Pages

Showing posts with label आम जनता. Show all posts
Showing posts with label आम जनता. Show all posts

Saturday, August 6, 2011

बढ़ रही है संसद और समाज के बीच दूरी


 लोकतंत्र पर मंडरा रहा है खतरा

विविधताओं से भरे इस देश में व्यवस्थागत अराजकता फैले यह हममे से कोई नहीं चाहेगा लेकिन जो परिस्थितियां हाल के दिनों में देश में बनी हैं, जिस तरह से संसद और समाज आमने-सामने दिख रहे हैं या कहें कि संसद और समाज के बीच दुरी बढ़ी है वह इशारा उसी व्यवस्थागत अराजकता की ओर कर रही है जिनसे हम बचना चाहते हैं| सवाल है क्या संसद और समाज के बीच यह दुरी जायज है? जिस संसदीय व्यवस्था की परंपरा आज़ादी के बाद से इस देश में चली आ रही है कहीं यह उसके खात्मे का संकेत तो नहीं है? पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान अपने अलोकतांत्रिक नीतियों के कारण ही आज अव्यवस्थित है| ये सवाल इसलिए भी बहस की मांग करते हैं क्योंकि निहित स्वार्थ के खातिर राजनीतिक दलों ने देश की रीढ़ यानी आम जनता को इतना नुकसान पहुंचाया है कि उसके खिलाफ लोग अब गोलबंद होने लगे हैं| यह निराशा कभी-भी भयंकर रूप ले सकती है लेकिन क्या शासन सत्ता में बैठे लोगों को इसकी भनक है?
ऐसे में जब अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन को आखिरी लड़ाई के रूप में  आह्वान कर दिया है स्थितियाँ बिगड़ने के हालात ज्यादा हैं| दरअसल सवाल सिर्फ जनलोकपाल विधेयक और भ्रष्टाचार का ही नहीं है| कई मुद्दे हैं जिनसे लोगों का संसदीय व्यवस्था से विश्वास उठता जा रहा है| जिनमे मंहगाई, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, जैसे मुद्दे प्रमुख हैं| सच यह भी है कि एक तरफ़ लोग सम्मानजनक जिंदगी जीने की कोशिश में दिनरात एक करते हैं तो दूसरी तरफ़ सुविधासंपन्न लोग हैं| दोनों के बीच बढ़ रही खाई निराशा की चरम सीमा तक पहुंच चुकी है| इसलिए समझना यह भी पड़ेगा कि यह निराशा सामाजिक नियमों, आदर्शों और मूल्यों को नजरंदाज कर हक और अधिकार में अंतर समझे बिना लोगों को उपद्रवी बना सकती है और वह स्थिति निश्चित ही सभ्य समाज के लिए अच्छी नहीं होगी| और फिर लोकतान्त्रिक व्यवस्था में आम जनता को ज्यादा दिनों तक बेवकूफ बनाना भी आसान नहीं है| लेकिन वोट बैंक और कुर्सी के लालच में देश को बांटने से भी पीछे न हटने वाली पार्टियां क्या अपने अंतर्मन से ये सवाल पूछेंगी? ज़ाहिर है नहीं|
इस बीच सांसद का सत्र भी चल रहा है| हंगामों और संग्रामों की आशंकाओं के बीच अबतक ठोस बहस किसी मुद्दे पर दिखाई नहीं दी है| मंहगाई जैसे मुद्दों पर बहस के लिए 80% सांसदों का अनुपस्थित रहना सांसदों की आम जनता से जुड़े मुद्दों पर गंभीरता को समझने के लिए काफी है| कभी जनता से जुड़ी समस्याओं पर गंभीर बहस की जगह संसद आज सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गया है| जहां तीखे सवाल तो होते हैं, सरकार और विपक्ष एक दूसरे को घेरने में भी कोई कसर नहीं छोड़ती लेकिन देशहित के लिए नहीं, कुर्सी पाने या बचाने के लिए| फिर सवाल है जब संसद अपने लक्ष्य से भटक जाए तो फिर संसदीय व्यवस्था के मायने क्या हैं?
दूसरी तरफ केन्द्र सरकार की जनआकांक्षाओं से जुड़े जनलोकपाल बिल पर जिस तरह से उदासीन दिखी और दिख रही है उसने सरकार के खिलाफ लोगों के गुस्से को भड़काने का काम किया है| यानी लोकतांत्रिक व्यवस्था के नियमों को कुचलकर सरकार ने जनता की भावनाओं का भी मजाक बनाया| इसलिए आज स्वतंत्रता दिवस यानि 15 अगस्त की चर्चा के बदले 16 अगस्त की चर्चा लोगों के जुबान पर है| समर्थन कितना मिलेगा य सरकार क्या रुख अपनाएगी यह तो आनेवाला वक्त बताएगा लेकिंन आम लोगों का संसदीय व्यवस्था से इस तरह भरोसा उठना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है|

गिरिजेश कुमार

  

