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Friday, April 6, 2012

देश बदला कि नहीं यह पूछने वाले आप कौन होते हैं?

कल आधी रात के बाद मेरे मोबाईल पर एक मैसेज आया- “अन्ना के आंदोलन का एक साल पूरा हो गया। क्या बदल गया देश?” मेरा जवाब था “बड़े परिवर्तन में वक्त लगता है। निरंतर संघर्ष से ही हमें विजय हासिल होगी। अगर आप मानते हैं कि अन्ना का आंदोलन सही है, तो आपको भी इस लड़ाई को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उठानी चाहिए। और ये लड़ाई देश को बदलने के लिए नहीं एक कानून की माँग को लेकर थी। जो अभी जारी है। देश बदलने की लड़ाई आपको ही लड़नी पड़ेगी।“ दरअसल हममें से ज्यादातर लोग इस बात को समझ बैठे हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ़ मजबूत लोकपाल को लेकर जो लड़ाई ठीक एक साल पहले छेड़ी गयी वह अन्ना का आंदोलन है, और हमें तमाशबीन बनकर सिर्फ़ सवाल उठाना है। यानी कुछ भी कहो लेकिन सही हम ही हैं, और हम कहते थे कि कुछ भी बदलने वाला नहीं है, वाली मानसिकता पूरे समाज में इस तरह से गहरी पैठ बना  चुकी है कि इससे बाहर निकलना एक अनसुलझी पहेली बन गयी है। यहाँ मसला सिर्फ़ अन्ना के आंदोलन का ही नहीं है, सामाजिक कुरीतियों के अबतक समाज में बने रहने के पीछे भी यही मानसिकता है। सवाल है फिर लड़ेगा कौन? भ्रष्टाचार से लोग किस तरह से त्रस्त हैं, यह बात सड़कों पर उतरी लाखों की भीड़ ने साबित कर दिया है लेकिन पहल की जिम्मेदारी कितने लोग लेते हैं? सवाल यही है।
दरअसल 73 साल के अन्ना हजारे हिन्दुस्तान की बहरी सियासत के सामने उस घुन की दवा माँगने आए थे, जिसने पूरे मुल्क को खोखला बना दिया है। 5 अप्रैल को जंतर-मंतर पर अनशन उस दधिची की चेतावनी थी जिसने अपनी उम्र अन्याय के खिलाफ़ आवाम की आँखें खोलने में गुजार दी। पिछले छः दशकों से जिस चिंगारी को पूरा समाज अपने सीने में दबाए जी रहा था, उसी चिंगारी को हवा देते हुए जब एक बूढ़े ने सरकार से साफ़ लफ़्ज़ों में कहा कि सम्राट आँखें खोलो, तो शायद पहली बार सरकार को उसकी हैसियत का अंदाज़ा लगा। आजादी के बाद बिना किसी राजनीतिक बैनर के लोग सड़कों पर इतनी बड़ी संख्या में पहली बार उतरे थे, सुसुप्तावस्था से जागने के लिए क्या इतना काफी नहीं था। अभी भी जो लोग सवाल उठा रहे हैं उन्हें क्या खुद से यही सवाल नहीं करना चाहिए?
पिछले एक साल में तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद लोगों की भागीदारी राजनीतिक जागरूकता का परिचय देती हैं। यह सच है कि लड़ाई के एक साल बाद भी उद्देश्य पूरा नहीं हुआ है लेकिन क्या यह सरकार की नाकामी नहीं है? याद कीजिये पिछली बार संसद कब एक जुट हुई थी? जब सांसदों के खिलाफ़ आपत्तिजनक टिप्पणी हुई। इस टिप्पणी को हम नजरंदाज भी करें तो क्या यह सवाल सांसदों से नहीं पूछा जाना चाहिए कि आपकी यही एकजुटता उस समय क्यों नहीं दिखती जब मंहगाई पर चर्चा होती है, जब गरीबी से निजात के रास्ते निकालने पर चर्चा होती है। जब जनता के हित के लिए सवाल पूछने की बारी आती है। उलटे आप सदन से अनुपस्थित रहते हैं। ज़ाहिर है संसदीय प्रणाली में कानून बनाने की जिम्मेदारी संसद की है लेकिन संसद को इस जिम्मेदारी का ख्याल पिछले बयालीस सालों में क्यों नहीं आया?
आज जबकि हर दिन एक नया घोटाला सामने आ रहा है तो भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सख्त कानून की प्रासंगिकता और बढ़ गयी है। लेकिन बड़ा सवाल है कि इसे समझेगा कौन? आम जनता का पाला कनिमोंझी, कलमाड़ी और ए राजा जैसे तथाकथित बड़े लोगों से नहीं पड़ता उसे सरकारी दफ्तरों में  बैठे अधिकारी से काम होता है जहाँ से उसे आवासीय और जाति प्रमाण पत्र जैसे ज़रुरी कागजात बनाने पड़ते हैं। विडम्बना यह है कि उसके लिए उन्हें घुस देना पड़ता है। इस स्तर के भ्रष्टाचार को दूर करने की जरुरत है। ज़ाहिर एक कानून भ्रष्टाचार दूर नहीं कर सकता, लेकिन बाकी बातें बाद में भी हो सकती है पहले कानून बनना चाहिए।
गिरिजेश कुमार

Tuesday, March 27, 2012

मानवता की हत्या के साथ-साथ रिश्तों का भी क़त्ल!

