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Wednesday, December 21, 2011

सामाजिक विभत्सता की कारुणिक दास्तान


“मेरे मम्मी-पापा हमारी शादी के लिए राज़ी नहीं थे। क्योंकि हमारी जाति अलग थी। उनकी इच्छा के विरुद्ध हमने मुंबई कोर्ट में शादी कर ली। उन्होंने मुझे यह कहकर बुलाया कि हमें तुम्हारी शादी मंजूर है। मैं बहुत ही साधारण लड़की हूँ। मैं उनकी चालों को नहीं समझ पायी। उन्होंने मुझे घर में ही किडनैप कर रखा है। मेरे मम्मी-पापा ने मेरे पति को जान से मार देने की धमकी दी है। वे मुझे किसी से बात भी नहीं करने दे रहे...(क्रमशः)“  इस कहानी की हर एक पंक्ति हमें अंदर तक झकझोरती है। दर्द की दास्ताँ पढ़ते-पढ़ते कब उसके दर्द से रिश्ता जुड़ जाता है, पता ही नहीं चलता? अकेले में रोते-रोते जब किसी की आँखे सूज़ जाती हैं तो दिल में छुपे गुबार किसी भी रास्ते बाहर आने को बेताब हो उठते हैं। यह बेताबी कभी इंसान को तोड़ देती है, तो कभी उसे विद्रोही बना देती है। हालाँकि उस इंसान के लिए दोनों ही स्थिति खतरनाक है, लेकिन भींगी आँखें, अगर सिलवटों से भी बहती आँसुओं का हिसाब माँगने लगे तो फिर आखिर भरोसा किसपर किया जाए? अपने ही जब दुश्मन बन जाएँ तो मदद किससे मांगी जाए, यह बड़ा सवाल बन जाता है?

बहरहाल, यह आपबीती है, बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की रहने वाली पल्लवी पल्लू की, जिसे उसने फेसबुक पर शेयर किया है। अंत में उसने अपने और अपने पति की ज़िन्दगी की रक्षा की गुहार लगायी है। विडंबना देखिये, जो उसका हक है, उसे उसको भीख के रूप में माँगना पड़ रहा है। उसकी गलती बस इतनी है कि उसने उस व्यक्ति से शादी कर ली जिससे वो प्यार करती थी। और दुर्भाग्य से वो उसकी जाति का नहीं है। आखिर किस आधुनिकता की फटी हुई चादर ओढ़े जी रहे हैं हम? जहाँ एक लड़की सिर्फ़ इसलिए नज़रबंद है, क्योंकि उसने अंतर्जातीय विवाह जैसी सामाजिक कुरीति के मुँह पर तमाचा मारा है।
वो पूछती है, कोई इंसान अगर जातिवाद की लड़ाई लड़ता है तो क्या वह देशद्रोही है? दरअसल, सवाल सिर्फ़ यही नहीं है, सवाल उस मानसिकता का भी है जो आधी आबादी को दोयम दर्जे की निगाह से देखता है, और उसके सारे फैसलों पर परिवारवालों का नियंत्रण रहता है। अगर इस नियंत्रण से आगे निकलने की किसी ने कोशिश की तो उसकी नैतिकता पर ही सवाल उठा दिए जाते हैं, फिर यही समाज उसे घटिया, बदचलन, बाजारी और न जाने कैसे-कैसे उपनाम से संबोधित करता है? सवाल, जातिवाद जैसी सामाजिक कुरीति का भी है जिसने कभी-न-कभी हमसब को अपनी जद में लिया और हम हैं कि फिर भी उस चोले को उतार फेंकना नहीं चाहते। इसीलिए अंतर्जातीय विवाह को हम झूठी शान-ओ-शौकत में पड़कर स्वीकार करना नहीं चाहते। सामाजिक बुराई को स्टेटस सिम्बल बनाकर हम खुद को ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को विनाश की ओर धकेल रहे हैं। पल्लवी जैसी न जाने कितनी ही लड़कियाँ इस तथाकथित आधुनिक समाज से अपनी ज़िन्दगी की भीख माँगने को विवश है?
हमारी सामाजिक संरचना में झूठी अस्मिता और दिखावेपन ने इतनी गहरी पैठ बना ली है कि अगर कोई उसे तोड़ने की कोशिश करे तो, या तो उसे तोड़ दिया जाता है, या उसकी आवाज़ उसके कमरे की दीवारों से ही टकराकर रह जाती है। कोई उसके अंतर्मन में झाँकने की कोशिश नहीं करता। हताशा, निराशा और कुंठा के ऐसे ही आलम में कोई आत्महत्या जैसे जघन्य कदम उठाने को मजबूर होता है। ज़रूरत इस बात की है कि हम खुद की सोच को परिपक्व बनायें। अपनी मानसिकता में थोड़ा बदलाव कर हम कई सामाजिक बुराइयों को दूर कर सकते हैं। दूसरों को दोष देने से पहले हमें खुद के दोषों पर भी विचार करना चाहिए। इसमें माता-पिता की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है।  ताकि फिर कोई पल्लवी ज़िन्दगी की भीख माँगने को विवश न हो।
गिरिजेश कुमार

