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Wednesday, November 23, 2022

जीवाणुओं ने भारत में ली 13.67 लाख लोगों की जान

नई दिल्ली। 33 तरह के जीवाणुओं के रण 2019 में भारत में 13.67 लाख से अधिक लोगों की जान गई हैं। इनमें से 5 तरह के जीवाणु, ई.कोली, एस. न्यूमोनिया, के.न्यूमोनिया, एस.ऑरियस और ए.बाउमनी, में ही सबसे घातक रोगजनक पाए गए हैं। लैंसेट में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार इन पांच जीवाणुओं के कारण होने वाले संक्रमण के कारण 2019 में भारत में 6.8 लाख से अधिक लोगों की जान गई है। जबकि 33 बैक्टीरियल इंफेक्शन ने 13.67 लाख से अधिक लोगों की जान ली है। 


ई.कोली ने ली भारत में सबसे अधिक जान

भारत में सबसे अधिक जान ई. कोली की वजह से गई है। यह बैक्टीरिया डायरिया, मूत्र पथ के संक्रमण और निमोनिया से जुड़ा हुआ है। इसने 1.6 लाख लोगों की जान ली है। लैंसेट की रिपोर्ट, ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी 2019, 33 प्रजातियों के बैक्टीरिया के संक्रमण के कारण होने वाली मौतों पर आधारित है।  संक्रमण से संबंधित मौतों के लिए जिम्मेदार अन्य सामान्य बैक्टीरिया में साल्मोनेला टाइफी, गैर-टाइफाइडल साल्मोनेला और स्यूडोमोनास एरुगिनोसा शामिल हैं।

दुनियाभर में 77 लाख मौतें बैक्टीरिया से
लैंसेट की रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक स्तर पर संक्रमण के कारण अनुमानित 1.37 करोड़ लोगों की मौत हुई है। इन मौतों में से, 77 लाख मौतें अध्ययन में शामिल 33 बैक्टीरियल इंफेक्शन से जुड़ी थीं, जिनमें पाँच बैक्टीरिया सभी मौतों के आधे से अधिक के लिए जिम्मेदार है। 77 लाख बैक्टीरिया से होने वाली मौतों में से 75 फीसदी से अधिक तीन सिंड्रोम के कारण हुईं हैं। इनमें निम्न श्वसन संक्रमण, रक्तप्रवाह संक्रमण और  पेट से संबंधित संक्रमण शामिल है। वाशिंगटन विश्वविद्यालय में इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन (आईएचएमई) के निदेशक तथा अध्ययन के सह-लेखक डॉक्टर क्रिस्टोफर मुरे ने कहा कि पहली बार ये नए आंकड़े जीवाणु संक्रमण से उत्पन्न वैश्विक स्वास्थ्य को चुनौती के बारे में बताते हैं। 


किस बैक्टीरिया से देश में कितनी मौतें     मृत्यु दर/लाख     दुनिया में मौतें 

इशरीकिया कोली                         1.6 लाख     16.1       9.50 लाख

स्ट्रैपटोकोकस निमोनिया(एस.  निमोनिया) 1.4 लाख     14.4        8.29 लाख

क्लेबसिएला निमोनिया                 1.3 लाख     13.2         7.90 लाख

स्टेफिलोकोकस ऑरियस( एस ऑरियस) 1.2 लाख     12.8          11 लाख

एसिनेटोबैक्टर बाउमानी                 1.1 लाख      11

उम्र के हिसाब से भी अलग-अलग है मौतों का आंकड़ा 
-15 साल से ऊपर के युवाओं की मौत की सबसे बड़ी वजह एस, ऑरियस बैक्टीरिया। इनकी वजह से 9.40 लाख जानें पूरी दुनिया में गई हैं।
-5 से 14 साल की उम्र के बच्चों में सबसे ज्यादा मौतें साल्मोनेला एंटरिका सेरोवर टायफी से जुड़ी, 49,000 मौतें हुई
-नवजात शिशुओं से बड़े लेकिन 5 साल से कम उम्र के बच्चों में, एस निमोनिया सबसे घातक रोगज़नक़ था, जिसकी वजह से 225,000 मौतें हुईं
-नवजात शिशुओं की मौतों से जुड़ा रोगजनक के. निमोनिया है, 1.24 लाख मौतें हुईं

प्रमुख बातें 

-2019 में दुनियाभर में 77 लाख मौतें 33 तरह के बैक्टीरिया के कारण हुई

-कुल वैश्विक मौतों का 13.6 प्रतिशत का कारण ये 33 बैक्टीरिया 

-54.6 फीसदी मौतों के लिए पांच तरह के बैक्टीरिया जिम्मेदार

जीवाणु के कारण देश, क्षेत्र के अनुसार मृत्यु दर अलग-अलग

-सब सहारन अफ्रीका में 230 मौतें प्रति एक लाख जनसंख्या पर

-पश्चिमी यूरोप, उत्तरी अमेरिका, एशिया में 52 मौतें प्रति एक लाख जनसंख्या पर

Thursday, November 17, 2022

दुनियाभर में 1 अरब युवाओं पर क्यों है बहरे होने का खतरा?

नई दिल्ली। हेडफोन, ईयरफोन तथा ईयरबड पर तेज आवाज में संगीत सुनने के कारण किशोरों व युवाओं पर बहरेपन का खतरा मंडरा रहा है। बीएमजे ग्लोबल हेल्थ जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में दुनियाभर में 1 अरब से अधिक किशोरों व युवाओं के सुनने की क्षमता खो देने के खतरे का अंदेशा जताया गया है।

शोधकर्ताओं की इस अंतरराष्ट्रीय टीम का अनुमान है कि 12 से 34 वर्ष के 24% युवा अपने डिवाइस पर आवाज के 'असुरक्षित स्तर' पर संगीत सुन रहे हैं। यानी वे तेज आवाज में गाने सुन रहे हैं। जो उनके कानों के लिए ठीक नहीं है। शोधकर्ताओं ने सरकारों से सुनने की सुरक्षित नीतियों को तत्काल लागू करने का आह्वान भी किया है। 

 43 करोड़ लोग सुनने की अक्षमता से पीड़ित
विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि वर्तमान में दुनिया भर में सभी उम्र के 43 करोड़ से अधिक लोग सुनने की अक्षमता से पीड़ित हैं। स्मार्टफोन, हेडफोन और ईयरबड्स जैसे व्यक्तिगत सुनने वाले उपकरणों  के उपयोग के कारण युवा विशेष रूप से प्रभावित हो रहे हैं। साथ ही तेज आवाज में संगीत बजानेवाले जगहों पर जाने से भी उनके कानों पर असर पड़ रहा है।  