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ये रिश्तों का क़त्ल  है!

“वो लोग जबरदस्ती गाडी में बैठ गए। उसके बाद सब सामान माँगने लगे और फिर आंटी(Aunty) को बगल की गली में जाने कहा फिर मार दिया” यह बयान है चार साल के उस बच्चे का जिसकी आँखों के सामने उसकी आंटी का पहले सामूहिक बलात्कार किया गया, फिर हत्या कर दी गयी। खौफ और डर से परेशान चेहरे से निकली उस बच्चे की आवाज जब कानों तक पहुँचती है तो अनायास ही मन करुणा और व्यवस्था के प्रति आक्रोश से भर जाता है। प्रशासनिक लापरवाही का इससे बड़ा उदहारण और क्या होगा कि इस घटना के बारह घंटे बीत जाने के बाद भी एफ आई आर दर्ज नहीं हुई थी। प्रशासन के आला अधिकारी घटनास्थल कभी जमुई जिले के अंतर्गत बता रहे थे तो कभी लखीसराय जिले के अंतर्गत। हत्या, लूट और बलात्कार इनमें से कोई एक घटना अगर किसी के साथ हो जाए  तो पहाड़ टूटने के सामान होता है लेकिन यहाँ तो तीनों घटना एक ही परिवार के साथ घटी थी। मजबूर और लाचार उस व्यक्ति की हालत क्या होगी इसकी सिर्फ़ कल्पना की जा सकती है। लेकिन सवाल है लड़ा किससे जाए  झूठी सरकार से, बेशर्म प्रशासन से, समाजहित का चोला पहने मीडिया से या रूठी किस्मत से?  
बीते रविवार की देर रात जब झारखण्ड का परिवार राजगीर के ऐतिहासिक स्थलों को देखकर वापस लौट रहा था तो उसने इस बात की कल्पना भी नहीं की होगी कि इस ऐतिहासिक सुंदरता का बखान वह अपने परिजनों से नहीं कर पाएँगे। उनकी गलती बस इतनी थी कि नीतीश सरकार के परिवर्तित बिहार की जो झूठी पहचान पूरे देश में बनाई गयी है, उसकी सच्चाई से वाकिफ़ नहीं थे या कहें कि उसके झाँसे में आ गए था। बिहार के जमुई जिला अंतर्गत जमुई-लखीसराय सड़क पर कुछ गुंडों ने जबरदस्ती कार को रोककर झारखण्ड के एक व्यवसायी परिवार के साथ लूटपाट की और परिवार की महिला के साथ सामूहिक बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी गयी। बेबस, लाचार परिवारवाले गनपॉइंट पर खड़े होकर इसे देखने को विवश थे। तो कानून व्यवस्था में सुधार का दावा करने वाली पुलिस सोयी हुई थी। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सुबह जब पुलिस का एक अधिकारी अस्पताल पहुँचा तो उसने एफआईआर रिपोर्ट भी नहीं पढ़ी थी। और घटना के चौबीस घंटे से ज्यादा बीत जाने के बाद भी बलात्कार की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पायी थी। कई सवाल मुँहबाए खड़ी है, जवाब देनेवाला कोई नहीं। भुगते वो जिसके सर पर ग़मों का पहाड़ टूटा। आज मानवता हारी नहीं, मर गयी।
स्तब्ध करने वाली यह घटना सीधे-सीधे राज्य सरकार की विफलता और उसके झूठे दावों की पोल खोलती है। अफ़सोस यह भी है राजनीति की जो पूँजी हमारे पास थी वह पूँजी की राजनीति में तब्द्दील हो चुकी है। आम लोग आखिर भरोसा किसपर करें? लोकतंत्र अगर मजबूर तंत्र में तब्दील हो जाए तो अन्याय और अत्याचार के खिलाफ़ आवाज कौन उठाएगा? जो घटना हमारी संवेदनशीलता को झकझोरती हैं और संवेदनहीनता उजागर करती हैं उसपर समाज के हित के लिए लड़नेवाली मीडिया की चुप्पी आश्चर्यजनक है।
मानवता, मनुष्यता, और व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश से भर देने वाली इस घटना की तपिश न तो प्रशासनिक तंत्र महसूस कर रहा है और न ही लोग। मानवीय संवेदना और इंसानी रिश्ते को झकझोर कर रख देने वाली इस घटना के दर्द को महसूस कर रहा हर व्यक्ति आज शर्मिंदा है। सवाल यह भी है कि जमुई जैसी घटना किसी मंत्री, विधायक, सांसद या अफसर के रिश्तेदारों के साथ क्यों नहीं घटती? क्यों बार-बार वही आम इसका शिकार होता है? मुख्यमंत्री घटना के दूसरे दिन तक रिपोर्ट मंगा रहे हैं तो दूसरी तरफ कार्रवाई का भरोसा दिया जा रहा है। लेकिन जिस भरोसे का क़त्ल राज्य सरकार और उसकी पुलिस ने किया उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? अपराध को रोका नहीं जा सकता लेकिन अपराधी बेख़ौफ़ क्यों हैं? इसका जवाब कौन देगा? और सबसे बड़ा सवाल क्या पीड़ितों को इंसाफ मिलेगा? शायद ये पूछना ही बेवकूफी है।

इस  कथित हत्याकांड में एक नया मोड़ आ गया है। कहा जा रहा है कि महिला के पति ने ही एक साजिश के तहत हत्या को अंजाम दिया। इसके लिए उसने बकायदा अपराधियों को सुपारी दी थी। चचेरी साली से अवैध सम्बन्ध को हत्या का कारण बताया गया है। उक्त जानकारी लखीसराय की एसपी ने प्रेस कांफ्रेंस में दी हैं। जाँच अभी जारी है। हालाँकि लोग इसे घटना की लीपापोती बता रहे हैं। सबसे पहले ऐसा आरोप मृत महिला के भाई ने लगाया था। इस सम्बन्ध में मृतक के पति समेत तीन लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। महिला का नाम सुमन है। (तारीख -31/03/12)  
गिरिजेश कुमार

Sunday, February 19, 2012

विद्यालयों के पास बिकती है मौत, बेच रहे मजबूर बच्चे!


