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Friday, November 25, 2011

थप्पड़ की गूंज तो सुनाई दे रही है, लेकिन निहितार्थों पर चर्चा नहीं हो रही


व्यवस्थाओं से निराश होकर या वर्तमान हालात से तंग आकर, कारण चाहे कुछ भी हो, थप्पड़ चूँकि देश को चलाने की तथाकथित ज़िम्मेदारी संभाले सरकार के मंत्री को पड़ी थी तो उसकी गूंज तो सुनाई पड़नी ही थी। लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि इस थप्पड़ की सिर्फ़ गूंज ही सुनाई दे रही है इसके निहितार्थों पर चर्चा नहीं की जा रही। शायद करना भी नहीं चाहते। लेकिन सवाल यह है जब भी कोई घटना हमारे स्वभाव के विपरीत घटित होती हैं तो बजाये उसकी जड़ तलाशने के हम निजी निष्कर्ष पर पहुंच कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री क्यों समझ लेते हैं?  एक बात हमें साफ़ तौर पर समझ लेनी चाहिए कि शरद पवार को थप्पड़ महज प्रचार पाने का हथकण्डा नहीं था। मंहगाई, भ्रष्टाचार और अघोषित तानाशाही के खिलाफ जो चिंगारी आम जनमानस रूपी राख में दबी हुई है उसे भड़काने की नापाक कोशिश एक ऐसे  शोले का रूप ले लेगी जिसे दबाना किसी भी शासक वर्ग के लिए आसान न होगा। इसीलिए जब घोर साम्राज्यवादी अमेरिका के राष्ट्रपति पर मुंतज़र अल ज़ैदी ने जूता फेंका था तो उसे वैश्विक समर्थन मिला था। और इसीलिए जब हरविंदर सिंह जैसा युवक आवेश में किसी मंत्री को थप्पड़ मारता है तो असभ्य होते हुए भी हम सिर्फ़ उसे दोषी नहीं ठहरा सकते।
माना कि एक सभ्य लोकतान्त्रिक समाज में जनता के प्रतिनधि को खुलेआम थप्पड़ मारना कतई जायज़ नहीं है लेकिन जो परिस्थितियां और जो हालात इस देश के सामने इन्ही भ्रष्ट नेताओं ने खड़े किये हैं उसे आखिर बर्दाश्त कब तक किया जा सकता है? हर चीज़ की एक सीमा होती है लेकिन हम यह क्यों भूल जाते हैं सीमा की भी एक सीमा होती है, जिसे लाँघने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए। हालाँकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लोकतान्त्रिक समाज में ऐसी प्रवृत्तियाँ विकसित होंगी तो किसी भी लोकतान्त्रिक संस्था का काम करना मुश्किल हो जाएगा लेकिन ऐसी प्रवृत्तियाँ विकसित न हों इसके प्रयास की ज़िम्मेदारी कौन लेगा? निहायत ही इसकी ज़िम्मेदारी उन्ही नेताओं को लेनी होगी जो देश चलाते हैं और आखिरकार गुस्सा भी उन्ही के खिलाफ है।
दरअसल आम जनता किसी फैसले पर तब पहुँचती है जब उसकी आशाओं, आकाँक्षाओं और भावनाओं के साथ खिलवाड़ होता है। आज भले ही हम इस घटना की जितनी भी निंदा कर लें लेकिन हमें चर्चा लोगों की उन मनोदशाओं पर भी करनी चाहिए जो उसे आपा खोने पर विवश करती है। इसे सिर्फ़ एक घटना मान लेना भी गलत होगा क्योंकि थप्पड़ मारना हममें से किसी का भी शौक नहीं होता। यह सच है कि हमें अपना विरोध दर्ज कराने के लिए लोकतान्त्रिक तरीकों का इस्तेमाल करना चाहिए लेकिन धरना, प्रदर्शन और जुलुस जैसे विरोध के शुद्ध  लोकतान्त्रिक तरीकों पर पुलिसिया ज़ुल्म इन्ही नेताओं की शह पर होता है फिर अव्यवस्थाओं के भंवर में फँसा आम आदमी क्या करे? फिर हम यह भी भूल नहीं सकते कि राहुल गाँधी को काले झंडे दिखा रहे युवकों को लतियाने में मंत्री भी शामिल थे। फिर उन युवकों से हम संयम की उम्मीद क्यों करते हैं?
इन सबके बीच विचारणीय यह भी है कि राजनीति पर जबतक स्वार्थनीति हावी रहेगा ऐसी घटनाएँ रोकी नहीं जा सकती। इसलिए निजीहित को छोड़कर नेताओं को जनहित की तरफ़ भी ध्यान देना चाहिए। अन्यथा यह कहना गलत न होगा कि शरद पवार को थप्पड़ सिर्फ़ एक बानगी भर है आगे लंबी कहानी है।
गिरिजेश कुमार


