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Monday, July 11, 2011

रेल हादसा: मुआवजों से तय होती है जिंदगी की कीमत

 दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क रेल हादसे रोकने मे नाकाम है| जिस रेल से भारत मे प्रतिदिन करीब सवा करोड़ लोग सफ़र करते हैं उनकी सुरक्षा राम भरोसे है और रेलवे उनकी जिंदगी की कीमत मुआवजों से तौलता है| गौरतलब है कि एक ही दिन मे दो बड़े रेल हादसों ने रेलवे की कार्यशैली को एक बार फिर कठघरे मे खड़ा कर दिया है| उत्तरप्रदेश मे मालवां स्टेशन के पास कालका एक्सप्रेस काल बन गई तो असम मे पुरी-गुवाहाटी एक्सप्रेस दुर्घटना ग्रस्त हो गई| कालका एक्सप्रेस दुर्घटना मे  69 लोग मारे जाने की पुष्टि हो चुकी है और तक़रीबन 245 घायल हैं तो पुरी-गुवाहाटी एक्सप्रेस से 70 लोगों के घायल होने की सूचना है| ये आंकड़े बढ़ सकते हैं| लेकिन याद कीजिये तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी ने फ़रवरी मे जब रेल बजट पेश किया था तो कहा था –“रहा गुलशन तो तब फूल खिलेंगे, रही ज़िंदगी तो कामयाबी मिलेगी” लेकिन कालका मेल दुर्घटना मे न तो गुलशन रहा न जिंदगी| इस भयानक मंजर की जो तस्वीरें टेलीविजन स्क्रीन पर आ रही हैं ज़ाहिर है स्थिति उससे भी बुरी है| लेकिन सवाल है हर हादसों के बाद जांच आयोग गठित कर दोषियों को सजा देने की घोषणा करने वाला और लोगों के उजड़े गुलशन को कागज के चंद नोटों से आबाद करने की असफल कोशिश करने वाला रेल मंत्रालय आखिर चेतेगा कब?
एक अनुमान के अनुसार देश में हर साल औसतन 300 छोटी-बड़ी रेल दुर्घटनाएँ होती हैं| आश्चर्य यह कि हर बार जांच के लिए टीम गठित होती है, रिपोर्ट भी आती है लेकिन सबक लेने की कोशिश नहीं होती और न ही दोषियों को सजा मिलती है| दर्द और त्रासदी की इस भयावहता को भुक्तभोगी ही समझ सकता है| सवाल यह भी है कि आम आदमी की सुरक्षा के लिए इस देश मे दरअसल जो रणनीति बनायीं जाति है और जो बजट आवंटित किया जाता है क्या उससे पूर्ण सुरक्षा उपलब्ध कराई जा सकती है? सोचने वाली बात यही है फिर चाहे वह रेल मंत्रालय हो या गृह मंत्रालय|
अपने आप को दुनिया के विकसित देशों की श्रेणी मे खड़ा करने की महत्वाकांक्षा लिए यह देश इंसानी लापरवाही को रोकने मे अबतक सक्षम नहीं हो सका| जबकि यह प्रमाणित तथ्य है कि ज्यादातर रेल हादसे रेलवे कर्मचारियों और अधिकारीयों की लापरवाही से होते हैं| विडंबना यह भी है कि गुलाम देशों के जमघट जिस कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए करोड़ों रूपये की हीलियम गैस गुब्बारों मे भरकर उड़ा दी गई और करोड़ों का घोटाला कर लिया गया उसी पैसों से आजादी के 64 साल बाद भी वह तकनीक इस देश नहीं आ सकी जिससे दुर्घटना के समय तत्काल राहत कार्य चलाकर पीडितों को मदद पहुंचाई जा सके| यहाँ सवाल सिर्फ कालका मेल का नहीं है सवाल रेलवे के उस उदासीनता का है जिससे सबक नहीं लिया जाता और जिसका शिकार हर बार आम निर्दोष लोग होते हैं| एक इंसान की ज़िंदगी की कीमत उसके परिवारजनों के लिए कहीं बड़ी होती है वनिस्पत 5 लाख रूपये के|
हर घटना की तरह ये घटना भी कुछ दिनों के बाद भुला दी जायेगी लेकिन जिन परिवारों मे मौत का मातम फ़ैल चुका है और जिनकी जिंदगी ज़िदा लाश मात्र बनकर रह गयी है उन परिवारों की तरफ देखने की कोशिश कौन करेगा? जिस उत्तरप्रदेश मे यह घटना हुई वहाँ राजनीतिक अराजकता का आलम है, एक तरफ महिलाओं की आबरू सुरक्षित नहीं है तो दूसरी तरफ़ सियासी दाँवपेंच खेला जा रहा है ऐसे मे हादसे के शिकार हुए लोगों की दास्ताँ गम और अफ़सोस के समंदर तले दब जाएँ तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी| लेकिन बड़ा सवाल यही है कि यात्रियों के पैसों से मुनाफे का बाजार खड़ा करने वाला रेलवे यात्रियों की सुरक्षित यात्रा आखिर कब सुनिश्चित करेगा?
ठीक दो दिन पहले मानवरहित फाटक पर ट्रेन और बस की टक्कर की भयावह तस्वीरें अभी लोगों के दिमाग से उतरीं भी नहीं थी कालका मेल हादसा हो गया| यह सच है कि हादसों को पूर्णतः  रोका नहीं जा सकता लेकिन क्या उन्हें कम भी नहीं किया जा सकता? रेल दुर्घटनाओं पर ममता बनर्जी की टिप्पणी थी “हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती” लेकिन जब पूरी अंगड़ाई ही ले ली जाए तो बदनामी से कितने दिनों तक बचा जा सकता है? रेल मंत्रालय सहित रेलवे के तमाम अधिकारी, कर्मचारी इस बात का मंथन करें|

(तस्वीरें livehundustan.com से)

 गिरिजेश कुमार


5 comments:

Anita said...

सारा देश इन हादसों में फंसे लोगों की पीड़ा से आहत है.आपने बिल्कुल सही कहा है रेल मंत्रालय को ठोस कदम उठाने होंगे, इस तरह यात्रियों के जीवन से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता.

Deepal Patel said...

behad dil dahla deni ghatna.. Laaparwah logon ko iske liye shakt se shakht saja ka prawadhan hon to kaafi ankush lagaya jaa sakta hai

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

सही बात कहता सशक्त आलेख.


सादर

Voice of youths said...

दीपल जी आप तक पहुँचना संभव नहीं हो पा रहा है|

एस.एम.मासूम said...

दर्दनाक है यह मंज़र. मुआवजा तो ज़िंदगी का क्या देगी सरकार. जो मिल जाए भला है.

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