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Wednesday, February 3, 2010

why suicide

सिकुडते सामाजिक परिवेश और अत्यंत महत्वाकंक्षाओं का परिणाम आत्महत्या ज़िन्दगी से हताश ,व्यवस्था से निराश और किस्मत क़ि बेवफाई से तंग आकर अगर कोई व्यक्ति आत्महत्या करता है तो बात समझ में आती है लेकिन ज़िन्दगी क़ि जिम्मेदारियों से मुक्त नाबालिग बच्चे अगर आत्महत्या करते हैं तो इसके पीछे कहीं -न कहीं कोई ऐसा कारण है जिसकी पड़ताल हमें करनी होगी | एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में अमेरिका क़ि तुलना में नाबालिग लड़के -लड़कियों में आत्महत्या क़ि प्रवृत्ति में ७५% क़ि बढ़ोत्तरी हुई |साल के दुसरे ही दिन 11 वर्षीय नेहा सवंत ने दुपत्ते से लटककर आत्महत्या कर ली|कारण ठ उसके मत -पिता नही चाह्ते थे उसकी बेटी डान्स प्रोग्राम मे भाग ले |इस खबर से लोग उबर भी नही पाए थे कि १२ वर्षीय सुशान्त पाटिल ने दादर मे अपने ही स्कूल मे आत्महत्या कर ली |क्योकी वह ६ विषयों मे से चार विषयों मे फेल कर गया था| सवाल उठ्ता है इन् बच्चों ने किस चीज़ ने आत्महत्या करने को मजबुर किया ?कहानी यहीं समाप्त नही हुइ |१९ जान को ६ और चत्रों के आत्महत्या कि खबर आई |इन्मे एक चीज गौर करने लायक है कि ज्यादातर बच्चे मुम्बई और उसके आसपास के शहरों से आते थे |तो क्या शहरों कि चकाचौंध मे और ज़िदगी कि भागदौड के बीच आज के युवा कहीं गुम हो जा रहे हैं?सर्वश्रेष्ठ करने कि चाह लिए ये बच्चे सर्वश्रेष्ठ न कर पने के कारण आत्महत्या कर रहे हैं ? और सबसे बडा सवाल तो ये है कि आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है ? कोई सिस्टम को गलत मनता है तो कोई मा -बाप को जिम्मेदार ठहराता है |लेकिन मेरी नज़र मे दोनो बराबर दोषी हैं |मुलतः यह हमारे पारिवारिक और सामाजिक परिवेश के सिकुड़ते हुए दयरों क परिणाम है |पारिवारिक और सामाजिक मुल्यों मे गिरावट और अत्यन्त महत्वाकंक्षाओं क बोझ बच्चों पर लादकर जीवनयापन करना इस्क एक प्रमुख कारण है |इसके लिए विद्यालय और शिक्क्षक भी जिम्मेदार है |कोई भी बच्चा मा के पेट से सब्कुच सिखकर नही आता|वह इसी समाज मे पैदा होता है ,पलता है ,बडा होता है और सब्कुच सिखता है |अगर समाज इन्हे अच्ची चिजें ना सिखाये तो वह गलत चीजें तो सिखेगा ही |साथ ही मा -बाप कि अपेक्षाएं बच्चों से इतनी ज्यादा बढ़ गई हैं कि वे १००%से नीचे कुच भी स्वीकार करने को तैयार नही होते|इससे बलमान पर क्या असर पड़ता है इसके तरफ झंकने कि कोशिश भी नही नही करते |यह तब्तक होता रहेगा जब्तक हम अपने आप मे बदलाव नही लायेंगे |इसलिए अगर हम एसी घटनाओं पर रोक लाग्न चाह्ते हैं तो हमे सबसे पहले आपने आप को बदल्न होगा |मा -बाप को बच्चों के लिए समय निकालना पड़ेगा|उनकी समस्यें सुन्नी पड़ेंगी तभी इसका समाधान सम्भव है |

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