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Saturday, August 6, 2011

बढ़ रही है संसद और समाज के बीच दूरी


 लोकतंत्र पर मंडरा रहा है खतरा

विविधताओं से भरे इस देश में व्यवस्थागत अराजकता फैले यह हममे से कोई नहीं चाहेगा लेकिन जो परिस्थितियां हाल के दिनों में देश में बनी हैं, जिस तरह से संसद और समाज आमने-सामने दिख रहे हैं या कहें कि संसद और समाज के बीच दुरी बढ़ी है वह इशारा उसी व्यवस्थागत अराजकता की ओर कर रही है जिनसे हम बचना चाहते हैं| सवाल है क्या संसद और समाज के बीच यह दुरी जायज है? जिस संसदीय व्यवस्था की परंपरा आज़ादी के बाद से इस देश में चली आ रही है कहीं यह उसके खात्मे का संकेत तो नहीं है? पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान अपने अलोकतांत्रिक नीतियों के कारण ही आज अव्यवस्थित है| ये सवाल इसलिए भी बहस की मांग करते हैं क्योंकि निहित स्वार्थ के खातिर राजनीतिक दलों ने देश की रीढ़ यानी आम जनता को इतना नुकसान पहुंचाया है कि उसके खिलाफ लोग अब गोलबंद होने लगे हैं| यह निराशा कभी-भी भयंकर रूप ले सकती है लेकिन क्या शासन सत्ता में बैठे लोगों को इसकी भनक है?
ऐसे में जब अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन को आखिरी लड़ाई के रूप में  आह्वान कर दिया है स्थितियाँ बिगड़ने के हालात ज्यादा हैं| दरअसल सवाल सिर्फ जनलोकपाल विधेयक और भ्रष्टाचार का ही नहीं है| कई मुद्दे हैं जिनसे लोगों का संसदीय व्यवस्था से विश्वास उठता जा रहा है| जिनमे मंहगाई, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, जैसे मुद्दे प्रमुख हैं| सच यह भी है कि एक तरफ़ लोग सम्मानजनक जिंदगी जीने की कोशिश में दिनरात एक करते हैं तो दूसरी तरफ़ सुविधासंपन्न लोग हैं| दोनों के बीच बढ़ रही खाई निराशा की चरम सीमा तक पहुंच चुकी है| इसलिए समझना यह भी पड़ेगा कि यह निराशा सामाजिक नियमों, आदर्शों और मूल्यों को नजरंदाज कर हक और अधिकार में अंतर समझे बिना लोगों को उपद्रवी बना सकती है और वह स्थिति निश्चित ही सभ्य समाज के लिए अच्छी नहीं होगी| और फिर लोकतान्त्रिक व्यवस्था में आम जनता को ज्यादा दिनों तक बेवकूफ बनाना भी आसान नहीं है| लेकिन वोट बैंक और कुर्सी के लालच में देश को बांटने से भी पीछे न हटने वाली पार्टियां क्या अपने अंतर्मन से ये सवाल पूछेंगी? ज़ाहिर है नहीं|
इस बीच सांसद का सत्र भी चल रहा है| हंगामों और संग्रामों की आशंकाओं के बीच अबतक ठोस बहस किसी मुद्दे पर दिखाई नहीं दी है| मंहगाई जैसे मुद्दों पर बहस के लिए 80% सांसदों का अनुपस्थित रहना सांसदों की आम जनता से जुड़े मुद्दों पर गंभीरता को समझने के लिए काफी है| कभी जनता से जुड़ी समस्याओं पर गंभीर बहस की जगह संसद आज सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गया है| जहां तीखे सवाल तो होते हैं, सरकार और विपक्ष एक दूसरे को घेरने में भी कोई कसर नहीं छोड़ती लेकिन देशहित के लिए नहीं, कुर्सी पाने या बचाने के लिए| फिर सवाल है जब संसद अपने लक्ष्य से भटक जाए तो फिर संसदीय व्यवस्था के मायने क्या हैं?
दूसरी तरफ केन्द्र सरकार की जनआकांक्षाओं से जुड़े जनलोकपाल बिल पर जिस तरह से उदासीन दिखी और दिख रही है उसने सरकार के खिलाफ लोगों के गुस्से को भड़काने का काम किया है| यानी लोकतांत्रिक व्यवस्था के नियमों को कुचलकर सरकार ने जनता की भावनाओं का भी मजाक बनाया| इसलिए आज स्वतंत्रता दिवस यानि 15 अगस्त की चर्चा के बदले 16 अगस्त की चर्चा लोगों के जुबान पर है| समर्थन कितना मिलेगा य सरकार क्या रुख अपनाएगी यह तो आनेवाला वक्त बताएगा लेकिंन आम लोगों का संसदीय व्यवस्था से इस तरह भरोसा उठना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है|

गिरिजेश कुमार

  

Monday, July 25, 2011

उदारीकरण ने आम आदमी को क्या दिया?


                उदारीकरण के 20 साल, आखिर हासिल क्या हुआ?
          