Tuesday, December 13, 2011

बेबसी की चक्की में पिसता बचपन

“मैं पढ़ता था लेकिन जब से पापा बीमार हुए तब से पढ़ाई छोड़ दी” इस कंपकपाती ठण्ड में सड़क के किनारे दीये की रौशनी में अंडा बेच रहे बमुश्किल दस साल के बच्चे से जब मैंने यह सवाल किया कि तुम पढ़ते नहीं हो? तो उसका जवाब यही था। टूटी-फूटी  भाषा में दिए इस जवाब को सुनकर अनायास ही मन उस बच्चे के प्रति करुणा, दया और ममता से भर जाता है। लेकिन सवाल है इसे कहा क्या जाए? नियति का फेर,व्यवस्था की खामी या उस बच्चे की किस्मत का दोष?
दरअसल भाग्य और भगवान के  भरोसे जीने वाला यह समाज व्यवस्थागत खामियों को भी किस्मत और कर्म के फल के निगाह से देखता है। दो जून की रोटी की तलाश,बीमार बाप के ईलाज के लिए पैसों की ज़रूरत और इन सबके बीच पिसता बचपन। समस्याएं एक नही हैं। ज़िंदगी को मज़बूरी का नाम देकर आखिर कब तक जिया जाए?
२१ वीं सदी में भले ही हमने विकास के नए पैमाने गढ़ लिए हों लेकिन बुनियादी सवाल अब भी कायम हैं। देश का भविष्य कहे जाने वाले बच्चे आर्थिक असमानता,गरीबी,मज़बूरी,लाचारी और बेबसी की उस चक्की में पिसते रहते हैं जहां से बाहर निकलना उसके वश की बात नही होती। हर चौक-चौराहे और गली-नुक्कड़ पर हमें ऐसी विवश ज़िन्दगी देखने को मिल जाती है। स्थिति बदलने और बेहतरी के तमाम सरकारी दावे होते हैं लेकिन इन दावों की वास्तविकता धरातल पर नही दिखती। नतीजतन ज़िंदगी शब्द से भी अनजान बच्चे ज़िन्दगी का बोझ उठाने को मजबूर होते हैं। जो उम्र उसके दिमागी विकास और नयी कल्पनाओं को अंजाम देने की होती है उस उम्र में उसे आटा-चक्की का भाव मालुम करना होता है। एक सभ्य लोकतान्त्रिक समाज के लिए यह स्थिति वाकई चिंताजनक है। लेकिन निजीहित जिस समाज का अंतिम लक्ष्य बन जाए उस समाज में जनहित की बात बेईमानी ज़रूर लगती है, फिर भी यह सवाल तो उठता ही है कि आखिर दोषी कौन है?
हमारा संविधान समानता और समता पर जोर देता है लेकिन आज़ादी के छः दशकों बाद भी हम इसके निहितार्थ को नहीं समझ पाए। सरकारी नीतियाँ भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। मुनाफ़ा आधारित सोच हमें गरीबों और ज़रूरतमंदों के लिए बनायीं नीतियों का लाभ उनतक पहुँचाने से रोकते हैं। फलस्वरूप ये नीतियाँ कागजों में ही रहकर सरकारी कार्यालयों की शोभा बढ़ाती रहती हैं। इस विकट,विपरीत और दमघोंटू परिस्थितियों से लड़ने के लिए जो इच्छा शक्ति चाहिए वो सरकारों में नहीं दिखती। परिणामतः सारी सुविधाओं का लाभ चंद मुट्ठी भर लोगों तक सिमट कर रह जाता है। अमीर और अमीर होते जाते हैं गरीब और गरीब।
इसी देश में एक तरफ़ ऐसे बच्चे हैं जो तमाम सुख सुविधाओं से संपन्न हैं और दूसरी तरफ़ ये बच्चे हैं जिन्हें इन शब्दों का मतलब भी नहीं पता है। एक देश के इन दो चेहरों के कालांतर में झाँकने की कोशिश आखिर कब होगी? सवाल यह भी है कि जो व्यवस्था इस देश के बच्चों को उनका बचपन नहीं दे पाता क्या उस व्यवस्था को उखाड़ नहीं फेंकना चाहिए? इस शर्मनाक स्थिति से खुद में शर्मिंदगी महसूस करनेवाले हर व्यक्ति को इस दिशा में एकसाथ मिलकर प्रयास करने चाहिए। ताकि बचपन बचाया जा सके।  
गिरिजेश कुमार

Saturday, December 10, 2011

ज़िंदगी बचाने की जगह क्यों बना मौत की कब्रगाह?

