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Monday, December 20, 2010

साहित्य,युवा और बाज़ार

कहते हैं साहित्य समाज का दर्पण होता है| साहित्य ने समाज को परिवर्तित करने में बड़ी अहम भूमिका निभाई है| समाज और सामाजिक बुराइयां जब सामाजिक व्यवस्था को पीछे धकेलने की कोशिश करती हैं तो साहित्य, प्रहरी की तरह काम करता है और लोगों में एक नई चेतना विकसित करता है| इन्ही साहित्यों के संगम का नाम है ‘पुस्तक मेला’| पटना पुस्तक मेला भी इसी की एक कड़ी है| बिहार जैसे प्रदेश में पुस्तक मेले में भीड़ का महत्व और बढ़ जाता है क्योंकि अभी भी इन राज्यों की गिनती पिछड़े राज्यों में होती है और शिक्षा का स्तर बहुत निम्न है| मेले की भीड़ हमें सुकून भी पहुंचाती है| लेकिन यह एक बड़ा सवाल है कि कितने लोग सच में किताब की खोज में वहाँ पहुँचते हैं? इस भीड़ में ज्यादातर संख्या युवाओं की है लेकिन अधिकांश् युवा इसे मौज मस्ती और समय बिताने के लिए उपयोग करते हैं| बड़ा अफ़सोस होता है जब युवा साहित्य में अरुचि दिखाते हैं|

इस देश में भगत सिंह जैसे लोग भी हुए जिसने अपने २३ साल के छोटे से उम्र में २३००० से ज्यादा किताबें पढ़ डाली| ये वो दौर था जब अंग्रेजों का अत्याचार अपनी चरम सीमा पर था| और इसी समय रूस में क्रांति संपन्न हुई थी जिसमे साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान था|लेकिन आज के युवाओं में पुस्तकों से बेरुखी क्यों है? क्यों पुस्तक मेले में जाकर भी उनका ध्यान पुस्तकों पर नहीं जाता? ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि क्या आधुनिकता की अंधी दौड में साहित्य कहीं खो गया है? प्रेमचंद, शरतचंद्र, मैक्सिम गोर्की,लेव तालस्तोय जैसे महान लेखकों का महान साहित्य आज के युवाओं को अपनी और आकर्षित क्यों नहीं करता? क्या पुस्तकें छपनी बंद हो जानी चाहिए? ये ऐसे सवाल हैं जो हमें सोचने को मजबूर करते हैं|

ऐसा नहीं है कि दोष सिर्फ युवाओं का है| आज के इस भागदौड भरी जिंदगी में एक लेखक दूसरे लेखक को नहीं पढता, एक आलोचक दूसरे आलोचक को नहीं पढता, क्योंकि उसके पास समय नहीं है| हर तरफ गला काट प्रतियोगिता के बीच साहित्य अपना अस्तित्व खोता हुआ दिखाई दे रहा है| हर लेखक सस्ती लोकप्रियता चाहता है इसलिए वो अपने सांस्कृतिक उसूलों से समझौता करने से भी पीछे नहीं हटता जिसकी कीमत साहित्य को अपने पतन के रूप में चुकानी पड रही हैं|

कभी पुस्तकें ज्ञान अर्जित करने का माध्यम हुआ करती थी लेकिन आज ये अपना स्वरुप इतना बदल चुकी है है कि लोग इसमें भी बाज़ार ढूंढने की कोशिश करते हैं| या यूँ कहें कि बाजारवाद के प्रभाव से पुस्तकें भी अछूती नहीं हैं| दोष बेशक हमारा है क्योंकि इस समाज में सबसे प्रबुद्ध मनुष्य ही है| इस बात से हम संतोष कर सकते हैं कि तमाम दुश्वारियों के बीच पुस्तक प्रेमियों की संख्या अभी भी है| लेकिन क्या हमें साहित्य,संस्कृति और युवाओं की सोच पर फिर से विचार करने की ज़रूरत नहीं है? ताकि किताबें फिर से लोगों को खासकर युवाओं को अपने पास आने को मजबूर करे|

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