विकास के लिए विदेशी पूँजी निवेश की चाह लिए तक़रीबन दो दशक पहले जिस उदारीकरण को तात्कालीन नरसिंह राव की कांग्रेस सरकार ने इस देश मे लागू किया उसने आम आदमी को आखिर दिया क्या? आज जब उदारीकरण को २० साल हो चुके हैं तो सबसे बड़ा सवाल यही उभरकर सामने आता है| उदारीकरण को लेकर न जाने कितने ही तर्क, वितर्क और कुतर्क दिए जाते हैं लेकिन वास्तविकता क्या है? यदि इस ‘उदारीकरण’ को आम आदमी के दृष्टिगत देखा जाए, जिसके लिए सारी योजनाएं बनती हैं और नीतियों का निर्धारण किया जाए जाता है भले ही उसकी हकीकत कुछ भी हो, तो यह सिर्फ़ एक धोखे के अलावा कुछ भी नही है| सच तो यह है कि उदारीकरण ने सीधे-सीधे पूंजीपतियों को लाभ पहुँचाया, आम आदमी की आर्थिक स्थिति तो और बिगड़ती चली गयी| अमीर और गरीब के बीच जो खाई दरअसल आज इस देश मे है उसकी जड़ मे भी उदारीकरण और पूंजीपतियों की पूँजीलोलुपता है| मुनाफे आधारित व्यवस्था की नींव पर विकास की लकीर खींची जाये तो वह किसके हित मे होगा यह सहज ही समझा जा सकता है?
20 साल पहले बजट पेश करते हुए तात्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने जो स्थिति देश के सामने रखी थी उससे बचने का रास्ता उदारीकरण के रूप मे ढूंढकर भले ही वाहवाही लूटी हो लेकिन इसके दुष्प्रभावों के दूरगामी परिणाम की फ़िक्र किसी को नहीं थी| उस समय वित्तीय असंतुलन के कारण देश के पास महज 15 दिनों के आयात के लायक विदेशी मुद्रा भण्डार बचा था सवाल है क्यों? पिछली कांग्रेस, संयुक्त मोर्चा और जनता दल सरकारों की गलत नीतियों के कारण हमें राष्ट्रीय शर्म भी झेलनी पड़ी और बैंक ऑफ इंग्लैंड से लोन लेने के लिए 47 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था| इसके अलावा मंहगाई का सवाल तब भी था| इन सबके बीच सवाल यह उठता है कि अगर इससे बचने का रास्ता उदारीकरण था तो आज वही सवाल उसी अवस्था मे या कहें की उससे भी बदतर अवस्था मे मुँहबाएं क्यों खड़ा है?
दरअसल सच यह है कि हमने जी डी पी रेट को अपने विकास का पैमाना मान लिया है और हमें लगता है कि हम विकसित हो रहे हैं| जबकि दूसरी तरफ कड़वा सच यह भी है कि देश बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी,बेकारी,असमानता, जो उदारीकरण की ही देन है, की गिरफ्त मे फँसा हुआ है| मशीनी युग ने आम आदमी से उसकी रोजी-रोटी छीन ली है| अमीरों को अमीर और गरीबों को और गरीब करना उदारीकरण का एकमात्र मकसद है| सवाल है जो देश मानव संसाधनों से परिपूर्ण है, जहाँ आत्मनिर्भर होने की असीम संभावनाएं थी और हैं भी वहाँ उदारीकरण की ज़रूरत क्यों पड़ी? उदारीकरण तो सिर्फ़ 10-15 प्रतिशत लोगों को सुख दे रहा है बाकी तो उसका अभिशाप ही झेल रहे हैं| फिर इस उदारीकरण के मायने क्या हैं?
 इस उदारीकरण को अगर आंकड़ों की नजर से  देखा जाए तो परिवहन  के क्षेत्र मे 1991 मे कुल 2296800 किमी सड़कें थी| एन एच 33690 किमी, रेल 62571 किमी और विद्युतीकृत रेल लाइन 10809 किमी थी| जबकि 2011 में कुल 33.4 लाख किमी सड़क है| जिसमे एन एच 65569 किमी और स्टेट हाईवे 130000 है| रेल लाइन की कुल लम्बाई 64215 किमी है जबकि विद्युतीकृत रेल लाइन 17811 किमी| वहीँ संचार के क्षेत्र मे 1991 मे कुल टेलीफोन कनेक्शन 50 लाख था जबकि अभी 6212.80 लाख है| 1991 मे कुल बेरोजगारी 9.02 मिलियन थी, 2004-05 में 10.51 मिलियन जबकि अभी 16.00 मिलियन है| यानी संचार क्षेत्र को छोड़ देन तो उदारीकरण से विकास की कुछ खास लकीर नहीं खींची जा सकी है| बेरोजगारी तो लगभग दो गुणी ज्यादा हो चुकी है| लेकिन जरा आज से ठीक 20 साल पहले चलते हैं जब तात्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने ऐतिहासिक बजट भाषण मे विक्टर ह्यूगो को उद्धृत करते हुए कहा था “दुनिया की कोई ताकत उस विचार को नहीं रोक सकती जिसका समय आ गया है”| आज यही सवाल तत्कालीन वित्तमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी से नही पूछा जाना चाहिए कि क्या उदारीकरण का वास्तविक समय आ गया था? फिर जब आज हालात ऐसे हैं तो आर्थिक सुधारों की शुरुआत की घोषणा को किस तरह संकट के भीतर से भविष्य की इबारत लिखना कहा जा सकता है?

गिरिजेश कुमार


  

Sunday, July 17, 2011

पूंजीपतियों पर हमला हो, तब हिलती है सरकार

 कह सकते हैं कि धमाकों के सिर्फ बारह घंटे बाद ही जिस तरह से मुंबई अपने रंग मे आ गई और लोग सड़कों पर उसी तरह से दौड़ने लगे जैसे कुछ हुआ ही नहीं, वो हमारी जिजीविषा, मुश्किलों से लड़ने की हमारी शक्ति और इंसानियत के हत्यारों के खिलाफ़ हमारी एकजुटता को प्रदर्शित करती है| हम यह भी कह सकते हैं कि चूँकि मुंबई के लिए यह कोई नई बात नहीं थी इसलिए वापस पटरी पर आने में उसे अपेक्षा से भी कम समय लगे, लेकिन क्या हम इतने से ही संतुष्ट हैं?