शरीर पर गंदे, मैले कुचैले कपड़े, ठंड और उचित देखभाल न होने से हाथ पैर और चेहरों के चमड़े फटे-फटे, उम्र बमुश्किल 12-13 साल, आँखे किसी खरीदार के इंतजार में। यह किसी एक की कहानी नहीं है ऐसे कई चेहरे आपको सरकारी स्कूल के बाहर मिल जायेंगे, जिनकी ज़िन्दगी गुटखा, पान मसाला और तम्बाकू बेचकर चलती है। एक तरफ़ इन्हें बेचना उन बच्चों की मज़बूरी है तो दूसरी तरफ़  पूरे समाज में धीमा जहर फ़ैल रहा है। जिस जगह  पर कल्पनाएँ  हकीकत का रूप लेती हैं उसी जगह पर मौत का सामान बेचा जाना हमें सकते में डालता है तो तस्वीर का दूसरा पहलू हमें सोचने पर मजबूर करता है। सरकार और प्रशासन सबकुछ जानते हुए भी चुप है। हालाँकि ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ बच्चे ही ऐसा करने को मजबूर हैं, स्कूल-कॉलेज से चंद कदम की दुरी पर ही ऐसी कई दुकाने सजी रहती हैं। जिनमे पान-गुटखा से लेकर शराब की दुकानें भी रहती हैं। इसका दूसरा सबसे बड़ा कारण यह है तम्बाकू उत्पादों का सबसे बड़ा खरीदार स्कूल कॉलेज के छात्र हैं। सवाल है क्या ‘धूम्रपान करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है’ तम्बाकू उत्पादों पर लिखी इस वैधानिक चेतावनी को ही हम अपने कर्तव्य की इतिश्री मान चुके हैं?
जबकि विज्ञापन पर निषेध व रेग्यूलेशन ऑफ ट्रेड एण्ड कॉमर्स उत्पादन आपूर्ति और वितरण एक्ट 2003 की धारा 6 के अनुसार तम्बाकू की बिक्री किसी अवयस्क द्वारा किये जाने पर प्रतिबन्ध  है। तथा शिक्षण संस्थानों के 100 मीटर की परिधि में तम्बाकू उत्पादों की बिक्री निषेध है। फिर भी ऐसा किया जाना और प्रशासनिक स्तर पर कोई कार्रवाई न होना हास्यास्पद है।
आँकड़ों पर अगर गौर किया जाए तो जो खौफनाक हकीकत सामने आती है उसे देखकर स्थिति की गंभीरता का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। 2000 में इंडिया-बिहार ग्लोबल यूथ टोबैको सर्वे में यह बात स्पष्ट तौर पर सामने आई कि 59 प्रतिशत प्रतिशत बच्चे किसी भी रूप में तम्बाकू उत्पाद का उपयोग कर रहे हैं। 14 प्रतिशत बच्चे सिगरेट पीते हैं, जबकि 46 प्रतिशत बच्चे तम्बाकू का दूसरे रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। वहीँ स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के मुताबिक देश में 10 वर्ष तक की उम्र के करीब 37 प्रतिशत प्रतिशत बच्चे स्मोकिंग करते हैं। जबकि स्कूल कॉलेज के 50 प्रतिशत से अधक छात्र तम्बाकू सेवन करते हैं। ज़ाहिर है ये आँकड़े हमने नहीं बनाए हैं फिर भी इसे रोकने और कानून का कड़ाई से पालन करने की दिशा में कोई प्रयास क्यों नहीं हो रहे हैं? बड़ा सवाल यही है।
क्रिकेटर युवराज सिंह को जब कैंसर की खबर आई तो हममे से हर कोई स्तब्ध था। युवराज की बीमारी तो फिर भी गंभीर नहीं थी लेकिन इसी कैंसर से कितने लोग हर साल काल के गाल में चले जाते है, इसका कोई स्पष्ट आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। फिर भी इसके जड़ को तलाशने की चर्चा कहीं नहीं  दिखी। सवाल यह भी है कि एक तरफ़ सरकार तम्बाकू मुक्त प्रदेश होने का सपना देखे और दूसरी तरफ धड़ल्ले से शराब दुकानों को लाइसेंस दिया जाए, तम्बाकू उत्पादों से राजस्व भी मिले और लोग तम्बाकू उत्पाद का उपयोग भी न करे ये दोनों एक साथ आखिर हो कैसे सकता है? जहाँ बाजार और उसके पैरोकार आड़े आते हैं वहाँ सरोकार की बात करना बेवकूफी लगती है। फिर भी इस धीमे जहर से समाज जिस अन्धकार की ओर बढ़ रहा हैं समय रहते उसपर कार्रवाई नहीं की गई तो फिर अपने आप को कोसने के अलावा कुछ भी नहीं बचेगा।
गिरिजेश कुमार

