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Sunday, November 7, 2010

आर्या की आत्महत्या: समाज के मुंह पर तमाचा

‘विवशता’ और ‘नाराज़गी’ ये दो ऐसे शब्द हैं जो इंसान को कुछ भी कर गुजरने को मजबूर करते हैं| इसीकि एक बानगी है आर्या की आत्महत्या| २५ अक्टूबर को पटना की रहने वाली २१ वर्षीय एम् बी ए की छात्रा आर्या ने आत्महत्या कर ली थी| अपने ८ पेज के सुसाईड नोट में उसने अपने ऊपर अपने ही प्रेमी और उसके दोस्तों द्वारा किये गए जुल्म की दास्ताँ लिखी है| साथ ही उसने क़ानून से न्याय की उम्मीद भी की है| आर्या के अनुसार उसके तथाकथित प्रेमी हर्ष और उसके ३ दोस्तों ने उसका शारीरिक और मानसिक शोषण किया जिससे तंग आकर उसने ये कदम उठाया| इस कांड में अभी तक चारों आरोपितों की गिरफ़्तारी हो चुकी है| लेकिन उसका कसूर क्या था? उसका कसूर तो सिर्फ इतना था कि उसने उस लड़के से प्यार किया था जिसकी नज़रों में इसकी कोई कीमत नहीं थी| उसका कसूर यह भी था कि वह उस समाज में रहती थी जहाँ लडकियां सिर्फ उपभोग की वस्तु समझी जाती हैं| उसपर जुल्म की इम्तहाँ ये कि प्रेम सम्बन्ध और आत्महत्या के ऐसे तमाम मामलों में यह समाज लड़कियों को ही दोषी ठहराता है| ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि क्या आधुनिकता की चकाचौंध में हम इतने अंधे हो गए हैं कि मानवीय मूल्य और इंसानी रिश्ते भी निरर्थक हो गए हैं? एक और सवाल जिसकी ओर शायद किसी का ध्यान भी नहीं जाता कि आखिर उस लड़की के पास क्या रास्ता बचता है जिसका इस तरह से शारीरिक और मानसिक शोषण किया जा रहा हो? आज आर्या ने आत्महत्या कर ली तो ये कहा जा रहा है कि उसे लड़ना चाहिए था अगर उसने आवाज़ उठायी होती तो यही समाज उसे न जाने क्या- क्या उपनाम से संबोधित करता| रिश्तों कि मर्यादा को ताक पर रखकर समाज के दरिंदों ने उसके साथ अन्याय किया|

इन विपरीत परिस्थितियों में जहाँ मानवीय संवेदनाएं दम तोड़ रही हैं क्या प्यार, प्रेम जैसे शब्दों का कोई स्थान नहीं है? अगर हाँ, तो इसकी कीमत लड़कियों को ही क्यों चुकानी पड़ती है?

आर्या ने अपने सुसाइड नोट में लिखा है कि उसे कानून से इन्साफ चाहिए लेकिन पूरी तरह से पूंजीवाद के चंगुल में कैद इस व्यवस्था में जहाँ हर चीज़ बिकाऊ है यह एक बड़ा सवाल है कि क्या उसकी अंतिम इच्छा पूरी होगी? और क्या हमारी न्यायिक व्यवस्था इतनी परिपक्व है? बहरहाल इन्साफ कि उम्मीद तो उसके मृत शरीर को भी है|

आर्या की मौत न सिर्फ उसके परिवारवालों के लिए गहरा सदमा है बल्कि यह इस समाज और सामाजिक व्यवस्था के मुंह पर तमाचा जहाँ लड़कियों और महिलाओं के मदद और उत्थान के बड़े बड़े दावे तो किये जाते हैं लेकिन हकीकत यही है कि हम अभी-भी उसी पुरुषप्रधान मानसिकता में जी रहे हैं जहाँ महिलाओं का काम पति ,परिवार और बच्चों की देखभाल करना माना जाता है| समाज में घटने वाली हर उस घटना जो मनुष्य के संबंधो पर प्रश्नचिन्ह लगाती है, के तह तक जाने की कोशिश कोई नहीं करता|

इस मार्मिक और व्यवस्था के प्रति आक्रोश से भर देने वाली घटना की तपिश को महसूस कर रहे हर सचेत नागरिक को एकजुट होकर एक सुर में यह प्रयास करना चाहिए कि ऐसे तमाम लोगों को जो ऊँचे पद का रौब दिखाकर रिश्तों का सौदा करते हैं और उसकी हत्या करते हैं कानून के कठघरे में लाया जाये और कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जाये ताकि फिर कोई ‘हर्ष’ इसे दोहराने की हिमाकत न कर सके|

1 comments:

Alok Mohan said...

bhai jo hua bahut bura hua
nyany to milna hi chahiye

pr kya ladkiya sahi ladko ko nhi pehchan paati

use pahle hi kuch kerna chahiye tha
aatmahatya se kya haasil hua

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