वो अस्पताल जिसमें आग लगी (तस्वीर-एपी)
ज़िंदगी बचाने की जगह मौत की कब्रगाह बन गया और किसी को इस बात का अफ़सोस नहीं है। पश्चिम बंगाल सरकार अपनी सफाई दे रही है तो अस्पताल प्रशासन भी नहीं चाहता कि उसकी साख पर बट्टा लगे। ऐसे में व्यवस्था पर भरोसा करने वाले लोग व्यवस्था की खामियों से असहज होकर अपना आपा खो दें और फिर वही सरकार यह कहे कि देश के लोगों को शान्ति व्यवस्था भंग नहीं करनी चाहिए तो समझना यह भी पड़ेगा कि आखिर ये माजरा है क्या? 
विदित  हो कि पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के ए एम् आर आई अस्पताल में 9 दिसम्बर की सुबह अचानक आग लग गयी थी जिसमे 89 लोगों के मरने की पुष्टि हो चुकी है। राहत कार्य अभी जारी है।  
अपने रिश्तेदारों की बेहतरी के लिए जो लोग अस्पताल आए थे उन्होंने यह सपने में भी नहीं सोचा होगा कि ठीक होने से पहले ही अस्पताल प्रशासन की व्यवस्थागत खामियां उनकी कब्र खोद चुकी हैं। ज़िन्दगी जीने की आस कब मौत के आशियाने में शरण ले लेती है यह तो कोई भी नहीं जानता लेकिन इसके लिए जिम्मेदार अगर इंसानी लापरवाही हो तो ह्रदय क्षुब्ध हो जाता है। सवाल उठता है कि क्या अस्पताल चलाने वाले लोग सिर्फ़ मुनाफ़े के लिए अस्पताल चला रहे थे? ईलाज करा रहे दूर दराज से आए लोगों की सुरक्षा उनके लिए कोई मायने नहीं रखती थी? सवाल यह भी है कि आखिर अस्पताल में इतना बड़ा हादसा हुआ कैसे?
हादसे के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कहती हैं कि दमकल विभाग के अधिकारियों ने अस्पताल को इस बात को लेकर चेताया था कि अस्पताल में आग से निबटने के पर्याप्त प्रबंध नहीं है। वहीँ अग्निशमन मंत्री जावेद खान कहते हैं कि आग की शुरुआत अस्पताल के तहखाने से हुई और यह तहखाना पूरी तरह अवैध है। ये बयान हादसे के कुछ ही घंटों बाद आए हैं। ज़ाहिर है सरकार से लेकर मंत्री तक को इस बात की जानकारी थी कि अस्पताल में आग जैसे हादसे से निबटने की तैयारी नहीं है फिर क्यों नहीं उसपर पहले कार्रवाई की गई? क्या पश्चिम बंगाल सरकार ऐसे ही किसी हादसे का इंतज़ार कर रही थी?
दरअसल हमारी मशीनरी इतनी अपरिपक्व है कि हम चाहकर भी ऐसे किसी घटना के अंजाम तक नहीं पहुंच पाते। इस घटना की परिणति भी तय है। सरकार ने जाँच के आदेश दिए हैं लेकिन इन जाँच रिपोर्टों की वास्तविकता फाइलों में कहीं गुम होकर अपना दम तोड़ देगी। ऐसे में जिन्होंने अपने परिजनों को खोया, अपने रिश्तेदारों को बेमौत मरते देखा उनकी सुननेवाला कौन है? सवाल यही है।  
प्रशासनिक लापरवाही, सरकारी अकर्मण्यता और सेवाओं पर भारी व्यक्तिवादी सोच हर बार आम निर्दोष लोगों की जान लेता है। यहाँ इंसान की ज़िंदगी की कीमत तय होती है जो फूटपाथ पर बिकने वाले किसी सस्ते और घटिया सामान से भी कम है। हर ऐसी घटना जो सीधे व्यवस्था की खामियों पर सवाल उठाते हैं, उसके रहनुमा अपने आप को पाक साफ बताने की कोशिश करते हैं। कोई भी उस मातमी सन्नाटे के पीछे झाँकने की कोशिश नहीं करता जहां उसके परिजनों की आँखे दर्द, गम और रुसवाई से सूज चुकी होती हैं। कोई उसके दिल का हाल जानने की कोशिश नहीं करता जिनके पास अब सिर्फ़ यादें बची हुई हैं। वर्तमान विकसित, समृद्ध और आत्मनिर्भर भारतीय व्यवस्था की यही सबसे बड़ी खामी है।
सवाल यह नही है कि जो हादसे हो चुके हैं उनपर कितना आंसू बहाया जाए और व्यवस्था को कितना कोसा जाए? सवाल यह है कि जिन हालातों में ऐसी घटनाएँ होती हैं उन पर गंभीरता पूर्वक विचार करके क्या कोई ठोस हल निकालने की कोशिश की जायेगी ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएँ दोबारा न घटे? और आम निर्दोष लोग बेवजह काल के गाल में न समायें?
गिरिजेश कुमार