Friday, November 25, 2011

थप्पड़ की गूंज तो सुनाई दे रही है, लेकिन निहितार्थों पर चर्चा नहीं हो रही


व्यवस्थाओं से निराश होकर या वर्तमान हालात से तंग आकर, कारण चाहे कुछ भी हो, थप्पड़ चूँकि देश को चलाने की तथाकथित ज़िम्मेदारी संभाले सरकार के मंत्री को पड़ी थी तो उसकी गूंज तो सुनाई पड़नी ही थी। लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि इस थप्पड़ की सिर्फ़ गूंज ही सुनाई दे रही है इसके निहितार्थों पर चर्चा नहीं की जा रही। शायद करना भी नहीं चाहते। लेकिन सवाल यह है जब भी कोई घटना हमारे स्वभाव के विपरीत घटित होती हैं तो बजाये उसकी जड़ तलाशने के हम निजी निष्कर्ष पर पहुंच कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री क्यों समझ लेते हैं?  एक बात हमें साफ़ तौर पर समझ लेनी चाहिए कि शरद पवार को थप्पड़ महज प्रचार पाने का हथकण्डा नहीं था। मंहगाई, भ्रष्टाचार और अघोषित तानाशाही के खिलाफ जो चिंगारी आम जनमानस रूपी राख में दबी हुई है उसे भड़काने की नापाक कोशिश एक ऐसे  शोले का रूप ले लेगी जिसे दबाना किसी भी शासक वर्ग के लिए आसान न होगा। इसीलिए जब घोर साम्राज्यवादी अमेरिका के राष्ट्रपति पर मुंतज़र अल ज़ैदी ने जूता फेंका था तो उसे वैश्विक समर्थन मिला था। और इसीलिए जब हरविंदर सिंह जैसा युवक आवेश में किसी मंत्री को थप्पड़ मारता है तो असभ्य होते हुए भी हम सिर्फ़ उसे दोषी नहीं ठहरा सकते।
माना कि एक सभ्य लोकतान्त्रिक समाज में जनता के प्रतिनधि को खुलेआम थप्पड़ मारना कतई जायज़ नहीं है लेकिन जो परिस्थितियां और जो हालात इस देश के सामने इन्ही भ्रष्ट नेताओं ने खड़े किये हैं उसे आखिर बर्दाश्त कब तक किया जा सकता है? हर चीज़ की एक सीमा होती है लेकिन हम यह क्यों भूल जाते हैं सीमा की भी एक सीमा होती है, जिसे लाँघने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए। हालाँकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लोकतान्त्रिक समाज में ऐसी प्रवृत्तियाँ विकसित होंगी तो किसी भी लोकतान्त्रिक संस्था का काम करना मुश्किल हो जाएगा लेकिन ऐसी प्रवृत्तियाँ विकसित न हों इसके प्रयास की ज़िम्मेदारी कौन लेगा? निहायत ही इसकी ज़िम्मेदारी उन्ही नेताओं को लेनी होगी जो देश चलाते हैं और आखिरकार गुस्सा भी उन्ही के खिलाफ है।
दरअसल आम जनता किसी फैसले पर तब पहुँचती है जब उसकी आशाओं, आकाँक्षाओं और भावनाओं के साथ खिलवाड़ होता है। आज भले ही हम इस घटना की जितनी भी निंदा कर लें लेकिन हमें चर्चा लोगों की उन मनोदशाओं पर भी करनी चाहिए जो उसे आपा खोने पर विवश करती है। इसे सिर्फ़ एक घटना मान लेना भी गलत होगा क्योंकि थप्पड़ मारना हममें से किसी का भी शौक नहीं होता। यह सच है कि हमें अपना विरोध दर्ज कराने के लिए लोकतान्त्रिक तरीकों का इस्तेमाल करना चाहिए लेकिन धरना, प्रदर्शन और जुलुस जैसे विरोध के शुद्ध  लोकतान्त्रिक तरीकों पर पुलिसिया ज़ुल्म इन्ही नेताओं की शह पर होता है फिर अव्यवस्थाओं के भंवर में फँसा आम आदमी क्या करे? फिर हम यह भी भूल नहीं सकते कि राहुल गाँधी को काले झंडे दिखा रहे युवकों को लतियाने में मंत्री भी शामिल थे। फिर उन युवकों से हम संयम की उम्मीद क्यों करते हैं?
इन सबके बीच विचारणीय यह भी है कि राजनीति पर जबतक स्वार्थनीति हावी रहेगा ऐसी घटनाएँ रोकी नहीं जा सकती। इसलिए निजीहित को छोड़कर नेताओं को जनहित की तरफ़ भी ध्यान देना चाहिए। अन्यथा यह कहना गलत न होगा कि शरद पवार को थप्पड़ सिर्फ़ एक बानगी भर है आगे लंबी कहानी है।
गिरिजेश कुमार


