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Monday, July 25, 2011

उदारीकरण ने आम आदमी को क्या दिया?


                उदारीकरण के 20 साल, आखिर हासिल क्या हुआ?
          
विकास के लिए विदेशी पूँजी निवेश की चाह लिए तक़रीबन दो दशक पहले जिस उदारीकरण को तात्कालीन नरसिंह राव की कांग्रेस सरकार ने इस देश मे लागू किया उसने आम आदमी को आखिर दिया क्या? आज जब उदारीकरण को २० साल हो चुके हैं तो सबसे बड़ा सवाल यही उभरकर सामने आता है| उदारीकरण को लेकर न जाने कितने ही तर्क, वितर्क और कुतर्क दिए जाते हैं लेकिन वास्तविकता क्या है? यदि इस ‘उदारीकरण’ को आम आदमी के दृष्टिगत देखा जाए, जिसके लिए सारी योजनाएं बनती हैं और नीतियों का निर्धारण किया जाए जाता है भले ही उसकी हकीकत कुछ भी हो, तो यह सिर्फ़ एक धोखे के अलावा कुछ भी नही है| सच तो यह है कि उदारीकरण ने सीधे-सीधे पूंजीपतियों को लाभ पहुँचाया, आम आदमी की आर्थिक स्थिति तो और बिगड़ती चली गयी| अमीर और गरीब के बीच जो खाई दरअसल आज इस देश मे है उसकी जड़ मे भी उदारीकरण और पूंजीपतियों की पूँजीलोलुपता है| मुनाफे आधारित व्यवस्था की नींव पर विकास की लकीर खींची जाये तो वह किसके हित मे होगा यह सहज ही समझा जा सकता है?
20 साल पहले बजट पेश करते हुए तात्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने जो स्थिति देश के सामने रखी थी उससे बचने का रास्ता उदारीकरण के रूप मे ढूंढकर भले ही वाहवाही लूटी हो लेकिन इसके दुष्प्रभावों के दूरगामी परिणाम की फ़िक्र किसी को नहीं थी| उस समय वित्तीय असंतुलन के कारण देश के पास महज 15 दिनों के आयात के लायक विदेशी मुद्रा भण्डार बचा था सवाल है क्यों? पिछली कांग्रेस, संयुक्त मोर्चा और जनता दल सरकारों की गलत नीतियों के कारण हमें राष्ट्रीय शर्म भी झेलनी पड़ी और बैंक ऑफ इंग्लैंड से लोन लेने के लिए 47 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था| इसके अलावा मंहगाई का सवाल तब भी था| इन सबके बीच सवाल यह उठता है कि अगर इससे बचने का रास्ता उदारीकरण था तो आज वही सवाल उसी अवस्था मे या कहें की उससे भी बदतर अवस्था मे मुँहबाएं क्यों खड़ा है?
दरअसल सच यह है कि हमने जी डी पी रेट को अपने विकास का पैमाना मान लिया है और हमें लगता है कि हम विकसित हो रहे हैं| जबकि दूसरी तरफ कड़वा सच यह भी है कि देश बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी,बेकारी,असमानता, जो उदारीकरण की ही देन है, की गिरफ्त मे फँसा हुआ है| मशीनी युग ने आम आदमी से उसकी रोजी-रोटी छीन ली है| अमीरों को अमीर और गरीबों को और गरीब करना उदारीकरण का एकमात्र मकसद है| सवाल है जो देश मानव संसाधनों से परिपूर्ण है, जहाँ आत्मनिर्भर होने की असीम संभावनाएं थी और हैं भी वहाँ उदारीकरण की ज़रूरत क्यों पड़ी? उदारीकरण तो सिर्फ़ 10-15 प्रतिशत लोगों को सुख दे रहा है बाकी तो उसका अभिशाप ही झेल रहे हैं| फिर इस उदारीकरण के मायने क्या हैं?
 इस उदारीकरण को अगर आंकड़ों की नजर से  देखा जाए तो परिवहन  के क्षेत्र मे 1991 मे कुल 2296800 किमी सड़कें थी| एन एच 33690 किमी, रेल 62571 किमी और विद्युतीकृत रेल लाइन 10809 किमी थी| जबकि 2011 में कुल 33.4 लाख किमी सड़क है| जिसमे एन एच 65569 किमी और स्टेट हाईवे 130000 है| रेल लाइन की कुल लम्बाई 64215 किमी है जबकि विद्युतीकृत रेल लाइन 17811 किमी| वहीँ संचार के क्षेत्र मे 1991 मे कुल टेलीफोन कनेक्शन 50 लाख था जबकि अभी 6212.80 लाख है| 1991 मे कुल बेरोजगारी 9.02 मिलियन थी, 2004-05 में 10.51 मिलियन जबकि अभी 16.00 मिलियन है| यानी संचार क्षेत्र को छोड़ देन तो उदारीकरण से विकास की कुछ खास लकीर नहीं खींची जा सकी है| बेरोजगारी तो लगभग दो गुणी ज्यादा हो चुकी है| लेकिन जरा आज से ठीक 20 साल पहले चलते हैं जब तात्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने ऐतिहासिक बजट भाषण मे विक्टर ह्यूगो को उद्धृत करते हुए कहा था “दुनिया की कोई ताकत उस विचार को नहीं रोक सकती जिसका समय आ गया है”| आज यही सवाल तत्कालीन वित्तमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी से नही पूछा जाना चाहिए कि क्या उदारीकरण का वास्तविक समय आ गया था? फिर जब आज हालात ऐसे हैं तो आर्थिक सुधारों की शुरुआत की घोषणा को किस तरह संकट के भीतर से भविष्य की इबारत लिखना कहा जा सकता है?