Tuesday, September 27, 2011

इस चकाचौंध के पीछे गहरा अंधेरा है


चमचमाती सड़कें, उसपर फर्राटेदार दौड़ती मंहगी कारें और आसमान को छूती इमारतें निश्चित ही किसी भी देश के विकसित और समृद्ध होने का प्रमाण हो सकती हैं लेकिन मुश्किल तब होती है जब इस चकाचौंध में हमारी आँखे इतनी चौंधिया जाती हैं कि हम उसके पीछे छिपे काले अंधेरे को देख नहीं पाते| अगर यह कहा जाए कि ऐसी ही कुछ स्थिति हमारे देश की है तो इसमें कोई आतिशयोक्ति नहीं होगी| जिंदगी के बारे में हम भले ही यह कह सकते हैं यह अनिश्चितताओं से भरी है लेकिन हमने समाज में रहने के जो  पैमाने बनाए हैं उनका लाभ कुछ मुट्ठीभर लोगों तक ही सीमित क्यों है? यही वो सवाल है जो हमें मथता है या कहें कि जिनकी जड़ें तलाशने की कोशिश नहीं होती|  
एक अघोषित अवकाश(40 दिन) से लौटने के बाद कई सारे सवाल कौंध रहे हैं| इन 40 दिनों में मैंने जिंदगी के कई रूप देखे| हालाँकि इनमे खुशियाँ कम ही थी| इस दौरान मौत से सामना भी हुआ और जिंदगी की जंग के लिए जिंदगी का ही विकृत रूप भी दिखा| किस्मत शब्द का उपयोग मैं नहीं करूंगा, क्योंकि इंसान को इसने जड़शील बना दिया है| दहशत से मची अफरातफरी भी दिखी तो जान बचाने के जुगत में लोगों को मरते भी देखा| जी, ये सब महज एक महीने में हुआ, अगर पीछे पलटकर देखने की कोशिश करता हूँ तो यकीन नहीं होता|
आखिर क्या हुआ इन 40 दिनों में? 1 सितम्बर 2011, ओवरब्रिज पर स्कूटी फिसली जिसे मैं ही चला रहा था| परिणामस्वरूप मेरा पैर गंभीर रूप से जख्मी हो गया और मुंह में भी चोटें आई| हालांकि मैं अब ठीक हूँ| 17 सितम्बर, मेरे दोस्त की माँ के गंभीर रूप से घायल होने की खबर आई| 18 सितम्बर, शाम अचानक आये भूकंप के झटकों ने ऐसा दहशत फैलाया कि अफरातफरी में कई की जान भी चली गई| आप कह सकते हैं सिर्फ 3 घटनाएँ हैं| जी, सिर्फ 3 ही हैं लेकिन इसके निहितार्थ को समझें तो गिनती नहीं कर पाएंगे| क्योंकि ये वो घटनाएँ हैं जिनसे मेरा सामना हुआ लेकिन ये रोज़ होती हैं| जगह बदल जाते हैं हालात नही|
यहाँ यह सब कहने की ज़रूरत इसलिए महसूस पड़ी कि क्योंकि मुख्य रूप से 17 और 18 सितम्बर की घटनाओं के बाद जो हालात उपजे और उनसे बाहर निकलने के प्रयास में जो बाधाएं आई, इनसे जूझते हुए लोगों के जो चेहरे मेरे सामने आये उसने सीधे-सीधे मेरे अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया| एक आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में अगर गंभीर आपदाएं आ जाएँ तो उस स्थिति की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है| दरअसल सवाल सिर्फ दुर्घटनाओं या प्राकृतिक आपदाओं का नहीं है सवाल विकास और भारत  निर्माण के दावों के बीच उपजे परिस्थितियों का है जिनसे जूझना आम आदमी की नियति है| दुर्घटनाएं व्यक्ति के हालात को देखकर घटित नहीं होती लेकिन आश्चर्य इस बात का है इस देश में करोड़ों रूपये बोरों में और बैगों में भटकते रहते हैं,(हाल के दिनों में ऐसे कई मामले देश के विभिन्न हिस्सों में देखने को मिले हैं) जिनकी बरामदगी के बाद उसका कोई दावेदार नही होता, लेकिन उसी पैसों से अस्पतालों में ऐसी सुविधाएँ विकसित नहीं हो पायी जिससे आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को किसी अनहोनी के बाद परिजनों के रहमोकरम या किसी की दया पर आश्रित न होना पड़े| ये हालात आज के हैं ऐसी बात नहीं है, या ऐसे हालात मेरे मित्र के साथ हैं ऐसा भी नही है लेकिन जो महत्वपूर्ण सवाल है वह यह है कि जिन सरकारों के हाथों में इन सबकी जिम्मेवारी है वो निजी स्वार्थों को तरजीह देने लगे और विरोधियों से बचाव ही जिनका प्रमुख लक्ष्य बन जाए तो ऐसे में आम जनता को मूलभूत सुविधाएँ मयस्सर कैसे होंगी?

