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Thursday, March 8, 2012

अपनी पारंपरिकता खोती होली!

अपनी पारंपरिक सुंदरता और खुशियों के मिश्रण का विहंगम संगम, होली आज बदरंग हो चुकी है। अगर कुछ बचा है तो वह है परम्पराओं के नाम पर रिवाजों को ढोने की मज़बूरी और धार्मिक आस्था, जिसे मानव समाज छोड़ नहीं सकता। एक वह समय होता था, जब होली की खुमारी फागुन के पूरे महीने रहती थी। फाग गाने से लेकर एक दूसरे को अबीर गुलाल लगाने की औपचारिकता तो अभी भी है लेकिन वो चीजें नहीं दिखती जब होली के सामाजिक मायने होते थे। होली का मतलब पुरानी दुश्मनी को भुलाकर एक नये रिश्ते की शुरुआत होती थी। मुझे अभी भी याद है गाँव की गलियों में हुल्लड़ मचाती युवकों की टोली और रंग से बचने के लिए भागते लोग। उस समय मैं बच्चों की श्रेणी में आता था जिसकी अलग टोली होती थी। गाँव के बुजुर्गों को चिढ़ाने से लेकर गाली सुनने का एक अलग ही अनुभव होता था। होली सिर्फ़ होली के दिन ही नहीं खेली जाती थी उसके लगभग एक सप्ताह पहले और एक सप्ताह बाद तक होली खेली जाती थी। परन्तु आज अपनों तक सीमित सामाजिक अवधारणा और एकल परिवार ने सब गुड़ गोबर कर दिया है। अपार्टमेंटल संस्कृति में लिप्त पूरा समाज अपने मूल को खोकर सिर्फ़ दिखावों तक सीमित रह गया है। शहरी संस्कृति भले ही विकास और समृद्धि की परिचायक हो लेकिन जो चीज़ हमें जड़ से अलग करती है वह है अनजानापन। नरमुंडों के बीच दिखावटी अपनापन तो है लेकिंन इंसानी रिश्ते नहीं दिखते। सब एक दूसरे की तरक्की और अमनचैन के दुश्मन बने हुए हैं। होली के बहाने मानवीय संवेदनाओं पर सवाल इसलिए क्योंकि मनुष्य उस सामाजिक समरसताओं का प्रतिनिधित्व करता है, जिसका उदाहरण दुनिया के दूसरे जीवों में नहीं मिलता।
आज होली इलेक्ट्रोनिक ग्रीटिंग कार्ड्स और वर्चुअल दुनिया तक सीमित होकर रह गयी है। पहले घर से दूर रहने वाले लोग होली के अवसर पर इकठ्ठा होते थे। इसकी तैयारी पहले से ही होती थी। संयुक्त परिवार का कांसेप्ट था। आज अगर कोई चीज़ कचोटती है तो वह यही है। मेरे मोबाईल पर सुबह से कई मेसेजेज आ चुके हैं। यही हाल फेसबुक पर और दूसरे सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर है। लेकिन सवाल है अपनी वास्तविक सुंदरता और अपनेपन को खोकर जिस होली को हम मना रहे हैं उसके मायने क्या हैं?
आज लोग घरों से बाहर निकलने से डरते हैं। हर तरफ़ एक आशंका, डर और अनहोनी की चिंता सताए रहती है। न जाने किस दरवाजे से अकस्मात कुछ ऐसा हो जाए जिसकी कल्पना भी नहीं की हो। शक के बढते दायरे और विश्वास की कमी इतनी घरी पैठ बना चुकी है कि अगर कोई लड़की इस सामाजिक तानेबाने को तोड़कर सड़कों पर मस्ती में झूमते दिख गई तो ये तथाकथित आधुनिक समाज संस्कृति का ताना देने लगेगा। घटिया मानसिकता के बढते प्रभाव के बीच हम इस समाज को आधुनिक कैसे कहें, बड़ा सवाल यही है।
होली में पारंपरिक गीतों और अबीर गुलाल के बीच मस्ती में झूमते हुए लोग होते थे। आज उनका स्थान अश्लील और भौंडे गीतों ने ले लिया है। बेहूदे तरीके से कैमरे के सामने नाचते हुए युवक-युवतियां। आश्चर्य है कि इसी समाज को इसमें संस्कृति का कोई खतरा दिखाई नहीं देता। सभ्यता और संस्कृति कि दुहाई देकर समाज को तोड़ने का काम हो रहा है। हालाँकि सवाल यह भी है कि इस सामाजिक  विभत्सता को देखने लायक आँख और समझने लायक मन आज कितने लोगों में है?
दरअसल अपने कर्तव्य पथ से विमुख हमारा समाज इन्ही चीजों में खुश है। यहाँ न तो होली या किसी भी त्यौहार के मूल रूप को खोने की कोई बेचैनी दिखती है और न ही इस समाज को जरा भी अफ़सोस होता है। तो फिर जिम्मेदारी कौन लेगा?
गिरिजेश कुमार

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