दरअसल हर आतंकी घटना इतिहास के पन्नों मे अपना अमिट नाम दर्ज कराती है और उन लोगों के लिए न भूलने वाली यादें छोड़ कर जाती है जो ऐसी घटनाओं मे मारे जाते हैं| अफ़सोस तब होता है जब जनता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध प्रशासनिक तंत्र और सरकारें गैरजिम्मेदाराना रवैया अपनाती हैं| मुंबई हादसों के बाद जनता के इन तथाकथित हिमायती नेताओं का बयान उन पीड़ितों पर नमक छिडकने जैसा है, जो इसके शिकार हुए हैं| लेकिन सवाल है हर आतंकी घटनाओं के बाद या किसी हादसे के बाद जो राजनीतिक समीकरण दरअसल इस देश मे बनाये जाते हैं और सियासी फ़ायदे ढूंढने की जो कुत्सित कोशिश होती है वह एक सभ्य लोकतान्त्रिक समाज के लिए कहाँ तक जायज है? सच मानिए तो लोकतान्त्रिक समाज कहने का भी मन नहीं करता| आखिर ऐसी परिस्थितियाँ क्यों बनी?
 इस देश के नेताओं की राजनीतिक समझ इसी बात से ज़ाहिर होती है कि वो ३१ महीने तक बम विस्फोट न होना अपने सरकार की उपलब्धि मानते हैं तो दूसरे नेता क्षेत्रवाद के तराजू पर इसे तौलते हैं| मीडिया भी इसे मसाला मारकर प्रस्तुत करता है और बजाये आलोचना के उसे अख़बारों के पहले पन्ने पर जगह मिलती है और न्यूज़ चैनलों की पहली खबर बनती है| जो लोग मारे गए या जो घायल हुए उनके प्रति हमदर्दी या संवेदना के दो शब्द किसी ने नहीं कहे| क्योंकि इसमें आम लोग मारे गए थे| उनकी न तो कोई राजनीतिक पहुँच थी और न ही वे पूंजीपति थे| आम जनता की तथाकथित हितैषी सरकारों की दोहरी मानसिकता का अंदाज़ा सिर्फ इस घटना से लगाया जाता है| जब 26 नवंबर 2008 को उसी मुंबई मे आतंकी हमला हुआ था तो राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री समेत केन्द्रीय गृहमंत्री तक को जाना पड़ा था क्योंकि वह हमला पूंजीपतियों की छाती पर हुआ था| और कहना न होगा कि इस देश मे पूंजीपतियों का अघोषित राज है| आतंक के विरोधी हम भी हैं लेकिन आतंकी घटनाओं पर जनता के साथ दोहरे व्यवहार का कतई समर्थन नहीं किया जा सकता| वह भी आम जनता के द्वारा चुनी गई सरकारों द्वारा|

इस घटना के लिए क्या सरकार जिम्मेदार नहीं है? जिस मुंबई मे ए टी एस, मुंबई पुलिस सहित कई आतंक निरोधी एजेंसियां काम करती हैं वहाँ बार-बार हमला करने मे आतंकी सफल कैसे हो जाते हैं? आखिर आतंकी घटनाओं को रोकने मे हमारा सुरक्षा तंत्र नाकाम क्यों रहता है? क्या यह सवाल जायज नहीं है कि बिना किसी घरभेदिये के किसी भी आतंकी वारदातों को अंजाम नहीं दिया जा सकता? तो फिर वह घरभेदिया कौन है? उसे ढूंढने की जिम्मेदारी किसकी है? आतंक के आकाओं को उसके घर मे घुसकर मारने की राजनीतिक इच्छाशक्ति हमारे अंदर क्यों नहीं है? बाहर की तो छोडिये जो हमारे घर के अंदर हैं उन्हें क्यों जिंदा रखा गया है? अफजल गुरु और कसाब अब तक जिन्दा क्यों है? एक बड़ा सवाल यह भी है कि सुरक्षा एजेंसियों और जाँच एजेंसियों के बीच आपसी तालमेल क्यों नही है? इन  सवालों के जवाब आज हर भारतीय तलाश रहा है| लेकिन जवाब के बदले उसे निराशा हाथ लगती है| इस हताशा और निराशा से विचलित होकर आज का युवा वर्ग अगर अनापेक्षित कदम उठा ले तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? यह इस देश की विडंबना है कि यहाँ कसाब और अफजल जैसे मानवता के हत्यारों के लिए भी मानवीय संवेदनाएं आड़े आती हैं| लेकिन वही मानवीय संवेदना अकाल मौत के शिकार हुए लोगों के लिए नहीं दिखती|
इसलिए सवाल सिर्फ आतंकी घटनाओं मे मारे जाने वाले लोगों का नहीं है सवाल उस नजरिये का भी है जो सरकारों का आम लोगों के प्रति होता है| देश भ्रष्टाचार, काले धन और सियासी चालों मे कौन कितना ताकतवर है, मे फँसा हुआ है राजनीतिक शुचिता की परवाह किसी को नहीं है| आखिरी सवाल ये कि 11 जुलाई 1993,26 नवंबर 2008,13 जुलाई 2011 के बाद अगली तारीख कौन सी होगी?