तेज आवाज में एक बार भी सुनना खतरनाक
शोधकर्ताओं के अनुसार तेज आवाज में एक बार गाने सुनना भी खतरनाक है। बार-बार सुनने से कान के सुनने की प्रणाली खत्म हो सकती है। वॉल्यूम तेज होने से कानों का होनेवाला नुकसान आगे जीवन में और मुश्किल खड़ी कर सकता है। कम उम्र के लोगों में अगर यह होता है तो इससे आगे चलकर उन्हें ज्यादा दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। 

21 सालों के अध्ययन का अध्ययन
शोधकर्ताओं ने पिछले 21 सालों के अध्ययन का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला है। अमेरिका में साउथ कैरोलिना विश्वविद्यालय के शिक्षाविदों के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने वर्ष 2000 और 2021 के बीच व्यक्तिगत सुनने वाले उपकरणों और तेज संगीत वाले स्थानों पर हुए पिछले अध्ययनों की जांच की है। इस विश्लेषण में 19,000 से अधिक लोगों पर किए गए 33 अध्ययनों को शामिल किया गया था।

तेज आवाज में गाने सुननेवालों में 27 फीसदी नाबालिग
शोधकर्ताओं ने कहा कि स्मार्टफोन, ईयरफोन, ईयरबड्स इत्यादि पर तेज आवाज में गाने सुननेवालों में 27 फीसदी नाबालिग हैं। 23 फीसदी संख्या वयस्कों की है। यह भी अनुमान लगाया गया है कि दुनिया भर में 12 से 34 वर्ष की आयु के 48% लोग क्लब या बार जैसे तेज आवाज वाले संगीत स्थलों में जाते हैं। इन आंकड़ों के आधार पर शोधकर्ताओं का अनुमान है कि किशोरों और युवा वयस्कों की वैश्विक संख्या जिनके सुनने की क्षमता खो देने का खतरा है, वह 0.67 अरब से 1.35 अरब तक हो सकती है।

भारत सहित दो दर्जन देशों की स्टडी शामिल
इस निष्कर्ष में भारत सहित करीब दो दर्जन देशों की स्टडी को शामिल किया गया है। इसमें उच्च, मध्यम व निम्न आय वाले तीनों तरह के देश शामिल हैं। यूएसए, यूके, स्वीटजरलैंड, नीदरलैंड्स, कनाडा, मेक्सिको इत्यादि देशों को अध्ययन में शामिल किया गया है। 

Wednesday, November 16, 2022

दुनिया@ 8,00,00,00,000, पर तेजी से हो रही बूढ़ी, जानिए भारत का हाल

नई दिल्ली। दुनिया की आबादी मंगलवार को 8 अरब को पार कर गई। पिछले 48 सालों में ही आबादी दोगुनी हो गई है। 1974 में दुनिया की आबादी 4 अरब थी। आबादी बढ़ने के साथ ही बुजुर्गों की संख्या भी काफी तेजी से बढ़ रही है। यूएन की रिपोर्ट के अनुसार पूरी दुनिया में बुजुर्गों की आबादी तेजी से बढ़ रही है। अभी वैश्विक जनसंख्या में 65 की उम्र या उससे अधिक उम्र वाले लोगों की हिस्सेदारी 10 फीसदी है, जबकि 2022 से 2030 के बीच यह बढ़कर 12 फीसदी हो जाएगी तथा 2050 तक 16 फीसदी हो जाएगी। इस दौरान यूरोप और नॉर्थ अमेरिका में हर 4 में से एक व्यक्ति की उम्र 65 साल से ज्यादा होगी।
भारत में 2036 तक बुजुर्गों की संख्या दोगुनी
नेशनल कमीशन ऑन पॉपुलेशन की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 2036 तक बुजुर्गों की संख्या दोगुनी हो जाएगी। मध्यम आयु-समूह (15-59 वर्ष) और बुजुर्गों (60 वर्ष और अधिक) के अनुपात में काफी वृद्धि होगी। जनसंख्या में वृद्ध व्यक्तियों की संख्या 2036 तक 23 करोड़ होने का अनुमान है। 2011 में देश में 10 करोड़ बुजुर्ग थे। कुल जनसंख्या में बुजुर्गों की संख्या में 6.5 फीसदी की वृद्धि होगी। 14.9 प्रतिशत बुजुर्ग होंगे। 

युवाओं की संख्या में वृद्धि का दौर खत्म
भारत में युवाओं की संख्या में वृद्धि का दौर खत्म हो चुका है। 15-24 वर्ष की आयु वर्ग में युवा जनसंख्या 2011 में 23.3 करोड़ से बढ़कर 2021 में 25.1 करोड़ होने का अनुमान था। 2036 तक यह इसके घटकर 22.9 करोड़ पर आने का अनुमान है। जनसंख्या में इस आयु वर्ग की हिस्सेदारी 15.1 फीसदी रह जाएगी, 2011 में यह 19.3 फीसदी थी। यानी 2011 में भारत में आधी आबादी(50.2 प्रतिशत) 24 साल या उससे कम की थी। 2036 में यह 35.3 फीसदी रह जाएगी। 2036 में भारतीयों की औसत आयु 34.5 वर्ष होने की उम्मीद है। 

2018 में पहली बार बुजुर्गों की आबादी बच्चों से ज्यादा हुई थी
दुनिया भर में 2018 में पहली बार 65 वर्ष या उससे अधिक आयु के व्यक्तियों की संख्या पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों से अधिक हुई थी। 2022 में, दुनियाभर में बुजुर्गों की संख्या 77.1 करोड़ है, जो 1980 से तीन गुना ज्यादा है। तब बुजुर्गों की आबादी 25.8 करोड़ थी। 2030 तक बुजुर्गों की आबादी 99.4 करोड़  और 2050 तक 1.6 अरब तक पहुंचने का अनुमान है। 2050 तक वैश्विक स्तर पर 65 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों की संख्या 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की संख्या से दोगुनी से अधिक होगी, जबकि 65 वर्ष की आयु के व्यक्तियों की संख्या या वैश्विक स्तर पर लगभग 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की संख्या के बराबर होगी।

2050 तक दुनिया की 50% आबादी 8 देशों में होगी
यूएन की रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक दुनिया की आबादी का  आधा से ज्यादा हिस्सा केवल आठ देशों में होगा। इनमें भारत, पाकिस्तान, फिलीपींस, मिस्र, कांगो, नाइजीरिया, तंजानिया​ और ​​​​​​इथियोपिया शामिल हैं। इसके अलावा 61 ऐसे देशों का अनुमान भी लगाया है जिनकी आबादी 2022 से 2050 के बीच घट जाएगी। इनमें सबसे ज्यादा देश यूरोप के होंगे। फिलहाल 46 देशों की आबादी सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ रही है, जिनमें से 32 देश सब सहारा अफ्रीका के हैं। 

