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Friday, March 23, 2012

अधूरा है देश के नायकों का सपना!

किसी भी देश की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने नायकों को किस तरह से याद करता है। भारत ही नहीं बल्कि विश्व इतिहास में देश के लिए त्याग और बलिदान के प्रतीक शहीद-ए-आजम भगत सिंह किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं। अंग्रेजों के साम्राज्य विस्तार की नीतियों और पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ भगत सिंह एक मजबूत चट्टान के रूप में खड़े हुए थे। भारतीय इतिहास  में 23 मार्च 1931 का दिन बड़े ही श्रद्धा और आदर के साथ याद किया जाता है। यही वह दिन था जब दुनिया ने देखा कि हिन्दुस्तानी देश के लिए किस तरह से अपना सबकुछ कुर्बान कर देते हैं। लेकिन क्या इस कुर्बानी को हम सहेज कर रख पाए हैं? हर साल शहीदी दिवस के दिन फूल मालाएँ चढाकर औपचारिकताएं पूरी करते वक्त यही वो सवाल है जो हमें सोचने को मजबूर करता है। इससे भी बड़ा सवाल ये है कि आखिर शहीदों की शहादत अपने ही देश में वन्दनीय क्यों है?   
28 सितम्बर 1907 को पंजाब के लायलपुर में जन्मे भगत सिंह का पूरा परिवार ही  आजादी आंदोलन के संघर्षों में सक्रिय था। भगत सिंह के अंदर देशभक्ति की भावना इसी पारिवारिक माहौल का ही नतीजा थी। लेकिन अफ़सोस कि जिस व्यक्ति के नाम लेते ही हजारों लोगों की आँखें नाम हो जाती हैं,  उनके क्रान्तिकारी विचारों से प्रभावित होकर लाखों लोग सड़कों पर अन्याय और अत्याचार के खिलाफ उतर आते हैं उन्हें भुलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है।  आज जिन विचारों की देश को सबसे ज्यादा ज़रूरत थी उन्ही विचारों को जड़ से मिटाने की कोशिशें हो रही हैं। वर्तमान में जबकि देश में आर्थिक असमानता दिन ब दिन बढती जा रही है, घोटाले, भ्रष्टाचार और लूट में पूरा देश लिप्त है, आपसी भेदभाव पूरे समाज को पीछे धकेल रहा है,  आम लोग चाहकर भी विरोध में आवाजें नहीं उठा पाते, लोग असंगठित होकर लड़ तो रहे हैं लेकिन उनकी आवाज़ कहीं दब कर रह जाती है ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भगत सिंह और उनके साथियों की क्रान्तिकारी  विचारधारा एक नई ऊर्जा प्रदान करती है।  अन्याय और अत्याचार के खिलाफ मजबूत विचारों से लैस होकर जहाँ ज़रूरत थी एक संगठित संघर्ष की वहीँ समाज में लोग हताशा और निराशा की ज़िन्दगी जी रहे हैं। अवसाद से ग्रसित होकर लोग आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम भी उठा रहे हैं, जिसका खामियाजा पूरा समाज भुगत रहा है। भगत सिंह के बहाने सामाजिक व्यवस्था पर सवाल इसलिए क्योंकि जिन मुश्किल परिस्थितियों में भगत सिंह और उनके साथियों ने अपनी जीवटता प्रदर्शित की वह हालात से टूटते हुए इंसानों  को रास्ता दिखाने के लिए काफी था। लेकिन उनके वीरता की चर्चा  सिलेबसों में तो नहीं ही दिखती, उलटे उनके विचारों को फैलने से रोकने के लिए तमाम षड्यंत्र रचे जाते हैं। देश के महापुरुषों की इस वन्दनीय स्थिति से हमें शर्मिंदगी महसूस होती है।  भगत सिंह जिस साम्राज्यवादी व्यवस्था के खिलाफ लड़ते रहे आज हमारी व्यवस्था उसी साम्राज्यवाद की पिछलग्गू बन गयी है।
भगत सिंह के विचारधारा रूपी सच को छुपाने की कोशिश की जा रही है। आज आज़ादी के इतने सालों बाद भी  उनके विचारोंं की प्रासंगिकता कायम है। समाज और देश के विकास की गहरी समझ और
कार्ययोजना उनके अंदर विकसित थी। लेकिन  उनकी जीवनी दुर्लभ दस्तावेज़ का रूप ले चुकी है जिसका जिम्मेदार शासन तंत्र है। कहीं न कहीं शासकों को इस बात का भय है कि अगर भगत सिंह की विचारधारा से प्रभावित होकर लोग जागरूक होकर इस भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ एकत्रित हो गए तो फिर उस क्रांति को रोकना किसी भी सरकार के लिए संभव नही होगा। हालाँकि भगत सिंह को याद करने की सार्थकता तभी है जब हम उनके विचारों को अमल में लायें और भारत को एक समाजवादी गणतंत्र बनाने की पहल करें। क्या अपनों तक सीमित समाज देश रत्न के प्रति अपने रवैये को बदलेगा?
गिरिजेश कुमार