कमोबेश यही हाल प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता का है| मैं जिस बिल्डिंग में रहता हूँ वो कतई भूकंपरोधी नहीं है लेकिन उस दिन भूकंप के बाद मची अफरातफरी की खबरें सुनकर जो पहला सवाल जेहन में आया वह यह कि अगर विकास का रास्ता इन कंक्रीट जंगलों से ही होकर गुजरता है तो इनमे भूकंपरोधी तकनीक का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता? जबकि यह सबको मालुम है कि भूकंप का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता|लेकिन दूसरा और अहम सवाल यह भी है कि मुनाफेआधारित व्यवस्था में आम आदमी के जीवन की फ़िक्र किसे है? बिल्डर जानते हैं कि मरने के बाद हर जिंदगी की कीमत तय होगी और फिर इसे भगवान का अभिशाप मानकर लोग चुप भी रह जाएंगे| फिर सबकुछ यूं ही चलता रहेगा| हालांकि उन मरनेवालों में बिल्डरों के परिजन भी हो सकते हैं इस बात को वे नजरअंदाज करते हैं| लेकिन हकीकत क्या है? जागरूकता फैलाने वाले कार्यक्रम यूं ही दम तोड़ते रहते हैं ऐसे में  जितने लोग भूकंप से नहीं मरे उससे ज्यादा लोग तो भगदड़ में मर गए| कम से कम बिहार में तो ऐसा ही हुआ| लेकिन विडंबना यह भी है कि लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ, सरकार ही अगर अस्थिर हो तो देशवासी जिंदगी को कोसने के अलावा कर ही क्या सकते हैं?
इन सबके बीच सुखद बात यही है कि उम्मीद के दीये कायम हैं और जबतक ये जलते रहेंगे हम हालात के परिवर्तन की आकांक्षा तो रख ही सकते हैं| लेकिन समझना यह भी पड़ेगा कि धैर्य की भी एक सीमा होती है|  
गिरिजेश कुमार

Monday, July 25, 2011

उदारीकरण ने आम आदमी को क्या दिया?


                उदारीकरण के 20 साल, आखिर हासिल क्या हुआ?
          