8 अरब सपने, 8 अरब उम्मीदें
दुनिया भर में पिछले 12 वर्षों में एक अरब लोगों नए लोग जुड़े हैं। भारत अगले साल चीन को दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश के रूप में पछाड़ने के कगार पर है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि वैश्विक आंकड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य में बड़े सुधार का संकेत देता है। मृत्यु का जोखिम कम हुआ है जीवन प्रत्याशा में वृद्धि हुई है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष ने कहा कि आठ अरब उम्मीदें। आठ अरब सपने। आठ अरब संभावनाएं। हमारा ग्रह अब आठ अरब लोगों का घर है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने कहा कि अगर दुनिया अमीरों और वंचितों के बीच की खाई को खत्म नहीं करेगी तो आठ अरब की यह आबादी, तनाव और अविश्वास, संकट और संघर्ष से भरी रहेगी। मानव आबादी लगभग 1800 तक एक अरब से कम थी, और एक से दो अरब तक बढ़ने में 100 से अधिक वर्षों का समय लगा।

ये चुनौतियां भी
आबादी 8 अरब पर भले ही पहुंच गई है लेकिन दुनिया आज वैसी नहीं है जैसी कभी रही है। कई मायनों में लोग अभी भी पुरानी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। हालांकि की उपलब्धियां भी हासिल हुई हैं। विश्व स्तर पर गरीबी दर में गिरावट आई है और विज्ञान ने कई लोगों की जान बचाई है। असमान आय, वैश्विक आबादी के सबसे गरीब आधे हिस्से को आय के दसवें हिस्से से भी कम वेतन मिलता है। जलवायु संकट सबसे बड़ा खतरा है। प्रजनन क्षमता में गिरावट का मतलब है कि दुनिया तेजी से बूढ़ी हो रही है, जिसके परिणाम कुछ विकसित अर्थव्यवस्थाओं में पहले से ही दिखाई दे रहे हैं। महिलाओं ने प्रगति की है लेकिन बेहतर अंतर्संबंध और आर्थिक भागीदारी के फल को भोगने में पीछे रह गई हैं। 

कैसे बढ़ी दुनिया की आबादी, 48 साल में ही हुई दोगुनी

1804 1 अरब

1927 2 अरब

1960 3 अरब

1974 4 अरब

1985 5 अरब

1999 6 अरब

2011 7 अरब

2022 8 अरब

किस देश में कितने लोग (प्रत्येक 100 लोगों में)

चीन         18
भारत 18
यूएस   4
पाकिस्तान    3
नाइजीरिया    3
इंडोनेशिया    3
ब्राजील     3
बांग्लादेश     2
अन्य            46

लोगों की औसत उम्र

1950 22.2 साल

2020 29.7 साल

2100 42.3 साल 

Tuesday, November 15, 2022

चिंताजनक: दुनियाभर में 78.7 करोड़ लोगों के पास पीने का साफ पानी नहीं,1.3 अरब बिना घर के

नई दिल्ली। 
दुनियाभर में 78.7 करोड़ लोगों के पास पीने का साफ पानी नहीं है, 1.3 अरब लोग बिना घर के रह रहे हैं। ये आंकड़े न्यूयॉर्क के फोर्डहम विश्वविद्यालय की रिपोर्ट के हैं। फोर्डहम फ्रांसिस ग्लोबल पॉवर्टी स्कोर 2022 के अनुसार दुनिया की 26.2 प्रतिशत आबादी गरीबी में रहती है। यह पिछले सात सालों में, जब से रिपोर्ट तैयार की जा रही है, सबसे अधिक है। रिपोर्ट के अनुसार भोजन की कमी, महिलाओं के खिलाफ अधिक भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता पर व्यापक प्रतिबंधों ने दुनिया भर में गरीबी को बढ़ाया है। 

 

80 देशों के आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई है रिपोर्ट

रिपोर्ट में कहा गया है कि स्कोर 80 से अधिक देशों से एकत्रित डेटा का औसत है। इसमें कोई भी विकसित देश शामिल नहीं है। रिपोर्ट में आकलन करने के लिए संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों और गैर-सरकारी संगठनों के नवीनतम उपलब्ध डेटा का उपयोग किया गया है। सात पैरामीटर पर रिपोर्ट तैयार की गई है। इसमें चार लोगों की भौतिक जरूरतों से संबंधित हैं, जबकि तीन में शिक्षा, लैंगिंक समानता तथा धार्मिक स्वतंत्रता शामिल है। चार भौतिक जरूरतों में भोजन, पानी आवास और रोजगार शामिल है। विश्वविद्यालय के अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था और विकास में विश्वविद्यालय के स्नातक कार्यक्रम के निदेशक हेनरी श्वालबेनबर्ग ने कहा कि 2015 के बाद सात मानदंडों के तहत मापी गई गरीबी सबसे अधिक है।

 82 देशों की लिस्ट में भारत का स्थान 64वां
82 देशों की लिस्ट में सभी सात पैरामीटर पर भारत का स्थान 64वां है।  भारत का फोर्डहम फ्रांसिस इंडेक्स 0.59 है। 2020 में भारत 44 वें स्थान पर था। भारत 2021 की स्थिति के अनुसार लैंगिक समानता से वंचित टॉप 10 देशों में शामिल है। इस लिस्ट में चीन, पाकिस्तान, वियतनाम, कतर, आर्मेनिया, मालदीव अफगानिस्तान इत्यादि देश भी हैं। हालांकि भोजन, पानी, आवास व रोजगार में भारत टॉप 10 देशों में शामिल नहीं है। 

रिपोर्ट के आंकड़े -
रिपोर्ट बताता है कि स्वच्छ पानी की पहुंच में 2020 में सुधार हुआ है। लेकिन कुपोषित लोगों की संख्या बढ़ी है। इसी तरह, बिना घर वाले लोगों की संख्या बढ़ी है। 

 -10.1%, 2020 में लगभग 78.7 करोड़ लोगों के पास स्वच्छ पानी नहीं मिला।
-2019 में 9.2 प्रतिशत लोग, लगभग 71 करोड़ कुपोषित थे।
-17.2 प्रतिशत लोग, लगभग 1.3 बिलियन के पास घर नहीं
-वयस्क आबादी का 13.3 प्रतिशत, लगभग 77.6 करोड़ 2020 में निरक्षर थे।
- दुनिया की श्रम शक्ति का 23.2 प्रतिशत, लगभग 80.4 करोड़ लोग बिना काम के थे।
या वे 2021 में प्रति दिन 3.20 डॉलर से कम वेतन पर काम कर रहे थे।
-दुनिया में 51.2% महिलाएं और लड़कियां ऐसे समाज में रहती हैं जहां उनके साथ लैंगिक आधार पर भेदभाव किया जाता है। दुनियाभर में 2 अरब महिलाएं ऐसी हैं।
-4.5 अरब लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता पर अलग-अलग तरीकों से प्रतिबंध लगाए गए। 


सेंट्रल टेक्सास में लक्जरी घर खरीदने में सबसे आगे हैं भारतीय


नई दिल्ली। ऑस्टिन बोर्ड ऑफ रियल्टर्स द्वारा हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका के सेंट्रल टेक्सास में घर खरीदने में दुनिया में सबसे आगे भारतीय हैं। ऐसा पहली बार हुआ है जब भारतीय मूल के लोगों ने दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले टेक्सास में सबसे ज्यादा घर खरीदा है। 