Thursday, November 17, 2011

बिना सोर्स के आप सड़क पर चलते कीड़े हैं जिन्हें कोई भी राह चलता कुचल देता है



मेरे पड़ोसी शर्मा जी की पत्नी जिंदगी और मौत से जूझ रही है। दो दिन पहले उन्हें गंभीर हृदयाघात हुआ था। शर्मा जी के सामने एक तरफ़ अपनी पत्नी की ज़िन्दगी है तो दूसरी तरफ़ मँहगे ईलाज के लिए पैसे के बंदोबस्त की चुनौती। आँखों से आँसुओं की अविरल बह रही धारा किसी भी इंसान का दिल चीर कर रख देता है। अपनों का साथ तो है लेकिन विवशता उनकी भी है। डॉक्टरों ने एम्स रेफ़र किया है। इन सबके बीच चिंता सिर्फ़ पैसों की ही नहीं है,चिंता उन सोर्सों की भी है जिससे ईलाज समय पर शुरू हो सके। ये सोर्स आखिर कैसे मिले? मंत्रियों, विधायकों से मदद की गुहार ताकि ज़िंदगी बचायी जा सके। ग़म, मज़बूरी और लाचारी के ऐसे हालात में एक आदमी क्या करे?
यह कहानी उस शर्मा जी की है जो सरकार से ईमानदारी और मेहनत की कमाई का वेतन लेते हैं। लेकिन इन्ही जनता के टैक्सों पर पल रही सरकार के पास अस्पतालों में मँहगे ईलाज के लिए पर्याप्त सुविधाएँ नहीं हैं। और हैं भी तो वह चंद मुट्ठीभर सुविधासंपन लोगों की रखैल बनकर रह गई हैं। इसे विडंबना ही कहेंगे कि एक तरफ़ करोड़ों रूपये काले धन के रूप में विदेशी बैंकों की शोभा बढ़ा रहे हैं तो दूसरी तरफ किसी के पास एयर एम्बुलेंस के लिए पैसे नहीं है। यह स्थिति हर उस व्यक्ति की है जो मध्यमवर्गीय परिवार से आता है। यहां हर चीज़ के लिए सोर्स चाहिए। नौकरी के लिए सोर्स, इलाज के लिए सोर्स, सरकारी दफ्तरों में काम कराने के लिए सोर्स। बिना सोर्स के आप सड़क पर चलते कीड़े हैं जिन्हें कोई भी राह चलता कुचल देता है। क्षमता, बुद्धिमता, ज्ञान, अर्हता सब सेकेंडरी चीजें हो चुकी हैं। सवाल है आखिर ऐसी व्यवस्था किसने बनायीं जो इंसान के जीने के लायक ही नहीं है?
माना की चमचमाती सड़कें,उसपर फर्राटेदार दौड़ती मँहगी कारें और आसमान छूती इमारतें किसी भी देश के विकसित और समृद्ध होने की परिचायक हैं लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और भोजन जैसी मूलभूत और बुनियादी ज़रूरतों का लाभ हर ज़रूरतमंद तक पहुँचे इसकी ज़िम्मेदारी भी सुनिश्चित होनी चाहिए। फिर ऐसे भारत निर्माण के दावों के दरअसल मायने क्या हैं जहाँ किसी की ज़िंदगी कागज़ के चंद नोटों के अभाव में नहीं बचाई जा सके? और पैसों का बंदोबस्त हो भी जाये तो सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त सुविधाएँ नहीं मिलती क्योंकि वह किसी मंत्री, विधायक, सांसद या अफसर का रिश्तेदार नहीं है। निजी अस्पताल उसके ख्वाब से भी बाहर की चीज़ है।
विवशताओं और लाचारियों के ऐसे हालात में ही इंसान गलत कदम उठाने को मजबूर होता है। भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी की नींव भी कहीं न कहीं यहीं से जन्म लेती है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि पूरी तरह से पूँजीवादी सोच और उपभोक्तावादी संस्कृति में कैद यह समाज और समाजिक व्यवस्था क्या मुनाफे पर आधारित अपनी मानसिकता को बदलकर मनुष्य मात्र के हित की बात सोचेगा? अगर हाँ तो कब तक? अगर नहीं तो क्यों नहीं?
गिरिजेश कुमार

