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Sunday, December 12, 2010

यह लड़ाई हमें ही लड़नी पड़ेगी

भ्रष्टाचार पर शायद मानव सभ्यता के शुरुआत से ही बहस चलती आ रही है| लेकिन आखिर भ्रष्टाचार है क्या? हममें से ज्यादातर लोग इस बात से ही अनभिग्य हैं| जब भी भ्रष्टाचार को खत्म करने की बात उठती है तब सबसे बड़ा सवाल यही उठता है| हमारा देश गांवों में बसता है| और दुर्भाग्य से शिक्षा का प्रचार प्रसार ग्रामीण क्षेत्रों में कम है| वहाँ रहने वाले ज्यादातर लोग अपने अधिकार और कर्तव्य के प्रति ही जागरूक नहीं हैं| जिम्मेदार वो सरकारें हैं जिनके ऊपर देश को चलाने की ज़िम्मेदारी है| जिन्हें भ्रष्टाचार की परिभाषा नहीं आती वो इसके खिलाफ लड़ाई कैसे लड़ सकते हैं? सरकारी दफ्तरों के बड़े अधिकारी उनके लिए भगवन के समान होते हैं जिन्हें चढ़ावा देना हर भक्त का काम होता है| ऐसी विपरीत परिस्थिति सिर्फ गांव में है ऐसी बात भी नहीं है देश के मंत्री से लेकर संतरी तक सिर्फ अपने स्वार्थ की पूर्ति करने में लगे हुए हैं ऐसे में जागरूकता कहीं पीछे छूट जाती है जिसकी ज़रूरत देश के हर नागरिक को है| लेकिन इसका यह कटाई मतलब नहीं है कि भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो सकता|

भ्रष्टाचार को खत्म करने के उपाय सोचने के पहले हमें यह सोचना पड़ेगा आखिर ये होता क्यों है? जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग घुस क्यों लेते हैं और फंड में घोटाला क्यों करते हैं? हम चाहे लाख इंकार करें लेकिन यह बिलकुल सच है कि हम पूंजीवादी व्यवस्था में जी रहे हैं| जहाँ पूंजी ही सबकुछ है| आर्थिक असमानता दूसरा सबसे प्रमुख कारण है| अमीर और अमीर बनने की इक्षा रखता है| वरना उच्च पदों पर बैठे लोगों का नाम घोटालों में नहीं आता|

लोकतंत्र के तीन महत्वपूर्ण अंग हैं कार्यपालिका,विधायिका और न्यायपालिका| और लोकतंत्र की सफलता का यही सबसे बड़ा मूलमंत्र है| लेकिन अगर यही तीनों अंग अपनी जिम्मेदारियों से भटक जाएँ तो फिर उस देश का क्या होगा? भारत में भ्रष्टाचार एक ऐसा मुद्दा है जिसपर हम चाहे जितनी भी बहस कर लें कम ही मालूम पड़ती है| तब सवाल यह है कि क्या हम कभी इस समाजिक बुराई से मुक्त हो सकेंगे? कार्यपालिका और विधायिका तो पहले भी सवालों के घेरे में आ चुकी हैं लेकिन पिछले दिनों न्यायपालिका पर भी भ्रष्टचार में लिप्त होने के आरोप लगे| किसी भी व्यवस्था में जब व्यवस्था खुद सवालों के घेरे में आ जाये तो ये बिलकुल साफ़ हो जाता है कि कहीं न कहीं एक बड़ी खाई है जिसे या तो हम जान बूझकर नज़रंदाज कर रहे हैं या समझ नहीं पा रहे हैं| और इन सबके बीच नुक्सान देश का हो रहा है| राष्ट्रमंडल घोटाला, आदर्श सोसायटी घोटाला और 2G स्पेक्ट्रम घोटाला, ये तीन बड़े मामले हाल ही में सामने आये हैं| स्पेक्ट्रुम घोटाले में तो देश के कई बड़े पत्रकारों का भी नाम सामने आया है| तो क्या सचमुच भ्रष्टाचार हमारे समाज में ऐसे घुलमिल गया है कि हम इससे निजात नहीं पा सकते? कदापि नहीं| मैं तो यही कहूँगा- “कौन कहता है आसमां में सुराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो”| आज तक हम ‘लड़ाई हमें भी लड़नी पड़ेगी’ की तर्ज़ पर लड़ रहे थे, अब ‘लड़ाई हमें ही लड़नी पड़ेगी’ की तर्ज पर इसकी शुरुआत करनी पड़ेगी| निश्चित ही युवाओं से अपेक्षाएं हैं| लेकिन क्या सिर्फ बड़ी बड़ी बातें कह देने से समाधान निकल जायेगा? ऐसा न तो कभी हुआ है और न ही कभी होगा| जब लोगों को शिक्षित करने की बात आती है तो निश्चित ही सरकार की तरफ ध्यान जाता है| भ्रष्टाचार को खत्म करने के प्रयास भी वहीँ से होना चाहिए लेकिन जब कार्यपालिका और विधायिका खुद सवालों के घेरे में हो तो ये अपेक्षा रखना भी बेईमानी होगा| इसलिए हर एक व्यक्ति जो समाज में थोड़ी भी दिलचस्पी रखता है, को ये ज़िम्मेदारी उठानी पड़ेगी आम लोगों को जागरूक करने का और उन्हें शिक्षित करने का|और एक बार जब लोगों को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास हो गया तो फिर भ्रष्टाचार समाप्त होने में बहुत देर नहीं लगेगी| और फिर हम शायद भ्रष्टाचार मुक्त समाज में रह सकेंगे|

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