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Wednesday, May 11, 2011

हादसों का दर्द: पूछिए उनसे जिन्होंने अपनों को खोया है

हादसे और जिंदगी के बीच शाय चोली दामन का साथ है| ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं जिसकी जिंदगी में हादसे न हुए हों| फिर वह चाहे दुर्घटना में किसी अपने की मौत हो या वक्त के सितम से विपरीत हुई परिस्थितियां| हालाँकि कड़वा सच यह भी है कि झेलना उसे ही पड़ता है जिसकी ज़िदगी में ऐसे तूफ़ान आते हैं| लेकिन सोचने वाली बात यह है कि इंसा होने के नाते क्या हम हादसों के दर्द को कम करने में कोई भूमिका अदा कर सकते हैं?

हादसों में अपने को खोने का गम क्या होता है कोई उनसे पूछे जिन्होंने अपनों को खोया है| इसे महसूस करना इतना आसान नहीं होता| लेकिन क्या हादसों के लिए क्या सिर्फ़ दूसरे ज़िम्मेदार होते हैं? इसे समझना पड़ेगा| किसी ने लिखा है –“बुझ जाते हैं दीये कभी अपनी ही गलतियों से, हर बार कुसूर हवाओं का नहीं होता”

दरअसल जिंदगी में भागदौड़ इतनी बढ़ गयी है कि हम इन चीजों पर सोचना ही नहीं चाहते| यहाँ हर किसी को अपने काम पर पहुँचने की जल्दी होती है इस जल्दबाजी में हम यह भी भूल जाते हैं कि जिस रास्ते पर हम चल रहे हैं उसके किनारे पर कोई मदद के लिए तड़प रहा है| शराब पीकर गाड़ी चलाना, व्यस्त सड़क पर तेज गाड़ी चलाने, ओवरटेक करने को हम अपनी शान समझते हैं नतीजा उन निर्दोषों को भुगतना पड़ता है जिनका आशियाना सड़क का किनारा है या फिर दिनभर मेहनत कर साईकिल से या पैदल घर लौट रहे होते हैं| क्या हम कभी उनके बारे में सोचते हैं? ऐसा करते हुए लोग यह भी भूल जाते हैं कि दांव पर उनकी खुद की जिंदगी भी लगी हुई है|

मौत के बाद आदमी का क्या होता है? स्वर्ग-नरक क्या सच में अस्तित्व में है जैसे सवाल मानव सभ्यता की शुरुआत से ही रहस्य का विषय बना हुआ है| लेकिन हम चंद मिनटों के रोमांच के लिए किसी की जिंदगी में जीवनभर ज़हर घोल देने का कुत्सित प्रयास क्यों करते हैं? शायद हम कभी यह नहीं सोचते कि सामने वाले के परिवार में आंसुओं का वो अंतहीन सिलसिला चल पड़ेगा जिसे कोई बाँध रोक नहीं सकता| हर व्यक्ति किसी न किसी के लिए खास होता है फिर किसी का आंसु बहाने के लिए मजबूर करने का हमें क्या अधिकार है?

ज़रा सोचिये उस वक्त कैसा लगेगा जब अचानक फेसबुक पर किसी का स्टेटस अपडेट होना बंद हो जाए, ब्लॉग पर नई पोस्ट न आये और बार-बार किये गए इमेल का भी ज़वाब न मिले| फिर एक दिन आपको पता चले कि वह अब इस दुनिया में नहीं है| हम चाहकर भी उससे बात नहीं कर सकते| सोचकर ही रूहें तन जाती हैं|

ऐसा नहीं है कि हम इसपर पूरी तरह रोक लगा सकते हैं लेकिन अपने प्रयास से कम् तो ज़रूर कर सकते हैं| वक्त के सितम की मार झेलना वैसे भी मुश्किल होता है लेकिन जहाँ किसी एक की गलती का खामियाजा पूरा परिवार भुगते, उसके मित्रगन भुगतें और सगे सम्बन्धी भुगतें यह कतई जायज नहीं है| इसपर हमें गंभीरता पूर्वक विचार करना चाहिए|

गिरिजेश कुमार

1 comments:

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

मानवीय पक्ष और संवेदनशीलता को बल देने वाला सुन्दर लेख ...

'अहा वही उदार है परोपकार जो करे
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे '

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