Saturday, January 14, 2012

राजनीति ही बदलेगी सियासत की सूरत


राजनीति की व्याख्या अगर परिभाषाओं की परिपाटी पर की जाए तो जो परिभाषा सबसे सटीक है वह है- यह सामाजिक ढाँचा जिस तरीके से संचालित होता है, वही राजनीति है। जाहिर है इसमें समाज की बेहतरी सबसे अहम है। प्रतिनिधि लोकतंत्र उसी राजनीति का हिस्सा है। दरअसल राजनीतिक पार्टियाँ जब इस सर्वमान्य प्रचलित परम्पराओं को तोड़कर राजनीति और सत्ता का इस्तेमाल निजी फायदे के लिए करने लगते हैं, तब यह सवाल उठता है कि आखिर राजनीति का मतलब है क्या? और राजनीति का तमगा पहनकर वर्तमान राजनेता जो कर रहे हैं, क्या वास्तव में वह राजनीति है? आम जनता के हित और समाजसेवा की साधना लिए उजली टोपी पहन लेना अगर वास्तविक राजनीति होती तो शायद हम भी सवाल न उठाते। लेकिन देश और समाज की बेहतरी के लिए जिस तरह के राजनीतिक संचालन की ज़रूरत है, वह नहीं होती। वर्तमान सत्तालोलुप पार्टियां राजनीति का अपराधीकरण और अपराधियों का राजनीतिकरण कर रही हैं। सिर्फ़ चुनाव जीतने को अपना मतलब और मकसद समझने वाली राजनीतिक पार्टियाँ इसके लिए कोई भी तरीका अपनाने से नहीं चूकते। यहाँ उम्मीदवारों की जीत मायने रखती है, उसका चरित्र नहीं। परिणामस्वरूप संसद और विधानसभाओं में ऐसे लोगों की तादाद बढ़ती जा रही है जो दबंग चरित्र के हैं। ऐसे लोग भी चुनाव जीत रहे हैं जिनपर कई आपराधिक मामले दर्ज है। ज़ाहिर है अगर लोगों को राजनीति का मतलब समझ में नहीं आ रहा है, और जिन्हें सामाजिक बहिष्कार मिलना चाहिए वो लोग जनप्रतिनिधि कहला रहे हैं तो व्यवस्था में कहीं-न-कहीं ऐसी खामी है जिसकी पड़ताल ज़रुरी है। वो खामी आखिर क्या है?
बहुदलीय प्रणाली पर आधारित वर्तमान भारतीय लोकतंत्र जनहित की बात तो करता है लेकिन वह संविधान तक ही सीमित है। धरातल पर उसकी वास्तविकता नहीं दिखती। वर्तमान चुनाव प्रणाली भी इसके लिए जिम्मेदार है। चुनाव आयोग पैसों के लूट के खेल को रोकने में नाकाम है। नियम बनाना अलग बात है उसे अमल में लाना अलग बात। खोखली हो चुकी इस व्यवस्था में सारा दोष चुनाव आयोग पर नहीं मढ़ा जा सकता। नेता, पुलिस और अपराधियों के गठजोड़ को खत्म करना होगा। हमारा समाज भयमुक्त नहीं है। यहाँ लोगों पर पुलिस का उतना ही खौफ है जितना अपराधियों का। वोट के बदले नोट जैसी सामाजिक बुराई राजनीति को हाशिए पर ले जाने के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार  है। हमारा सिस्टम इसे रोक पाने में पूरी तरह असफल है। चुनाव की घोषणा होते ही ये तत्व सक्रीय हो जाते हैं। आम भोली, निरीह और अनपढ़ जनता अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रति इतनी जागरूक नहीं है कि वह समाज के इन तथाकथित हितसोचकों के कुत्सित प्रयास को समझ सके। दरअसल, शासक वर्ग भी यह नहीं चाहता कि लोग जागरूक हों, क्योंकि अगर जनता जागरूक हो गई तो इनकी कुर्सी खतरे में पड़ जायेगी। वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था भी इसके लिए जिम्मेदार है। यहाँ हर चीज़ पर बाजार हावी है, और इस समाज को उसकी कीमत चाहिए होती है, जिसकी अदायगी ईमान, इज्ज़त और ज़मीर को बेचकर भी करनी पड़ती है। पार्टियों के चुनाव घोषणा पत्र में बेहतर समाज बनाने के तमाम वादे और दावे तो किये जाते हैं लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद सत्ता के सुख में ये सारी चीज़ें खत्म हो जाती हैं। इन सबके बीच पिसना पड़ता है उस आम जनता को जिसके लिए ये सारे प्रपंच रचे जाते हैं। परेशान होता है वह आम आदमी जिसकी तनख्वाह तो नहीं बढ़ती लेकिन ज़रूरत की चीज़ों के दाम ज़रूर बढते रहते हैं। सवाल है समाधान क्या हो?

