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Tuesday, March 27, 2012

मानवता की हत्या के साथ-साथ रिश्तों का भी क़त्ल!

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ये रिश्तों का क़त्ल  है!

“वो लोग जबरदस्ती गाडी में बैठ गए। उसके बाद सब सामान माँगने लगे और फिर आंटी(Aunty) को बगल की गली में जाने कहा फिर मार दिया” यह बयान है चार साल के उस बच्चे का जिसकी आँखों के सामने उसकी आंटी का पहले सामूहिक बलात्कार किया गया, फिर हत्या कर दी गयी। खौफ और डर से परेशान चेहरे से निकली उस बच्चे की आवाज जब कानों तक पहुँचती है तो अनायास ही मन करुणा और व्यवस्था के प्रति आक्रोश से भर जाता है। प्रशासनिक लापरवाही का इससे बड़ा उदहारण और क्या होगा कि इस घटना के बारह घंटे बीत जाने के बाद भी एफ आई आर दर्ज नहीं हुई थी। प्रशासन के आला अधिकारी घटनास्थल कभी जमुई जिले के अंतर्गत बता रहे थे तो कभी लखीसराय जिले के अंतर्गत। हत्या, लूट और बलात्कार इनमें से कोई एक घटना अगर किसी के साथ हो जाए  तो पहाड़ टूटने के सामान होता है लेकिन यहाँ तो तीनों घटना एक ही परिवार के साथ घटी थी। मजबूर और लाचार उस व्यक्ति की हालत क्या होगी इसकी सिर्फ़ कल्पना की जा सकती है। लेकिन सवाल है लड़ा किससे जाए  झूठी सरकार से, बेशर्म प्रशासन से, समाजहित का चोला पहने मीडिया से या रूठी किस्मत से?  
बीते रविवार की देर रात जब झारखण्ड का परिवार राजगीर के ऐतिहासिक स्थलों को देखकर वापस लौट रहा था तो उसने इस बात की कल्पना भी नहीं की होगी कि इस ऐतिहासिक सुंदरता का बखान वह अपने परिजनों से नहीं कर पाएँगे। उनकी गलती बस इतनी थी कि नीतीश सरकार के परिवर्तित बिहार की जो झूठी पहचान पूरे देश में बनाई गयी है, उसकी सच्चाई से वाकिफ़ नहीं थे या कहें कि उसके झाँसे में आ गए था। बिहार के जमुई जिला अंतर्गत जमुई-लखीसराय सड़क पर कुछ गुंडों ने जबरदस्ती कार को रोककर झारखण्ड के एक व्यवसायी परिवार के साथ लूटपाट की और परिवार की महिला के साथ सामूहिक बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी गयी। बेबस, लाचार परिवारवाले गनपॉइंट पर खड़े होकर इसे देखने को विवश थे। तो कानून व्यवस्था में सुधार का दावा करने वाली पुलिस सोयी हुई थी। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सुबह जब पुलिस का एक अधिकारी अस्पताल पहुँचा तो उसने एफआईआर रिपोर्ट भी नहीं पढ़ी थी। और घटना के चौबीस घंटे से ज्यादा बीत जाने के बाद भी बलात्कार की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पायी थी। कई सवाल मुँहबाए खड़ी है, जवाब देनेवाला कोई नहीं। भुगते वो जिसके सर पर ग़मों का पहाड़ टूटा। आज मानवता हारी नहीं, मर गयी।
स्तब्ध करने वाली यह घटना सीधे-सीधे राज्य सरकार की विफलता और उसके झूठे दावों की पोल खोलती है। अफ़सोस यह भी है राजनीति की जो पूँजी हमारे पास थी वह पूँजी की राजनीति में तब्द्दील हो चुकी है। आम लोग आखिर भरोसा किसपर करें? लोकतंत्र अगर मजबूर तंत्र में तब्दील हो जाए तो अन्याय और अत्याचार के खिलाफ़ आवाज कौन उठाएगा? जो घटना हमारी संवेदनशीलता को झकझोरती हैं और संवेदनहीनता उजागर करती हैं उसपर समाज के हित के लिए लड़नेवाली मीडिया की चुप्पी आश्चर्यजनक है।
मानवता, मनुष्यता, और व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश से भर देने वाली इस घटना की तपिश न तो प्रशासनिक तंत्र महसूस कर रहा है और न ही लोग। मानवीय संवेदना और इंसानी रिश्ते को झकझोर कर रख देने वाली इस घटना के दर्द को महसूस कर रहा हर व्यक्ति आज शर्मिंदा है। सवाल यह भी है कि जमुई जैसी घटना किसी मंत्री, विधायक, सांसद या अफसर के रिश्तेदारों के साथ क्यों नहीं घटती? क्यों बार-बार वही आम इसका शिकार होता है? मुख्यमंत्री घटना के दूसरे दिन तक रिपोर्ट मंगा रहे हैं तो दूसरी तरफ कार्रवाई का भरोसा दिया जा रहा है। लेकिन जिस भरोसे का क़त्ल राज्य सरकार और उसकी पुलिस ने किया उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? अपराध को रोका नहीं जा सकता लेकिन अपराधी बेख़ौफ़ क्यों हैं? इसका जवाब कौन देगा? और सबसे बड़ा सवाल क्या पीड़ितों को इंसाफ मिलेगा? शायद ये पूछना ही बेवकूफी है।

इस  कथित हत्याकांड में एक नया मोड़ आ गया है। कहा जा रहा है कि महिला के पति ने ही एक साजिश के तहत हत्या को अंजाम दिया। इसके लिए उसने बकायदा अपराधियों को सुपारी दी थी। चचेरी साली से अवैध सम्बन्ध को हत्या का कारण बताया गया है। उक्त जानकारी लखीसराय की एसपी ने प्रेस कांफ्रेंस में दी हैं। जाँच अभी जारी है। हालाँकि लोग इसे घटना की लीपापोती बता रहे हैं। सबसे पहले ऐसा आरोप मृत महिला के भाई ने लगाया था। इस सम्बन्ध में मृतक के पति समेत तीन लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। महिला का नाम सुमन है। (तारीख -31/03/12)  
गिरिजेश कुमार

Friday, March 23, 2012

अधूरा है देश के नायकों का सपना!

किसी भी देश की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने नायकों को किस तरह से याद करता है भारत ही नहीं बल्कि विश्व इतिहास में देश के लिए त्याग और बलिदान के प्रतीक शहीद-ए-आजम भगत सिंह किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं। अंग्रेजों के साम्राज्य विस्तार की नीतियों और पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ भगत सिंह एक मजबूत चट्टान के रूप में खड़े हुए थे। भारतीय इतिहास  में 23 मार्च 1931 का दिन बड़े ही श्रद्धा और आदर के साथ याद किया जाता है। यही वह दिन था जब दुनिया ने देखा कि हिन्दुस्तानी देश के लिए किस तरह से अपना सबकुछ कुर्बान कर देते हैं। लेकिन क्या इस कुर्बानी को हम सहेज कर रख पाए हैं? हर साल शहीदी दिवस के दिन फूल मालाएँ चढाकर औपचारिकताएं पूरी करते वक्त यही वो सवाल है जो हमें सोचने को मजबूर करता है। इससे भी बड़ा सवाल ये है कि आखिर शहीदों की शहादत अपने ही देश में वन्दनीय क्यों है?   
28 सितम्बर 1907 को पंजाब के लायलपुर में जन्मे भगत सिंह का पूरा परिवार ही  आजादी आंदोलन के संघर्षों में सक्रिय था। भगत सिंह के अंदर देशभक्ति की भावना इसी पारिवारिक माहौल का ही नतीजा थी। लेकिन अफ़सोस कि जिस व्यक्ति के नाम लेते ही हजारों लोगों की आँखें नाम हो जाती हैं,  उनके क्रान्तिकारी विचारों से प्रभावित होकर लाखों लोग सड़कों पर अन्याय और अत्याचार के खिलाफ उतर आते हैं उन्हें भुलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है  आज जिन विचारों की देश को सबसे ज्यादा ज़रूरत थी उन्ही विचारों को जड़ से मिटाने की कोशिशें हो रही हैंवर्तमान में जबकि देश में आर्थिक असमानता दिन ब दिन बढती जा रही है, घोटाले, भ्रष्टाचार और लूट में पूरा देश लिप्त है, आपसी भेदभाव पूरे समाज को पीछे धकेल रहा है,  आम लोग चाहकर भी विरोध में आवाजें नहीं उठा पाते, लोग असंगठित होकर लड़ तो रहे हैं लेकिन उनकी आवाज़ कहीं दब कर रह जाती है ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भगत सिंह और उनके साथियों की क्रान्तिकारी  विचारधारा एक नई ऊर्जा प्रदान करती है।  अन्याय और अत्याचार के खिलाफ मजबूत विचारों से लैस होकर जहाँ ज़रूरत थी एक संगठित संघर्ष की वहीँ समाज में लोग हताशा और निराशा की ज़िन्दगी जी रहे हैं। अवसाद से ग्रसित होकर लोग आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम भी उठा रहे हैं, जिसका खामियाजा पूरा समाज भुगत रहा है। भगत सिंह के बहाने सामाजिक व्यवस्था पर सवाल इसलिए क्योंकि जिन मुश्किल परिस्थितियों में भगत सिंह और उनके साथियों ने अपनी जीवटता प्रदर्शित की वह हालात से टूटते हुए इंसानों  को रास्ता दिखाने के लिए काफी था। लेकिन उनके वीरता की चर्चा  सिलेबसों में तो नहीं ही दिखती, उलटे उनके विचारों को फैलने से रोकने के लिए तमाम षड्यंत्र रचे जाते हैं। देश के महापुरुषों की इस वन्दनीय स्थिति से हमें शर्मिंदगी महसूस होती है।  भगत सिंह जिस साम्राज्यवादी व्यवस्था के खिलाफ लड़ते रहे आज हमारी व्यवस्था उसी साम्राज्यवाद की पिछलग्गू बन गयी है
भगत सिंह के विचारधारा रूपी सच को छुपाने की कोशिश की जा रही है। आज आज़ादी के इतने सालों बाद भी  उनके विचारोंं की प्रासंगिकता कायम है समाज और देश के विकास की गहरी समझ और
कार्ययोजना उनके अंदर विकसित थी। लेकिन  उनकी जीवनी दुर्लभ दस्तावेज़ का रूप ले चुकी है जिसका जिम्मेदार शासन तंत्र है। कहीं न कहीं शासकों को इस बात का भय है कि अगर भगत सिंह की विचारधारा से प्रभावित होकर लोग जागरूक होकर इस भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ एकत्रित हो गए तो फिर उस क्रांति को रोकना किसी भी सरकार के लिए संभव नही होगा। हालाँकि भगत सिंह को याद करने की सार्थकता तभी है जब हम उनके विचारों को अमल में लायें और भारत को एक समाजवादी गणतंत्र बनाने की पहल करें। क्या अपनों तक सीमित समाज देश रत्न के प्रति अपने रवैये को बदलेगा?
गिरिजेश कुमार