गिरिजेश कुमार


Wednesday, July 13, 2011

आम जनता में बनी नकारात्मक छवि बदलें देश के नेता

 समाज और देश का नेतृत्व करना सब के वश की बात नहीं होती| यह काम नेताओं का होता है, एक नेता वह होता है जिसके दिमाग मे समाज के विकास की दूरदर्शी योजनाएं होती हैं| उसकी जिंदगी का हर एक मिनट अपने देश की तरक्की और नए मुकाम हासिल करने के रास्तों पर विचार करने मे बीतता है| नेता जी सुभाष चन्द्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आजाद,सरदार बल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री इसी श्रेंणी के अंतर्गत आते हैं| और भी ऐसे कई नाम हैं जो इस श्रेंणी मे आते हैं| लेकिन अफ़सोस कि विरासत मे सौंपी गई इन नेताओं के नेतृत्वरूपी कृतित्व पर चलने वाला आज कोई नेता इस देश मे नहीं है| आज जितने भी नेताओं का चोला पहनकर अपने आप को नेता समझे बैठे हैं उनमे से एक भी ऐसे नहीं हैं  जिन्हें हम नेता कह सकें| ये सभी कुर्सीधारक हैं जो वक्त की नजाकत को देखकर पाला बदल लेते हैं| निजिहित को तवज्जो देने वाले कभी नेता नहीं कहला सकते| त्याग, बलिदान और जनता के दुःख-दर्द मे भागीदार बनना कोई नहीं चाहता इसलिए वर्तमान मे इन चोला धारक नेताओं के हर काम को लोग शक की निगाह से देखते हैं| सवाल है आखिर आम लोगों मे नेताओं की ऐसी छवि क्यों बनी?
दरअसल इसके लिए जिम्मेदार खुद यहीं लोग हैं| नेताओं ने जनता के विश्वासों का ऐसा मजाक बनाया कि जिससे लोग नेता शब्द से ही घृणा करने लगे| राजनीति, समाजिक ढाँचे को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करने का जरिया है लेकिन वर्तमान राजनीतिक पार्टियों और उसके कर्ताधर्ता कुछ नेताओं ने से इसे व्यवसाय बना दिया| ऐसे मे जनहित की बात सोचने वाला कौन है? देश मे 545 सांसदों मे 300 करोड़पति हैं| जिस देश की 70 प्रतिशत आबादी 20 रूपये से कम की रोज की आमदनी पर जिंदा हो उस देश की उसी आबादी का जन प्रतिनिधि करोड़पति है, इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे?
यहाँ हर नेता एक दूसरे की लोकप्रियता का दुश्मन है| कोई नेता अगर आगे बढ़कर जनता के लिए कुछ करना चाहता है, उसके सुख-दुःख का साझीदार बनना चाहता है तो विपक्षी पार्टियों को उसमे सियासी फ़ायदे के लिए सस्ती लोकप्रियता दिखाई देती है| उन्हें लगता है कि इससे उनकी पार्टी का बंटाधार हो जायेगा इसलिए उल जलूल बयान देकर किसी तरह ध्यान हटाया जाये| यहाँ हमाम मे सब नंगे वाली कहावत चरितार्थ होती है ऐसे मे ज़मीन और जनता के लिए संघर्ष करने वाली पार्टी या नेता दिखाई नहीं देते| चुनावी सभाओं मे बड़े-बड़े शब्दों का प्रयोग कर जनता को बरगलाने की कोशिश सभी करते हैं लेकिन हकीकत मे राजनीति की गन्दी चाल चलकर कुर्सी पाना मूल मकसद होता है|
आज देश जिस तरह से अराजक स्थिति मे पहुँच गया है ऐसा कौन दूरदर्शी नेता है जो भविष्य की वास्तविकता को बता सके? जबकि मौलाना अबुल कलाम आजाद ने 1946 मे ही भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के सुगबुगाहट के समय ही पाकिस्तान की स्थिति और भारत पर पड़ने वाले असर की विवेचना कर दी थी| मौलाना कोई ज्योतिषी या भविष्यद्रष्टा नहीं थे लेकिन दरअसल कुर्सीधारकों और नेता मे यही फर्क होता है|  लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान का नारा दिया था, उस समय जब सरकार पर संकट आई तो इन्ही किसानों ने अपने खुद के कमाए पैसे और गहनों से सरकार की मदद की थी लेकिन आज सरकारें खुद किसानों को लूट रहीं हैं,बदले मे  हक मांगने पर  लाठी और गोली मिलती है| इस सच को चाहे आज हम स्वीकार करें या न करें लेकिन जो स्थिति इस देश मे बनी हुई है वह कतई एक सभ्य समाज मे स्वीकार करने योग्य नहीं है|
सवाल यह भी है कि एक दूसरे के नुक्ताचीनी करने मे फंसे देश के नेताओं को  आम जनता मे बनी नकारात्मक छवि को बदलने के प्रयास नहीं करने चाहिए? सच मानिए तो इसी मे उनका और देश का भला है|

 गिरिजेश कुमार

Monday, July 11, 2011

रेल हादसा: मुआवजों से तय होती है जिंदगी की कीमत

 दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क रेल हादसे रोकने मे नाकाम है| जिस रेल से भारत मे प्रतिदिन करीब सवा करोड़ लोग सफ़र करते हैं उनकी सुरक्षा राम भरोसे है और रेलवे उनकी जिंदगी की कीमत मुआवजों से तौलता है| गौरतलब है कि एक ही दिन मे दो बड़े रेल हादसों ने रेलवे की कार्यशैली को एक बार फिर कठघरे मे खड़ा कर दिया है| उत्तरप्रदेश मे मालवां स्टेशन के पास कालका एक्सप्रेस काल बन गई तो असम मे पुरी-गुवाहाटी एक्सप्रेस दुर्घटना ग्रस्त हो गई| कालका एक्सप्रेस दुर्घटना मे  69 लोग मारे जाने की पुष्टि हो चुकी है और तक़रीबन 245 घायल हैं तो पुरी-गुवाहाटी एक्सप्रेस से 70 लोगों के घायल होने की सूचना है| ये आंकड़े बढ़ सकते हैं| लेकिन याद कीजिये तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी ने फ़रवरी मे जब रेल बजट पेश किया था तो कहा था –“रहा गुलशन तो तब फूल खिलेंगे, रही ज़िंदगी तो कामयाबी मिलेगी” लेकिन कालका मेल दुर्घटना मे न तो गुलशन रहा न जिंदगी| इस भयानक मंजर की जो तस्वीरें टेलीविजन स्क्रीन पर आ रही हैं ज़ाहिर है स्थिति उससे भी बुरी है| लेकिन सवाल है हर हादसों के बाद जांच आयोग गठित कर दोषियों को सजा देने की घोषणा करने वाला और लोगों के उजड़े गुलशन को कागज के चंद नोटों से आबाद करने की असफल कोशिश करने वाला रेल मंत्रालय आखिर चेतेगा कब?
एक अनुमान के अनुसार देश में हर साल औसतन 300 छोटी-बड़ी रेल दुर्घटनाएँ होती हैं| आश्चर्य यह कि हर बार जांच के लिए टीम गठित होती है, रिपोर्ट भी आती है लेकिन सबक लेने की कोशिश नहीं होती और न ही दोषियों को सजा मिलती है| दर्द और त्रासदी की इस भयावहता को भुक्तभोगी ही समझ सकता है| सवाल यह भी है कि आम आदमी की सुरक्षा के लिए इस देश मे दरअसल जो रणनीति बनायीं जाति है और जो बजट आवंटित किया जाता है क्या उससे पूर्ण सुरक्षा उपलब्ध कराई जा सकती है? सोचने वाली बात यही है फिर चाहे वह रेल मंत्रालय हो या गृह मंत्रालय|
अपने आप को दुनिया के विकसित देशों की श्रेणी मे खड़ा करने की महत्वाकांक्षा लिए यह देश इंसानी लापरवाही को रोकने मे अबतक सक्षम नहीं हो सका| जबकि यह प्रमाणित तथ्य है कि ज्यादातर रेल हादसे रेलवे कर्मचारियों और अधिकारीयों की लापरवाही से होते हैं| विडंबना यह भी है कि गुलाम देशों के जमघट जिस कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए करोड़ों रूपये की हीलियम गैस गुब्बारों मे भरकर उड़ा दी गई और करोड़ों का घोटाला कर लिया गया उसी पैसों से आजादी के 64 साल बाद भी वह तकनीक इस देश नहीं आ सकी जिससे दुर्घटना के समय तत्काल राहत कार्य चलाकर पीडितों को मदद पहुंचाई जा सके| यहाँ सवाल सिर्फ कालका मेल का नहीं है सवाल रेलवे के उस उदासीनता का है जिससे सबक नहीं लिया जाता और जिसका शिकार हर बार आम निर्दोष लोग होते हैं| एक इंसान की ज़िंदगी की कीमत उसके परिवारजनों के लिए कहीं बड़ी होती है वनिस्पत 5 लाख रूपये के|
हर घटना की तरह ये घटना भी कुछ दिनों के बाद भुला दी जायेगी लेकिन जिन परिवारों मे मौत का मातम फ़ैल चुका है और जिनकी जिंदगी ज़िदा लाश मात्र बनकर रह गयी है उन परिवारों की तरफ देखने की कोशिश कौन करेगा? जिस उत्तरप्रदेश मे यह घटना हुई वहाँ राजनीतिक अराजकता का आलम है, एक तरफ महिलाओं की आबरू सुरक्षित नहीं है तो दूसरी तरफ़ सियासी दाँवपेंच खेला जा रहा है ऐसे मे हादसे के शिकार हुए लोगों की दास्ताँ गम और अफ़सोस के समंदर तले दब जाएँ तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी| लेकिन बड़ा सवाल यही है कि यात्रियों के पैसों से मुनाफे का बाजार खड़ा करने वाला रेलवे यात्रियों की सुरक्षित यात्रा आखिर कब सुनिश्चित करेगा?
ठीक दो दिन पहले मानवरहित फाटक पर ट्रेन और बस की टक्कर की भयावह तस्वीरें अभी लोगों के दिमाग से उतरीं भी नहीं थी कालका मेल हादसा हो गया| यह सच है कि हादसों को पूर्णतः  रोका नहीं जा सकता लेकिन क्या उन्हें कम भी नहीं किया जा सकता? रेल दुर्घटनाओं पर ममता बनर्जी की टिप्पणी थी “हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती” लेकिन जब पूरी अंगड़ाई ही ले ली जाए तो बदनामी से कितने दिनों तक बचा जा सकता है? रेल मंत्रालय सहित रेलवे के तमाम अधिकारी, कर्मचारी इस बात का मंथन करें|