विकास के लिए विदेशी पूँजी निवेश की चाह लिए तक़रीबन दो दशक पहले जिस उदारीकरण को तात्कालीन नरसिंह राव की कांग्रेस सरकार ने इस देश मे लागू किया उसने आम आदमी को आखिर दिया क्या? आज जब उदारीकरण को २० साल हो चुके हैं तो सबसे बड़ा सवाल यही उभरकर सामने आता है| उदारीकरण को लेकर न जाने कितने ही तर्क, वितर्क और कुतर्क दिए जाते हैं लेकिन वास्तविकता क्या है? यदि इस ‘उदारीकरण’ को आम आदमी के दृष्टिगत देखा जाए, जिसके लिए सारी योजनाएं बनती हैं और नीतियों का निर्धारण किया जाए जाता है भले ही उसकी हकीकत कुछ भी हो, तो यह सिर्फ़ एक धोखे के अलावा कुछ भी नही है| सच तो यह है कि उदारीकरण ने सीधे-सीधे पूंजीपतियों को लाभ पहुँचाया, आम आदमी की आर्थिक स्थिति तो और बिगड़ती चली गयी| अमीर और गरीब के बीच जो खाई दरअसल आज इस देश मे है उसकी जड़ मे भी उदारीकरण और पूंजीपतियों की पूँजीलोलुपता है| मुनाफे आधारित व्यवस्था की नींव पर विकास की लकीर खींची जाये तो वह किसके हित मे होगा यह सहज ही समझा जा सकता है?
20 साल पहले बजट पेश करते हुए तात्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने जो स्थिति देश के सामने रखी थी उससे बचने का रास्ता उदारीकरण के रूप मे ढूंढकर भले ही वाहवाही लूटी हो लेकिन इसके दुष्प्रभावों के दूरगामी परिणाम की फ़िक्र किसी को नहीं थी| उस समय वित्तीय असंतुलन के कारण देश के पास महज 15 दिनों के आयात के लायक विदेशी मुद्रा भण्डार बचा था सवाल है क्यों? पिछली कांग्रेस, संयुक्त मोर्चा और जनता दल सरकारों की गलत नीतियों के कारण हमें राष्ट्रीय शर्म भी झेलनी पड़ी और बैंक ऑफ इंग्लैंड से लोन लेने के लिए 47 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था| इसके अलावा मंहगाई का सवाल तब भी था| इन सबके बीच सवाल यह उठता है कि अगर इससे बचने का रास्ता उदारीकरण था तो आज वही सवाल उसी अवस्था मे या कहें की उससे भी बदतर अवस्था मे मुँहबाएं क्यों खड़ा है?
दरअसल सच यह है कि हमने जी डी पी रेट को अपने विकास का पैमाना मान लिया है और हमें लगता है कि हम विकसित हो रहे हैं| जबकि दूसरी तरफ कड़वा सच यह भी है कि देश बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी,बेकारी,असमानता, जो उदारीकरण की ही देन है, की गिरफ्त मे फँसा हुआ है| मशीनी युग ने आम आदमी से उसकी रोजी-रोटी छीन ली है| अमीरों को अमीर और गरीबों को और गरीब करना उदारीकरण का एकमात्र मकसद है| सवाल है जो देश मानव संसाधनों से परिपूर्ण है, जहाँ आत्मनिर्भर होने की असीम संभावनाएं थी और हैं भी वहाँ उदारीकरण की ज़रूरत क्यों पड़ी? उदारीकरण तो सिर्फ़ 10-15 प्रतिशत लोगों को सुख दे रहा है बाकी तो उसका अभिशाप ही झेल रहे हैं| फिर इस उदारीकरण के मायने क्या हैं?
 इस उदारीकरण को अगर आंकड़ों की नजर से  देखा जाए तो परिवहन  के क्षेत्र मे 1991 मे कुल 2296800 किमी सड़कें थी| एन एच 33690 किमी, रेल 62571 किमी और विद्युतीकृत रेल लाइन 10809 किमी थी| जबकि 2011 में कुल 33.4 लाख किमी सड़क है| जिसमे एन एच 65569 किमी और स्टेट हाईवे 130000 है| रेल लाइन की कुल लम्बाई 64215 किमी है जबकि विद्युतीकृत रेल लाइन 17811 किमी| वहीँ संचार के क्षेत्र मे 1991 मे कुल टेलीफोन कनेक्शन 50 लाख था जबकि अभी 6212.80 लाख है| 1991 मे कुल बेरोजगारी 9.02 मिलियन थी, 2004-05 में 10.51 मिलियन जबकि अभी 16.00 मिलियन है| यानी संचार क्षेत्र को छोड़ देन तो उदारीकरण से विकास की कुछ खास लकीर नहीं खींची जा सकी है| बेरोजगारी तो लगभग दो गुणी ज्यादा हो चुकी है| लेकिन जरा आज से ठीक 20 साल पहले चलते हैं जब तात्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने ऐतिहासिक बजट भाषण मे विक्टर ह्यूगो को उद्धृत करते हुए कहा था “दुनिया की कोई ताकत उस विचार को नहीं रोक सकती जिसका समय आ गया है”| आज यही सवाल तत्कालीन वित्तमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी से नही पूछा जाना चाहिए कि क्या उदारीकरण का वास्तविक समय आ गया था? फिर जब आज हालात ऐसे हैं तो आर्थिक सुधारों की शुरुआत की घोषणा को किस तरह संकट के भीतर से भविष्य की इबारत लिखना कहा जा सकता है?