Thursday, March 8, 2012

अपनी पारंपरिकता खोती होली!

अपनी पारंपरिक सुंदरता और खुशियों के मिश्रण का विहंगम संगम, होली आज बदरंग हो चुकी है। अगर कुछ बचा है तो वह है परम्पराओं के नाम पर रिवाजों को ढोने की मज़बूरी और धार्मिक आस्था, जिसे मानव समाज छोड़ नहीं सकता। एक वह समय होता था, जब होली की खुमारी फागुन के पूरे महीने रहती थी। फाग गाने से लेकर एक दूसरे को अबीर गुलाल लगाने की औपचारिकता तो अभी भी है लेकिन वो चीजें नहीं दिखती जब होली के सामाजिक मायने होते थे। होली का मतलब पुरानी दुश्मनी को भुलाकर एक नये रिश्ते की शुरुआत होती थी। मुझे अभी भी याद है गाँव की गलियों में हुल्लड़ मचाती युवकों की टोली और रंग से बचने के लिए भागते लोग। उस समय मैं बच्चों की श्रेणी में आता था जिसकी अलग टोली होती थी। गाँव के बुजुर्गों को चिढ़ाने से लेकर गाली सुनने का एक अलग ही अनुभव होता था। होली सिर्फ़ होली के दिन ही नहीं खेली जाती थी उसके लगभग एक सप्ताह पहले और एक सप्ताह बाद तक होली खेली जाती थी। परन्तु आज अपनों तक सीमित सामाजिक अवधारणा और एकल परिवार ने सब गुड़ गोबर कर दिया है। अपार्टमेंटल संस्कृति में लिप्त पूरा समाज अपने मूल को खोकर सिर्फ़ दिखावों तक सीमित रह गया है। शहरी संस्कृति भले ही विकास और समृद्धि की परिचायक हो लेकिन जो चीज़ हमें जड़ से अलग करती है वह है अनजानापन। नरमुंडों के बीच दिखावटी अपनापन तो है लेकिंन इंसानी रिश्ते नहीं दिखते। सब एक दूसरे की तरक्की और अमनचैन के दुश्मन बने हुए हैं। होली के बहाने मानवीय संवेदनाओं पर सवाल इसलिए क्योंकि मनुष्य उस सामाजिक समरसताओं का प्रतिनिधित्व करता है, जिसका उदाहरण दुनिया के दूसरे जीवों में नहीं मिलता।
आज होली इलेक्ट्रोनिक ग्रीटिंग कार्ड्स और वर्चुअल दुनिया तक सीमित होकर रह गयी है। पहले घर से दूर रहने वाले लोग होली के अवसर पर इकठ्ठा होते थे। इसकी तैयारी पहले से ही होती थी। संयुक्त परिवार का कांसेप्ट था। आज अगर कोई चीज़ कचोटती है तो वह यही है। मेरे मोबाईल पर सुबह से कई मेसेजेज आ चुके हैं। यही हाल फेसबुक पर और दूसरे सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर है। लेकिन सवाल है अपनी वास्तविक सुंदरता और अपनेपन को खोकर जिस होली को हम मना रहे हैं उसके मायने क्या हैं?
आज लोग घरों से बाहर निकलने से डरते हैं। हर तरफ़ एक आशंका, डर और अनहोनी की चिंता सताए रहती है। न जाने किस दरवाजे से अकस्मात कुछ ऐसा हो जाए जिसकी कल्पना भी नहीं की हो। शक के बढते दायरे और विश्वास की कमी इतनी घरी पैठ बना चुकी है कि अगर कोई लड़की इस सामाजिक तानेबाने को तोड़कर सड़कों पर मस्ती में झूमते दिख गई तो ये तथाकथित आधुनिक समाज संस्कृति का ताना देने लगेगा। घटिया मानसिकता के बढते प्रभाव के बीच हम इस समाज को आधुनिक कैसे कहें, बड़ा सवाल यही है।
होली में पारंपरिक गीतों और अबीर गुलाल के बीच मस्ती में झूमते हुए लोग होते थे। आज उनका स्थान अश्लील और भौंडे गीतों ने ले लिया है। बेहूदे तरीके से कैमरे के सामने नाचते हुए युवक-युवतियां। आश्चर्य है कि इसी समाज को इसमें संस्कृति का कोई खतरा दिखाई नहीं देता। सभ्यता और संस्कृति कि दुहाई देकर समाज को तोड़ने का काम हो रहा है। हालाँकि सवाल यह भी है कि इस सामाजिक  विभत्सता को देखने लायक आँख और समझने लायक मन आज कितने लोगों में है?
दरअसल अपने कर्तव्य पथ से विमुख हमारा समाज इन्ही चीजों में खुश है। यहाँ न तो होली या किसी भी त्यौहार के मूल रूप को खोने की कोई बेचैनी दिखती है और न ही इस समाज को जरा भी अफ़सोस होता है। तो फिर जिम्मेदारी कौन लेगा?
गिरिजेश कुमार

Wednesday, March 7, 2012

फिर हिली धरती


क्या हम किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहे हैं?