Sunday, November 27, 2011

घर हो या बाहर, दुर्व्यवहार महिलाओं के साथ ही होता है

पुरुष वर्चस्ववादी सामाजिक अवधारणा में स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार कोई नई बात नहीं है लेकिन बदलते परिवेश में सीमित सोच और घटिया मानसिकता पूरी  व्यवस्था के लिए घातक है। सवाल है चंद लफंगे पुरे समाज को चुनौती देने का दुस्साहस कैसे कर लेते हैं? सवाल यह भी है कि यह सिलसिला आखिर कबतक चलता रहेगा? कल सरेराह बीच बाजार में एक युवती के साथ छेड़खानी की गई। अभी कुछ ही दिन पहले इंसानियत को शर्मसार कर इसी शहर में एक छात्रा के साथ उसके पिता के सामने बदतमीजी की गई थी और लोग मूकदर्शक बने रहे थे। इन सबके बीच बड़ा सवाल यह भी है क्या हमारे पूर्वजों के द्वारा विरासत में सौंपे गए संस्कार और संस्कृति प्रभावहीन हो गयी है?
दरअसल जब ऐसी घटनाएँ घटती हैं तो यही समाज संवेदनशील हो जाता है। चर्चाओं बहसों का एक नया दौर शुरू हो जाता है और कुछ समय के लिए ऐसा लगता है कि एक ठोस हल इस बार ज़रूर निकलेगा लेकिन स्थिति बदलती नहीं है। सदियों से पीछे धकेली गयी स्त्री समाज को अपनी आबरू बचाने के लिए पुरुषों का सहारा लेना पड़ता है। आधुनिकता की चादर ओढ़े इस समाज में आधुनिकता कम फूहडता ज्यादा दिखती है। लेकिन क्या हमारी संवेदना मर चुकी है। हम यह क्यों भूल जाते हैं कि वह लड़की हममे से ही किसी की बहन, किसी की बेटी है?
एक और बात जो ऐसे मामलों में नजर आती है वह यह कि ज्यादातर बदतमीज रसूख वाले घर से सम्बन्ध रखते हैं। पैसे और पॉवर का धौंस दिखाकर सबकुछ मैनेज कर लेते हैं। यानी दोष इस व्यवस्था में भी है जहां अपराध करने वाले जानते हैं कि ज्यादा से ज्यादा क्या हो सकता है? ऐसे में वह लड़की क्या करे या सताई गयी लड़की के परिवार वाले क्या करे? इस सवाल का जवाब कोई देना नहीं चाहता।
दूसरी तरफ़ खुलेपन के नाम पर पुरे समाज में जिस तरह से अश्लीलता फैलाई जा रही है वह भी ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार है। हमारी कानून व्यवस्था और प्रशासनिक अमला इतना सुस्त है कि पहले तो अपराधी पकड़ में नहीं आते और पकड़ में आ  भी गए तो किसी को उसके किये की सजा नहीं मिलती। नतीजा बेशर्मी की हद को पारकर सरेआम ये लफंगई करते हैं।
स्त्री देह को उपभोग की वस्तु समझने वाली हमारी सामाजिक संरचना धीरे-धीरे सभ्यता का प्रकाश खोकर इतनी मलीन हो चुकी है कि उसे अच्छे बुरे का भी ख्याल नहीं रहा। अपनों तक ही सीमित सोच हमें हर लड़की को नीची निगाह से देखने को विवश करता है। इस सोच को भी बदलना ज़रुरी है। हमारे तथाकथित विकसित समाज की कड़वी  सच्चाई यह भी है कि घर हो या बाहर, दुर्व्यवहार महिलाओं के साथ ही होता है। दहेज के लिए हत्या और प्रताड़ित करने कि घटनाओं में इजाफा इस बात के सबूत हैं।    
कहते हैं बच्चे की पहली पाठशाला उसका घर होता है। तो आखिर उनकी परवरिश में कहां कमी रह जाती है कि सड़कों पर खुलेआम बदतमीजी करने से ये बाज नहीं आते। उनके माँ बाप को भी इस दिशा में सोचना चाहिए। एक स्वस्थ, सुन्दर और भयमुक्त समाज बनाने की ज़िम्मेदारी हम सबकी है। इसमें ऐसी चीजों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। यह सच है कि घर के चारों ओर अगर कचड़ा फैला हुआ हो तो हम अपने घर को दुर्गन्धमुक्त नहीं रख सकते। और चुपचाप बैठे रहना भी समाधान नहीं है। साथ ही प्रशासन को भी दोषियों को सजा दिलाने में महती भूमिका अदा करने की ज़रूरत है।
गिरिजेश कुमार

  