गिरिजेश कुमार


  

11 comments:

  1. शायद कटोरा हासिल हो जाए।

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  2. जिनका चित्र दिया गया है उनके हाथ के तो कटोरे भी बिक चुके हैं. उदारीकरण के दस्तावेज़ के हाशिए में भी ये कहीं नहीं दिखते.

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  3. नीतियाँ शायद उतनी गलत नहीं होतीं उन्हें लागू करने वाले स्वार्थ के कारण उन्हें गलत सिद्ध कर देते हैं....

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  4. उदारीकरण ने आम आदमी को क्या दिया ?

    यदि आप विदर्भ महाराष्ट्र के एक 'नक्सली समस्याग्रस्त जंगली आदिवासी गाँव' के एक शिक्षक के पुत्र को आम आदमी माने तो….
    मेरे मित्रो में से कोई बेरोजगार नहीं है! मेरे परिवार में, कुटुम्ब में कोई बेरोजगार नहीं है ! सभी के बच्चे अच्छे स्कूलों में जाते है. शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुँच है!

    फायदा उन्हें ही नहीं हुआ है जिन्होंने समय के साथ चलाना नहीं सीखा अर्थात शिक्षा और आगे बढ़ने के मौको के सामने आने पर हाथ पर हाथ डाले भाग्य के भरोसे, सरकार के भरोसे बैठे रहे!
    सरकार सब कुछ प्लेट में परोस कर नहीं देती!

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  5. @ आशीष श्रीवास्तव
    जो सरकार 60 सालो में गरीबो को स्वच्छ पानी भी नहीं दे सकती वो और क्या कर सकती है. मेरे गॉव में आज भी बोहोत से इलाके है जहा पानी लेने के लिए मीलो जाना पड़ता है. आपको सब मिला होगा किन्तु मेरे साथ में सरकारी स्कूलों में पढने वाले सभी दोस्त आज भी बेकार है कोई किसी दुकान में काम कर रहा है कोई चाय की टपरी में काम कर रहा है. मेरे परिवार में थोडा जादा पैसा था सो बाद में उन्होंने मुझे प्राइवेट स्कूल में दाल दिया और मैं आगे निकल आया किन्तु उनका भविष्य बर्बाद हो गया. समय के साथ आगे बढ़ने का मौका सबको नहीं मिलता. आपको मौका मिला उसमे सरकार का जादा योगदान था या आपके परिवार का ये भी पता करिए.

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  6. आम आदमी तो गन्ना की तरह है पेरा जाना ही नियति है....
    बढ़िया आलेख...
    सादर...

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  7. आशीष जी, समय के साथ चलना हर व्यक्ति सीख जाता है लेकिन समस्या है कि यहां सबकुछ उनके हाथ में नही है जो वास्तव में बढ़ना चाहता है| बेशक आप अपनी नजरों से चीजों को देखने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन ज़रा हकीकत, वास्तविकता और आंकड़ों पर भी नजर दौड़ाइये तो बेहतर होगा|

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  8. @Abhishek
    अभीषेक जी,
    सरकार कौन है ? कौन चुनता है?
    सरकार कोई भी वस्तु प्लेट मे परोस कर नही देती ? भगवान भरोसे/सरकार भरोसे रहने से कुछ नही होता!

