Pages

Saturday, March 12, 2011

इस तबाही को समझो, यह तबाही कुछ कहती है

जापान में ढाया कुदरत ने कहर
तकनीकि तौर पर दुनिया का सबसे मजबूत देश चंद घंटों के जलजले में तबाह हो गया| कितने लोगों की जाने गई और कितनी संपत्ति का नुकसान हुआ कुछ भी अनुमान लगाना नामुमकिन है| 8.9 तीव्रता से आये इस भूकंप के बाद आई सुनामी ने सबकुछ तबाह कर दिया| कुदरत के इस कहर की चपेट में जापान ही नहीं दुनिया का 47 देशों के आने की संभावना बताई जा रही है| इस भयंकर आपदा की घडी में हमारी मानवीय सम्वेदनाएँ पीडितों के साथ हैं| हमारी सहानुभूति उनके साथ है जो इस जलजले का शिकार हुए हैं| लेकिन इसे कतई नही भूल सकते कि प्रकृति के इस विनाशकारी रूप के लिए सबसे ज्यादा ज़िम्मेदार हम मनुष्य ही हैं| कल तक जापान के जिस शिंडेइ शहर में रहना लोगों का सपना होता था आज उसका अस्तित्व ही मिट चुका है| ऐसे कई शहर हैं जिनका अवशेष मात्र बचा हुआ है| यह तबाही कुछ कहती है इसे नज़रंदाज़ करना मंहगा पड़ सकता है|

हालाँकि यह भी सच है कि ऐसे जलजलों के बाद अंगुली मनुष्य औरउसकी कार्यशैली पर उठती है| आसमान को छूने की आकांक्षा लिए मनुष्य ने सीमाओं को लांघने में कोई कसर नहीं छोड़ी है| आज डर और दर्द का जो आलम जापान में दिखाई दे रहा है उसकी भयावहता का चित्र देखकर इंसान की रूह कांप उठती है| आँखों में आंसू के सूखने और अपनों की तलाश में ना जाने कितने दिन लगेंगे? प्रकृति की रुष्टता और विकराल रूप से हम सभी वाकिफ हैं लेकिन इसे समझने के प्रयास नाकाफी हैं| एक प्रकृति की सुंदरता पृथ्वी को दूसरे ग्रहों से अलग बनाती है तो दूसरी तरफ हम मुनाफा अर्जित करने के लिए इसी सुंदरता से खिलवाड़ कर

पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन कर खुली चुनौती दे रहे हैं| लेकिन सवाल अब भी वही क्या हम अभी भी सीख लेंगे? इस सुनामी का असर भारत पर नही होगा यह सोच कर हम खुश ज़रूर हो सकते हैं लेकिन बहुत दिनों तक नही?

दरअसल हमने प्राकृतिक संसाधनों का इतना असीमित दोहन किया है और कर रहे हैं कि हमें इससे प्रकृति को होने वाले नुकसान की ओर ध्यान देना उचित ही नहीं समझा| और जब ऐसी अनअपेक्षाकृत कोई प्राकृतिक आपदा आती है तो बहस कर, प्रकृति को बचाने की नसीहत देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं| जापान की यह तबाही भी कुछ दिन लोगों के दिमाग में रहेगी, समाचार चैनलों के लिए टाइम पास करने का साधन बनेगी और फिर सबकुछ ऐसा ही चलता रहेगा| पूरी पृथ्वी पर मंडरा रहे इस संभावित खतरे के बावजूद हमारी आंखे उसे देख नहीं पा रही हैं| भौतिकवादी संस्कृति के इस चंद लम्हों की खुशी के लिए हम अपने आने वाली पीढ़ियों का भविष्य दाँव पर लगा रहे हैं| जब जापान जैसे विकसित देश के लिए, जो भूकंप के मुहाने पर ही पला, बढ़ा, यह इतनी बड़ी विपदा के रूप में आ सकता है जिसके आगे उसकी सारी ताकत क्षीण पड़ गयी तो भारत या दूसरे विकासशील देशों की क्या हालात होगी इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है?

हालांकि यह समय सवाल उठाने का नहीं है और ना ही दोष बताने का| हमारी एकजुटता ही ऐसी विपदाओं से हमें बचा सकती है| जो लोग प्रभावित इलाकों में फंसे हुए हैं वह सुरक्षित बाहर निकलेंगे इसकी हम आशा करते हैं|

गिरिजेश कुमार

Wednesday, March 9, 2011

ये तो हद कर दी सरकार आपने!