Friday, November 25, 2011

थप्पड़ की गूंज तो सुनाई दे रही है, लेकिन निहितार्थों पर चर्चा नहीं हो रही


व्यवस्थाओं से निराश होकर या वर्तमान हालात से तंग आकर, कारण चाहे कुछ भी हो, थप्पड़ चूँकि देश को चलाने की तथाकथित ज़िम्मेदारी संभाले सरकार के मंत्री को पड़ी थी तो उसकी गूंज तो सुनाई पड़नी ही थी। लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि इस थप्पड़ की सिर्फ़ गूंज ही सुनाई दे रही है इसके निहितार्थों पर चर्चा नहीं की जा रही। शायद करना भी नहीं चाहते। लेकिन सवाल यह है जब भी कोई घटना हमारे स्वभाव के विपरीत घटित होती हैं तो बजाये उसकी जड़ तलाशने के हम निजी निष्कर्ष पर पहुंच कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री क्यों समझ लेते हैं?  एक बात हमें साफ़ तौर पर समझ लेनी चाहिए कि शरद पवार को थप्पड़ महज प्रचार पाने का हथकण्डा नहीं था। मंहगाई, भ्रष्टाचार और अघोषित तानाशाही के खिलाफ जो चिंगारी आम जनमानस रूपी राख में दबी हुई है उसे भड़काने की नापाक कोशिश एक ऐसे  शोले का रूप ले लेगी जिसे दबाना किसी भी शासक वर्ग के लिए आसान न होगा। इसीलिए जब घोर साम्राज्यवादी अमेरिका के राष्ट्रपति पर मुंतज़र अल ज़ैदी ने जूता फेंका था तो उसे वैश्विक समर्थन मिला था। और इसीलिए जब हरविंदर सिंह जैसा युवक आवेश में किसी मंत्री को थप्पड़ मारता है तो असभ्य होते हुए भी हम सिर्फ़ उसे दोषी नहीं ठहरा सकते।
माना कि एक सभ्य लोकतान्त्रिक समाज में जनता के प्रतिनधि को खुलेआम थप्पड़ मारना कतई जायज़ नहीं है लेकिन जो परिस्थितियां और जो हालात इस देश के सामने इन्ही भ्रष्ट नेताओं ने खड़े किये हैं उसे आखिर बर्दाश्त कब तक किया जा सकता है? हर चीज़ की एक सीमा होती है लेकिन हम यह क्यों भूल जाते हैं सीमा की भी एक सीमा होती है, जिसे लाँघने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए। हालाँकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लोकतान्त्रिक समाज में ऐसी प्रवृत्तियाँ विकसित होंगी तो किसी भी लोकतान्त्रिक संस्था का काम करना मुश्किल हो जाएगा लेकिन ऐसी प्रवृत्तियाँ विकसित न हों इसके प्रयास की ज़िम्मेदारी कौन लेगा? निहायत ही इसकी ज़िम्मेदारी उन्ही नेताओं को लेनी होगी जो देश चलाते हैं और आखिरकार गुस्सा भी उन्ही के खिलाफ है।
दरअसल आम जनता किसी फैसले पर तब पहुँचती है जब उसकी आशाओं, आकाँक्षाओं और भावनाओं के साथ खिलवाड़ होता है। आज भले ही हम इस घटना की जितनी भी निंदा कर लें लेकिन हमें चर्चा लोगों की उन मनोदशाओं पर भी करनी चाहिए जो उसे आपा खोने पर विवश करती है। इसे सिर्फ़ एक घटना मान लेना भी गलत होगा क्योंकि थप्पड़ मारना हममें से किसी का भी शौक नहीं होता। यह सच है कि हमें अपना विरोध दर्ज कराने के लिए लोकतान्त्रिक तरीकों का इस्तेमाल करना चाहिए लेकिन धरना, प्रदर्शन और जुलुस जैसे विरोध के शुद्ध  लोकतान्त्रिक तरीकों पर पुलिसिया ज़ुल्म इन्ही नेताओं की शह पर होता है फिर अव्यवस्थाओं के भंवर में फँसा आम आदमी क्या करे? फिर हम यह भी भूल नहीं सकते कि राहुल गाँधी को काले झंडे दिखा रहे युवकों को लतियाने में मंत्री भी शामिल थे। फिर उन युवकों से हम संयम की उम्मीद क्यों करते हैं?
इन सबके बीच विचारणीय यह भी है कि राजनीति पर जबतक स्वार्थनीति हावी रहेगा ऐसी घटनाएँ रोकी नहीं जा सकती। इसलिए निजीहित को छोड़कर नेताओं को जनहित की तरफ़ भी ध्यान देना चाहिए। अन्यथा यह कहना गलत न होगा कि शरद पवार को थप्पड़ सिर्फ़ एक बानगी भर है आगे लंबी कहानी है।
गिरिजेश कुमार


Wednesday, November 23, 2011

क्यों बिखर रहा अन्ना का आंदोलन?