    मै एक सरकारी स्कूल से पढ़ा हूं! हिन्दी माध्यम से!
    आकंड़े, हकीकत मै जानता हूं, अपनी जड़ो से जुड़ा हूं, साल मे दो महीने(अपनी नौकरी से छूट्टी लेकर) उसी आदिवासी क्षेत्र मे रहता हूं!

    क्या आप १९९१ के हालात जानते है ? १९८९ का आरक्षण विरोधी आंदोलन और उसके पिछे कारण याद है। विरोध आरक्षण का नही था, विरोध का मूल था बेरोजगारी का डर!

    मै ११ वी मे था, हमारी कक्षा मे हर छात्र अपने भविष्य के लिए चिंतित था! मै भी, मेरे दोस्त भी!

    उदारीकरण के बाद मेरा कोई भी मित्र बेरोजगार नही है।

    रोजगार का अर्थ सरकारी/प्रायवेट नौकरी नही होता है। मेरा एक मित्र जिसके पिता की साइलिल पंक्चर ठीक करने की दूकान थी, आज मोटरसाइकिल शोरूम खोल कर बैठा है। दूसरा मित्र मशरूम/मूसली की खेती करता है, पूरा का पूरा निर्यात करता है।

    भाई, मौके खोजने होते है, सरकार से भीख नही! सरकार(या कोई भी) किसी का भविष्य बरबाद नही करती, व्यक्ति स्वयं के भविष्य का निर्माता होता है।

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  9. अपनी टिप्पणी मे एक और बात जोड़ना चाहूंगा, सरकार को दोष देने से पहले एक बार दक्षिण भारत और उत्तर भारत की भी तुलना कर लें।

    एक ही उदारीकरण की सरकारी निती होने के बावजूद दोनो क्षेत्रो मे इतना अंतर क्यों है? (मेरा नाम आपको बता देगा कि मै उत्तर भारतीय हूं!)

    क्यों दक्षिण भारत मे , बिजली,सड़क,पानी की बेहतर व्यवस्था है ? क्यों उद्योग धंधे दक्षिण भारत मे ज्यादा फलफूल रहे है?

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  10. @ आशीष जी
    जैसा मैंने पहले कहा जो सरकार स्वच्छ पानी नहीं दे सकती वो सरकार कुछ परोसकर प्लेट में देगी ये तो कोई पागल ही सोच सकता है. रही बात सरकार चुनने की तो सरकार आम आदमी ही अपने और अपनो की भलाई और देश को सही तरीके से चलाने के लिए चुनता है किन्तु वही सरकार जब आम आदमी का खून चूसती है तो आम आदमी कहा जाये. अगर उदारीकरण से 10% लोगो का फायदा हुआ भी है तो आप 90% लोगो को क्यूँ भूल जाते है. यहाँ बात उदारीकरण से केवल आपके या आपके पहचान वाले के फायदे की नहीं है. जो आकडे इस लेख में दिए गए है वो पूरे भारत को रिप्रिजेंट करते है केवल मुझे या आपको नहीं. मैंने में अपना ग्रेजुऐसन हिंदी में ही किया है. और आज ठीक-ठाक कमाता हूँ उसका मतलब ये नहीं है की मैं उनके बारे में ना सोचु जिनको एस उदारीकरण से फायदा नहीं हुआ या नुकसान हुआ है. भीख और हक़ में अंतर होता है. उदारीकरण से फायदा उनको ही होता है जिनकी पोहोच सरकार तक होती है क्यूंकि सरकार ही परिवार वाद और जाती वाद को बढ़ावा देती है. आपकुई प्रॉब्लम ये है आप खुद को और अपने पहचान वालो की प्रगति को बस उदारीकरण से जोड़ के देख रहे है ना आपको आकडे दिख रहे है और ना सरकारी उदारीकरण की उदार नीतिया जो केवल अमीरों के लिए है. उदारीकरण होने के बावजूद उत्तर भारत बर्बाद है और दक्षिण भारत आबाद. फिर आप कैसे कह सकते है दक्षिण भारत के फलने फूलने का कारन उदारीकरण है.

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