(तस्वीरें livehundustan.com से)

 गिरिजेश कुमार


Wednesday, July 6, 2011

भ्रष्टाचार पर छिड़ी बहस मे कहाँ है आम आदमी?


 भ्रष्टाचार पर जितनी बहस और चर्चाएँ हाल के दिनों मे हुई उतनी देश के इतिहास मे शायद कभी नहीं हुई| लोकपाल, जनलोकपाल, सरकार और सिविल सोसायटी के बीच मतभेद इन तमाम मुद्दों पर पिछले चार महीनों से लगातार चर्चा-बहस हो रही है लेकिन सवाल है जिस आम जनता के लिए ये लड़ाई लड़ी जा रही है वो कितना समझ पाया है? और इस दिशा मे ठोस प्रयास क्या वास्तव मे किये जा रहे हैं? आम जनता जब हम कहते हैं तो उसका सीधा मतलब उन लोगों से होता है जो दूर दराज के क्षेत्रों मे, सुदूर गांवों मे दैनिक मजदूरी या किसी तरह अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं| यकीं मानिये तो भ्रष्टाचार से सबसे ज्यादा प्रभावित यही लोग हैं या कहें कि भ्रष्टाचार का सबसे ज्यादा खामियाजा इन्ही लोगों को भुगतना पड़ता है| लेकिन सच तो यह है कि ये बहस दिल्ली और बड़े शहरों के सुविधासंपन्न और परदे के पीछे से भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले लोगों तक ही सिमित है,आम लोगों तो अभी भी नहीं पता लोकपाल और जन लोकपाल क्या है?  ऐसे मे जड़ से भ्रष्टाचार खत्म करने की और भ्रष्टमुक्त समाज बनाने की जो काल्पनिक रूपरेखाएँ खींची गयी हैं उसके मायने क्या है?
दरअसल विषमताओं और विविधताओं मे बंटा हुआ यह समाज सामाजिक सरोकारों से जुड़े ऐसे तमाम मुद्दों पर ऐसे ही अंतर्विरोध मे फंस जाता है| सियासत, सियासी फायदे और निजी हित के चक्कर मे खुलकर एक पक्ष कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं ले पाती है| सरकार की उदासीनता और गैरजवाबदेह होना इसीकी अगली कड़ी है| ऐसे मे यह साफ है कि लोकतान्त्रिक सरकार अपने कर्तव्यों को भूल चुकी है|   
हालाँकि सच यह भी है कि पिछले बयालीस साल से  जो विधेयक संसद और कार्यालयों की धुल फाँक रहा था अन्ना हजारे ने जब उसकी धुल साफ़ करनी चाही तो बीच मे सरकार ने अड़ंगा लगा दिया| एक तरफ कांग्रेस चीख-चीख कर यह कह रही है कि हम भ्रष्टाचार के विरुद्ध हैं और दूसरी तरफ उसकी सरकार एक ठोस कानून नहीं बनने देना चाह रही क्योंकि उसे लगता है इससे उसके अपने ही हाथ बंध जायंगे लेकिन बहाना संसदीय लोकतंत्र पर खतरे का है| सरकार की इस दोहरी नीति को बेनकाब करने और जनता को उसकी चालों को समझाने की जिम्मेदारी विपक्षी पार्टियों का होता है लेकिन देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी भाजपा अपने स्वार्थ के कारण बिल पर अपनी राय भी स्पष्ट नहीं कर पायी है| इसलिए  सवाल सिर्फ भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए जनलोकपाल बिल लाने या सरकार और सिविल सोसायटी के बीच असहमति का नही  है सवाल है आम जनता को राहत देने का या कहें कि उसकी समस्याओं को दूर करने का या भ्रष्टमुक्त समाज बनाने का जो हुनर इस देश मे अपनाया जा रहा है, उसमे आम आदमी फिट होता कहाँ है?
 
