो तुमने बरी ही बारीकी से किया है पर बढते अफसरवाद की ओर तुम्हारा ध्यान नहीं गया. बिहार सरकार की नाकामी में बस इतना ही कहना है की गावों में सड़क तो है पर किसानो को फसल उगने के लिए उपजाऊ ज़मीन नहीं...
आगे आप समझदार हैं.

Voice of youths said...

दोस्त पोजेटिव थिंकिंग का मतलब ये नहीं होता कि सिर्फ़ अच्छा सोचो, जो चीज़ अच्छा हुआ है उसको स्वीकार करना भी ज़रुरी है| और शायद तुमने पोस्ट में ये वाक्य नहीं पढ़ा, "हमारा प्रयास बहुत मायने रखता है"

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