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Tuesday, December 13, 2011

बेबसी की चक्की में पिसता बचपन

“मैं पढ़ता था लेकिन जब से पापा बीमार हुए तब से पढ़ाई छोड़ दी” इस कंपकपाती ठण्ड में सड़क के किनारे दीये की रौशनी में अंडा बेच रहे बमुश्किल दस साल के बच्चे से जब मैंने यह सवाल किया कि तुम पढ़ते नहीं हो? तो उसका जवाब यही था। टूटी-फूटी  भाषा में दिए इस जवाब को सुनकर अनायास ही मन उस बच्चे के प्रति करुणा, दया और ममता से भर जाता है। लेकिन सवाल है इसे कहा क्या जाए? नियति का फेर,व्यवस्था की खामी या उस बच्चे की किस्मत का दोष?
दरअसल भाग्य और भगवान के  भरोसे जीने वाला यह समाज व्यवस्थागत खामियों को भी किस्मत और कर्म के फल के निगाह से देखता है। दो जून की रोटी की तलाश,बीमार बाप के ईलाज के लिए पैसों की ज़रूरत और इन सबके बीच पिसता बचपन। समस्याएं एक नही हैं। ज़िंदगी को मज़बूरी का नाम देकर आखिर कब तक जिया जाए?
२१ वीं सदी में भले ही हमने विकास के नए पैमाने गढ़ लिए हों लेकिन बुनियादी सवाल अब भी कायम हैं। देश का भविष्य कहे जाने वाले बच्चे आर्थिक असमानता,गरीबी,मज़बूरी,लाचारी और बेबसी की उस चक्की में पिसते रहते हैं जहां से बाहर निकलना उसके वश की बात नही होती। हर चौक-चौराहे और गली-नुक्कड़ पर हमें ऐसी विवश ज़िन्दगी देखने को मिल जाती है। स्थिति बदलने और बेहतरी के तमाम सरकारी दावे होते हैं लेकिन इन दावों की वास्तविकता धरातल पर नही दिखती। नतीजतन ज़िंदगी शब्द से भी अनजान बच्चे ज़िन्दगी का बोझ उठाने को मजबूर होते हैं। जो उम्र उसके दिमागी विकास और नयी कल्पनाओं को अंजाम देने की होती है उस उम्र में उसे आटा-चक्की का भाव मालुम करना होता है। एक सभ्य लोकतान्त्रिक समाज के लिए यह स्थिति वाकई चिंताजनक है। लेकिन निजीहित जिस समाज का अंतिम लक्ष्य बन जाए उस समाज में जनहित की बात बेईमानी ज़रूर लगती है, फिर भी यह सवाल तो उठता ही है कि आखिर दोषी कौन है?
हमारा संविधान समानता और समता पर जोर देता है लेकिन आज़ादी के छः दशकों बाद भी हम इसके निहितार्थ को नहीं समझ पाए। सरकारी नीतियाँ भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। मुनाफ़ा आधारित सोच हमें गरीबों और ज़रूरतमंदों के लिए बनायीं नीतियों का लाभ उनतक पहुँचाने से रोकते हैं। फलस्वरूप ये नीतियाँ कागजों में ही रहकर सरकारी कार्यालयों की शोभा बढ़ाती रहती हैं। इस विकट,विपरीत और दमघोंटू परिस्थितियों से लड़ने के लिए जो इच्छा शक्ति चाहिए वो सरकारों में नहीं दिखती। परिणामतः सारी सुविधाओं का लाभ चंद मुट्ठी भर लोगों तक सिमट कर रह जाता है। अमीर और अमीर होते जाते हैं गरीब और गरीब।
इसी देश में एक तरफ़ ऐसे बच्चे हैं जो तमाम सुख सुविधाओं से संपन्न हैं और दूसरी तरफ़ ये बच्चे हैं जिन्हें इन शब्दों का मतलब भी नहीं पता है। एक देश के इन दो चेहरों के कालांतर में झाँकने की कोशिश आखिर कब होगी? सवाल यह भी है कि जो व्यवस्था इस देश के बच्चों को उनका बचपन नहीं दे पाता क्या उस व्यवस्था को उखाड़ नहीं फेंकना चाहिए? इस शर्मनाक स्थिति से खुद में शर्मिंदगी महसूस करनेवाले हर व्यक्ति को इस दिशा में एकसाथ मिलकर प्रयास करने चाहिए। ताकि बचपन बचाया जा सके।  
गिरिजेश कुमार