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Monday, July 26, 2010

सांस्कृतिक विरासतों से दूर होती युवा पीढ़ी

पिछले दिनों कला एवं संस्कृति विभाग बिहार सरकार की ओर से भारतीय नृत्य कला मंदिर में आयोजित कार्यक्रम ‘शनिवाहार’ में जाने का मौका मिला|उस दिन ओडिसी नृत्य और तबला वादन का कार्यक्रम था| कलाकारों ने मन तो मोह लिया लेकिन दिल में एक कसक आज तक रह गई कि संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए आयोजित इस कार्यक्रम में दर्शक दीर्घा खाली पड़ी थी| कुछ गिने चुने लोग थे जिसमे अधिकांश वहीँ के शिक्षक और कर्मचारी थे| मन में ये सवाल उठा कि आखिर लोग सांस्कृतिक विरासतों से दूर क्यों हैं? किन वजहों ने लोगों को अपनी सांस्कृतिक झलक पाने के लिए मजबूर नहीं किया? खासकर आज की युवा पीढ़ी की अगर हम बात करें तो सांस्कृतिक धरोहरों से वह और भी उदासीन है जो वास्तव में गंभीर चिंता का विषय है|
पूरी तरह से पाश्चात्य संस्कृति की जंजीरों में कैद युवा पीढ़ी आज अपने ही संस्कृति से मुह मोड़ती नज़र आ रही है|आधुनिकता की खाल ओढ़े इस समाज में संस्कृति की रक्षा के तथाकथित ठेकेदार तो हैं लेकिन उन्हें सिर्फ अपने स्वार्थ की पूर्ति में ही अपना उद्देश्य नज़र आता है|तब सवाल यह उठता है कि आखिर खुद के इस हालत से बाहर निकलने का रास्ता कौन बताएगा?
हमारे सामने समस्या यह है कि हम युवाओं को दोष तो दे देते हैं लेकिन वास्तविक सच्चाई को नज़रअंदाज कर देते हैं|उचित प्रचार और सही ज्ञान के अभाव में युवा अपनी संस्कृति को समझ नही पाते ऐसे में ज्यादा तढक- बढक वाले पाश्चात्य संस्कृति की कैद में युवा आसानी से आ जाते हैं,जिसके लिए सीधे तौर पर केंद्र और राज्य की सरकारें जिम्मेदार हैं| ज़रूरत इस बात की है कि युवाओं के अंदर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के प्रति रूचि पैदा कि जाये,उन्हें अपनी देश कि सांस्कृतिक विरासतों के बारे में बताया जाये ताकि अपने देश कि संस्कृति कि गरिमा बनी रहे|

1 comments:

Shweta said...

well written Grijesh, its important to be rooted to one's culture especially for the younger lot..
Keep writing.. Aapki awaaz bahut dur tak jaegi..

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