मैं जिस बिल्डिंग में रहता हूँ वह कतई भूकंपरोधी नहीं है। ज़ाहिर है, अगर तेज झटके वाला  भूकम्प आया तो इन पंक्तियों का लेखक भी उस त्रासदी का शिकार हो सकता है। कल एक बार फिर देश के कई शहरों में भूकंप ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। देश के पाँच राज्यों में हुए चुनाव की चहल-पहल, राजनीतिक समीकरण, सरकार बनाने के लिए गठजोड़ और हार जीत के कयासों के बीच भले ही यह खबर कहीं दब गयी लेकिन इसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। ठीक है कि यह भूकंप सिर्फ़ 4.9 तीव्रता का था जो आमतौर पर खतरनाक नहीं होता है। लेकिन प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता की कमी जो अफरातफरी पैदा करती है , और जो नुकसान की सबसे बड़ी वजह होती है, उसपर विमर्श कौन करेगा? आमतौर पर यहाँ लोग इस बात से अनभिग्य होते हैं कि जब भूकंप आए तो क्या करना चाहिए? हमारा प्रशासनिक तंत्र इतना मजबूत नहीं है कि ऐसी विपरीत स्थितियों में तत्काल राहत और बचाव का कार्य शुरू किया जा सके। यह स्थिति सिर्फ़ राजधानी पटना की है ऐसी बात नहीं है, देश में सभी जगहों के हालात कमोबेश एक से हैं। और यह बात पिछले 15 फरवरी को दिल्ली में हुए मॉक ड्रिल में खुलकर सामने आ चुकी है। तो क्या हम किसी बड़े हादसे का इन्तजार कर रहे हैं? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बार-बार हिलती धरती और उससे होने वाले नुकसान का अंदाज़ा होते हुए भी इसपर कोई ठोस कार्ययोजना तथा उसे अमल में लाने के प्रयासों पर कोई चर्चा नहीं होती।  
पिछली बार जब 18 सितम्बर की शाम धरती हिली थी, जिसके झटके पूरे उत्तर भारत में महसूस किये गए थे, यह सवाल तब भी उठा था। यह सवाल तब भी उठा था जब 26 जनवरी 2001 को गुजरात भूकंप से तबाह हो गया था। और यह सवाल कल भी उठा, परन्तु स्थितियां न तो तब बदली और न ही आज। आनेवाले समय में इसे बदलने की उम्मीद कितनी है, पता नहीं! लेकिन इन सबके बीच सवाल यह भी है स्थितियां बदलती क्यों नहीं हैं?
हालाँकि सच यह भी है कि कर्तव्यविमुख सरकारें अपनी जिम्मेदारियों से भी मुँह मोड़ चुकी हैं। आम जनता अपनी जीवनशैली इस तरह से बना चुकी है, जहाँ इस तरफ़ सोचना उसके कार्यक्षेत्र के दायरे में नहीं आता। भूकंप जानलेवा नहीं होता, बल्कि कमजोर इमारतें भूकंप के कारण गिरकर जानलेवा बन जाती हैं। लेकिन विकास का पैमाना समझे जाने वाली ऊँची इमारतें अपने दायरे को फैलाकर पूरे शहर को जिस तरह से कंक्रीट के जंगल में तब्दील कर रही हैं, वह किसी दिन कब्रगाह में बदल जाए तो कोई आतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन बड़ा सवाल यह भी है कि अगर विकास का रास्ता इन्ही कंक्रीट जंगलों से होकर गुजरता है तो उसमे भूकंपरोधी तकनीक का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता? परन्तु आम आदमी के जान की फ़िक्र यहाँ किसे है? बिल्डर जानते हैं कि मरने के बाद हर ज़िन्दगी की कीमत तय होगी और लोग इसे भगवान का दंड समझकर चुप भी हो जायेंगे। फिर सबकुछ यूँ ही चलता रहेगा। अगर कुछ छूट जाएगा तो वह होगा न मिटने वाली यादें और न रुकने वाले आँसू। बार-बार हिलती धरती किसी बड़े खतरे का संकेत है या यह मात्र एक प्राकृतिक घटना, यह तो आनेवाला वक्त बातायेगा लेकिन इससे बचाव के पर्याप्त उपाय समय रहते नहीं किये गए तो आनेवाले समय में भूकंप से जानमाल के नुकसान का अंदाज़ा लगाना मुश्किल होगा। ज़ाहिर है खामियाजा पूरे मानव समाज को भुगतना होगा।
गिरिजेश कुमार

Sunday, February 19, 2012

विद्यालयों के पास बिकती है मौत, बेच रहे मजबूर बच्चे!


शरीर पर गंदे, मैले कुचैले कपड़े, ठंड और उचित देखभाल न होने से हाथ पैर और चेहरों के चमड़े फटे-फटे, उम्र बमुश्किल 12-13 साल, आँखे किसी खरीदार के इंतजार में। यह किसी एक की कहानी नहीं है ऐसे कई चेहरे आपको सरकारी स्कूल के बाहर मिल जायेंगे, जिनकी ज़िन्दगी गुटखा, पान मसाला और तम्बाकू बेचकर चलती है। एक तरफ़ इन्हें बेचना उन बच्चों की मज़बूरी है तो दूसरी तरफ़  पूरे समाज में धीमा जहर फ़ैल रहा है। जिस जगह  पर कल्पनाएँ  हकीकत का रूप लेती हैं उसी जगह पर मौत का सामान बेचा जाना हमें सकते में डालता है तो तस्वीर का दूसरा पहलू हमें सोचने पर मजबूर करता है। सरकार और प्रशासन सबकुछ जानते हुए भी चुप है। हालाँकि ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ बच्चे ही ऐसा करने को मजबूर हैं, स्कूल-कॉलेज से चंद कदम की दुरी पर ही ऐसी कई दुकाने सजी रहती हैं। जिनमे पान-गुटखा से लेकर शराब की दुकानें भी रहती हैं। इसका दूसरा सबसे बड़ा कारण यह है तम्बाकू उत्पादों का सबसे बड़ा खरीदार स्कूल कॉलेज के छात्र हैं। सवाल है क्या ‘धूम्रपान करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है’ तम्बाकू उत्पादों पर लिखी इस वैधानिक चेतावनी को ही हम अपने कर्तव्य की इतिश्री मान चुके हैं?
जबकि विज्ञापन पर निषेध व रेग्यूलेशन ऑफ ट्रेड एण्ड कॉमर्स उत्पादन आपूर्ति और वितरण एक्ट 2003 की धारा 6 के अनुसार तम्बाकू की बिक्री किसी अवयस्क द्वारा किये जाने पर प्रतिबन्ध  है। तथा शिक्षण संस्थानों के 100 मीटर की परिधि में तम्बाकू उत्पादों की बिक्री निषेध है। फिर भी ऐसा किया जाना और प्रशासनिक स्तर पर कोई कार्रवाई न होना हास्यास्पद है।
आँकड़ों पर अगर गौर किया जाए तो जो खौफनाक हकीकत सामने आती है उसे देखकर स्थिति की गंभीरता का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। 2000 में इंडिया-बिहार ग्लोबल यूथ टोबैको सर्वे में यह बात स्पष्ट तौर पर सामने आई कि 59 प्रतिशत प्रतिशत बच्चे किसी भी रूप में तम्बाकू उत्पाद का उपयोग कर रहे हैं। 14 प्रतिशत बच्चे सिगरेट पीते हैं, जबकि 46 प्रतिशत बच्चे तम्बाकू का दूसरे रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। वहीँ स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के मुताबिक देश में 10 वर्ष तक की उम्र के करीब 37 प्रतिशत प्रतिशत बच्चे स्मोकिंग करते हैं। जबकि स्कूल कॉलेज के 50 प्रतिशत से अधक छात्र तम्बाकू सेवन करते हैं। ज़ाहिर है ये आँकड़े हमने नहीं बनाए हैं फिर भी इसे रोकने और कानून का कड़ाई से पालन करने की दिशा में कोई प्रयास क्यों नहीं हो रहे हैं? बड़ा सवाल यही है।
क्रिकेटर युवराज सिंह को जब कैंसर की खबर आई तो हममे से हर कोई स्तब्ध था। युवराज की बीमारी तो फिर भी गंभीर नहीं थी लेकिन इसी कैंसर से कितने लोग हर साल काल के गाल में चले जाते है, इसका कोई स्पष्ट आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। फिर भी इसके जड़ को तलाशने की चर्चा कहीं नहीं  दिखी। सवाल यह भी है कि एक तरफ़ सरकार तम्बाकू मुक्त प्रदेश होने का सपना देखे और दूसरी तरफ धड़ल्ले से शराब दुकानों को लाइसेंस दिया जाए, तम्बाकू उत्पादों से राजस्व भी मिले और लोग तम्बाकू उत्पाद का उपयोग भी न करे ये दोनों एक साथ आखिर हो कैसे सकता है? जहाँ बाजार और उसके पैरोकार आड़े आते हैं वहाँ सरोकार की बात करना बेवकूफी लगती है। फिर भी इस धीमे जहर से समाज जिस अन्धकार की ओर बढ़ रहा हैं समय रहते उसपर कार्रवाई नहीं की गई तो फिर अपने आप को कोसने के अलावा कुछ भी नहीं बचेगा।
गिरिजेश कुमार

Sunday, February 12, 2012

डर्टी 'सिल्क' है या सिस्टम?