सेंट्रल टेक्सास इंटरनेशनल होमबॉयर्स रिपोर्ट 2022 अंतर्राष्ट्रीय होमबॉयर्स भारत के लोगों का हिस्सा 21 फीसदी है। जो सबसे अधिक है। इसके बाद मेक्सिको का स्थान है वहां के लोगों का 10 फीसदी हिस्सा है। चीनके 6 फीसदी व कनाडा के 4 फीसदीलोगों ने घर खरीदा है। 

41 फीसदी भारतीय हैं 
ग्रेटर ऑस्टिन एशियन चैंबर ऑफ कॉमर्स के अनुसार, ग्रेटर ऑस्टिन में 1.65 लाख एशियाई अमेरिकी व्यक्ति रहते हैं जिसमें 41 प्रतिशत भारतीय हैं। यह वर्ष 2010 के मुकाबले 30 प्रतिशत अधिक है। रिपोर्ट के अनुसार ऑस्टिन के तकनीकी क्षेत्र में वृद्धि की वजह से भारतीय घर खरीदारों की संख्या बढ़ रही है।  

भारत से ज्यादातर विदेशी खरीदार संपत्ति खरीदने के लिए अमेरिकी मॉर्गेज फाइनेंसिंग (82 फीसदी) का इस्तेमाल करते हैं, जबकि 12 फीसदी खरीदारी पूरी तरह से नकद होती है। 

विलियमसन काउंटी भारतीयों की पसंद
टेक्सास में विलियमसन काउंटी भारतीयों की सबसे ज्यादा पसंद है। यहां 53 फीसदी भारतीयों ने घर खरीदा है। इसके बाद ऑस्टिन शहर के अंदर ट्रेविस काउंटी में 24 प्रतिशत, ऑस्टिन शहर के बाहर 18 प्रतिशत और हेस काउंटी में छह प्रतिशत की खरीदारी हुई है। अंतरराष्ट्रीय होमबॉयर्स ने अप्रैल 2021 से मार्च 2022 तक ग्रेटर ऑस्टिन क्षेत्र में संपत्तियों पर 61.3 करोड़ डॉलर खर्च किए हैं। 

सेंट्रल टेक्सास, न्यूयॉर्क और फ्रांसिस्को जैसे महानगरों का विकल्प
रिपोर्ट के मुताबिक, सेंट्रल टेक्सास भारतीय घर खरीदारों के लिए न्यूयॉर्क और सैन फ्रांसिस्को जैसे महंगे महानगरीय क्षेत्रों का विकल्प प्रदान करता है। यहां अपार्टमेंट से लेकर एकल-परिवार के लिए घरों की सुविधा उपलब्ध है। अंतर्राष्ट्रीय होमबॉयर्स में गैर-अमेरिकी नागरिक शामिल हैं जो यहां ग्रीन कार्ड पर हैं या यहां विदेशी कार्य या छात्र वीजा पर हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि आधे से अधिक विदेशी खरीदारों के पास अमेरिकी ग्रीन कार्ड है, जो दर्शाता है कि वे वैध स्थायी निवासी हैं।

भारतीयों ने किस तरह के घर खरीदे

सिंगल फैमिली होम प्रॉपर्टी- 94 %
आवासीय भूमि 6%
प्राथमिक आवास के लिए 59 फीसदी खरीदारी
35 फीसदी घरों का उपयोग किराये के लिए किया जा रहा
6 फीसदी लोगों ने अन्य कामों के लिए खरीदारी की
घरों की औसत कीमत- 513900 डॉलर( 4.17 करोड़ रुपए से अधिक) 

Monday, November 14, 2022

विश्व मधुमेह दिवस: युवा क्यों आ रहे चपेट में, जानिए ?

 

नई दिल्ली। इंटरनेशनल डायबेट्स फेडरेशन की रिपोर्ट के अनुसार 53.7 करो़ड़ लोग मधुमेह की बीमारी से ग्रसित हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। हालांकि अच्छी बात यह है कि लोगों में जागरूकता भी बढ़ रही है। हेल्थकेयर कंपनी प्रैक्टो की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक साल में युवाओं में मधुमेह से संबंधि सलाह में 46 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। यह सर्वे अक्टूबर 2020 से सितंबर 2021 तथा अक्टूबर 2021 से सितंबर 2022 के आंकड़ों पर आधारित है।

सलाह लेनेवालों में आधे युवा 25-34 साल के

रिपोर्ट के अनुसार मधुमेह से संबंधित सलाह लेनेवाले युवाओं में 50 फीसदी 25-34 साल की आयुवर्ग के थे। पिछले वर्ष से परामर्श लेने में उनकी हिस्सेदारी में 46 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 35-44 साल के युवाओं में सलाह लेने की प्रवृत्ति 33 फीसदी बढ़ी है जबकि 45-54 साल के लोग 8 फीसदी थे।  डॉक्टरों का सुझाव है कि खराब जीवन शैली  व्यायाम न करना तथा खराब आहार की आदतें युवा भारतीयों में मधुमेह के लिए जिम्मेदार  हैं। 

 5.36 लाख मरीजों के सैंपल में 44 फीसदी 40-60 साल के

टाटा1 एमजी की ओर से जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार मार्च से अक्टूबर 2022 तक जांच किए गए सैंपल में 1 तिहाई लोगों में मधुमेह पाया गया। जिसमें 40-60 साल के उम्र के लोगों की संख्या सबसे अधिक थी। इसके अलावा मधुमेह रोगियों का अनुपात महिलाओं की तुलना में पुरुषों में अधिक पाया गया। । यह रिपोर्ट उन लोगों पर किए गए डेटा विश्लेषण के आधार पर तैयार की गई है, जो मधुमेह के लिए खुद की जांच करवाना चाहते थे। 

मार्च-अक्टूबर 2022 के बीच मधुमेह के लिए कुल 536,164 ब्लड सैंपल की जांच की गई। इन नमूनों में से 180,891 (लगभग 33 प्रतिशत) में मधुमेह पाया गया। सबसे अधिक 44 फीसदी 40-60 साल की उम्र केथे। उसके 60 साल से ऊपर के 42 फीसदी, 25-40 साल के 12.5 फीसदी लोगों में मधुमेह पाया गया।