अन्ना का आंदोलन तो टाँय-टाँय फिस्स हो गया न? कंप्यूटर पर कुछ ज़रुरी काम करने के दौरान एक पुराने मित्र का फोन पर यही पहला सवाल था। कई दिनों के बाद अचानक आए फोन पर इस सवाल ने थोड़ी देर के लिए तो मुझे भी सकते में डाल दिया। फिर जवाब दिया अभी अधीर  होने की ज़रूरत शायद नहीं है क्योंकि जिस कानून की माँग को लेकर इस आंदोलन की शुरुआत हुई थी उसके लिए संसद के शीतकालीन सत्र तक का इंतज़ार तो करना पड़ेगा। उसके पहले किसी निष्कर्ष पर पहुँचना जल्दबाजी कही जायेगी। बहरहाल जवाब में कुछ भी कहा जाए लेकिन यह सवाल उस आम आदमी की निराशा को भी प्रदर्शित करता है जिसके मन में भ्रष्टाचार के खात्मे की उम्मीद जगी थी। हालाँकि यह सच है कि बड़ी लड़ाई लड़ने में वक्त लगता है और इस दरम्यान हमें कई पड़ाव भी पार करने पड़ते हैं। लेकिन भ्रष्टाचार नामक जिस घुन की दवा माँगने अन्ना हजारे आए थे उसके अंजाम तक पहुँचने से पहले ही जिस तरह से अन्ना के सहयोगियों में वैचारिक मतभेद सामने आ रहा है उसने इस लड़ाई को पीछे ज़रूर धकेला है। सवाल है सदियों से दबे इस जनाक्रोश को सही दिशा देने में कामयाबी हासिल क्यों नहीं हो सकी? इस सवाल पर अन्ना और उनके सहयोगियों को भी आत्ममंथन की ज़रूरत है। दुनिया का इतिहास गवाह है कि समय-समय पर जनता का आक्रोश जनउभारों के रूप में सामने आता रहा है। शासक वर्ग के खिलाफ़ भ्रष्टाचार के बहाने उपजे इस आक्रोश को भी एक दिशा देने की ज़रूरत थी जो व्यवस्था परिवर्तन के लिए ज़मीन तैयार करती। लेकिन इस लड़ाई की  अगली कतार में शामिल लोग भी वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था के उस कुटिल नीति का शिकार हो गए जिसमें व्यक्तिवाद प्रमुख है। अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी और खुद अन्ना को हमने अपने ऊपर लगे आरोपों के जवाब में आपा खोते हुए देखा है। अन्ना और उनके सहयोगियों का ज्यादातर वक्त अब यह सफाई देने में बीतता है कि हमारे बीच कोई मतभेद नहीं है। ऐसे में आम निरीह जनता के मन में ऐसे सवाल उठना जायज है। अन्ना टीम के प्रमुख सदस्य प्रशांत भूषण के कश्मीर पर दिए विवादास्पद बयान के बाद से उभरा मतभेद हर दिन एक नए रूप में सामने आ रहा है। इस मतभेद ने आम लोगों के मन में बनी साफ़ छवि को भी आघात पहुँचाया है। जिसे समय रहते समझने की ज़रूरत है।
दूसरी तरफ़ जब अन्ना हर वर्ग और धर्म के लोगों को कोर कमिटी में शामिल करने की बात करते हैं तो जाने अनजाने वह सदियों से कोढ़ की तरह समाज में जड़ें जमाये हुए उसी रूढ़िवादी मानसिकता को ही बढ़ावा देते हैं जिसमे जातिवाद प्रमुख हैं। किसी भी लड़ाई का आधार यह नहीं हो सकता कि उस टीम में शामिल लोग अलग-अलग धर्मों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे या नहीं। या फिर वह किस जाति से सम्बन्ध रखते हैं। व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई विचारों के आधार पर लड़ी जाती है।
इस तरह की लड़ाई पहली बार लड़ी जा रही है ऐसी बात नहीं है। 1974 का छात्र आंदोलन इससे कहीं ज्यादा बड़ा और व्यापक पैमाने पर हुआ था। उस वक्त भी मुद्दा भ्रष्टाचार था। लेकिन सम्पूर्ण क्रांति का जो नारा जयप्रकाश नारायण ने दिया उसे सही ढंग से परिभाषित नहीं किया जा सका था। जिसका हश्र आज हमारे सामने है। अन्ना के आंदोलन की तुलना जेपी के आन्दोलन से करना उचित नहीं है लेकिन इतिहास की गलतियों से सीख लेना भी ज़रुरी है। किसी भी आंदोलन को जनांदोलन सिर्फ़ इसलिए नहीं माना जा सकता क्योंकि उसमे बड़े पैमाने पर लोग शामिल हैं। दरअसल उस भीड़ में वैचारिक रूप से मजबुत और राजनीतिक चालों की गहरी समझ रखनेवाले कितने लोग हैं यह समझना भी ज़रुरी है। वैचारिक रूप से लोगों को मजबूत बनाने की ज़िम्मेदारी उन लोगों पर होती है जो आंदोलन के अगली कतार में शामिल होते हैं लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पा रहा है। हालाँकि यह नहीं कहा जा सकता कि अन्ना का आंदोलन फेल हो गया लेकिन बिखर रहे इस आंदोलन की कड़ियों को जोड़ना ज़रुरी है। अन्यथा भ्रष्टाचार मुक्त समाज की कल्पना सिर्फ़ एक ख्वाब बनकर ही रह जायेगी।
गिरिजेश कुमार

