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Wednesday, July 13, 2011

आम जनता में बनी नकारात्मक छवि बदलें देश के नेता

 समाज और देश का नेतृत्व करना सब के वश की बात नहीं होती| यह काम नेताओं का होता है, एक नेता वह होता है जिसके दिमाग मे समाज के विकास की दूरदर्शी योजनाएं होती हैं| उसकी जिंदगी का हर एक मिनट अपने देश की तरक्की और नए मुकाम हासिल करने के रास्तों पर विचार करने मे बीतता है| नेता जी सुभाष चन्द्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आजाद,सरदार बल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री इसी श्रेंणी के अंतर्गत आते हैं| और भी ऐसे कई नाम हैं जो इस श्रेंणी मे आते हैं| लेकिन अफ़सोस कि विरासत मे सौंपी गई इन नेताओं के नेतृत्वरूपी कृतित्व पर चलने वाला आज कोई नेता इस देश मे नहीं है| आज जितने भी नेताओं का चोला पहनकर अपने आप को नेता समझे बैठे हैं उनमे से एक भी ऐसे नहीं हैं  जिन्हें हम नेता कह सकें| ये सभी कुर्सीधारक हैं जो वक्त की नजाकत को देखकर पाला बदल लेते हैं| निजिहित को तवज्जो देने वाले कभी नेता नहीं कहला सकते| त्याग, बलिदान और जनता के दुःख-दर्द मे भागीदार बनना कोई नहीं चाहता इसलिए वर्तमान मे इन चोला धारक नेताओं के हर काम को लोग शक की निगाह से देखते हैं| सवाल है आखिर आम लोगों मे नेताओं की ऐसी छवि क्यों बनी?
दरअसल इसके लिए जिम्मेदार खुद यहीं लोग हैं| नेताओं ने जनता के विश्वासों का ऐसा मजाक बनाया कि जिससे लोग नेता शब्द से ही घृणा करने लगे| राजनीति, समाजिक ढाँचे को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करने का जरिया है लेकिन वर्तमान राजनीतिक पार्टियों और उसके कर्ताधर्ता कुछ नेताओं ने से इसे व्यवसाय बना दिया| ऐसे मे जनहित की बात सोचने वाला कौन है? देश मे 545 सांसदों मे 300 करोड़पति हैं| जिस देश की 70 प्रतिशत आबादी 20 रूपये से कम की रोज की आमदनी पर जिंदा हो उस देश की उसी आबादी का जन प्रतिनिधि करोड़पति है, इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे?
यहाँ हर नेता एक दूसरे की लोकप्रियता का दुश्मन है| कोई नेता अगर आगे बढ़कर जनता के लिए कुछ करना चाहता है, उसके सुख-दुःख का साझीदार बनना चाहता है तो विपक्षी पार्टियों को उसमे सियासी फ़ायदे के लिए सस्ती लोकप्रियता दिखाई देती है| उन्हें लगता है कि इससे उनकी पार्टी का बंटाधार हो जायेगा इसलिए उल जलूल बयान देकर किसी तरह ध्यान हटाया जाये| यहाँ हमाम मे सब नंगे वाली कहावत चरितार्थ होती है ऐसे मे ज़मीन और जनता के लिए संघर्ष करने वाली पार्टी या नेता दिखाई नहीं देते| चुनावी सभाओं मे बड़े-बड़े शब्दों का प्रयोग कर जनता को बरगलाने की कोशिश सभी करते हैं लेकिन हकीकत मे राजनीति की गन्दी चाल चलकर कुर्सी पाना मूल मकसद होता है|
आज देश जिस तरह से अराजक स्थिति मे पहुँच गया है ऐसा कौन दूरदर्शी नेता है जो भविष्य की वास्तविकता को बता सके? जबकि मौलाना अबुल कलाम आजाद ने 1946 मे ही भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के सुगबुगाहट के समय ही पाकिस्तान की स्थिति और भारत पर पड़ने वाले असर की विवेचना कर दी थी| मौलाना कोई ज्योतिषी या भविष्यद्रष्टा नहीं थे लेकिन दरअसल कुर्सीधारकों और नेता मे यही फर्क होता है|  लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान का नारा दिया था, उस समय जब सरकार पर संकट आई तो इन्ही किसानों ने अपने खुद के कमाए पैसे और गहनों से सरकार की मदद की थी लेकिन आज सरकारें खुद किसानों को लूट रहीं हैं,बदले मे  हक मांगने पर  लाठी और गोली मिलती है| इस सच को चाहे आज हम स्वीकार करें या न करें लेकिन जो स्थिति इस देश मे बनी हुई है वह कतई एक सभ्य समाज मे स्वीकार करने योग्य नहीं है|
सवाल यह भी है कि एक दूसरे के नुक्ताचीनी करने मे फंसे देश के नेताओं को  आम जनता मे बनी नकारात्मक छवि को बदलने के प्रयास नहीं करने चाहिए? सच मानिए तो इसी मे उनका और देश का भला है|

 गिरिजेश कुमार

2 comments:

PRO. PAWAN K MISHRA said...

सलीके से समझाया है इसीलिये नेताओ की समझ मे आने वला नही बाकी हम आप तो खुद समझदार है

नुक्‍कड़ said...

वे नेता ही क्‍या हुए
जो बदल जाएं
वे बदल सकते हैं
दल
दे सकते हैं
जनता को
दलदल।

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