दरअसल, सत्ता का इस्तेमाल निजी फायदे के लिए हो और जनता के हित की तथाकथित राजनीतिक ढोंग भी रचा जाए, ये दोनों काम एक ही नाव पर सवार होकर अगर कोई पार्टी करना चाहती है तो समझना यह भी पड़ेगा कि आखिर इसके मायने क्या है? अगर राजनीति का मतलब सत्ता है तो जाहिर है कोई भी पार्टी इससे खुद को अलग कर नहीं रख पाएगी। लेकिन विकास की जिस लकीर को खींचने का दावा कर ये पार्टियाँ वोट माँगने जाती हैं उसमें आम आदमी फिट होता कहाँ है, यह भी बड़ा सवाल है? 
यह विडंबना है कि आज़ादी के छह दशक बीत जाने के बाद भी देश की जनता राजनीतिक रूप से पूरी तरह जागरूक नहीं हो पायी है। जिसका नाजायज फायदा नेता उठाते हैं। इसलिए सवाल सिर्फ़ यही नहीं है कि स्थिति बदलेगी कैसे, सवाल यह भी है कि उसे कैसे लोग बदलेंगे? इस व्यवस्था से फायदे में रह रहे लोगों की तादाद भले ही ज्यादा न हो लेकिन इनके पास ताकत ज़रूर है। इसलिए ये लोग कभी नहीं चाहेंगे कि ये हालात बदले।  दूसरी तरफ़ पेट, परिवार और ज़िन्दगी की जद्दोजहद में पिसना मजदूरों की मज़बूरी है। इस मज़बूरी और लाचारी के आलम में क्रांति की मशाल को जलाना मुश्किल ही नहीं कठिन भी है। हालाँकि दुनिया का इतिहास इस बात की भी गवाही देता है कि शोले हमेशा राख में दबी चिंगारियों से भडकते हैं। असंगठित होकर इस व्यवस्था के खिलाफ़ हममे से हर कोई अपने-अपने तरीके से लड़ाई लड़ रहा है। ज़रूरत है उन्हें संगठित करने की। राजनीतिक जागरूकता दूसरी सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है।
आम जनता के मन में बनी नेताओं की नकारात्मक छवि उनमे घृणा का भाव उत्पन्न करता है। एक सभ्य लोकतान्त्रिक व्यवस्था में ऐसी स्थिति को कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता। चुनाव भी औपचारिकताओं तक सीमित रह गया है। एक वोट देश की दशा और दिशा तय करेगा यह मनोभाव न तो मतदाता के मन में होता है न नेता के मन में। भयाक्रांत यह समाज आखिर सही निर्णय लेगा तो कैसे?
हालाँकि हमारी सबसे बड़ी खासियत यह रही है कि हमने उम्मीद के दीये को कभी बुझने नहीं दिया। विपरीत परिस्थितियों में रास्ता निकालने की कला हमें विरासत में मिली है लेकिन इससे पहले कि यह धैर्य अराजकता का रूप ले ले हमें एक ठोस, गंभीर और सकारात्मक हल निकालने के प्रयास करने होंगे। निश्चित ही यह ज़िम्मेदारी उनलोगों को लेनी पड़ेगी जिनका देश, समाज, और सियासत से थोड़ा भी लगाव है।