Thursday, November 17, 2011

बिना सोर्स के आप सड़क पर चलते कीड़े हैं जिन्हें कोई भी राह चलता कुचल देता है



मेरे पड़ोसी शर्मा जी की पत्नी जिंदगी और मौत से जूझ रही है। दो दिन पहले उन्हें गंभीर हृदयाघात हुआ था। शर्मा जी के सामने एक तरफ़ अपनी पत्नी की ज़िन्दगी है तो दूसरी तरफ़ मँहगे ईलाज के लिए पैसे के बंदोबस्त की चुनौती। आँखों से आँसुओं की अविरल बह रही धारा किसी भी इंसान का दिल चीर कर रख देता है। अपनों का साथ तो है लेकिन विवशता उनकी भी है। डॉक्टरों ने एम्स रेफ़र किया है। इन सबके बीच चिंता सिर्फ़ पैसों की ही नहीं है,चिंता उन सोर्सों की भी है जिससे ईलाज समय पर शुरू हो सके। ये सोर्स आखिर कैसे मिले? मंत्रियों, विधायकों से मदद की गुहार ताकि ज़िंदगी बचायी जा सके। ग़म, मज़बूरी और लाचारी के ऐसे हालात में एक आदमी क्या करे?
यह कहानी उस शर्मा जी की है जो सरकार से ईमानदारी और मेहनत की कमाई का वेतन लेते हैं। लेकिन इन्ही जनता के टैक्सों पर पल रही सरकार के पास अस्पतालों में मँहगे ईलाज के लिए पर्याप्त सुविधाएँ नहीं हैं। और हैं भी तो वह चंद मुट्ठीभर सुविधासंपन लोगों की रखैल बनकर रह गई हैं। इसे विडंबना ही कहेंगे कि एक तरफ़ करोड़ों रूपये काले धन के रूप में विदेशी बैंकों की शोभा बढ़ा रहे हैं तो दूसरी तरफ किसी के पास एयर एम्बुलेंस के लिए पैसे नहीं है। यह स्थिति हर उस व्यक्ति की है जो मध्यमवर्गीय परिवार से आता है। यहां हर चीज़ के लिए सोर्स चाहिए। नौकरी के लिए सोर्स, इलाज के लिए सोर्स, सरकारी दफ्तरों में काम कराने के लिए सोर्स। बिना सोर्स के आप सड़क पर चलते कीड़े हैं जिन्हें कोई भी राह चलता कुचल देता है। क्षमता, बुद्धिमता, ज्ञान, अर्हता सब सेकेंडरी चीजें हो चुकी हैं। सवाल है आखिर ऐसी व्यवस्था किसने बनायीं जो इंसान के जीने के लायक ही नहीं है?
माना की चमचमाती सड़कें,उसपर फर्राटेदार दौड़ती मँहगी कारें और आसमान छूती इमारतें किसी भी देश के विकसित और समृद्ध होने की परिचायक हैं लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और भोजन जैसी मूलभूत और बुनियादी ज़रूरतों का लाभ हर ज़रूरतमंद तक पहुँचे इसकी ज़िम्मेदारी भी सुनिश्चित होनी चाहिए। फिर ऐसे भारत निर्माण के दावों के दरअसल मायने क्या हैं जहाँ किसी की ज़िंदगी कागज़ के चंद नोटों के अभाव में नहीं बचाई जा सके? और पैसों का बंदोबस्त हो भी जाये तो सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त सुविधाएँ नहीं मिलती क्योंकि वह किसी मंत्री, विधायक, सांसद या अफसर का रिश्तेदार नहीं है। निजी अस्पताल उसके ख्वाब से भी बाहर की चीज़ है।
विवशताओं और लाचारियों के ऐसे हालात में ही इंसान गलत कदम उठाने को मजबूर होता है। भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी की नींव भी कहीं न कहीं यहीं से जन्म लेती है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि पूरी तरह से पूँजीवादी सोच और उपभोक्तावादी संस्कृति में कैद यह समाज और समाजिक व्यवस्था क्या मुनाफे पर आधारित अपनी मानसिकता को बदलकर मनुष्य मात्र के हित की बात सोचेगा? अगर हाँ तो कब तक? अगर नहीं तो क्यों नहीं?
गिरिजेश कुमार