बिहार में सुशासन की सरकार के अफसर कितने संवेदन शील और सक्रिय हैं इसका ताज़ा उदाहरण है एम् के कॉलेज सीतामढ़ी के सौ छात्रों का इंटरमीडिएट की परीक्षा से वंचित रहना| बिहार सरकार शिक्षा में बेहतरी का दावा करती है और राज्य को एक शिक्षित प्रदेश की श्रेंणी में लाना चाहती है| लेकिन पता नहीं राज्य सरकार ने शिक्षित प्रदेश का मतलब क्या निकाल रखा है? घटनाक्रम यह है कि बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के अध्यक्ष और सचिव की गलती का खामियाजा उन सौ छात्रों को भुगतना पड़ रहा है जिन्होंने पुरे साल मेहनत की और अंतिम समय में परीक्षा से वंचित रह गए| गौर करने वाली बात यह भी है कि तीन मार्च को पटना उच्च न्यायालय ने एम् के कॉलेज के सभी छात्रों का ओ एम् आर(ऑप्टिकल मार्क रीडर) स्वीकार करने का आदेश दिया था ताकि आठ मार्च से शुरू होने वाली परीक्षा में छात्र भाग ले सकें लेकिन समिति ने यह फॉर्म जमा ही नहीं लिया| अब अगर छात्र आक्रोशित होकर तोड़फोड़ करते हैं तो दोष किसका है? क्या छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करना का हक समिति को है?

यह मामला अब कोर्ट में है| कोर्ट ने अधिकारीयों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है| माना कि छात्रों के साथ न्याय करेगा कोर्ट लेकिन इस वजह से छात्रों को जो मानसिक परेशानी झेलनी पड़ी और उनका १ साल बर्बाद हुआ उसकी भरपाई कैसे होगी? सरकार इस मामले पर चुप है लेकिन कोई उन छात्रों और उनके माँ बाप से पूछे कि उनपर क्या बीत रही है जिन्होंने एक -एक रुपया जोड़कर परीक्षा का फॉर्म भरा था और भूखे रहकर ट्यूशन की फीस दी थी| मजदूरी कर जिन बच्चों का शिक्षित करने का जिम्मा उनके माँ बाप ने उठया उनके सपनों की रौंदने की ज़िम्मेदारी क्या समिति लेगी ? लेकिन अफ़सोस कि हम सिर्फ़ आश्चर्य व्यक्त कर सकते हैं| काश! यह बात ए सी कारों में बैठे अफसरों, जनता के पैसों पर राज करने वाले सरकारों और नेताओं को समझ में आ पाती?

गिरिजेश कुमार

Monday, March 7, 2011

अपनी सभ्यता को भूलते जा रहे हैं लोग

एक सभ्य समाज की पहचान उसकी सभ्यता और संस्कृति से होती है| ये उस समाज की अमानत होती है जिसे सहेज कर रखने की ज़िम्मेदारी समाज में रह रहे लोगों की है| लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति, जिसकी मिसाल पूरी दुनिया में दी जाती है, और दूसरे देश जिसका अनुशरण करते हैं, को आज अपने ही देश के लोग भूलते जा रहे हैं| प्यार के नाम पर अश्लीलता और उसकी रक्षा के लिए संस्कृति के तथाकथित ठेकेदारों के पैदा होने की खबर से अख़बारों के पन्ने भरे रहते हैं| मानवीय मूल्य और इंसानी रिश्ते निरर्थक साबित हो रहे हैं| सामाजिक संवेदना मरी हुई दिखाई देती है| माँ-बाप, भाई –बहन, आस-पड़ोस जैसे पवित्र रिश्तों से विश्वास, दरक रहे हैं| ये स्थिति उस देश की है जहाँ इज्ज़त को सर का ताज माना जाता है और शर्म लोगों का गहना है| एक बड़ा सवाल उठता है कि ऐसा क्यों हो रहा है? जहाँ अपने बूढ़े माँ बाप की सेवा करना धर्म माना जाता था वहाँ आज उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया जा रहा है| कहने वाले इसे कलयुगी प्रभाव की संज्ञा देते हैं लेकिन वास्तविकता क्या है? इसकी तहकीकात ज़रुरी है|

जहाँ एक तरफ़ ये हालात हैं वही दूसरी तरफ़ हमें देखने को मिलता है कि समाज में परम्परा के नाम पर कुछ चीजों ने ऐसी गहरी जड़ जमा ली है जिसे बहुत पहले ही अलविदा कह देना चाहिए था| जिसमे अंतरजातीय विवाहों का विरोध, महिलाओं के प्रति दोहरी मानसिकता, अंधविश्वास, उंच नीच का भेद, छुआछूत जैसी चीजें प्रमुख हैं|

दरअसल आगे निकलने की होड़ और दौड़ते भागते जिंदगी के बीच इन महत्वपूर्ण चीजों की तरफ ध्यान देना लोग ज़रुरी नही समझते| पश्चिम की भोगविलास वादी सभ्यता में हम इतने खो चुके हैं कि अपने पुरखों के द्वारा विरासत में सौंपी गई अपनी सभ्यता को ठुकरा दिया है| जिसका नतीजा यह हो रहा है कि आधुनिकता के नाम पर अश्लीलता बढ़ रही है और प्यार जैसे पवित्र रिश्तों को नीची निगाहों से देखा जा रहा है| उत्कृष्ट साहित्य और क्रन्तिकारी विचारधारा से वर्तमान युवा पीढ़ी दूर है| समाज और सामजिक समस्याओं के प्रति जो रूचि आज़ादी के समय युवाओं में थी, आज नहीं है| जनसंचार माध्यमों में हावी व्यापारवाद और रेवेन्यू के लिए आपत्त्तिजनक जनक चीजों को बढ़ाचढ़ाकर पेश करना भी इसके लिए जिम्मेदार हैं| समाज में उच्च स्थान रखने वाले लोग भी आगे आने से कतराते हैं| शिक्षाविद, समाजशास्त्री गणमान्य और प्रबुद्ध लोग, समाज से जुडी समस्याओं के लिए, सभ्यता और संस्कृति रूपी विरासत को बचाने के लिए आगे आये हैं, ऐसा सुनने को नहीं मिलता|

इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि समाज के हित के लिए लोग आगे आयें, और सामाजिक सभ्यता पर मंडरा रहे इस खतरे को भांपते हुए उसे दूर करने के प्रयास किये जाएँ|

गिरिजेश कुमार

Thursday, March 3, 2011

बच्चों में बढ़ रही है, परीक्षाओं में नक़ल करने की प्रवृत्ति

जिस बुनियाद पर हम महल बनाना चाहते हैं उसकी नींव ही कमजोर डाली जाये तो फिर आनेवाले भविष्य में उस महल का क्या होगा? मिटटी के घरोंदे रूपी बच्चों में शिक्षारूपी जल सिंचित कर सफलता की जिन ऊँचाइयों पर हम उन्हें पहुँचाना चाहते हैं, उन्हें संस्कार का छोटा सा पाठ पढाने में हम कहाँ चूक जाते हैं? शिक्षित होना अलग बात है लेकिन उसे आत्मसात करना अलग बात| बिहार बोर्ड की हाल ही में समाप्त हुई मैट्रिक की परीक्षा में राज्य भर से कुल 1436 बच्चे नक़ल करते हुए पकडे गए| ये सरकारी आँकड़े हैं, इनके अलावा कितने ही ऐसे बच्चे हैं जो पकडे नहीं गए और अपनी बहादुरी पर इठला रहे हैं| कदाचारमुक्त परीक्षा के तमाम दावों पर हजारों रूपये खर्च कर दिए जाते हैं, समिति, कमिटी से लेकर बड़े बड़े अधिकारियों की टीम गठित की जाती है लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जिंदगी की पहली सीढ़ी को पार कर देश का नाम रौशन करने वाले ये बच्चे आखिर परीक्षाओं में कदाचार में लिप्त क्यों पाए जाते हैं?

गौरतलब है कि आत्मविश्वास की कमी, असफल होने का डर, मनोवैज्ञानिक दबाव और विषयों की गहरी समझ ना होने के कारण वे सफल होने का शॉर्ट कर्ट ढूंढते हैं| जिसमे अभिभावकों की भी सहमति होती है| दरअसल दोष सिर्फ़ बच्चों का ही है ऐसी बात भी नही है, विद्यालयों में जो संस्कार और जो शिक्षा इन्हें मिलनी चाहिए वो नहीं मिलता| आत्मविश्वास की भावना विकसित करने का जो काम शिक्षकों को करना चाहिए उन्हें करने में वो असफल रहते हैं| यहीं पर शिक्षा व्यवस्था की खामियां सामने आती हैं| कभी सामाजिक सदभाव और आपसी सहिष्णुता का पाठ पढाने वाले विद्यालय आज अपनी गरिमा को खोकर निजी स्वार्थ के रास्ते पर अग्रसर हो चुका है| मतलब भरे इस सामाजिक व्यवस्था में शिक्षा का मंदिर भी खुदगर्जी का शिकार हो चुका है| इसलिए शिक्षा से गुणवत्ता गायब है| अफ़सोस लेकिन सच है कि सरकारें सिर्फ़ अपनी छवि बनाने पर जोर देती है जिससे बुनियादी चीजें अधूरी रह जाती हैं|

मध्यमवर्गीय परिवारों से आनेवाले ये बच्चे खुद नहीं जानते की ऐसा करके वो अपने ही पैरों में खुद कुल्हाडी मार रहे हैं| परीक्षा में सफल होने के लिए नक़ल का रास्ता अपनाते अपनी जिंदगी को धोखा देते हैं| ज्यादातर अभिभावकों की सोच यही रहती है इनके बच्चे किसी तरह से पास कर जाएँ| आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नही होती कि अपने बच्चे को दोबारा परीक्षा में बैठने की फीस भर सकें| इनके निम्न सोच के लिए हम इन्हें भी दोष नहीं दे सकते क्योंकि पूंजीवादी सामाजिक व्यवस्था ने इनके पैरों में बेडियाँ डाली हुई हैं, और ये चाहकर भी उससे तोड़ नहीं सकते|

ये स्थिति तबतक बने रहेगी जबतक शिक्षा को प्राथमिकता नहीं दी जायेगी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया जायेगा| सरकारी विद्यालयों में ऐसी व्यवस्था विकसित करनी पड़ेगी कि वहाँ पढ़ने वाले बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की कतार में शामिल हो सकें| साथ ही साथ बच्चों में आत्मविश्वास की भावना विकसित करना भी ज़रुरी है|

गिरिजेश कुमार