आशंकाएं सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों से भी हैं| तक़रीबन ४ महीने पहले इसी आंदोलन को राजनेताओं और राजनीतिक पार्टियों से बिल्कुल दूर रखा गया था और यह नजारा पूरी दुनिया ने देखा था कि किस तरह नेताओं को हूट किया जा रहा है लेकिन वही अन्ना हजारे आज राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं की शरण मे देखे जा रहे हैं| सवाल है क्यों? मुझे लगता है जितना समय निहित स्वार्थी पार्टियों पर खर्च किया जा रहा है उतना ही समय आम जनता के बीच खर्च किया जाए तो हम उस उद्देश्य को प्राप्त कर सकते हैं जिसके लिए ये कवायद हो रही है| हर आंदोलन के विरोधी होते ही हैं लेकिन यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम उनको कितना स्पेस देते हैं| इसलिए ज़रूरत इस बात की भी है अपने विरोधियों मे न उलझ कर उस आम जनता को इसका वास्तविक अर्थ समझाया जाये जो अभी तक इससे महरूम है बाकी बहस बाद मे भी हो सकती है|

गिरिजेश कुमार

Friday, June 24, 2011

भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लोगों का गुस्सा पैदा कर सकता है अराजक स्थिति

  कल आधी रात के बाद मेरे मोबाईल पर एक मेसेज आया –“मेरे पापा के ऑफिस का क्लर्क, जी पी एफ अकाउंट खोलने का 300 रूपये मांग रहा है| क्या करें?” मैंने जवाब दिया “उस क्लर्क के मुँह पर थप्पड़ मारिये और निगरानी विभाग, पटना को सूचित कर दीजिए|” थोड़ी देर बाद उसी व्यक्ति का पुनः मेसेज आया “आप उसे 300 रूपये दे दीजिए, क्योंकि जी पी एफ अकाउंट खोलने का रेट अभी यही चल रहा होगा” ये उसी सवाल का किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा दिया गया जवाब था| जी , हमारे देश में ज्यादातर लोगों की मानसिकता ऐसी ही हो चुकी है| उन्होंने इस अपनी जिंदगी का हिस्सा मान लिया है| भ्रष्टाचार की जड़ दरअसल यहीं से शुरू होती है| ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि अन्ना हजारे जिस घुन के  दवा की मांग कर रहे हैं, जंतर-मंतर के घोषित अनशन को आजादी की दूसरी लड़ाई कह रहे हैं क्या वह इस मानसिकता को बदल सकती है? ऐसे में अगर अन्ना हजारे जंतर-मंतर पर अनशन करते हुए मर भी जाएँ तो क्या भ्रष्टाचार खत्म हो पायेगा? सीधा और टका सा ज़वाब है- नहीं| सवाल यह भी है कि जिस तरह से पूरी व्यवस्था घुन की तरह सड़ चुकी है उसकी दुर्गन्ध को सिर्फ एक कानून बनाकर कैसे दूर किया जा सकता है?
एक तरफ ये सारे मुद्दे हैं, अंतर्विरोध है आशंकाएं हैं तो दूसरी तरफ केन्द्र सरकार का तानाशाही रवैया सामने आ रहा है| भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उसकी गंभीरता जगज़ाहिर हो चुकी है| इसलिए सवाल सिर्फ यही नहीं है कि केन्द्र सरकार को अन्ना हजारे और उनकी टीम की बात मान लेनी चाहिये या नहीं सवाल यह भी है कि भ्रष्टाचार को रोकने के जिस विधेयक की मांग आज अन्ना हजारे सहित देश के तमाम लोग कर रहे हैं, ऐसा ही कोई ठोस कानून पिछले बयालीस सालो में क्यों नहीं बन सका?
समझना यह भी पड़ेगा कि भ्रष्टाचार के आखिर मायने क्या हैं? 2G, सी ए जी, राष्ट्रमंडल खेल और आदर्श सोसायटी जैसे बड़े घोटाले, जिसमे सरकार के बड़े-बड़े मंत्री सहित कई अफसर शामिल पाए गए, या निचले स्तर से छोटे मोटे घोटाले, जिसमे एक दलाल से लेकर लाल बत्ती वाले अफसरों की भागीदारी होती है? इसे परिभाषित करने की ज़रूरत है| क्योंकि आम लोगों को काम सुरेश कलमाड़ी और कनिमोंझी जैसे लोगों से नहीं प्रखंड स्तर, या पंचायत स्तर पर छोटे सरकारी दफ्तरों से पड़ता है|
भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी खामी यह है कि वह सिर्फ अपने हित देखता है, जनहित या राष्ट्रहित बाद में और शायद देखता भी नही है| भ्रष्टाचार और सशक्त लोकपाल जैसे मुद्दों पर दलीय राजनीति से ऊपर उठकर इसलिए हमारे देश की राजनीतिक पार्टियां सोच नहीं  पा रही| सरकार और सिविल सोसायटी के बीच की बातचीत का हश्र पहले ही बैठक के बाद से लगभग नजर आने लगा था| सरकार की मंशा को समझना ज़रुरी है| भला अपने लिए कोई कब्र खोदता है क्या? हम यह नही समझ पा रहे कि भ्रष्टाचार के खिलाफ इस लड़ाई को कांग्रेस विरोधी क्यों समझा जा रहा है? एक लोकतान्त्रिक समाज में सिविल सोसायटी और सरकार बार बार सामने आये यह ज़रुरी नहीं है लेकिन यह ज़िम्मेदारी सरकार की भी है वह ऐसी नौबत न आने दे|
दूसरी तरफ़ सरकार के विरोध में जो गुस्सा आम लोगों में है व उग्र रूप लेकर कहीं ऐसा न हो कि हिंसक और अराजक स्थिति में पहुँच जाए|अन्ना हजारे ने जो भरोसा दिलाने की कोशिश की है उसके टूटने में अगर केन्द्र सरकार आड़े आती है तो निश्चित ही वह स्थिति एक सभ्य समाज के लिए ठीक नहीं होगी| बाकी बहस तो बाद में भी हो सकती है लेकिन पहले एक कानून बनने दिया जाने चाहिए था|
हालाँकि जिस तरह से तक़रीबन दो महीने पहले हुए आंदोलन में संसदीय राजनीति के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे उससे यह सवाल भी उठता है कि कहीं लोग इस वर्तमान लोकतान्त्रिक संसदीय व्यवस्था से उब तो नहीं चुके हैं? अगर ऐसा है तो वाकई चिंता की बात है| 