रूबी सिंह
फिल्म ‘डर्टी पिक्चर’ की ‘सिल्क’ को लोग डर्टी मानते हैं। हालाँकि सिल्क बाजारी है या विचारी, इसमें से किसी निष्कर्ष पर पहुँचना आसान नहीं है। लेकिन गंभीर और बड़ा सवाल यह है कि ‘सिल्क’ डर्टी है या सिस्टम? क्योंकि इस सिस्टम में सफलता के लिए या तो समझौता करना होता है या आत्महत्या! दो दिन पहले भोजपुरी फिल्मों की मशहूर नायिका रूबी सिंह ने मुंबई स्थित अपने फ़्लैट में आत्महत्या कर ली। कारणों के तफ्तीश की ज़िम्मेदारी पुलिस की है लेकिन इसके सामाजिक सन्दर्भ पर चर्चा कौन करेगा? अफ़सोस है कि हर ऐसी घटना मीडिया के लिए खबर बनती है और समाज के लिए विमर्श का विषय। लेकिन इस विमर्श से ठोस हल निकालने की कोशिश नहीं होती, खानापूर्ति करना ही इसका उद्देश्य होता है। बताया जाता है कि रूबी सिंह पिछले कुछ दिनों से डिप्रेशन में थी। काम न मिलना भी उसकी एक वजह बताई जा रही है। लेकिन आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठाने के पीछे छिपे रहस्य पर से पर्दा उठने में शायद वक्त लगे लेकिन निहितार्थों का चर्चा से गायब होना चौंकाता है।
नफीसा, कुलजीत रंधावा, विवेका बाबाजी, रूबी सिंह, इस लिस्ट में नामों की फेहरिस्त काफी लम्बी है। ग्लैमर की चकाचौंध में फैशन की दुनिया का स्याह सच एक बार नहीं कई बार दुनिया के सामने आ चुका है। इसे गलत माननेवालों की भी कमी नहीं है लेकिन स्थित ढाक के तीन पात वाली कहावत से आगे नहीं बढ़ती। सवाल है चमकती दुनिया के काले सच से जबकि हम सब वाकिफ हैं फिर भी इस दुनिया से काले परदे हटाने के प्रयास क्यों नहीं होते? ज़ाहिर है बाजार इसमें बड़ी भूमिका अदा करता है। रूबी सिंह के आत्महत्या की प्रारम्भिक वजहें भी इन्ही सब चीज़ों की ओर ईशारा करती हैं।
गाँव की गलियों से होकर रौशनी से नहाये हुए शहर में अपने आप को स्टार के रूप में देखने की ख्वाहिश रखने वाले लोगों की कमी नहीं है। वास्तविक सच को जाने बिना परदे पर बनावटी मुस्कान बिखेरने वाले सितारों की ज़िन्दगी में खुद को शामिल करना भी ऐसी मौत का कारण होता है। सपने टूटते हैं, टूटने के लिए ही होते हैं शायद। आखिर आत्मविश्वास की जमीन जब हिलने लगे तो ऐसे हालात में वो व्यक्ति क्या करे?
पैसे की चाहत और उच्च जीवन स्तर जीने की आकांक्षा ने लोगों के जमीर को भी बेचने का काम किया है। दिखावे में फँसे समाज के एक तरफ़ ज़िन्दगी से जंग है तो दूसरी तरफ़ झूठे मान सम्मान की फ़िक्र। मकड़े के जाल की तरह उलझी इस व्यवस्था में एक इंसान का जीना वैसे ही मुमकिन नहीं था, गला काट प्रतियोगिता, हमेशा आगे रहने की होड़ और एक झटके में दुनिया को आकर्षित कर लेने की प्रवृत्ति ने इसे और भी मुश्किल बना दिया है। एक तरफ़ देश भूख, गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार से जूझ रहा है तो दूसरी तरफ़ समाज में निराशा है, हताशा है, भविष्य का संकट है। अवसाद, मानसिक तनाव इत्यादि भी हैं।  इन सबकी वजहें चाहे जो भी हो नुकसान पूरे समाज को हो रहा है।  
देश और राज्य की सरकारों को सिर्फ़ घोटाले, कुर्सी और अपनी सत्ता बचाने में इंटरेस्ट है। मनुष्य के आत्मबल को निर्मित करने और उसे विपरीत परिस्थितियों में भी तटस्थ रहने की प्रेरणा देना कहीं किसी भी सिलेबस में शामिल नहीं है। खुद से जूझते इंसान के लिए यह और भी कठिन है। सवाल है ऐसी दमघोंटू परिस्थिति आखिर कब तक रहेगी? रूबी सिंह अंतिम नाम होगा ऐसी अपेक्षा रखना भी बेवकूफी है।
गिरिजेश कुमार

Saturday, January 14, 2012

राजनीति ही बदलेगी सियासत की सूरत


राजनीति की व्याख्या अगर परिभाषाओं की परिपाटी पर की जाए तो जो परिभाषा सबसे सटीक है वह है- यह सामाजिक ढाँचा जिस तरीके से संचालित होता है, वही राजनीति है। जाहिर है इसमें समाज की बेहतरी सबसे अहम है। प्रतिनिधि लोकतंत्र उसी राजनीति का हिस्सा है। दरअसल राजनीतिक पार्टियाँ जब इस सर्वमान्य प्रचलित परम्पराओं को तोड़कर राजनीति और सत्ता का इस्तेमाल निजी फायदे के लिए करने लगते हैं, तब यह सवाल उठता है कि आखिर राजनीति का मतलब है क्या? और राजनीति का तमगा पहनकर वर्तमान राजनेता जो कर रहे हैं, क्या वास्तव में वह राजनीति है? आम जनता के हित और समाजसेवा की साधना लिए उजली टोपी पहन लेना अगर वास्तविक राजनीति होती तो शायद हम भी सवाल न उठाते। लेकिन देश और समाज की बेहतरी के लिए जिस तरह के राजनीतिक संचालन की ज़रूरत है, वह नहीं होती। वर्तमान सत्तालोलुप पार्टियां राजनीति का अपराधीकरण और अपराधियों का राजनीतिकरण कर रही हैं। सिर्फ़ चुनाव जीतने को अपना मतलब और मकसद समझने वाली राजनीतिक पार्टियाँ इसके लिए कोई भी तरीका अपनाने से नहीं चूकते। यहाँ उम्मीदवारों की जीत मायने रखती है, उसका चरित्र नहीं। परिणामस्वरूप संसद और विधानसभाओं में ऐसे लोगों की तादाद बढ़ती जा रही है जो दबंग चरित्र के हैं। ऐसे लोग भी चुनाव जीत रहे हैं जिनपर कई आपराधिक मामले दर्ज है। ज़ाहिर है अगर लोगों को राजनीति का मतलब समझ में नहीं आ रहा है, और जिन्हें सामाजिक बहिष्कार मिलना चाहिए वो लोग जनप्रतिनिधि कहला रहे हैं तो व्यवस्था में कहीं-न-कहीं ऐसी खामी है जिसकी पड़ताल ज़रुरी है। वो खामी आखिर क्या है?
बहुदलीय प्रणाली पर आधारित वर्तमान भारतीय लोकतंत्र जनहित की बात तो करता है लेकिन वह संविधान तक ही सीमित है। धरातल पर उसकी वास्तविकता नहीं दिखती। वर्तमान चुनाव प्रणाली भी इसके लिए जिम्मेदार है। चुनाव आयोग पैसों के लूट के खेल को रोकने में नाकाम है। नियम बनाना अलग बात है उसे अमल में लाना अलग बात। खोखली हो चुकी इस व्यवस्था में सारा दोष चुनाव आयोग पर नहीं मढ़ा जा सकता। नेता, पुलिस और अपराधियों के गठजोड़ को खत्म करना होगा। हमारा समाज भयमुक्त नहीं है। यहाँ लोगों पर पुलिस का उतना ही खौफ है जितना अपराधियों का। वोट के बदले नोट जैसी सामाजिक बुराई राजनीति को हाशिए पर ले जाने के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार  है। हमारा सिस्टम इसे रोक पाने में पूरी तरह असफल है। चुनाव की घोषणा होते ही ये तत्व सक्रीय हो जाते हैं। आम भोली, निरीह और अनपढ़ जनता अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रति इतनी जागरूक नहीं है कि वह समाज के इन तथाकथित हितसोचकों के कुत्सित प्रयास को समझ सके। दरअसल, शासक वर्ग भी यह नहीं चाहता कि लोग जागरूक हों, क्योंकि अगर जनता जागरूक हो गई तो इनकी कुर्सी खतरे में पड़ जायेगी। वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था भी इसके लिए जिम्मेदार है। यहाँ हर चीज़ पर बाजार हावी है, और इस समाज को उसकी कीमत चाहिए होती है, जिसकी अदायगी ईमान, इज्ज़त और ज़मीर को बेचकर भी करनी पड़ती है। पार्टियों के चुनाव घोषणा पत्र में बेहतर समाज बनाने के तमाम वादे और दावे तो किये जाते हैं लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद सत्ता के सुख में ये सारी चीज़ें खत्म हो जाती हैं। इन सबके बीच पिसना पड़ता है उस आम जनता को जिसके लिए ये सारे प्रपंच रचे जाते हैं। परेशान होता है वह आम आदमी जिसकी तनख्वाह तो नहीं बढ़ती लेकिन ज़रूरत की चीज़ों के दाम ज़रूर बढते रहते हैं। सवाल है समाधान क्या हो?