Wednesday, July 13, 2011

आम जनता में बनी नकारात्मक छवि बदलें देश के नेता

 समाज और देश का नेतृत्व करना सब के वश की बात नहीं होती| यह काम नेताओं का होता है, एक नेता वह होता है जिसके दिमाग मे समाज के विकास की दूरदर्शी योजनाएं होती हैं| उसकी जिंदगी का हर एक मिनट अपने देश की तरक्की और नए मुकाम हासिल करने के रास्तों पर विचार करने मे बीतता है| नेता जी सुभाष चन्द्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आजाद,सरदार बल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री इसी श्रेंणी के अंतर्गत आते हैं| और भी ऐसे कई नाम हैं जो इस श्रेंणी मे आते हैं| लेकिन अफ़सोस कि विरासत मे सौंपी गई इन नेताओं के नेतृत्वरूपी कृतित्व पर चलने वाला आज कोई नेता इस देश मे नहीं है| आज जितने भी नेताओं का चोला पहनकर अपने आप को नेता समझे बैठे हैं उनमे से एक भी ऐसे नहीं हैं  जिन्हें हम नेता कह सकें| ये सभी कुर्सीधारक हैं जो वक्त की नजाकत को देखकर पाला बदल लेते हैं| निजिहित को तवज्जो देने वाले कभी नेता नहीं कहला सकते| त्याग, बलिदान और जनता के दुःख-दर्द मे भागीदार बनना कोई नहीं चाहता इसलिए वर्तमान मे इन चोला धारक नेताओं के हर काम को लोग शक की निगाह से देखते हैं| सवाल है आखिर आम लोगों मे नेताओं की ऐसी छवि क्यों बनी?
दरअसल इसके लिए जिम्मेदार खुद यहीं लोग हैं| नेताओं ने जनता के विश्वासों का ऐसा मजाक बनाया कि जिससे लोग नेता शब्द से ही घृणा करने लगे| राजनीति, समाजिक ढाँचे को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करने का जरिया है लेकिन वर्तमान राजनीतिक पार्टियों और उसके कर्ताधर्ता कुछ नेताओं ने से इसे व्यवसाय बना दिया| ऐसे मे जनहित की बात सोचने वाला कौन है? देश मे 545 सांसदों मे 300 करोड़पति हैं| जिस देश की 70 प्रतिशत आबादी 20 रूपये से कम की रोज की आमदनी पर जिंदा हो उस देश की उसी आबादी का जन प्रतिनिधि करोड़पति है, इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे?
यहाँ हर नेता एक दूसरे की लोकप्रियता का दुश्मन है| कोई नेता अगर आगे बढ़कर जनता के लिए कुछ करना चाहता है, उसके सुख-दुःख का साझीदार बनना चाहता है तो विपक्षी पार्टियों को उसमे सियासी फ़ायदे के लिए सस्ती लोकप्रियता दिखाई देती है| उन्हें लगता है कि इससे उनकी पार्टी का बंटाधार हो जायेगा इसलिए उल जलूल बयान देकर किसी तरह ध्यान हटाया जाये| यहाँ हमाम मे सब नंगे वाली कहावत चरितार्थ होती है ऐसे मे ज़मीन और जनता के लिए संघर्ष करने वाली पार्टी या नेता दिखाई नहीं देते| चुनावी सभाओं मे बड़े-बड़े शब्दों का प्रयोग कर जनता को बरगलाने की कोशिश सभी करते हैं लेकिन हकीकत मे राजनीति की गन्दी चाल चलकर कुर्सी पाना मूल मकसद होता है|
आज देश जिस तरह से अराजक स्थिति मे पहुँच गया है ऐसा कौन दूरदर्शी नेता है जो भविष्य की वास्तविकता को बता सके? जबकि मौलाना अबुल कलाम आजाद ने 1946 मे ही भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के सुगबुगाहट के समय ही पाकिस्तान की स्थिति और भारत पर पड़ने वाले असर की विवेचना कर दी थी| मौलाना कोई ज्योतिषी या भविष्यद्रष्टा नहीं थे लेकिन दरअसल कुर्सीधारकों और नेता मे यही फर्क होता है|  लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान का नारा दिया था, उस समय जब सरकार पर संकट आई तो इन्ही किसानों ने अपने खुद के कमाए पैसे और गहनों से सरकार की मदद की थी लेकिन आज सरकारें खुद किसानों को लूट रहीं हैं,बदले मे  हक मांगने पर  लाठी और गोली मिलती है| इस सच को चाहे आज हम स्वीकार करें या न करें लेकिन जो स्थिति इस देश मे बनी हुई है वह कतई एक सभ्य समाज मे स्वीकार करने योग्य नहीं है|
सवाल यह भी है कि एक दूसरे के नुक्ताचीनी करने मे फंसे देश के नेताओं को  आम जनता मे बनी नकारात्मक छवि को बदलने के प्रयास नहीं करने चाहिए? सच मानिए तो इसी मे उनका और देश का भला है|

 गिरिजेश कुमार