गिरिजेश कुमार


  

Sunday, July 17, 2011

पूंजीपतियों पर हमला हो, तब हिलती है सरकार

 कह सकते हैं कि धमाकों के सिर्फ बारह घंटे बाद ही जिस तरह से मुंबई अपने रंग मे आ गई और लोग सड़कों पर उसी तरह से दौड़ने लगे जैसे कुछ हुआ ही नहीं, वो हमारी जिजीविषा, मुश्किलों से लड़ने की हमारी शक्ति और इंसानियत के हत्यारों के खिलाफ़ हमारी एकजुटता को प्रदर्शित करती है| हम यह भी कह सकते हैं कि चूँकि मुंबई के लिए यह कोई नई बात नहीं थी इसलिए वापस पटरी पर आने में उसे अपेक्षा से भी कम समय लगे, लेकिन क्या हम इतने से ही संतुष्ट हैं?

दरअसल हर आतंकी घटना इतिहास के पन्नों मे अपना अमिट नाम दर्ज कराती है और उन लोगों के लिए न भूलने वाली यादें छोड़ कर जाती है जो ऐसी घटनाओं मे मारे जाते हैं| अफ़सोस तब होता है जब जनता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध प्रशासनिक तंत्र और सरकारें गैरजिम्मेदाराना रवैया अपनाती हैं| मुंबई हादसों के बाद जनता के इन तथाकथित हिमायती नेताओं का बयान उन पीड़ितों पर नमक छिडकने जैसा है, जो इसके शिकार हुए हैं| लेकिन सवाल है हर आतंकी घटनाओं के बाद या किसी हादसे के बाद जो राजनीतिक समीकरण दरअसल इस देश मे बनाये जाते हैं और सियासी फ़ायदे ढूंढने की जो कुत्सित कोशिश होती है वह एक सभ्य लोकतान्त्रिक समाज के लिए कहाँ तक जायज है? सच मानिए तो लोकतान्त्रिक समाज कहने का भी मन नहीं करता| आखिर ऐसी परिस्थितियाँ क्यों बनी?
 इस देश के नेताओं की राजनीतिक समझ इसी बात से ज़ाहिर होती है कि वो ३१ महीने तक बम विस्फोट न होना अपने सरकार की उपलब्धि मानते हैं तो दूसरे नेता क्षेत्रवाद के तराजू पर इसे तौलते हैं| मीडिया भी इसे मसाला मारकर प्रस्तुत करता है और बजाये आलोचना के उसे अख़बारों के पहले पन्ने पर जगह मिलती है और न्यूज़ चैनलों की पहली खबर बनती है| जो लोग मारे गए या जो घायल हुए उनके प्रति हमदर्दी या संवेदना के दो शब्द किसी ने नहीं कहे| क्योंकि इसमें आम लोग मारे गए थे| उनकी न तो कोई राजनीतिक पहुँच थी और न ही वे पूंजीपति थे| आम जनता की तथाकथित हितैषी सरकारों की दोहरी मानसिकता का अंदाज़ा सिर्फ इस घटना से लगाया जाता है| जब 26 नवंबर 2008 को उसी मुंबई मे आतंकी हमला हुआ था तो राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री समेत केन्द्रीय गृहमंत्री तक को जाना पड़ा था क्योंकि वह हमला पूंजीपतियों की छाती पर हुआ था| और कहना न होगा कि इस देश मे पूंजीपतियों का अघोषित राज है| आतंक के विरोधी हम भी हैं लेकिन आतंकी घटनाओं पर जनता के साथ दोहरे व्यवहार का कतई समर्थन नहीं किया जा सकता| वह भी आम जनता के द्वारा चुनी गई सरकारों द्वारा|