दरअसल, सत्ता का इस्तेमाल निजी फायदे के लिए हो और जनता के हित की तथाकथित राजनीतिक ढोंग भी रचा जाए, ये दोनों काम एक ही नाव पर सवार होकर अगर कोई पार्टी करना चाहती है तो समझना यह भी पड़ेगा कि आखिर इसके मायने क्या है? अगर राजनीति का मतलब सत्ता है तो जाहिर है कोई भी पार्टी इससे खुद को अलग कर नहीं रख पाएगी। लेकिन विकास की जिस लकीर को खींचने का दावा कर ये पार्टियाँ वोट माँगने जाती हैं उसमें आम आदमी फिट होता कहाँ है, यह भी बड़ा सवाल है? 
यह विडंबना है कि आज़ादी के छह दशक बीत जाने के बाद भी देश की जनता राजनीतिक रूप से पूरी तरह जागरूक नहीं हो पायी है। जिसका नाजायज फायदा नेता उठाते हैं। इसलिए सवाल सिर्फ़ यही नहीं है कि स्थिति बदलेगी कैसे, सवाल यह भी है कि उसे कैसे लोग बदलेंगे? इस व्यवस्था से फायदे में रह रहे लोगों की तादाद भले ही ज्यादा न हो लेकिन इनके पास ताकत ज़रूर है। इसलिए ये लोग कभी नहीं चाहेंगे कि ये हालात बदले।  दूसरी तरफ़ पेट, परिवार और ज़िन्दगी की जद्दोजहद में पिसना मजदूरों की मज़बूरी है। इस मज़बूरी और लाचारी के आलम में क्रांति की मशाल को जलाना मुश्किल ही नहीं कठिन भी है। हालाँकि दुनिया का इतिहास इस बात की भी गवाही देता है कि शोले हमेशा राख में दबी चिंगारियों से भडकते हैं। असंगठित होकर इस व्यवस्था के खिलाफ़ हममे से हर कोई अपने-अपने तरीके से लड़ाई लड़ रहा है। ज़रूरत है उन्हें संगठित करने की। राजनीतिक जागरूकता दूसरी सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है।
आम जनता के मन में बनी नेताओं की नकारात्मक छवि उनमे घृणा का भाव उत्पन्न करता है। एक सभ्य लोकतान्त्रिक व्यवस्था में ऐसी स्थिति को कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता। चुनाव भी औपचारिकताओं तक सीमित रह गया है। एक वोट देश की दशा और दिशा तय करेगा यह मनोभाव न तो मतदाता के मन में होता है न नेता के मन में। भयाक्रांत यह समाज आखिर सही निर्णय लेगा तो कैसे?
हालाँकि हमारी सबसे बड़ी खासियत यह रही है कि हमने उम्मीद के दीये को कभी बुझने नहीं दिया। विपरीत परिस्थितियों में रास्ता निकालने की कला हमें विरासत में मिली है लेकिन इससे पहले कि यह धैर्य अराजकता का रूप ले ले हमें एक ठोस, गंभीर और सकारात्मक हल निकालने के प्रयास करने होंगे। निश्चित ही यह ज़िम्मेदारी उनलोगों को लेनी पड़ेगी जिनका देश, समाज, और सियासत से थोड़ा भी लगाव है।

Wednesday, December 21, 2011

सामाजिक विभत्सता की कारुणिक दास्तान


“मेरे मम्मी-पापा हमारी शादी के लिए राज़ी नहीं थे। क्योंकि हमारी जाति अलग थी। उनकी इच्छा के विरुद्ध हमने मुंबई कोर्ट में शादी कर ली। उन्होंने मुझे यह कहकर बुलाया कि हमें तुम्हारी शादी मंजूर है। मैं बहुत ही साधारण लड़की हूँ। मैं उनकी चालों को नहीं समझ पायी। उन्होंने मुझे घर में ही किडनैप कर रखा है। मेरे मम्मी-पापा ने मेरे पति को जान से मार देने की धमकी दी है। वे मुझे किसी से बात भी नहीं करने दे रहे...(क्रमशः)“  इस कहानी की हर एक पंक्ति हमें अंदर तक झकझोरती है। दर्द की दास्ताँ पढ़ते-पढ़ते कब उसके दर्द से रिश्ता जुड़ जाता है, पता ही नहीं चलता? अकेले में रोते-रोते जब किसी की आँखे सूज़ जाती हैं तो दिल में छुपे गुबार किसी भी रास्ते बाहर आने को बेताब हो उठते हैं। यह बेताबी कभी इंसान को तोड़ देती है, तो कभी उसे विद्रोही बना देती है। हालाँकि उस इंसान के लिए दोनों ही स्थिति खतरनाक है, लेकिन भींगी आँखें, अगर सिलवटों से भी बहती आँसुओं का हिसाब माँगने लगे तो फिर आखिर भरोसा किसपर किया जाए? अपने ही जब दुश्मन बन जाएँ तो मदद किससे मांगी जाए, यह बड़ा सवाल बन जाता है?

बहरहाल, यह आपबीती है, बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की रहने वाली पल्लवी पल्लू की, जिसे उसने फेसबुक पर शेयर किया है। अंत में उसने अपने और अपने पति की ज़िन्दगी की रक्षा की गुहार लगायी है। विडंबना देखिये, जो उसका हक है, उसे उसको भीख के रूप में माँगना पड़ रहा है। उसकी गलती बस इतनी है कि उसने उस व्यक्ति से शादी कर ली जिससे वो प्यार करती थी। और दुर्भाग्य से वो उसकी जाति का नहीं है। आखिर किस आधुनिकता की फटी हुई चादर ओढ़े जी रहे हैं हम? जहाँ एक लड़की सिर्फ़ इसलिए नज़रबंद है, क्योंकि उसने अंतर्जातीय विवाह जैसी सामाजिक कुरीति के मुँह पर तमाचा मारा है।
वो पूछती है, कोई इंसान अगर जातिवाद की लड़ाई लड़ता है तो क्या वह देशद्रोही है? दरअसल, सवाल सिर्फ़ यही नहीं है, सवाल उस मानसिकता का भी है जो आधी आबादी को दोयम दर्जे की निगाह से देखता है, और उसके सारे फैसलों पर परिवारवालों का नियंत्रण रहता है। अगर इस नियंत्रण से आगे निकलने की किसी ने कोशिश की तो उसकी नैतिकता पर ही सवाल उठा दिए जाते हैं, फिर यही समाज उसे घटिया, बदचलन, बाजारी और न जाने कैसे-कैसे उपनाम से संबोधित करता है? सवाल, जातिवाद जैसी सामाजिक कुरीति का भी है जिसने कभी-न-कभी हमसब को अपनी जद में लिया और हम हैं कि फिर भी उस चोले को उतार फेंकना नहीं चाहते। इसीलिए अंतर्जातीय विवाह को हम झूठी शान-ओ-शौकत में पड़कर स्वीकार करना नहीं चाहते। सामाजिक बुराई को स्टेटस सिम्बल बनाकर हम खुद को ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को विनाश की ओर धकेल रहे हैं। पल्लवी जैसी न जाने कितनी ही लड़कियाँ इस तथाकथित आधुनिक समाज से अपनी ज़िन्दगी की भीख माँगने को विवश है?
हमारी सामाजिक संरचना में झूठी अस्मिता और दिखावेपन ने इतनी गहरी पैठ बना ली है कि अगर कोई उसे तोड़ने की कोशिश करे तो, या तो उसे तोड़ दिया जाता है, या उसकी आवाज़ उसके कमरे की दीवारों से ही टकराकर रह जाती है। कोई उसके अंतर्मन में झाँकने की कोशिश नहीं करता। हताशा, निराशा और कुंठा के ऐसे ही आलम में कोई आत्महत्या जैसे जघन्य कदम उठाने को मजबूर होता है। ज़रूरत इस बात की है कि हम खुद की सोच को परिपक्व बनायें। अपनी मानसिकता में थोड़ा बदलाव कर हम कई सामाजिक बुराइयों को दूर कर सकते हैं। दूसरों को दोष देने से पहले हमें खुद के दोषों पर भी विचार करना चाहिए। इसमें माता-पिता की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है।  ताकि फिर कोई पल्लवी ज़िन्दगी की भीख माँगने को विवश न हो।
गिरिजेश कुमार