डेली न्यूज़ एक्टीविस्ट मे प्रकाशित



गिरिजेश कुमार

Wednesday, June 22, 2011

पटना विश्वविद्यालय: छात्रों के भविष्य के साथ क्यों हो रहा है खिलवाड़?

पटना विश्वविद्यालय एक बार फिर सुर्ख़ियों में है| किसी शोध कार्य के लिए या तरक्की के लिए नहीं बल्कि छात्रों के उग्र प्रदर्शन और अराजकता के लिए| ताज़ा मामला स्नातक की सीटों को घटाने को लेकर है जिसके विरोध में छात्र संगठन और विश्वविद्यालय प्रशासन आमने-सामने है| सीटें टाने को लेकर सरकार का तर्क है छात्र वोकेशनल कोर्स को तवज्जो दे रहे हैं इसलिए स्नातक की सीटें घटा दी गई| हालाँकि विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र संगठनों का आमने-सामने होना कोई नई बात नही है लेकिन सवाल है उच्च शिक्षा के विकास, और मानव संसाधन के सही उपयोग का जो हुनर विश्वविद्यालय और राज्य सरकार अपना रही है उसमे छात्र फिट होता कहाँ है? छात्रों के हितों के साथ खिलवाड़ करके विश्वविद्यालय उनकी ढ़ाई पर ही पाबंदी लगाने पर क्यों तुला हुआ है? उच्च शिक्षा को बर्बाद करके सरकार आखिर विकास की कौन सी लकीर अपने नाम खींचना चाहती है? कभी महान शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों को पैदा करनेवाला यह विश्वविद्यालय आज विवाद, अराजकता, और हताशा का केंद्रबिंदु बना हुआ है लेकिन राज्य सरकार बिहार विकास कर रहा है कि ऐसी कुम्भकर्णी नींद में सोयी हुई है कि उसे धुप, गर्मी और बरसात में एडमिश के लिए भटकते छात्र दिखाई ही नहीं देते|
इस बार इंटर का रिजल्ट अच्छा होने और पिछले साल के कट ऑफ मार्क्स में दो से तीन फीसदी बढ़ने की संभावन से छात्रों के एडमिशन कराना वैसे भी आसान नही था सीटों की संख्या घटाने के बा यह और भी मुश्किल हो गया है|
Patna university senate
बिहार सरकार के मानव संसाधन विभाग के सचिव अंजनी कुमार सिंह एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर जोर देते हैं| उच्च शिक्षा को और सुदृढ़ और व्यवस्थित बनाने की बात करते हैं लेकिन दूसरी तरफ छात्रों के भविष्य से ही खिलवाड़ करते हैं| सरकार की इस दोहरी मानसिकता को समझने की क्षमता कितने लोगों में है? मनुष्य निर्माण और चरित्र निर्माण का केन्द्र विश्वविद्यालय अराजक स्थिति में पहुंचकर गुंडे, मवाली निर्माण केन्द्र में तब्दील हो जाये ऐसा कौन चाहेगा? लेकिन जो स्थितियां सरकार और विश्वविद्यालय पैदा कर रहा हैं ऐसे में अगर छात्र उग्र होकर पुरे सिस्टम को चुनौती देने पर उतारू हो जाएँ और हिंसक रूप अख्तियार कर लें तो इसकी ज़िम्मेदारी किसकी होगी?
दरअसल सच यही है कि विश्वविद्यालय आज सिर्फ डिग्री देने की दुकान है जहाँ छात्र उसकी उचित कीमत चुकाकर प्राप्त करते हैं| शिक्षा का मूल उद्देश्य तो बाजारवादी सोच में कहीं खो चुका है| फीस वृद्धि, छात्र संघ का चुनाव, एकेडेमिक कैलेंडर जारी करने, साल में 180 दिन पढ़ाई की गारंटी करने जैसे छात्रहित से जुड़े विषयों पर लंबे समय से लड़ाई चल रही है लेकिन इसपर सरकार और विश्विद्यालय ने कभी ध्यान देने की ज़रूरत नही समझी| हर साल विश्वविद्यालय की गलतियों का खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ता है| सवाल यह भी है कि बार बार छात्र संगठन और विश्वविद्यालय को आमने सामने आने की ज़रूरत क्यों पड़ती है? जबकि यह प्रमाणित तथ्य है कि विश्वविद्यालयों में छात्र संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है| सरकार की उदासीनता के कारण शिक्षा पहले ही बाजारू माल में तब्दील हो चुकी है रही सही कसर भी पूरी करने में कोई कोताही नहीं बरती जा रही है| बड़ा सवाल यही है कि उच्च शिक्षा में दिन--दिन गिरावट और विश्वविद्यालयों की ऐसी स्थिति में सुधार के प्रयास क्यों नही किये जाते? समाज के प्रबुद्ध लोगों की चुप्पी समझ से बाहर है
                                                
                                  पहले घटाई गई, अब भेजा गया बढ़ाने का प्रस्ताव
गिरिजेश कुमार

Sunday, June 19, 2011

हम वर्चुअल दुनिया में जीना क्यों पसंद करते हैं?