Wednesday, July 13, 2011

आम जनता में बनी नकारात्मक छवि बदलें देश के नेता

 समाज और देश का नेतृत्व करना सब के वश की बात नहीं होती| यह काम नेताओं का होता है, एक नेता वह होता है जिसके दिमाग मे समाज के विकास की दूरदर्शी योजनाएं होती हैं| उसकी जिंदगी का हर एक मिनट अपने देश की तरक्की और नए मुकाम हासिल करने के रास्तों पर विचार करने मे बीतता है| नेता जी सुभाष चन्द्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आजाद,सरदार बल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री इसी श्रेंणी के अंतर्गत आते हैं| और भी ऐसे कई नाम हैं जो इस श्रेंणी मे आते हैं| लेकिन अफ़सोस कि विरासत मे सौंपी गई इन नेताओं के नेतृत्वरूपी कृतित्व पर चलने वाला आज कोई नेता इस देश मे नहीं है| आज जितने भी नेताओं का चोला पहनकर अपने आप को नेता समझे बैठे हैं उनमे से एक भी ऐसे नहीं हैं  जिन्हें हम नेता कह सकें| ये सभी कुर्सीधारक हैं जो वक्त की नजाकत को देखकर पाला बदल लेते हैं| निजिहित को तवज्जो देने वाले कभी नेता नहीं कहला सकते| त्याग, बलिदान और जनता के दुःख-दर्द मे भागीदार बनना कोई नहीं चाहता इसलिए वर्तमान मे इन चोला धारक नेताओं के हर काम को लोग शक की निगाह से देखते हैं| सवाल है आखिर आम लोगों मे नेताओं की ऐसी छवि क्यों बनी?
दरअसल इसके लिए जिम्मेदार खुद यहीं लोग हैं| नेताओं ने जनता के विश्वासों का ऐसा मजाक बनाया कि जिससे लोग नेता शब्द से ही घृणा करने लगे| राजनीति, समाजिक ढाँचे को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करने का जरिया है लेकिन वर्तमान राजनीतिक पार्टियों और उसके कर्ताधर्ता कुछ नेताओं ने से इसे व्यवसाय बना दिया| ऐसे मे जनहित की बात सोचने वाला कौन है? देश मे 545 सांसदों मे 300 करोड़पति हैं| जिस देश की 70 प्रतिशत आबादी 20 रूपये से कम की रोज की आमदनी पर जिंदा हो उस देश की उसी आबादी का जन प्रतिनिधि करोड़पति है, इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे?
यहाँ हर नेता एक दूसरे की लोकप्रियता का दुश्मन है| कोई नेता अगर आगे बढ़कर जनता के लिए कुछ करना चाहता है, उसके सुख-दुःख का साझीदार बनना चाहता है तो विपक्षी पार्टियों को उसमे सियासी फ़ायदे के लिए सस्ती लोकप्रियता दिखाई देती है| उन्हें लगता है कि इससे उनकी पार्टी का बंटाधार हो जायेगा इसलिए उल जलूल बयान देकर किसी तरह ध्यान हटाया जाये| यहाँ हमाम मे सब नंगे वाली कहावत चरितार्थ होती है ऐसे मे ज़मीन और जनता के लिए संघर्ष करने वाली पार्टी या नेता दिखाई नहीं देते| चुनावी सभाओं मे बड़े-बड़े शब्दों का प्रयोग कर जनता को बरगलाने की कोशिश सभी करते हैं लेकिन हकीकत मे राजनीति की गन्दी चाल चलकर कुर्सी पाना मूल मकसद होता है|
आज देश जिस तरह से अराजक स्थिति मे पहुँच गया है ऐसा कौन दूरदर्शी नेता है जो भविष्य की वास्तविकता को बता सके? जबकि मौलाना अबुल कलाम आजाद ने 1946 मे ही भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के सुगबुगाहट के समय ही पाकिस्तान की स्थिति और भारत पर पड़ने वाले असर की विवेचना कर दी थी| मौलाना कोई ज्योतिषी या भविष्यद्रष्टा नहीं थे लेकिन दरअसल कुर्सीधारकों और नेता मे यही फर्क होता है|  लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान का नारा दिया था, उस समय जब सरकार पर संकट आई तो इन्ही किसानों ने अपने खुद के कमाए पैसे और गहनों से सरकार की मदद की थी लेकिन आज सरकारें खुद किसानों को लूट रहीं हैं,बदले मे  हक मांगने पर  लाठी और गोली मिलती है| इस सच को चाहे आज हम स्वीकार करें या न करें लेकिन जो स्थिति इस देश मे बनी हुई है वह कतई एक सभ्य समाज मे स्वीकार करने योग्य नहीं है|
सवाल यह भी है कि एक दूसरे के नुक्ताचीनी करने मे फंसे देश के नेताओं को  आम जनता मे बनी नकारात्मक छवि को बदलने के प्रयास नहीं करने चाहिए? सच मानिए तो इसी मे उनका और देश का भला है|

 गिरिजेश कुमार