Tuesday, December 13, 2011

बेबसी की चक्की में पिसता बचपन

“मैं पढ़ता था लेकिन जब से पापा बीमार हुए तब से पढ़ाई छोड़ दी” इस कंपकपाती ठण्ड में सड़क के किनारे दीये की रौशनी में अंडा बेच रहे बमुश्किल दस साल के बच्चे से जब मैंने यह सवाल किया कि तुम पढ़ते नहीं हो? तो उसका जवाब यही था। टूटी-फूटी  भाषा में दिए इस जवाब को सुनकर अनायास ही मन उस बच्चे के प्रति करुणा, दया और ममता से भर जाता है। लेकिन सवाल है इसे कहा क्या जाए? नियति का फेर,व्यवस्था की खामी या उस बच्चे की किस्मत का दोष?
दरअसल भाग्य और भगवान के  भरोसे जीने वाला यह समाज व्यवस्थागत खामियों को भी किस्मत और कर्म के फल के निगाह से देखता है। दो जून की रोटी की तलाश,बीमार बाप के ईलाज के लिए पैसों की ज़रूरत और इन सबके बीच पिसता बचपन। समस्याएं एक नही हैं। ज़िंदगी को मज़बूरी का नाम देकर आखिर कब तक जिया जाए?
२१ वीं सदी में भले ही हमने विकास के नए पैमाने गढ़ लिए हों लेकिन बुनियादी सवाल अब भी कायम हैं। देश का भविष्य कहे जाने वाले बच्चे आर्थिक असमानता,गरीबी,मज़बूरी,लाचारी और बेबसी की उस चक्की में पिसते रहते हैं जहां से बाहर निकलना उसके वश की बात नही होती। हर चौक-चौराहे और गली-नुक्कड़ पर हमें ऐसी विवश ज़िन्दगी देखने को मिल जाती है। स्थिति बदलने और बेहतरी के तमाम सरकारी दावे होते हैं लेकिन इन दावों की वास्तविकता धरातल पर नही दिखती। नतीजतन ज़िंदगी शब्द से भी अनजान बच्चे ज़िन्दगी का बोझ उठाने को मजबूर होते हैं। जो उम्र उसके दिमागी विकास और नयी कल्पनाओं को अंजाम देने की होती है उस उम्र में उसे आटा-चक्की का भाव मालुम करना होता है। एक सभ्य लोकतान्त्रिक समाज के लिए यह स्थिति वाकई चिंताजनक है। लेकिन निजीहित जिस समाज का अंतिम लक्ष्य बन जाए उस समाज में जनहित की बात बेईमानी ज़रूर लगती है, फिर भी यह सवाल तो उठता ही है कि आखिर दोषी कौन है?
हमारा संविधान समानता और समता पर जोर देता है लेकिन आज़ादी के छः दशकों बाद भी हम इसके निहितार्थ को नहीं समझ पाए। सरकारी नीतियाँ भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। मुनाफ़ा आधारित सोच हमें गरीबों और ज़रूरतमंदों के लिए बनायीं नीतियों का लाभ उनतक पहुँचाने से रोकते हैं। फलस्वरूप ये नीतियाँ कागजों में ही रहकर सरकारी कार्यालयों की शोभा बढ़ाती रहती हैं। इस विकट,विपरीत और दमघोंटू परिस्थितियों से लड़ने के लिए जो इच्छा शक्ति चाहिए वो सरकारों में नहीं दिखती। परिणामतः सारी सुविधाओं का लाभ चंद मुट्ठी भर लोगों तक सिमट कर रह जाता है। अमीर और अमीर होते जाते हैं गरीब और गरीब।
इसी देश में एक तरफ़ ऐसे बच्चे हैं जो तमाम सुख सुविधाओं से संपन्न हैं और दूसरी तरफ़ ये बच्चे हैं जिन्हें इन शब्दों का मतलब भी नहीं पता है। एक देश के इन दो चेहरों के कालांतर में झाँकने की कोशिश आखिर कब होगी? सवाल यह भी है कि जो व्यवस्था इस देश के बच्चों को उनका बचपन नहीं दे पाता क्या उस व्यवस्था को उखाड़ नहीं फेंकना चाहिए? इस शर्मनाक स्थिति से खुद में शर्मिंदगी महसूस करनेवाले हर व्यक्ति को इस दिशा में एकसाथ मिलकर प्रयास करने चाहिए। ताकि बचपन बचाया जा सके।  
गिरिजेश कुमार

Saturday, December 10, 2011

ज़िंदगी बचाने की जगह क्यों बना मौत की कब्रगाह?

वो अस्पताल जिसमें आग लगी (तस्वीर-एपी)
ज़िंदगी बचाने की जगह मौत की कब्रगाह बन गया और किसी को इस बात का अफ़सोस नहीं है। पश्चिम बंगाल सरकार अपनी सफाई दे रही है तो अस्पताल प्रशासन भी नहीं चाहता कि उसकी साख पर बट्टा लगे। ऐसे में व्यवस्था पर भरोसा करने वाले लोग व्यवस्था की खामियों से असहज होकर अपना आपा खो दें और फिर वही सरकार यह कहे कि देश के लोगों को शान्ति व्यवस्था भंग नहीं करनी चाहिए तो समझना यह भी पड़ेगा कि आखिर ये माजरा है क्या? 
विदित  हो कि पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के ए एम् आर आई अस्पताल में 9 दिसम्बर की सुबह अचानक आग लग गयी थी जिसमे 89 लोगों के मरने की पुष्टि हो चुकी है। राहत कार्य अभी जारी है।  
अपने रिश्तेदारों की बेहतरी के लिए जो लोग अस्पताल आए थे उन्होंने यह सपने में भी नहीं सोचा होगा कि ठीक होने से पहले ही अस्पताल प्रशासन की व्यवस्थागत खामियां उनकी कब्र खोद चुकी हैं। ज़िन्दगी जीने की आस कब मौत के आशियाने में शरण ले लेती है यह तो कोई भी नहीं जानता लेकिन इसके लिए जिम्मेदार अगर इंसानी लापरवाही हो तो ह्रदय क्षुब्ध हो जाता है। सवाल उठता है कि क्या अस्पताल चलाने वाले लोग सिर्फ़ मुनाफ़े के लिए अस्पताल चला रहे थे? ईलाज करा रहे दूर दराज से आए लोगों की सुरक्षा उनके लिए कोई मायने नहीं रखती थी? सवाल यह भी है कि आखिर अस्पताल में इतना बड़ा हादसा हुआ कैसे?
हादसे के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कहती हैं कि दमकल विभाग के अधिकारियों ने अस्पताल को इस बात को लेकर चेताया था कि अस्पताल में आग से निबटने के पर्याप्त प्रबंध नहीं है। वहीँ अग्निशमन मंत्री जावेद खान कहते हैं कि आग की शुरुआत अस्पताल के तहखाने से हुई और यह तहखाना पूरी तरह अवैध है। ये बयान हादसे के कुछ ही घंटों बाद आए हैं। ज़ाहिर है सरकार से लेकर मंत्री तक को इस बात की जानकारी थी कि अस्पताल में आग जैसे हादसे से निबटने की तैयारी नहीं है फिर क्यों नहीं उसपर पहले कार्रवाई की गई? क्या पश्चिम बंगाल सरकार ऐसे ही किसी हादसे का इंतज़ार कर रही थी?
दरअसल हमारी मशीनरी इतनी अपरिपक्व है कि हम चाहकर भी ऐसे किसी घटना के अंजाम तक नहीं पहुंच पाते। इस घटना की परिणति भी तय है। सरकार ने जाँच के आदेश दिए हैं लेकिन इन जाँच रिपोर्टों की वास्तविकता फाइलों में कहीं गुम होकर अपना दम तोड़ देगी। ऐसे में जिन्होंने अपने परिजनों को खोया, अपने रिश्तेदारों को बेमौत मरते देखा उनकी सुननेवाला कौन है? सवाल यही है।  
प्रशासनिक लापरवाही, सरकारी अकर्मण्यता और सेवाओं पर भारी व्यक्तिवादी सोच हर बार आम निर्दोष लोगों की जान लेता है। यहाँ इंसान की ज़िंदगी की कीमत तय होती है जो फूटपाथ पर बिकने वाले किसी सस्ते और घटिया सामान से भी कम है। हर ऐसी घटना जो सीधे व्यवस्था की खामियों पर सवाल उठाते हैं, उसके रहनुमा अपने आप को पाक साफ बताने की कोशिश करते हैं। कोई भी उस मातमी सन्नाटे के पीछे झाँकने की कोशिश नहीं करता जहां उसके परिजनों की आँखे दर्द, गम और रुसवाई से सूज चुकी होती हैं। कोई उसके दिल का हाल जानने की कोशिश नहीं करता जिनके पास अब सिर्फ़ यादें बची हुई हैं। वर्तमान विकसित, समृद्ध और आत्मनिर्भर भारतीय व्यवस्था की यही सबसे बड़ी खामी है।
सवाल यह नही है कि जो हादसे हो चुके हैं उनपर कितना आंसू बहाया जाए और व्यवस्था को कितना कोसा जाए? सवाल यह है कि जिन हालातों में ऐसी घटनाएँ होती हैं उन पर गंभीरता पूर्वक विचार करके क्या कोई ठोस हल निकालने की कोशिश की जायेगी ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएँ दोबारा न घटे? और आम निर्दोष लोग बेवजह काल के गाल में न समायें?
गिरिजेश कुमार