Tuesday, September 27, 2011

इस चकाचौंध के पीछे गहरा अंधेरा है


चमचमाती सड़कें, उसपर फर्राटेदार दौड़ती मंहगी कारें और आसमान को छूती इमारतें निश्चित ही किसी भी देश के विकसित और समृद्ध होने का प्रमाण हो सकती हैं लेकिन मुश्किल तब होती है जब इस चकाचौंध में हमारी आँखे इतनी चौंधिया जाती हैं कि हम उसके पीछे छिपे काले अंधेरे को देख नहीं पाते| अगर यह कहा जाए कि ऐसी ही कुछ स्थिति हमारे देश की है तो इसमें कोई आतिशयोक्ति नहीं होगी| जिंदगी के बारे में हम भले ही यह कह सकते हैं यह अनिश्चितताओं से भरी है लेकिन हमने समाज में रहने के जो  पैमाने बनाए हैं उनका लाभ कुछ मुट्ठीभर लोगों तक ही सीमित क्यों है? यही वो सवाल है जो हमें मथता है या कहें कि जिनकी जड़ें तलाशने की कोशिश नहीं होती|  
एक अघोषित अवकाश(40 दिन) से लौटने के बाद कई सारे सवाल कौंध रहे हैं| इन 40 दिनों में मैंने जिंदगी के कई रूप देखे| हालाँकि इनमे खुशियाँ कम ही थी| इस दौरान मौत से सामना भी हुआ और जिंदगी की जंग के लिए जिंदगी का ही विकृत रूप भी दिखा| किस्मत शब्द का उपयोग मैं नहीं करूंगा, क्योंकि इंसान को इसने जड़शील बना दिया है| दहशत से मची अफरातफरी भी दिखी तो जान बचाने के जुगत में लोगों को मरते भी देखा| जी, ये सब महज एक महीने में हुआ, अगर पीछे पलटकर देखने की कोशिश करता हूँ तो यकीन नहीं होता|
आखिर क्या हुआ इन 40 दिनों में? 1 सितम्बर 2011, ओवरब्रिज पर स्कूटी फिसली जिसे मैं ही चला रहा था| परिणामस्वरूप मेरा पैर गंभीर रूप से जख्मी हो गया और मुंह में भी चोटें आई| हालांकि मैं अब ठीक हूँ| 17 सितम्बर, मेरे दोस्त की माँ के गंभीर रूप से घायल होने की खबर आई| 18 सितम्बर, शाम अचानक आये भूकंप के झटकों ने ऐसा दहशत फैलाया कि अफरातफरी में कई की जान भी चली गई| आप कह सकते हैं सिर्फ 3 घटनाएँ हैं| जी, सिर्फ 3 ही हैं लेकिन इसके निहितार्थ को समझें तो गिनती नहीं कर पाएंगे| क्योंकि ये वो घटनाएँ हैं जिनसे मेरा सामना हुआ लेकिन ये रोज़ होती हैं| जगह बदल जाते हैं हालात नही|
यहाँ यह सब कहने की ज़रूरत इसलिए महसूस पड़ी कि क्योंकि मुख्य रूप से 17 और 18 सितम्बर की घटनाओं के बाद जो हालात उपजे और उनसे बाहर निकलने के प्रयास में जो बाधाएं आई, इनसे जूझते हुए लोगों के जो चेहरे मेरे सामने आये उसने सीधे-सीधे मेरे अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया| एक आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में अगर गंभीर आपदाएं आ जाएँ तो उस स्थिति की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है| दरअसल सवाल सिर्फ दुर्घटनाओं या प्राकृतिक आपदाओं का नहीं है सवाल विकास और भारत  निर्माण के दावों के बीच उपजे परिस्थितियों का है जिनसे जूझना आम आदमी की नियति है| दुर्घटनाएं व्यक्ति के हालात को देखकर घटित नहीं होती लेकिन आश्चर्य इस बात का है इस देश में करोड़ों रूपये बोरों में और बैगों में भटकते रहते हैं,(हाल के दिनों में ऐसे कई मामले देश के विभिन्न हिस्सों में देखने को मिले हैं) जिनकी बरामदगी के बाद उसका कोई दावेदार नही होता, लेकिन उसी पैसों से अस्पतालों में ऐसी सुविधाएँ विकसित नहीं हो पायी जिससे आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को किसी अनहोनी के बाद परिजनों के रहमोकरम या किसी की दया पर आश्रित न होना पड़े| ये हालात आज के हैं ऐसी बात नहीं है, या ऐसे हालात मेरे मित्र के साथ हैं ऐसा भी नही है लेकिन जो महत्वपूर्ण सवाल है वह यह है कि जिन सरकारों के हाथों में इन सबकी जिम्मेवारी है वो निजी स्वार्थों को तरजीह देने लगे और विरोधियों से बचाव ही जिनका प्रमुख लक्ष्य बन जाए तो ऐसे में आम जनता को मूलभूत सुविधाएँ मयस्सर कैसे होंगी?

कमोबेश यही हाल प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता का है| मैं जिस बिल्डिंग में रहता हूँ वो कतई भूकंपरोधी नहीं है लेकिन उस दिन भूकंप के बाद मची अफरातफरी की खबरें सुनकर जो पहला सवाल जेहन में आया वह यह कि अगर विकास का रास्ता इन कंक्रीट जंगलों से ही होकर गुजरता है तो इनमे भूकंपरोधी तकनीक का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता? जबकि यह सबको मालुम है कि भूकंप का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता|लेकिन दूसरा और अहम सवाल यह भी है कि मुनाफेआधारित व्यवस्था में आम आदमी के जीवन की फ़िक्र किसे है? बिल्डर जानते हैं कि मरने के बाद हर जिंदगी की कीमत तय होगी और फिर इसे भगवान का अभिशाप मानकर लोग चुप भी रह जाएंगे| फिर सबकुछ यूं ही चलता रहेगा| हालांकि उन मरनेवालों में बिल्डरों के परिजन भी हो सकते हैं इस बात को वे नजरअंदाज करते हैं| लेकिन हकीकत क्या है? जागरूकता फैलाने वाले कार्यक्रम यूं ही दम तोड़ते रहते हैं ऐसे में  जितने लोग भूकंप से नहीं मरे उससे ज्यादा लोग तो भगदड़ में मर गए| कम से कम बिहार में तो ऐसा ही हुआ| लेकिन विडंबना यह भी है कि लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ, सरकार ही अगर अस्थिर हो तो देशवासी जिंदगी को कोसने के अलावा कर ही क्या सकते हैं?
इन सबके बीच सुखद बात यही है कि उम्मीद के दीये कायम हैं और जबतक ये जलते रहेंगे हम हालात के परिवर्तन की आकांक्षा तो रख ही सकते हैं| लेकिन समझना यह भी पड़ेगा कि धैर्य की भी एक सीमा होती है|  
गिरिजेश कुमार