Tuesday, September 27, 2011

इस चकाचौंध के पीछे गहरा अंधेरा है


चमचमाती सड़कें, उसपर फर्राटेदार दौड़ती मंहगी कारें और आसमान को छूती इमारतें निश्चित ही किसी भी देश के विकसित और समृद्ध होने का प्रमाण हो सकती हैं लेकिन मुश्किल तब होती है जब इस चकाचौंध में हमारी आँखे इतनी चौंधिया जाती हैं कि हम उसके पीछे छिपे काले अंधेरे को देख नहीं पाते| अगर यह कहा जाए कि ऐसी ही कुछ स्थिति हमारे देश की है तो इसमें कोई आतिशयोक्ति नहीं होगी| जिंदगी के बारे में हम भले ही यह कह सकते हैं यह अनिश्चितताओं से भरी है लेकिन हमने समाज में रहने के जो  पैमाने बनाए हैं उनका लाभ कुछ मुट्ठीभर लोगों तक ही सीमित क्यों है? यही वो सवाल है जो हमें मथता है या कहें कि जिनकी जड़ें तलाशने की कोशिश नहीं होती|  
एक अघोषित अवकाश(40 दिन) से लौटने के बाद कई सारे सवाल कौंध रहे हैं| इन 40 दिनों में मैंने जिंदगी के कई रूप देखे| हालाँकि इनमे खुशियाँ कम ही थी| इस दौरान मौत से सामना भी हुआ और जिंदगी की जंग के लिए जिंदगी का ही विकृत रूप भी दिखा| किस्मत शब्द का उपयोग मैं नहीं करूंगा, क्योंकि इंसान को इसने जड़शील बना दिया है| दहशत से मची अफरातफरी भी दिखी तो जान बचाने के जुगत में लोगों को मरते भी देखा| जी, ये सब महज एक महीने में हुआ, अगर पीछे पलटकर देखने की कोशिश करता हूँ तो यकीन नहीं होता|
आखिर क्या हुआ इन 40 दिनों में? 1 सितम्बर 2011, ओवरब्रिज पर स्कूटी फिसली जिसे मैं ही चला रहा था| परिणामस्वरूप मेरा पैर गंभीर रूप से जख्मी हो गया और मुंह में भी चोटें आई| हालांकि मैं अब ठीक हूँ| 17 सितम्बर, मेरे दोस्त की माँ के गंभीर रूप से घायल होने की खबर आई| 18 सितम्बर, शाम अचानक आये भूकंप के झटकों ने ऐसा दहशत फैलाया कि अफरातफरी में कई की जान भी चली गई| आप कह सकते हैं सिर्फ 3 घटनाएँ हैं| जी, सिर्फ 3 ही हैं लेकिन इसके निहितार्थ को समझें तो गिनती नहीं कर पाएंगे| क्योंकि ये वो घटनाएँ हैं जिनसे मेरा सामना हुआ लेकिन ये रोज़ होती हैं| जगह बदल जाते हैं हालात नही|
यहाँ यह सब कहने की ज़रूरत इसलिए महसूस पड़ी कि क्योंकि मुख्य रूप से 17 और 18 सितम्बर की घटनाओं के बाद जो हालात उपजे और उनसे बाहर निकलने के प्रयास में जो बाधाएं आई, इनसे जूझते हुए लोगों के जो चेहरे मेरे सामने आये उसने सीधे-सीधे मेरे अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया| एक आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में अगर गंभीर आपदाएं आ जाएँ तो उस स्थिति की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है| दरअसल सवाल सिर्फ दुर्घटनाओं या प्राकृतिक आपदाओं का नहीं है सवाल विकास और भारत  निर्माण के दावों के बीच उपजे परिस्थितियों का है जिनसे जूझना आम आदमी की नियति है| दुर्घटनाएं व्यक्ति के हालात को देखकर घटित नहीं होती लेकिन आश्चर्य इस बात का है इस देश में करोड़ों रूपये बोरों में और बैगों में भटकते रहते हैं,(हाल के दिनों में ऐसे कई मामले देश के विभिन्न हिस्सों में देखने को मिले हैं) जिनकी बरामदगी के बाद उसका कोई दावेदार नही होता, लेकिन उसी पैसों से अस्पतालों में ऐसी सुविधाएँ विकसित नहीं हो पायी जिससे आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को किसी अनहोनी के बाद परिजनों के रहमोकरम या किसी की दया पर आश्रित न होना पड़े| ये हालात आज के हैं ऐसी बात नहीं है, या ऐसे हालात मेरे मित्र के साथ हैं ऐसा भी नही है लेकिन जो महत्वपूर्ण सवाल है वह यह है कि जिन सरकारों के हाथों में इन सबकी जिम्मेवारी है वो निजी स्वार्थों को तरजीह देने लगे और विरोधियों से बचाव ही जिनका प्रमुख लक्ष्य बन जाए तो ऐसे में आम जनता को मूलभूत सुविधाएँ मयस्सर कैसे होंगी?

कमोबेश यही हाल प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता का है| मैं जिस बिल्डिंग में रहता हूँ वो कतई भूकंपरोधी नहीं है लेकिन उस दिन भूकंप के बाद मची अफरातफरी की खबरें सुनकर जो पहला सवाल जेहन में आया वह यह कि अगर विकास का रास्ता इन कंक्रीट जंगलों से ही होकर गुजरता है तो इनमे भूकंपरोधी तकनीक का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता? जबकि यह सबको मालुम है कि भूकंप का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता|लेकिन दूसरा और अहम सवाल यह भी है कि मुनाफेआधारित व्यवस्था में आम आदमी के जीवन की फ़िक्र किसे है? बिल्डर जानते हैं कि मरने के बाद हर जिंदगी की कीमत तय होगी और फिर इसे भगवान का अभिशाप मानकर लोग चुप भी रह जाएंगे| फिर सबकुछ यूं ही चलता रहेगा| हालांकि उन मरनेवालों में बिल्डरों के परिजन भी हो सकते हैं इस बात को वे नजरअंदाज करते हैं| लेकिन हकीकत क्या है? जागरूकता फैलाने वाले कार्यक्रम यूं ही दम तोड़ते रहते हैं ऐसे में  जितने लोग भूकंप से नहीं मरे उससे ज्यादा लोग तो भगदड़ में मर गए| कम से कम बिहार में तो ऐसा ही हुआ| लेकिन विडंबना यह भी है कि लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ, सरकार ही अगर अस्थिर हो तो देशवासी जिंदगी को कोसने के अलावा कर ही क्या सकते हैं?
इन सबके बीच सुखद बात यही है कि उम्मीद के दीये कायम हैं और जबतक ये जलते रहेंगे हम हालात के परिवर्तन की आकांक्षा तो रख ही सकते हैं| लेकिन समझना यह भी पड़ेगा कि धैर्य की भी एक सीमा होती है|  
गिरिजेश कुमार