मधुमेह की स्थिति 

- भारत में 7.7 करोड़ लोग मधुमेह से पीड़ित हैं

- दुनिया में 53.7 करोड़(20-79 साल के) पीड़ित हैं

- यानी हर 10 में से 1 व्यक्ति डायबिटीज से ग्रसित है। 

- 2030 तक  इसके 64.3 करोड़ पर पहुंचने का अनुमान है

-2045 तक दुनियाभर में 78.3 करोड़ लोग मधुमेह से ग्रसित होंगे

-2021 में 67 लाख लोग मधुमेह से मरे

स्त्रोत- इंटरनेशनल डायबेट्स फेडरेशन  

Sunday, November 13, 2022

पांच साल बाद दुनिया को मिलेगी सबसे घातक हाईपरसोनिक मिसाइल

नई दिल्ली। पांच साल बाद, 2027 में दुनिया को सबसे घातक हाईपरसोनिक मिसाइल मिलेगी। नई हाईपरसोनिक अटैक क्रूज मिसाइल(एचएसीएम) वर्तमान मिसाइल से 20 गुना तेजी से उड़ान भरेगी। इस मिसाइल से दुश्मनों को बचने का मौका नहीं मिलेगा। यह अपनी तरह का पहला मिसाइल होगा जो एयर-ब्रीदिंग स्क्रैमजेट इंजन का इस्तेमाल करेगा। अमेरिका और आस्ट्रेलिया के लिए यह मिसाइल निर्माण किया जा रहा है। 


अमेरिकी कंपनी कर रही निर्माण 

मिसाइल का निर्माण अमेरिकी कंपनी रेथियॉन और नॉर्थ्रॉप ग्रुम्मन करेगी। कंपनी 98.5 करोड़ डॉलर से हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल विकसित करेगी। संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के लिए विकसित किया जानेवाले यह मिसाइल जमीन पर हमले के लिए डिज़ाइन किया गया है। अनुबंध की शर्तों के तहत, अमेरिका को 2027 में पहली मिसाइल मिलेगी।  2020 में, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने संयुक्त रूप से साउदर्न क्रॉस इंटीग्रेटेड फ़्लाइट रिसर्च एक्सपेरिमेंट पार्टनरशिप(एससीआईफायर) की शुरुआत की। ऑस्ट्रेलिया के राष्ट्रीय ध्वज पर दिखाई देने वाले नक्षत्र के नाम पर एससीआईफायर का उद्देश्य एक एयर-ब्रीदिंग हाइपरसोनिक हथियार प्रणाली विकसित करना था।  

 क्या है पारंपरिक क्रूज मिसाइल
पारंपरिक क्रूज मिसाइल मूल रूप से पायलट रहित विमान हैं। टर्बोफैन इंजन क्रूज मिसाइलों को शक्ति प्रदान करते हैं। राडार से बचने के लिए क्रूज मिसाइलें कम उंचाई पर उड़ती हैं। टॉमहॉक क्रूज मिसाइलें 550 मील प्रति घंटे की गति से 98 से 164 फीट की ऊंचाई पर उड़ती हैं।

हाईपरसोनिक मिसाइल
एचएसीएम एक हाइपरसोनिक हथियार है, जिसका अर्थ है कि ध्वनि की गति से 5 गुना तेज गति गति से उड़ान भरता है। अधिकांश मिसाइलें लगभग मच 3(ध्वनि की गति से 3 गुना अधिक) तेजी से उड़ान भरती हैं।  टर्बोफैन इंजन की तरह, स्क्रैमजेट ईंधन के के लिए आसपास के वातावरण से ऑक्सीजन लेते हैं। नासा के अनुसार, स्क्रैमजेट इंजनों को कम से कम 15 मच तक काम करना चाहिए। यह प्रति घंटे 11,509 मील की दूरी तय करता है, या लगभग दो घंटे में पृथ्वी का चक्कर लगा सकता है। 

अमेरिकी रक्षा कंपनी रेथियॉन भारत में रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र में काम कर रही
भारत के एयरोस्पेस और रक्षा क्षेत्र के लिए रेथियॉन टेक्नोलॉजी काम कर रही है। 1940 के दशक से ही कंपनी काम कर रही है। कंपनी मेक इन इंडिया के तहत नेट जीरो एमिशन की दिशा में देश की मदद करने के लिए स्थानीय स्तर पर उत्पादों को विकसित करने के लिए भारत में स्थित फर्मों के साथ साझेदारी कर रही है। यहां 5 हजार से ज्यादा कर्मचारी आधुनिक हथियार बनाने में लगे हैं।

अंतरिक्ष में भारत के नए युग की शुरुआत, अब स्पेसएक्स को मिलेगी टक्कर

स्काईरूट द्वारा बनाया रॉकेट

 नई दिल्ली। स्पेसएक्स की तरह भारत भी अब निजी रॉकेट के जरिए   अंतरिक्ष में कदम रखने को तैयार है। भारत का पहला निजी तौर पर   विकसित रॉकेट विक्रम-एस तीन पेलोड के साथ मिशन पर 15 नवंबर को   लॉन्च के लिए तैयार है। हैदराबाद स्थित अंतरिक्ष स्टार्टअप स्काईरूट   एयरोस्पेस द्वारा इसे विकसित किया गया है। स्काईरूट एयरोस्पेस का   यह पहला मिशन है। इसका नाम 'प्रारंभ' रखा गया है। रॉकेट दो   भारतीय और एक विदेशी पेलोड ले जाएगा। इसे श्रीहरिकोटा में भारतीय   अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के लॉन्चपैड से लॉन्च किया जाएगा। 

विक्रम एस क्या है?

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई के नाम पर रॉकेट का नाम विक्रम एस रखा गया है। यह एक छोटा-लिफ्ट लॉन्च वाहन है। इसे अंतरिक्ष उद्योग के लिए एक नए युग की शुरुआत का संकेत बताया जा रहा है। स्काईरूट एयरोस्पेस के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर नागा भरत डाका के अनुसार विक्रम-एस रॉकेट एक सिंगल-स्टेज सब-ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल है जो तीन ग्राहक पेलोड ले जाएगा और अंतरिक्ष लॉन्च वाहनों की तकनीकों का परीक्षण और सत्यापन करने में मदद करेगा।

सीरीज में तीन रॉकेट, इंटरनेट जीपीएस की सेवाएं बेहतर होंगी 

'विक्रम' सीरीज में तीन रॉकेट हैं जिन्हें छोटे उपग्रहों को लॉन्च करने के लिए विकसित किया जा रहा है। ये अंतरिक्ष और पृथ्वी इमेजिंग से ब्रॉडबैंड इंटरनेट, जीपीएस, आईओटी जैसी संचार सेवाओं को बेहतर करने में मदद करेंगे।

815 किलो तक के उपग्रह को ले जा सकेंगे
स्टार्टअप मीडिया एंड इंफॉर्मेशन प्लेटफॉर्म आईएनसी42 की रिपोर्ट में कहा गया है कि विक्रम सीरीज़ (1, 2, 3) में सॉलिड-स्टेट रॉकेट शामिल हैं जो कार्बन कंपोजिट और 3डी-प्रिंटेड मोटर्स के साथ अपग्रेड होनेवाले आर्किटेक्चर पर बनाए गए हैं। इसे 72 घंटे से कम समय में असेंबल और लॉन्च किया जा सकता है। वे 815 किलोग्राम तक के वजन वाले उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षा और सूर्य-समकालिक ध्रुवीय कक्षाओं  में ले जा सकते हैं।