Sunday, November 27, 2011

घर हो या बाहर, दुर्व्यवहार महिलाओं के साथ ही होता है

पुरुष वर्चस्ववादी सामाजिक अवधारणा में स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार कोई नई बात नहीं है लेकिन बदलते परिवेश में सीमित सोच और घटिया मानसिकता पूरी  व्यवस्था के लिए घातक है। सवाल है चंद लफंगे पुरे समाज को चुनौती देने का दुस्साहस कैसे कर लेते हैं? सवाल यह भी है कि यह सिलसिला आखिर कबतक चलता रहेगा? कल सरेराह बीच बाजार में एक युवती के साथ छेड़खानी की गई। अभी कुछ ही दिन पहले इंसानियत को शर्मसार कर इसी शहर में एक छात्रा के साथ उसके पिता के सामने बदतमीजी की गई थी और लोग मूकदर्शक बने रहे थे। इन सबके बीच बड़ा सवाल यह भी है क्या हमारे पूर्वजों के द्वारा विरासत में सौंपे गए संस्कार और संस्कृति प्रभावहीन हो गयी है?
दरअसल जब ऐसी घटनाएँ घटती हैं तो यही समाज संवेदनशील हो जाता है। चर्चाओं बहसों का एक नया दौर शुरू हो जाता है और कुछ समय के लिए ऐसा लगता है कि एक ठोस हल इस बार ज़रूर निकलेगा लेकिन स्थिति बदलती नहीं है। सदियों से पीछे धकेली गयी स्त्री समाज को अपनी आबरू बचाने के लिए पुरुषों का सहारा लेना पड़ता है। आधुनिकता की चादर ओढ़े इस समाज में आधुनिकता कम फूहडता ज्यादा दिखती है। लेकिन क्या हमारी संवेदना मर चुकी है। हम यह क्यों भूल जाते हैं कि वह लड़की हममे से ही किसी की बहन, किसी की बेटी है?
एक और बात जो ऐसे मामलों में नजर आती है वह यह कि ज्यादातर बदतमीज रसूख वाले घर से सम्बन्ध रखते हैं। पैसे और पॉवर का धौंस दिखाकर सबकुछ मैनेज कर लेते हैं। यानी दोष इस व्यवस्था में भी है जहां अपराध करने वाले जानते हैं कि ज्यादा से ज्यादा क्या हो सकता है? ऐसे में वह लड़की क्या करे या सताई गयी लड़की के परिवार वाले क्या करे? इस सवाल का जवाब कोई देना नहीं चाहता।
दूसरी तरफ़ खुलेपन के नाम पर पुरे समाज में जिस तरह से अश्लीलता फैलाई जा रही है वह भी ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार है। हमारी कानून व्यवस्था और प्रशासनिक अमला इतना सुस्त है कि पहले तो अपराधी पकड़ में नहीं आते और पकड़ में आ  भी गए तो किसी को उसके किये की सजा नहीं मिलती। नतीजा बेशर्मी की हद को पारकर सरेआम ये लफंगई करते हैं।
स्त्री देह को उपभोग की वस्तु समझने वाली हमारी सामाजिक संरचना धीरे-धीरे सभ्यता का प्रकाश खोकर इतनी मलीन हो चुकी है कि उसे अच्छे बुरे का भी ख्याल नहीं रहा। अपनों तक ही सीमित सोच हमें हर लड़की को नीची निगाह से देखने को विवश करता है। इस सोच को भी बदलना ज़रुरी है। हमारे तथाकथित विकसित समाज की कड़वी  सच्चाई यह भी है कि घर हो या बाहर, दुर्व्यवहार महिलाओं के साथ ही होता है। दहेज के लिए हत्या और प्रताड़ित करने कि घटनाओं में इजाफा इस बात के सबूत हैं।    
कहते हैं बच्चे की पहली पाठशाला उसका घर होता है। तो आखिर उनकी परवरिश में कहां कमी रह जाती है कि सड़कों पर खुलेआम बदतमीजी करने से ये बाज नहीं आते। उनके माँ बाप को भी इस दिशा में सोचना चाहिए। एक स्वस्थ, सुन्दर और भयमुक्त समाज बनाने की ज़िम्मेदारी हम सबकी है। इसमें ऐसी चीजों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। यह सच है कि घर के चारों ओर अगर कचड़ा फैला हुआ हो तो हम अपने घर को दुर्गन्धमुक्त नहीं रख सकते। और चुपचाप बैठे रहना भी समाधान नहीं है। साथ ही प्रशासन को भी दोषियों को सजा दिलाने में महती भूमिका अदा करने की ज़रूरत है।
गिरिजेश कुमार

  

Friday, November 25, 2011

थप्पड़ की गूंज तो सुनाई दे रही है, लेकिन निहितार्थों पर चर्चा नहीं हो रही


व्यवस्थाओं से निराश होकर या वर्तमान हालात से तंग आकर, कारण चाहे कुछ भी हो, थप्पड़ चूँकि देश को चलाने की तथाकथित ज़िम्मेदारी संभाले सरकार के मंत्री को पड़ी थी तो उसकी गूंज तो सुनाई पड़नी ही थी। लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि इस थप्पड़ की सिर्फ़ गूंज ही सुनाई दे रही है इसके निहितार्थों पर चर्चा नहीं की जा रही। शायद करना भी नहीं चाहते। लेकिन सवाल यह है जब भी कोई घटना हमारे स्वभाव के विपरीत घटित होती हैं तो बजाये उसकी जड़ तलाशने के हम निजी निष्कर्ष पर पहुंच कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री क्यों समझ लेते हैं?  एक बात हमें साफ़ तौर पर समझ लेनी चाहिए कि शरद पवार को थप्पड़ महज प्रचार पाने का हथकण्डा नहीं था। मंहगाई, भ्रष्टाचार और अघोषित तानाशाही के खिलाफ जो चिंगारी आम जनमानस रूपी राख में दबी हुई है उसे भड़काने की नापाक कोशिश एक ऐसे  शोले का रूप ले लेगी जिसे दबाना किसी भी शासक वर्ग के लिए आसान न होगा। इसीलिए जब घोर साम्राज्यवादी अमेरिका के राष्ट्रपति पर मुंतज़र अल ज़ैदी ने जूता फेंका था तो उसे वैश्विक समर्थन मिला था। और इसीलिए जब हरविंदर सिंह जैसा युवक आवेश में किसी मंत्री को थप्पड़ मारता है तो असभ्य होते हुए भी हम सिर्फ़ उसे दोषी नहीं ठहरा सकते।
माना कि एक सभ्य लोकतान्त्रिक समाज में जनता के प्रतिनधि को खुलेआम थप्पड़ मारना कतई जायज़ नहीं है लेकिन जो परिस्थितियां और जो हालात इस देश के सामने इन्ही भ्रष्ट नेताओं ने खड़े किये हैं उसे आखिर बर्दाश्त कब तक किया जा सकता है? हर चीज़ की एक सीमा होती है लेकिन हम यह क्यों भूल जाते हैं सीमा की भी एक सीमा होती है, जिसे लाँघने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए। हालाँकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लोकतान्त्रिक समाज में ऐसी प्रवृत्तियाँ विकसित होंगी तो किसी भी लोकतान्त्रिक संस्था का काम करना मुश्किल हो जाएगा लेकिन ऐसी प्रवृत्तियाँ विकसित न हों इसके प्रयास की ज़िम्मेदारी कौन लेगा? निहायत ही इसकी ज़िम्मेदारी उन्ही नेताओं को लेनी होगी जो देश चलाते हैं और आखिरकार गुस्सा भी उन्ही के खिलाफ है।
दरअसल आम जनता किसी फैसले पर तब पहुँचती है जब उसकी आशाओं, आकाँक्षाओं और भावनाओं के साथ खिलवाड़ होता है। आज भले ही हम इस घटना की जितनी भी निंदा कर लें लेकिन हमें चर्चा लोगों की उन मनोदशाओं पर भी करनी चाहिए जो उसे आपा खोने पर विवश करती है। इसे सिर्फ़ एक घटना मान लेना भी गलत होगा क्योंकि थप्पड़ मारना हममें से किसी का भी शौक नहीं होता। यह सच है कि हमें अपना विरोध दर्ज कराने के लिए लोकतान्त्रिक तरीकों का इस्तेमाल करना चाहिए लेकिन धरना, प्रदर्शन और जुलुस जैसे विरोध के शुद्ध  लोकतान्त्रिक तरीकों पर पुलिसिया ज़ुल्म इन्ही नेताओं की शह पर होता है फिर अव्यवस्थाओं के भंवर में फँसा आम आदमी क्या करे? फिर हम यह भी भूल नहीं सकते कि राहुल गाँधी को काले झंडे दिखा रहे युवकों को लतियाने में मंत्री भी शामिल थे। फिर उन युवकों से हम संयम की उम्मीद क्यों करते हैं?
इन सबके बीच विचारणीय यह भी है कि राजनीति पर जबतक स्वार्थनीति हावी रहेगा ऐसी घटनाएँ रोकी नहीं जा सकती। इसलिए निजीहित को छोड़कर नेताओं को जनहित की तरफ़ भी ध्यान देना चाहिए। अन्यथा यह कहना गलत न होगा कि शरद पवार को थप्पड़ सिर्फ़ एक बानगी भर है आगे लंबी कहानी है।
गिरिजेश कुमार


Wednesday, November 23, 2011

क्यों बिखर रहा अन्ना का आंदोलन?