Saturday, August 6, 2011

बढ़ रही है संसद और समाज के बीच दूरी


 लोकतंत्र पर मंडरा रहा है खतरा

विविधताओं से भरे इस देश में व्यवस्थागत अराजकता फैले यह हममे से कोई नहीं चाहेगा लेकिन जो परिस्थितियां हाल के दिनों में देश में बनी हैं, जिस तरह से संसद और समाज आमने-सामने दिख रहे हैं या कहें कि संसद और समाज के बीच दुरी बढ़ी है वह इशारा उसी व्यवस्थागत अराजकता की ओर कर रही है जिनसे हम बचना चाहते हैं| सवाल है क्या संसद और समाज के बीच यह दुरी जायज है? जिस संसदीय व्यवस्था की परंपरा आज़ादी के बाद से इस देश में चली आ रही है कहीं यह उसके खात्मे का संकेत तो नहीं है? पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान अपने अलोकतांत्रिक नीतियों के कारण ही आज अव्यवस्थित है| ये सवाल इसलिए भी बहस की मांग करते हैं क्योंकि निहित स्वार्थ के खातिर राजनीतिक दलों ने देश की रीढ़ यानी आम जनता को इतना नुकसान पहुंचाया है कि उसके खिलाफ लोग अब गोलबंद होने लगे हैं| यह निराशा कभी-भी भयंकर रूप ले सकती है लेकिन क्या शासन सत्ता में बैठे लोगों को इसकी भनक है?
ऐसे में जब अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन को आखिरी लड़ाई के रूप में  आह्वान कर दिया है स्थितियाँ बिगड़ने के हालात ज्यादा हैं| दरअसल सवाल सिर्फ जनलोकपाल विधेयक और भ्रष्टाचार का ही नहीं है| कई मुद्दे हैं जिनसे लोगों का संसदीय व्यवस्था से विश्वास उठता जा रहा है| जिनमे मंहगाई, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, जैसे मुद्दे प्रमुख हैं| सच यह भी है कि एक तरफ़ लोग सम्मानजनक जिंदगी जीने की कोशिश में दिनरात एक करते हैं तो दूसरी तरफ़ सुविधासंपन्न लोग हैं| दोनों के बीच बढ़ रही खाई निराशा की चरम सीमा तक पहुंच चुकी है| इसलिए समझना यह भी पड़ेगा कि यह निराशा सामाजिक नियमों, आदर्शों और मूल्यों को नजरंदाज कर हक और अधिकार में अंतर समझे बिना लोगों को उपद्रवी बना सकती है और वह स्थिति निश्चित ही सभ्य समाज के लिए अच्छी नहीं होगी| और फिर लोकतान्त्रिक व्यवस्था में आम जनता को ज्यादा दिनों तक बेवकूफ बनाना भी आसान नहीं है| लेकिन वोट बैंक और कुर्सी के लालच में देश को बांटने से भी पीछे न हटने वाली पार्टियां क्या अपने अंतर्मन से ये सवाल पूछेंगी? ज़ाहिर है नहीं|
इस बीच सांसद का सत्र भी चल रहा है| हंगामों और संग्रामों की आशंकाओं के बीच अबतक ठोस बहस किसी मुद्दे पर दिखाई नहीं दी है| मंहगाई जैसे मुद्दों पर बहस के लिए 80% सांसदों का अनुपस्थित रहना सांसदों की आम जनता से जुड़े मुद्दों पर गंभीरता को समझने के लिए काफी है| कभी जनता से जुड़ी समस्याओं पर गंभीर बहस की जगह संसद आज सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गया है| जहां तीखे सवाल तो होते हैं, सरकार और विपक्ष एक दूसरे को घेरने में भी कोई कसर नहीं छोड़ती लेकिन देशहित के लिए नहीं, कुर्सी पाने या बचाने के लिए| फिर सवाल है जब संसद अपने लक्ष्य से भटक जाए तो फिर संसदीय व्यवस्था के मायने क्या हैं?
दूसरी तरफ केन्द्र सरकार की जनआकांक्षाओं से जुड़े जनलोकपाल बिल पर जिस तरह से उदासीन दिखी और दिख रही है उसने सरकार के खिलाफ लोगों के गुस्से को भड़काने का काम किया है| यानी लोकतांत्रिक व्यवस्था के नियमों को कुचलकर सरकार ने जनता की भावनाओं का भी मजाक बनाया| इसलिए आज स्वतंत्रता दिवस यानि 15 अगस्त की चर्चा के बदले 16 अगस्त की चर्चा लोगों के जुबान पर है| समर्थन कितना मिलेगा य सरकार क्या रुख अपनाएगी यह तो आनेवाला वक्त बताएगा लेकिंन आम लोगों का संसदीय व्यवस्था से इस तरह भरोसा उठना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है|

गिरिजेश कुमार

  

Sunday, July 17, 2011

पूंजीपतियों पर हमला हो, तब हिलती है सरकार

 कह सकते हैं कि धमाकों के सिर्फ बारह घंटे बाद ही जिस तरह से मुंबई अपने रंग मे आ गई और लोग सड़कों पर उसी तरह से दौड़ने लगे जैसे कुछ हुआ ही नहीं, वो हमारी जिजीविषा, मुश्किलों से लड़ने की हमारी शक्ति और इंसानियत के हत्यारों के खिलाफ़ हमारी एकजुटता को प्रदर्शित करती है| हम यह भी कह सकते हैं कि चूँकि मुंबई के लिए यह कोई नई बात नहीं थी इसलिए वापस पटरी पर आने में उसे अपेक्षा से भी कम समय लगे, लेकिन क्या हम इतने से ही संतुष्ट हैं?