एक जमाना था जब बच्चों के अंदर पिता का खौफ़ रहता था| और बच्चे पिता की मर्ज़ी के खिलाफ कुछ करने की हिम्मत नहीं रखते थे| बच्चों के भविष्य के लिए यह अच्छा भी था तो खराब भी| गलत न करने की डर और खौफ़ से एक तरफ बच्चे अंतर्मुखी स्वभाव के बन जाते थे तो दूसरी तरफ़ यह उसे अपने ही द्वारा उठाये गए क़दमों पर विचार करने को मजबूर करता था| बदलते दौर में यह स्थिति बदली| बच्चों के मन से पिता का खौफ़ दूर हुआ और मित्रवत व्यवहार ज्यादा होने लगा| हालाँकि समाज की बेहतरी के लिए यह स्थिति अच्छी थी लेकिन इसके बुरे परिणाम ज्यादा देखने को मिलते हैं| खुलेपन के आदि युवा धीरे-धीरे समाज, परिवार से कटकर इन्टरनेट और तकनीक की वर्चुअल दुनिया में जीना पसंद करने लगे| आज फादर्स डे पर इस बात की चर्चा इसलिए क्योंकि जिस उद्देश्य और जिस भावना के साथ 19 जून 1910 को वाशिंगटन के स्पोकेन शहर की एक महिला ने इसकी शुरुआत की थी और इसके 14 साल बाद वाशिंगटन के राष्ट्रपति ने इसे हर वर्ष मनाने की घोषणा की थी वह भावना आज नहीं दिखती| हम फेसबुक, ऑरकुट और ऐसे ही सोशल साइट्स पर दोस्तों को इलेक्ट्रोनिक कार्ड भेजकर या मोबाइल पर मेसेज भेजकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ बैठते हैं| जबकि हकीकत तो यह है कि जितना प्यार, समर्पण, आदर इन वर्चुअल दुनिया में दिखता है, उनकी वास्तविक जिंदगी उतनी ही कड़वी, कर्कश और दुखदायी होती है| गंभीर सवाल यह है कि क्या फादर्स डे इलेक्ट्रोनिक ग्रीटिंग्स, दिल को छू लेने वाले मैसेज और एक दूसरे को विश् कर देने तक ही सीमित है?

हालाँकि यह भी सच है कि माँ-बाप के प्रति प्यार को प्रदर्शित करने के लिए कोई खास दिन की ज़रूरत नहीं होती| हमारा भारतीय समाज भी इस विषय पर दो वर्गों में बंटा हुआ है, एक वर्ग समर्थन करता है तो दूसरा विरोध, लेकिन यहाँ हम इस दिवस के औचित्य पर चर्चा करना ज़रुरी नहीं समझते| लेकिन भावनाओं के जिस बंधन में बंधकर हमने माँ-बाप के प्यार के उस निहितार्थ को समझा और उनके लिए एक खास दिन उपहार स्वरुप देने की सोची उसके इस हश्र पर चिंतित ज़रूर हैं| कहीं हम अपने सामाजिक उसूलों और मूल्यों को दरकिनार कर अस्तित्वहीन और आधारहीन दुनिया में तो नहीं जी रहे? सामाजिक आदर्शों की बलि आखिर हम क्या पाना चाहते हैं? और क्या हाइटेक होने की यही परिभाषा है? ये ऐसे सवाल हैं जिनका ज़वाब ढूँढना ज़रुरी है|

Father's Day

हेल्प एज इंडिया संस्था के द्वारा एल्डर एब्यूज एंड क्राइम इन इंडिया नामक सर्वेक्षण के शनिवार को जारी रिपोर्ट पर अगर गौर किया जाए तो इसके अनुसार निचले सामाजिक आर्थिक परिवेश में 63.4 प्रतिशत मामलों में पुत्रवधुएँ वृद्धों से दुर्व्यवहार करती हैं जबकि 44 प्रतिशत मामलों में बेटे वृद्धों से दुर्व्यवहार करते हैं| यह स्थिति उच्च सामाजिक आर्थिक परिवेश में भी पायी गई| दिल्ली, मुंबई हैदराबाद, चेन्नई जैसे बड़े शहरों में वृद्धों के साथ मौखिक दुर्व्यवहार 100 प्रतिशत है| जबकि पटना जैसे अपेक्षाकृत छोटे शहरों में शारीरिक दुर्व्यवहार सबसे अधिक 71 प्रतिशत है| इस सर्वेक्षण में यह बात भी सामने आई कि पुत्रों पर निर्भर रहने के कारण वृद्ध महिलाऐं सबसे जयादा दुर्व्यवहार की शिकार होती हैं| राष्ट्रीय स्टार पर 70 वर्ष से अधिक वृद्धों के मामलों में दुर्व्यवहार के मामले सबसे अधिक हैं|यह सर्वेक्षण देश के 9 शहरों में किया गया था| अगर यह स्थिति है तो वाकई चिंताजनक है|

दरअसल हमारे देश की सामाजिक संरचना पिछले कुछ दिनों में ऐसी बन गयी है कि हममें पश्चिमी सभ्यता के नकारात्मक चीजों को अपनाने की होड़ सी लग गई है| हम उनसे आगे निकलना तो चाहते हैं लेकिन इतनी जल्दबाजी में कि सही रास्तों की तलाश भी ज़रुरी नहीं समझते| जिसके परिणामस्वरुप हम खुदगर्ज, स्वार्थी और आत्मकेंद्रित बन जाते हैं| और हमें विरासत में बुजुर्गों से मिले संस्कार भी याद नहीं रहते| आज संयुक्त परिवार की संकल्पना टूट चुकी है| एकल परिवार की सबसे बड़ी खामी यही है कि उसकी जिंदगी पत्नी और बच्चों तक ही सीमित हो जाती है ऐसे में बूढ़े माँ-बाप और रिश्तेदारों की फ़िक्र किसे है? वृद्धाश्रमों की बढती संख्या और उसमे बढते वृद्धों की संख्या इस बात की प्रमाण हैं| आखिर में एक सवाल यह कि पिता को समर्पित इस दिन क्या हम्म यह संकल्प लेंगे कि सिर्फ़ वर्चुअल ही नहीं वास्तविक जिंदगी में भी हम अपने बुजुर्गों का सम्मान करेंगे? फादर्स डे मनाने का असली मकसद तभी पूरा होगा|

गिरिजेश कुमार