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Thursday, May 5, 2011

कब तक होता रहेगा रिश्तों का क़त्ल?

बिहार की राजधानी पटना में एक बार फिर खून का रिश्ता शर्मसार हुआ| जहाँ जिंदगी और समाज के पचडों से अनजान दसवर्षीय रोहित को पैसों के लालच में उसके ही रिश्तेदारों ने अपहरण कर हत्या कर दी| बताया यह जा रहा है कि 7 लाख की फिरौती के लिए उसके ही चचेरे भाई ने पहले उसका अपहरण किया और फिर गला रेत कर हत्या कर दी| कल उसकी लाश को गड्ढे से बरामद किया गया| रोहित के पिता पटना में जूनियर इंजिनियर के पद पर कार्यरत हैं| इस दर्दनाक कुकृत्य की जितनी भी निंदा की जाए, कम होगी लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है वह कौन सी परिस्थितियां हैं जो विश्वास आधारित रिश्तों के बीच दरार पैदा कर रही हैं? आखिर लोग रिश्तों की कीमत को क्यों भूलते जा रहे हैं? क्या पैसा हमारी जिंदगी में इतनी अहमियत रखने लगा है कि हम प्यार, विश्वास और सामाजिक उसूलों की बलि चढ़ा दें? इस हत्या के बाद एक बार फिर ये ज्वलंत सवाल हमारे सामने मुंह बाएं खड़ा है लेकिन महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या हम सबक लेंगे?

भगवान बुद्ध और महावीर की धरती रिश्तों के क़त्ल का पहले भी गवाह बन चुकी है| चंद महीने पहले आर्या की आत्महत्या को हम अभी पूरी तरह से भूले भी नहीं हैं जहाँ उसके ही प्रेमी ने उसे शारीरिक और मानसिक रूप से इतना प्रताड़ित किया कि उसने खुद की इहलीला समाप्त कर ली| लेकिन ऐसी हर घटना जो इंसानियत और मानवता पर प्रश्नचिन्ह खड़े करती है, हमें अंदर से झकझोर देती है और मन में एक ही सवाल उठता है आखिर ऐसा कब तक? विकास के जिन दावों और हकीकतों के मुहाने पर आज प्रदेश खड़ा है उसमे ऐसी घटना, लोगों की मानसिकता में बदलाव पर सवालिया निशान लगाती है|

दरअसल यह व्यवस्था ऐसी है जहाँ आप चाहकर भी उस सोच से बाहर नहीं निकल सकते जहाँ उसकी कमीज मेरी कमीज से सफ़ेद कैसे वाले लोग रहते हैं| समाज के इन अनसुलझे पहलुओं को सुलझाने की कीमत कई बार चुकानी पड़ी है| हालाँकि ऐसी मार्मिक घटनाओं के पीछे भी कुछ सवाल है जिस पर विचार करना पड़ेगा और जिसपर सामान्यतया लोग ध्यान देने की ज़रूरत नहीं समझते| मसलन, अपहरण और हत्या की ऐसी वारदातों के लिए क्या सिर्फ प्रशासन ही जिम्मेदार है? एक सभ्य समाज के नागरिक होने के नाते हमारा क्या कर्तव्य है? आखि हम अपनी सोच अक्ब बदलेंगे? यह सच है कि कानून व्यवस्था की ज़िम्मेदारी एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सरकार और प्रशासन की है| अपराधियों के मन में पुलिस का खौफ़ भी ज़रुरी है लेकि जहाँ बात हमारी अपनी मानसिकता की आती है वहां प्रशासन या सरकार क्या कर सकती है? दरअसल हम इतने खुदगर्ज़ हो गए हैं कि हमें अपने अलावा किसी दूसरे की फ़िक्र ही नहीं है| भौतिकवादी चकाचौंध में मनुष्य इतना अंधा हो गया है कि उसके लिए अपने और अपने परिवार को बेचने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं| इस समाज को हर चीज़ की कीमत चाहिए और यही इस वर्तमान सामाजिक व्यवस्था का सबसे दुखद चेहरा है|

दूसरी बात यह भी है कि हमारी न्यायिक प्रक्रिया इतनी परिपक्व नहीं है कि वह तत्काल न्याय कर सके और दोषियों को सजा दे सके| एक केस को अंजाम तक पहुँचने में वर्षों लग जाते हैं और फिर भी न्याय नहीं मिलता जिससे अपराधियों के हौसले और बुलंद होते हैं|

इसलिए अब ज़रूरत ही नहीं समय की मांग भी है कि सरकार ऐसी नीति बनाये ताकि अपराधी अपराध करने से पहले सोचने को विवश हों अन्यथा पता नहीं कितने रोहित इसके शिकार होंगे?

गिरिजेश कुमार

3 comments:

PRO. PAWAN K MISHRA said...

अंत में जंगल राज का खात्मा न्य्याय्प्रिय जंगली बन कर ही किया जाएगा

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

बहुत ही दुखद घटना.....विचारणीय लेख

आदमी संवेदनहीन होता जा रहा है , सम्बन्धों पर स्वार्थ भारी है |

Prabodh Kumar Govil said...

ham shanka sandeh aur nafrat ke aamchalan ke yug me kyon pahunchte ja rahen hain, yah sochna hoga. ek junior engineer se uska hi saga sat-lakh ki mang akhir kaise kar pata hai, kuchh rahasyon ko suljhana hi hoga.

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