विक्रम-1 सीरीज का पहला प्रक्षेपण होगा जिसमें तीन ठोस ईंधन, साथ ही एक तरल-ईंधन किक चरण शामिल है। यह कम झुकाव वाली कक्षाओं में 480 किलोग्राम वजन वाले हल्के उपग्रहों को ले जाने में सक्षम होगा। अन्य दो, विक्रम 2 और विक्रम 3 में कई कक्षीय सम्मिलन के साथ भारी पेलोड होंगे।

सब-ऑर्बिटल मिशन क्या है?
एक सब-ऑर्बिटल(उप-कक्षीय) अंतरिक्ष यान तब होता है जब एक अंतरिक्ष यान उस गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र को छोड़ देता है जिससे इसे लॉन्च किया गया था। उप-कक्षीय मिशन कक्षा की तुलना में कम ऊंचाई पर होते हैं। वास्तविक कक्षा में अंतरिक्ष यान के प्रक्षेपण से पहले प्रयोग के रूप में इन्हें महत्वपूर्ण माना जाता है। चेन्नई स्थित एक एयरोस्पेस स्टार्टअप, स्पेसकिड्ज़ विक्रम-एस के उप-कक्षीय उड़ान पर भारत, अमेरिका, सिंगापुर और इंडोनेशिया के छात्रों द्वारा विकसित 2.5 किलोग्राम पेलोड 'फन-सैट' उड़ाएगा।

 2020 में इसरो ने निजी कंपनियों के लिए खोला था दरवाजा
इसरो ने 2020 में निजी क्षेत्र को पहली बार रॉकेट एवं उपग्रह बनाने और प्रक्षेपण सेवाएं मुहैया कराने की अनुमति दी थी। हैदराबाद में स्थित, स्काईरूट पहला स्टार्टअप है जिसने अपने रॉकेट लॉन्च करने के लिए इसरो के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। इसका उद्देश्य किफायती, विश्वसनीय और सभी के लिए नियमित अंतरिक्ष उड़ान के मिशन को आगे बढ़ाते हुए कम लागत पर उपग्रह प्रक्षेपण सेवाओं को उपलब्ध कराना है.। 


Saturday, November 12, 2022

सौर ऊर्जा से छह महीने में भारत ने बचाए तेल पर खर्च होनेवाले इतने हजार करोड़ रुपए

नई दिल्ली। सौर ऊर्जा के माध्यम से भारत ने इस साल जनवरी से लेकर जून तक की पहली छमाही में ईंधन पर
खर्च होनेवाले 420 करोड़ अमेरिकी डॉलर(34 हजार करोड़ से अधिक रुपए) बचाए हैं। साथ ही भारत ने 19.4 मिलियन टन कोयले की भी बचत की है। एनर्जी थिंक टैंक एम्बर, सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर, और इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस द्वारा जारी रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ है। रिपोर्ट में पिछले 10 सालों में सौर ऊर्जा के विकास से संबंधित विश्लेषण किया गया है। 

सबसे अधिक चीन ने बचाए
रिपोर्ट में कहा गया है कि सबसे अधिक 34 बिलियन अमरीकी डालर की बचत चीन ने की है। वहां सौर ऊर्जा बिजली की कुल मांग का 5% पूरा करता है। इस अवधि के दौरान अतिरिक्त कोयला और गैस आयात में लगभग 21 बिलियन अमरीकी डालर बचाया गया है। चीन के बाद, जापान ने सौर ऊर्जा उत्पादन के कारण ईंधन की लागत में 5.6 बिलियन अमरीकी डालर की बचत की है। वियतनाम ने ईंधन लागत में 1.7 बिलियन अमरीकी डालर की बचत की है यहां 2018 में सौर उत्पादन लगभग शून्य टेरावाट घंटा था, जो अपने आप में एक बड़ी वृद्धि है।

सौर क्षमता वाली शीर्ष 10 अर्थव्यवस्थाओं में 5 अब एशिया में
रिपोर्ट के अनुसार सौर क्षमता वाली शीर्ष 10 अर्थव्यवस्थाओं में से पांच अब एशिया में हैं, जिनमें चीन, जापान, भारत, दक्षिण कोरिया और वियतनाम शामिल हैं। चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, फिलीपींस और थाईलैंड सहित सात प्रमुख एशियाई देशों ने जनवरी से जून 2022 तक लगभग 34 बिलियन अमरीकी डालर की संभावित जीवाश्म ईंधन की बचत की है, जो कुल जीवाश्म ईंधन लागत के 9% के बराबर है। 

बिजली की मांग में सौर ऊर्जा का हिस्सा 11 फीसदी
वर्ष 2022 में, जनवरी से जून तक बिजली की मांग में सौर ऊर्जा का 11% हिस्सा था। थाईलैंड और फिलीपींस में बचाई गई ईंधन लागत उल्लेखनीय है। फिलीपींस केवल 1% के लोगों के लिए सौर ऊर्जा उपलब्ध कराता है लेकिन इसके बावजूद ईंधन खर्च में 78 मिलियन अमरीकी डालर की बचत की है। वहीं थाईलैंड जहां सौर ऊर्जा बिजली का केवल 2 पीसदी है, अनुमानित 209 मिलियन अमेरिकी डॉलर की बचत की है।  इन दोनों देशों में सौर ऊर्जा का विकास धीमा रहा है। लेकिन फिर भी काफी अधिक राशि बचाई है।  

भारत में बिजली की डिमांड पिछले 10 सालों में 82 फीसदी बढ़ी है
भारत में वर्ष 2010 से 2021 तक पिछले 10 सालों में बिजली की मांग में 82 फीसदी की वृद्धि हुई है। इसी अवधि में वैश्विक स्तर पर बिजली की मांग में 31.8% की वृद्धि दर्ज की गई है। एशिया के अन्य देशों में वियतनाम में सबसे अधिक वृद्धि 125 फीसदी हुई है। इसके बाद चीन में 102 फीसदी, इंडोनेशिया  में 75 फीसदी, मलेशिया में 39 फीसदी तथा थाईलैंड मे 34 फीसदी की वृद्धि हुई है। 

 

मिसाइल हमले में बची सात साल की इस बच्ची की प्रतिभा ने दुनिया को चौंकाया

नई दिल्ली। सीरिया की मूल निवासी सात साल की बच्ची शम अल बकर ने दुबई ओपेरा में अरब रीडिंग चैंपियन का खिताब जीता है। वह जब सिर्फ छह माह की थी, तब सीरिया में गृहयुद्ध के दौरान पिता के साथ कार में यात्रा करते हुए एक मिसाइल आक्रमण में बच गई थी। हालांकि, इस घटना में उसके पिता की मौत हो गई थी। अरब रीडिंग चैंपियन बनने पर उसे पांच लाख दिराम (एक करोड़ रुपये से अधिक) की राशि पुरस्कार के तौर पर मिली है। 