इस घटना के लिए क्या सरकार जिम्मेदार नहीं है? जिस मुंबई मे ए टी एस, मुंबई पुलिस सहित कई आतंक निरोधी एजेंसियां काम करती हैं वहाँ बार-बार हमला करने मे आतंकी सफल कैसे हो जाते हैं? आखिर आतंकी घटनाओं को रोकने मे हमारा सुरक्षा तंत्र नाकाम क्यों रहता है? क्या यह सवाल जायज नहीं है कि बिना किसी घरभेदिये के किसी भी आतंकी वारदातों को अंजाम नहीं दिया जा सकता? तो फिर वह घरभेदिया कौन है? उसे ढूंढने की जिम्मेदारी किसकी है? आतंक के आकाओं को उसके घर मे घुसकर मारने की राजनीतिक इच्छाशक्ति हमारे अंदर क्यों नहीं है? बाहर की तो छोडिये जो हमारे घर के अंदर हैं उन्हें क्यों जिंदा रखा गया है? अफजल गुरु और कसाब अब तक जिन्दा क्यों है? एक बड़ा सवाल यह भी है कि सुरक्षा एजेंसियों और जाँच एजेंसियों के बीच आपसी तालमेल क्यों नही है? इन  सवालों के जवाब आज हर भारतीय तलाश रहा है| लेकिन जवाब के बदले उसे निराशा हाथ लगती है| इस हताशा और निराशा से विचलित होकर आज का युवा वर्ग अगर अनापेक्षित कदम उठा ले तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? यह इस देश की विडंबना है कि यहाँ कसाब और अफजल जैसे मानवता के हत्यारों के लिए भी मानवीय संवेदनाएं आड़े आती हैं| लेकिन वही मानवीय संवेदना अकाल मौत के शिकार हुए लोगों के लिए नहीं दिखती|
इसलिए सवाल सिर्फ आतंकी घटनाओं मे मारे जाने वाले लोगों का नहीं है सवाल उस नजरिये का भी है जो सरकारों का आम लोगों के प्रति होता है| देश भ्रष्टाचार, काले धन और सियासी चालों मे कौन कितना ताकतवर है, मे फँसा हुआ है राजनीतिक शुचिता की परवाह किसी को नहीं है| आखिरी सवाल ये कि 11 जुलाई 1993,26 नवंबर 2008,13 जुलाई 2011 के बाद अगली तारीख कौन सी होगी?

गिरिजेश कुमार


Wednesday, July 6, 2011

भ्रष्टाचार पर छिड़ी बहस मे कहाँ है आम आदमी?