दरअसल हर आतंकी घटना इतिहास के पन्नों मे अपना अमिट नाम दर्ज कराती है और उन लोगों के लिए न भूलने वाली यादें छोड़ कर जाती है जो ऐसी घटनाओं मे मारे जाते हैं| अफ़सोस तब होता है जब जनता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध प्रशासनिक तंत्र और सरकारें गैरजिम्मेदाराना रवैया अपनाती हैं| मुंबई हादसों के बाद जनता के इन तथाकथित हिमायती नेताओं का बयान उन पीड़ितों पर नमक छिडकने जैसा है, जो इसके शिकार हुए हैं| लेकिन सवाल है हर आतंकी घटनाओं के बाद या किसी हादसे के बाद जो राजनीतिक समीकरण दरअसल इस देश मे बनाये जाते हैं और सियासी फ़ायदे ढूंढने की जो कुत्सित कोशिश होती है वह एक सभ्य लोकतान्त्रिक समाज के लिए कहाँ तक जायज है? सच मानिए तो लोकतान्त्रिक समाज कहने का भी मन नहीं करता| आखिर ऐसी परिस्थितियाँ क्यों बनी?
 इस देश के नेताओं की राजनीतिक समझ इसी बात से ज़ाहिर होती है कि वो ३१ महीने तक बम विस्फोट न होना अपने सरकार की उपलब्धि मानते हैं तो दूसरे नेता क्षेत्रवाद के तराजू पर इसे तौलते हैं| मीडिया भी इसे मसाला मारकर प्रस्तुत करता है और बजाये आलोचना के उसे अख़बारों के पहले पन्ने पर जगह मिलती है और न्यूज़ चैनलों की पहली खबर बनती है| जो लोग मारे गए या जो घायल हुए उनके प्रति हमदर्दी या संवेदना के दो शब्द किसी ने नहीं कहे| क्योंकि इसमें आम लोग मारे गए थे| उनकी न तो कोई राजनीतिक पहुँच थी और न ही वे पूंजीपति थे| आम जनता की तथाकथित हितैषी सरकारों की दोहरी मानसिकता का अंदाज़ा सिर्फ इस घटना से लगाया जाता है| जब 26 नवंबर 2008 को उसी मुंबई मे आतंकी हमला हुआ था तो राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री समेत केन्द्रीय गृहमंत्री तक को जाना पड़ा था क्योंकि वह हमला पूंजीपतियों की छाती पर हुआ था| और कहना न होगा कि इस देश मे पूंजीपतियों का अघोषित राज है| आतंक के विरोधी हम भी हैं लेकिन आतंकी घटनाओं पर जनता के साथ दोहरे व्यवहार का कतई समर्थन नहीं किया जा सकता| वह भी आम जनता के द्वारा चुनी गई सरकारों द्वारा|

इस घटना के लिए क्या सरकार जिम्मेदार नहीं है? जिस मुंबई मे ए टी एस, मुंबई पुलिस सहित कई आतंक निरोधी एजेंसियां काम करती हैं वहाँ बार-बार हमला करने मे आतंकी सफल कैसे हो जाते हैं? आखिर आतंकी घटनाओं को रोकने मे हमारा सुरक्षा तंत्र नाकाम क्यों रहता है? क्या यह सवाल जायज नहीं है कि बिना किसी घरभेदिये के किसी भी आतंकी वारदातों को अंजाम नहीं दिया जा सकता? तो फिर वह घरभेदिया कौन है? उसे ढूंढने की जिम्मेदारी किसकी है? आतंक के आकाओं को उसके घर मे घुसकर मारने की राजनीतिक इच्छाशक्ति हमारे अंदर क्यों नहीं है? बाहर की तो छोडिये जो हमारे घर के अंदर हैं उन्हें क्यों जिंदा रखा गया है? अफजल गुरु और कसाब अब तक जिन्दा क्यों है? एक बड़ा सवाल यह भी है कि सुरक्षा एजेंसियों और जाँच एजेंसियों के बीच आपसी तालमेल क्यों नही है? इन  सवालों के जवाब आज हर भारतीय तलाश रहा है| लेकिन जवाब के बदले उसे निराशा हाथ लगती है| इस हताशा और निराशा से विचलित होकर आज का युवा वर्ग अगर अनापेक्षित कदम उठा ले तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? यह इस देश की विडंबना है कि यहाँ कसाब और अफजल जैसे मानवता के हत्यारों के लिए भी मानवीय संवेदनाएं आड़े आती हैं| लेकिन वही मानवीय संवेदना अकाल मौत के शिकार हुए लोगों के लिए नहीं दिखती|
इसलिए सवाल सिर्फ आतंकी घटनाओं मे मारे जाने वाले लोगों का नहीं है सवाल उस नजरिये का भी है जो सरकारों का आम लोगों के प्रति होता है| देश भ्रष्टाचार, काले धन और सियासी चालों मे कौन कितना ताकतवर है, मे फँसा हुआ है राजनीतिक शुचिता की परवाह किसी को नहीं है| आखिरी सवाल ये कि 11 जुलाई 1993,26 नवंबर 2008,13 जुलाई 2011 के बाद अगली तारीख कौन सी होगी?

गिरिजेश कुमार