(मिसाइल हमले में बची बच्ची के साथ दुबई के शासक)

बकर ने यह खिताब 44 देशों के 22.27 मिलियन (करीब सवा दो करोड़) बच्चों के बीच सबसे शानदार प्रदर्शन करते हुए जीता। संयुक्त अरब अमीरात के उप राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और दुबई के शासक शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम ने उसे पुरस्कृत किया। दुबई के शासक शेख मोहम्मद ने कहा कि अरब रीडिंग चैलेंज एक ऐसी सभ्यता का निर्माण करने प्रतियोगिता है जो किताबों के माध्यम से शुरू होती है। हमारा लक्ष्य है कि हर घर में कम से कम एक पाठक हो। हम हमारे अरब युवाओं के लिए बिना पढ़े और ज्ञान के बेहतर भविष्य का निर्माण नहीं कर सकते।

70 किताबें पढ़ीं प्रतियोगिता जीतने के लिए
प्रतियोगिता जीतने के लिए बकर ने 70 किताबें पढ़ीं। उसने कहा, 'मुझे पढ़ना पसंद है, क्योंकि ऐसा बहुत कुछ है जिसे आप सीख सकते हैं ताकि सफल हो सकें। मैं सभी बच्चों को इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए आमंत्रित करती हूं, क्योंकि यह बहुत ही फायदेमंद है।' जूरी के एक सवाल के जवाब में उसने कहा, एक किताब को तीन बार पढ़ना तीन किताबों को एक बार पढ़ने से बेहतर है। इससे हम सीख सकते हैं और अपने जीवन में लागू कर सकते हैं।


ट्यूनिशिया के एडम दूसरे स्थान पर

ट्यूनीशिया के एडम अल कासिमी पढ़ने की चुनौती में दूसरे स्थान पर रहे, जबकि जॉर्डन के राशिद अल खतीब ने तीसरा स्थान हासिल किया। एडम को एक लाख दिराम (20 लाख रुपए से अधिक) और राशिद को 70 हजार दिराम (करीब 15 लाख रुपए) का नकद पुरस्कार दिया गया।

Friday, April 6, 2012

देश बदला कि नहीं यह पूछने वाले आप कौन होते हैं?

कल आधी रात के बाद मेरे मोबाईल पर एक मैसेज आया- “अन्ना के आंदोलन का एक साल पूरा हो गया। क्या बदल गया देश?” मेरा जवाब था “बड़े परिवर्तन में वक्त लगता है। निरंतर संघर्ष से ही हमें विजय हासिल होगी। अगर आप मानते हैं कि अन्ना का आंदोलन सही है, तो आपको भी इस लड़ाई को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उठानी चाहिए। और ये लड़ाई देश को बदलने के लिए नहीं एक कानून की माँग को लेकर थी। जो अभी जारी है। देश बदलने की लड़ाई आपको ही लड़नी पड़ेगी।“ दरअसल हममें से ज्यादातर लोग इस बात को समझ बैठे हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ़ मजबूत लोकपाल को लेकर जो लड़ाई ठीक एक साल पहले छेड़ी गयी वह अन्ना का आंदोलन है, और हमें तमाशबीन बनकर सिर्फ़ सवाल उठाना है। यानी कुछ भी कहो लेकिन सही हम ही हैं, और हम कहते थे कि कुछ भी बदलने वाला नहीं है, वाली मानसिकता पूरे समाज में इस तरह से गहरी पैठ बना  चुकी है कि इससे बाहर निकलना एक अनसुलझी पहेली बन गयी है। यहाँ मसला सिर्फ़ अन्ना के आंदोलन का ही नहीं है, सामाजिक कुरीतियों के अबतक समाज में बने रहने के पीछे भी यही मानसिकता है। सवाल है फिर लड़ेगा कौन? भ्रष्टाचार से लोग किस तरह से त्रस्त हैं, यह बात सड़कों पर उतरी लाखों की भीड़ ने साबित कर दिया है लेकिन पहल की जिम्मेदारी कितने लोग लेते हैं? सवाल यही है।
दरअसल 73 साल के अन्ना हजारे हिन्दुस्तान की बहरी सियासत के सामने उस घुन की दवा माँगने आए थे, जिसने पूरे मुल्क को खोखला बना दिया है। 5 अप्रैल को जंतर-मंतर पर अनशन उस दधिची की चेतावनी थी जिसने अपनी उम्र अन्याय के खिलाफ़ आवाम की आँखें खोलने में गुजार दी। पिछले छः दशकों से जिस चिंगारी को पूरा समाज अपने सीने में दबाए जी रहा था, उसी चिंगारी को हवा देते हुए जब एक बूढ़े ने सरकार से साफ़ लफ़्ज़ों में कहा कि सम्राट आँखें खोलो, तो शायद पहली बार सरकार को उसकी हैसियत का अंदाज़ा लगा। आजादी के बाद बिना किसी राजनीतिक बैनर के लोग सड़कों पर इतनी बड़ी संख्या में पहली बार उतरे थे, सुसुप्तावस्था से जागने के लिए क्या इतना काफी नहीं था। अभी भी जो लोग सवाल उठा रहे हैं उन्हें क्या खुद से यही सवाल नहीं करना चाहिए?
पिछले एक साल में तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद लोगों की भागीदारी राजनीतिक जागरूकता का परिचय देती हैं। यह सच है कि लड़ाई के एक साल बाद भी उद्देश्य पूरा नहीं हुआ है लेकिन क्या यह सरकार की नाकामी नहीं है? याद कीजिये पिछली बार संसद कब एक जुट हुई थी? जब सांसदों के खिलाफ़ आपत्तिजनक टिप्पणी हुई। इस टिप्पणी को हम नजरंदाज भी करें तो क्या यह सवाल सांसदों से नहीं पूछा जाना चाहिए कि आपकी यही एकजुटता उस समय क्यों नहीं दिखती जब मंहगाई पर चर्चा होती है, जब गरीबी से निजात के रास्ते निकालने पर चर्चा होती है। जब जनता के हित के लिए सवाल पूछने की बारी आती है। उलटे आप सदन से अनुपस्थित रहते हैं। ज़ाहिर है संसदीय प्रणाली में कानून बनाने की जिम्मेदारी संसद की है लेकिन संसद को इस जिम्मेदारी का ख्याल पिछले बयालीस सालों में क्यों नहीं आया?
आज जबकि हर दिन एक नया घोटाला सामने आ रहा है तो भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सख्त कानून की प्रासंगिकता और बढ़ गयी है। लेकिन बड़ा सवाल है कि इसे समझेगा कौन? आम जनता का पाला कनिमोंझी, कलमाड़ी और ए राजा जैसे तथाकथित बड़े लोगों से नहीं पड़ता उसे सरकारी दफ्तरों में  बैठे अधिकारी से काम होता है जहाँ से उसे आवासीय और जाति प्रमाण पत्र जैसे ज़रुरी कागजात बनाने पड़ते हैं। विडम्बना यह है कि उसके लिए उन्हें घुस देना पड़ता है। इस स्तर के भ्रष्टाचार को दूर करने की जरुरत है। ज़ाहिर एक कानून भ्रष्टाचार दूर नहीं कर सकता, लेकिन बाकी बातें बाद में भी हो सकती है पहले कानून बनना चाहिए।
गिरिजेश कुमार

Tuesday, March 27, 2012

मानवता की हत्या के साथ-साथ रिश्तों का भी क़त्ल!