अन्ना का आंदोलन तो टाँय-टाँय फिस्स हो गया न? कंप्यूटर पर कुछ ज़रुरी काम करने के दौरान एक पुराने मित्र का फोन पर यही पहला सवाल था। कई दिनों के बाद अचानक आए फोन पर इस सवाल ने थोड़ी देर के लिए तो मुझे भी सकते में डाल दिया। फिर जवाब दिया अभी अधीर  होने की ज़रूरत शायद नहीं है क्योंकि जिस कानून की माँग को लेकर इस आंदोलन की शुरुआत हुई थी उसके लिए संसद के शीतकालीन सत्र तक का इंतज़ार तो करना पड़ेगा। उसके पहले किसी निष्कर्ष पर पहुँचना जल्दबाजी कही जायेगी। बहरहाल जवाब में कुछ भी कहा जाए लेकिन यह सवाल उस आम आदमी की निराशा को भी प्रदर्शित करता है जिसके मन में भ्रष्टाचार के खात्मे की उम्मीद जगी थी। हालाँकि यह सच है कि बड़ी लड़ाई लड़ने में वक्त लगता है और इस दरम्यान हमें कई पड़ाव भी पार करने पड़ते हैं। लेकिन भ्रष्टाचार नामक जिस घुन की दवा माँगने अन्ना हजारे आए थे उसके अंजाम तक पहुँचने से पहले ही जिस तरह से अन्ना के सहयोगियों में वैचारिक मतभेद सामने आ रहा है उसने इस लड़ाई को पीछे ज़रूर धकेला है। सवाल है सदियों से दबे इस जनाक्रोश को सही दिशा देने में कामयाबी हासिल क्यों नहीं हो सकी? इस सवाल पर अन्ना और उनके सहयोगियों को भी आत्ममंथन की ज़रूरत है। दुनिया का इतिहास गवाह है कि समय-समय पर जनता का आक्रोश जनउभारों के रूप में सामने आता रहा है। शासक वर्ग के खिलाफ़ भ्रष्टाचार के बहाने उपजे इस आक्रोश को भी एक दिशा देने की ज़रूरत थी जो व्यवस्था परिवर्तन के लिए ज़मीन तैयार करती। लेकिन इस लड़ाई की  अगली कतार में शामिल लोग भी वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था के उस कुटिल नीति का शिकार हो गए जिसमें व्यक्तिवाद प्रमुख है। अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी और खुद अन्ना को हमने अपने ऊपर लगे आरोपों के जवाब में आपा खोते हुए देखा है। अन्ना और उनके सहयोगियों का ज्यादातर वक्त अब यह सफाई देने में बीतता है कि हमारे बीच कोई मतभेद नहीं है। ऐसे में आम निरीह जनता के मन में ऐसे सवाल उठना जायज है। अन्ना टीम के प्रमुख सदस्य प्रशांत भूषण के कश्मीर पर दिए विवादास्पद बयान के बाद से उभरा मतभेद हर दिन एक नए रूप में सामने आ रहा है। इस मतभेद ने आम लोगों के मन में बनी साफ़ छवि को भी आघात पहुँचाया है। जिसे समय रहते समझने की ज़रूरत है।
दूसरी तरफ़ जब अन्ना हर वर्ग और धर्म के लोगों को कोर कमिटी में शामिल करने की बात करते हैं तो जाने अनजाने वह सदियों से कोढ़ की तरह समाज में जड़ें जमाये हुए उसी रूढ़िवादी मानसिकता को ही बढ़ावा देते हैं जिसमे जातिवाद प्रमुख हैं। किसी भी लड़ाई का आधार यह नहीं हो सकता कि उस टीम में शामिल लोग अलग-अलग धर्मों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे या नहीं। या फिर वह किस जाति से सम्बन्ध रखते हैं। व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई विचारों के आधार पर लड़ी जाती है।
इस तरह की लड़ाई पहली बार लड़ी जा रही है ऐसी बात नहीं है। 1974 का छात्र आंदोलन इससे कहीं ज्यादा बड़ा और व्यापक पैमाने पर हुआ था। उस वक्त भी मुद्दा भ्रष्टाचार था। लेकिन सम्पूर्ण क्रांति का जो नारा जयप्रकाश नारायण ने दिया उसे सही ढंग से परिभाषित नहीं किया जा सका था। जिसका हश्र आज हमारे सामने है। अन्ना के आंदोलन की तुलना जेपी के आन्दोलन से करना उचित नहीं है लेकिन इतिहास की गलतियों से सीख लेना भी ज़रुरी है। किसी भी आंदोलन को जनांदोलन सिर्फ़ इसलिए नहीं माना जा सकता क्योंकि उसमे बड़े पैमाने पर लोग शामिल हैं। दरअसल उस भीड़ में वैचारिक रूप से मजबुत और राजनीतिक चालों की गहरी समझ रखनेवाले कितने लोग हैं यह समझना भी ज़रुरी है। वैचारिक रूप से लोगों को मजबूत बनाने की ज़िम्मेदारी उन लोगों पर होती है जो आंदोलन के अगली कतार में शामिल होते हैं लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पा रहा है। हालाँकि यह नहीं कहा जा सकता कि अन्ना का आंदोलन फेल हो गया लेकिन बिखर रहे इस आंदोलन की कड़ियों को जोड़ना ज़रुरी है। अन्यथा भ्रष्टाचार मुक्त समाज की कल्पना सिर्फ़ एक ख्वाब बनकर ही रह जायेगी।
गिरिजेश कुमार

Thursday, November 17, 2011

बिना सोर्स के आप सड़क पर चलते कीड़े हैं जिन्हें कोई भी राह चलता कुचल देता है



मेरे पड़ोसी शर्मा जी की पत्नी जिंदगी और मौत से जूझ रही है। दो दिन पहले उन्हें गंभीर हृदयाघात हुआ था। शर्मा जी के सामने एक तरफ़ अपनी पत्नी की ज़िन्दगी है तो दूसरी तरफ़ मँहगे ईलाज के लिए पैसे के बंदोबस्त की चुनौती। आँखों से आँसुओं की अविरल बह रही धारा किसी भी इंसान का दिल चीर कर रख देता है। अपनों का साथ तो है लेकिन विवशता उनकी भी है। डॉक्टरों ने एम्स रेफ़र किया है। इन सबके बीच चिंता सिर्फ़ पैसों की ही नहीं है,चिंता उन सोर्सों की भी है जिससे ईलाज समय पर शुरू हो सके। ये सोर्स आखिर कैसे मिले? मंत्रियों, विधायकों से मदद की गुहार ताकि ज़िंदगी बचायी जा सके। ग़म, मज़बूरी और लाचारी के ऐसे हालात में एक आदमी क्या करे?
यह कहानी उस शर्मा जी की है जो सरकार से ईमानदारी और मेहनत की कमाई का वेतन लेते हैं। लेकिन इन्ही जनता के टैक्सों पर पल रही सरकार के पास अस्पतालों में मँहगे ईलाज के लिए पर्याप्त सुविधाएँ नहीं हैं। और हैं भी तो वह चंद मुट्ठीभर सुविधासंपन लोगों की रखैल बनकर रह गई हैं। इसे विडंबना ही कहेंगे कि एक तरफ़ करोड़ों रूपये काले धन के रूप में विदेशी बैंकों की शोभा बढ़ा रहे हैं तो दूसरी तरफ किसी के पास एयर एम्बुलेंस के लिए पैसे नहीं है। यह स्थिति हर उस व्यक्ति की है जो मध्यमवर्गीय परिवार से आता है। यहां हर चीज़ के लिए सोर्स चाहिए। नौकरी के लिए सोर्स, इलाज के लिए सोर्स, सरकारी दफ्तरों में काम कराने के लिए सोर्स। बिना सोर्स के आप सड़क पर चलते कीड़े हैं जिन्हें कोई भी राह चलता कुचल देता है। क्षमता, बुद्धिमता, ज्ञान, अर्हता सब सेकेंडरी चीजें हो चुकी हैं। सवाल है आखिर ऐसी व्यवस्था किसने बनायीं जो इंसान के जीने के लायक ही नहीं है?
माना की चमचमाती सड़कें,उसपर फर्राटेदार दौड़ती मँहगी कारें और आसमान छूती इमारतें किसी भी देश के विकसित और समृद्ध होने की परिचायक हैं लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और भोजन जैसी मूलभूत और बुनियादी ज़रूरतों का लाभ हर ज़रूरतमंद तक पहुँचे इसकी ज़िम्मेदारी भी सुनिश्चित होनी चाहिए। फिर ऐसे भारत निर्माण के दावों के दरअसल मायने क्या हैं जहाँ किसी की ज़िंदगी कागज़ के चंद नोटों के अभाव में नहीं बचाई जा सके? और पैसों का बंदोबस्त हो भी जाये तो सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त सुविधाएँ नहीं मिलती क्योंकि वह किसी मंत्री, विधायक, सांसद या अफसर का रिश्तेदार नहीं है। निजी अस्पताल उसके ख्वाब से भी बाहर की चीज़ है।
विवशताओं और लाचारियों के ऐसे हालात में ही इंसान गलत कदम उठाने को मजबूर होता है। भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी की नींव भी कहीं न कहीं यहीं से जन्म लेती है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि पूरी तरह से पूँजीवादी सोच और उपभोक्तावादी संस्कृति में कैद यह समाज और समाजिक व्यवस्था क्या मुनाफे पर आधारित अपनी मानसिकता को बदलकर मनुष्य मात्र के हित की बात सोचेगा? अगर हाँ तो कब तक? अगर नहीं तो क्यों नहीं?
गिरिजेश कुमार