 भ्रष्टाचार पर जितनी बहस और चर्चाएँ हाल के दिनों मे हुई उतनी देश के इतिहास मे शायद कभी नहीं हुई| लोकपाल, जनलोकपाल, सरकार और सिविल सोसायटी के बीच मतभेद इन तमाम मुद्दों पर पिछले चार महीनों से लगातार चर्चा-बहस हो रही है लेकिन सवाल है जिस आम जनता के लिए ये लड़ाई लड़ी जा रही है वो कितना समझ पाया है? और इस दिशा मे ठोस प्रयास क्या वास्तव मे किये जा रहे हैं? आम जनता जब हम कहते हैं तो उसका सीधा मतलब उन लोगों से होता है जो दूर दराज के क्षेत्रों मे, सुदूर गांवों मे दैनिक मजदूरी या किसी तरह अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं| यकीं मानिये तो भ्रष्टाचार से सबसे ज्यादा प्रभावित यही लोग हैं या कहें कि भ्रष्टाचार का सबसे ज्यादा खामियाजा इन्ही लोगों को भुगतना पड़ता है| लेकिन सच तो यह है कि ये बहस दिल्ली और बड़े शहरों के सुविधासंपन्न और परदे के पीछे से भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले लोगों तक ही सिमित है,आम लोगों तो अभी भी नहीं पता लोकपाल और जन लोकपाल क्या है?  ऐसे मे जड़ से भ्रष्टाचार खत्म करने की और भ्रष्टमुक्त समाज बनाने की जो काल्पनिक रूपरेखाएँ खींची गयी हैं उसके मायने क्या है?
दरअसल विषमताओं और विविधताओं मे बंटा हुआ यह समाज सामाजिक सरोकारों से जुड़े ऐसे तमाम मुद्दों पर ऐसे ही अंतर्विरोध मे फंस जाता है| सियासत, सियासी फायदे और निजी हित के चक्कर मे खुलकर एक पक्ष कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं ले पाती है| सरकार की उदासीनता और गैरजवाबदेह होना इसीकी अगली कड़ी है| ऐसे मे यह साफ है कि लोकतान्त्रिक सरकार अपने कर्तव्यों को भूल चुकी है|   
हालाँकि सच यह भी है कि पिछले बयालीस साल से  जो विधेयक संसद और कार्यालयों की धुल फाँक रहा था अन्ना हजारे ने जब उसकी धुल साफ़ करनी चाही तो बीच मे सरकार ने अड़ंगा लगा दिया| एक तरफ कांग्रेस चीख-चीख कर यह कह रही है कि हम भ्रष्टाचार के विरुद्ध हैं और दूसरी तरफ उसकी सरकार एक ठोस कानून नहीं बनने देना चाह रही क्योंकि उसे लगता है इससे उसके अपने ही हाथ बंध जायंगे लेकिन बहाना संसदीय लोकतंत्र पर खतरे का है| सरकार की इस दोहरी नीति को बेनकाब करने और जनता को उसकी चालों को समझाने की जिम्मेदारी विपक्षी पार्टियों का होता है लेकिन देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी भाजपा अपने स्वार्थ के कारण बिल पर अपनी राय भी स्पष्ट नहीं कर पायी है| इसलिए  सवाल सिर्फ भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए जनलोकपाल बिल लाने या सरकार और सिविल सोसायटी के बीच असहमति का नही  है सवाल है आम जनता को राहत देने का या कहें कि उसकी समस्याओं को दूर करने का या भ्रष्टमुक्त समाज बनाने का जो हुनर इस देश मे अपनाया जा रहा है, उसमे आम आदमी फिट होता कहाँ है?
 
आशंकाएं सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों से भी हैं| तक़रीबन ४ महीने पहले इसी आंदोलन को राजनेताओं और राजनीतिक पार्टियों से बिल्कुल दूर रखा गया था और यह नजारा पूरी दुनिया ने देखा था कि किस तरह नेताओं को हूट किया जा रहा है लेकिन वही अन्ना हजारे आज राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं की शरण मे देखे जा रहे हैं| सवाल है क्यों? मुझे लगता है जितना समय निहित स्वार्थी पार्टियों पर खर्च किया जा रहा है उतना ही समय आम जनता के बीच खर्च किया जाए तो हम उस उद्देश्य को प्राप्त कर सकते हैं जिसके लिए ये कवायद हो रही है| हर आंदोलन के विरोधी होते ही हैं लेकिन यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम उनको कितना स्पेस देते हैं| इसलिए ज़रूरत इस बात की भी है अपने विरोधियों मे न उलझ कर उस आम जनता को इसका वास्तविक अर्थ समझाया जाये जो अभी तक इससे महरूम है बाकी बहस बाद मे भी हो सकती है|

गिरिजेश कुमार