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ये रिश्तों का क़त्ल  है!

“वो लोग जबरदस्ती गाडी में बैठ गए। उसके बाद सब सामान माँगने लगे और फिर आंटी(Aunty) को बगल की गली में जाने कहा फिर मार दिया” यह बयान है चार साल के उस बच्चे का जिसकी आँखों के सामने उसकी आंटी का पहले सामूहिक बलात्कार किया गया, फिर हत्या कर दी गयी। खौफ और डर से परेशान चेहरे से निकली उस बच्चे की आवाज जब कानों तक पहुँचती है तो अनायास ही मन करुणा और व्यवस्था के प्रति आक्रोश से भर जाता है। प्रशासनिक लापरवाही का इससे बड़ा उदहारण और क्या होगा कि इस घटना के बारह घंटे बीत जाने के बाद भी एफ आई आर दर्ज नहीं हुई थी। प्रशासन के आला अधिकारी घटनास्थल कभी जमुई जिले के अंतर्गत बता रहे थे तो कभी लखीसराय जिले के अंतर्गत। हत्या, लूट और बलात्कार इनमें से कोई एक घटना अगर किसी के साथ हो जाए  तो पहाड़ टूटने के सामान होता है लेकिन यहाँ तो तीनों घटना एक ही परिवार के साथ घटी थी। मजबूर और लाचार उस व्यक्ति की हालत क्या होगी इसकी सिर्फ़ कल्पना की जा सकती है। लेकिन सवाल है लड़ा किससे जाए  झूठी सरकार से, बेशर्म प्रशासन से, समाजहित का चोला पहने मीडिया से या रूठी किस्मत से?  
बीते रविवार की देर रात जब झारखण्ड का परिवार राजगीर के ऐतिहासिक स्थलों को देखकर वापस लौट रहा था तो उसने इस बात की कल्पना भी नहीं की होगी कि इस ऐतिहासिक सुंदरता का बखान वह अपने परिजनों से नहीं कर पाएँगे। उनकी गलती बस इतनी थी कि नीतीश सरकार के परिवर्तित बिहार की जो झूठी पहचान पूरे देश में बनाई गयी है, उसकी सच्चाई से वाकिफ़ नहीं थे या कहें कि उसके झाँसे में आ गए था। बिहार के जमुई जिला अंतर्गत जमुई-लखीसराय सड़क पर कुछ गुंडों ने जबरदस्ती कार को रोककर झारखण्ड के एक व्यवसायी परिवार के साथ लूटपाट की और परिवार की महिला के साथ सामूहिक बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी गयी। बेबस, लाचार परिवारवाले गनपॉइंट पर खड़े होकर इसे देखने को विवश थे। तो कानून व्यवस्था में सुधार का दावा करने वाली पुलिस सोयी हुई थी। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सुबह जब पुलिस का एक अधिकारी अस्पताल पहुँचा तो उसने एफआईआर रिपोर्ट भी नहीं पढ़ी थी। और घटना के चौबीस घंटे से ज्यादा बीत जाने के बाद भी बलात्कार की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पायी थी। कई सवाल मुँहबाए खड़ी है, जवाब देनेवाला कोई नहीं। भुगते वो जिसके सर पर ग़मों का पहाड़ टूटा। आज मानवता हारी नहीं, मर गयी।
स्तब्ध करने वाली यह घटना सीधे-सीधे राज्य सरकार की विफलता और उसके झूठे दावों की पोल खोलती है। अफ़सोस यह भी है राजनीति की जो पूँजी हमारे पास थी वह पूँजी की राजनीति में तब्द्दील हो चुकी है। आम लोग आखिर भरोसा किसपर करें? लोकतंत्र अगर मजबूर तंत्र में तब्दील हो जाए तो अन्याय और अत्याचार के खिलाफ़ आवाज कौन उठाएगा? जो घटना हमारी संवेदनशीलता को झकझोरती हैं और संवेदनहीनता उजागर करती हैं उसपर समाज के हित के लिए लड़नेवाली मीडिया की चुप्पी आश्चर्यजनक है।
मानवता, मनुष्यता, और व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश से भर देने वाली इस घटना की तपिश न तो प्रशासनिक तंत्र महसूस कर रहा है और न ही लोग। मानवीय संवेदना और इंसानी रिश्ते को झकझोर कर रख देने वाली इस घटना के दर्द को महसूस कर रहा हर व्यक्ति आज शर्मिंदा है। सवाल यह भी है कि जमुई जैसी घटना किसी मंत्री, विधायक, सांसद या अफसर के रिश्तेदारों के साथ क्यों नहीं घटती? क्यों बार-बार वही आम इसका शिकार होता है? मुख्यमंत्री घटना के दूसरे दिन तक रिपोर्ट मंगा रहे हैं तो दूसरी तरफ कार्रवाई का भरोसा दिया जा रहा है। लेकिन जिस भरोसे का क़त्ल राज्य सरकार और उसकी पुलिस ने किया उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? अपराध को रोका नहीं जा सकता लेकिन अपराधी बेख़ौफ़ क्यों हैं? इसका जवाब कौन देगा? और सबसे बड़ा सवाल क्या पीड़ितों को इंसाफ मिलेगा? शायद ये पूछना ही बेवकूफी है।

इस  कथित हत्याकांड में एक नया मोड़ आ गया है। कहा जा रहा है कि महिला के पति ने ही एक साजिश के तहत हत्या को अंजाम दिया। इसके लिए उसने बकायदा अपराधियों को सुपारी दी थी। चचेरी साली से अवैध सम्बन्ध को हत्या का कारण बताया गया है। उक्त जानकारी लखीसराय की एसपी ने प्रेस कांफ्रेंस में दी हैं। जाँच अभी जारी है। हालाँकि लोग इसे घटना की लीपापोती बता रहे हैं। सबसे पहले ऐसा आरोप मृत महिला के भाई ने लगाया था। इस सम्बन्ध में मृतक के पति समेत तीन लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। महिला का नाम सुमन है। (तारीख -31/03/12)  
गिरिजेश कुमार

Friday, March 23, 2012

अधूरा है देश के नायकों का सपना!

किसी भी देश की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने नायकों को किस तरह से याद करता है भारत ही नहीं बल्कि विश्व इतिहास में देश के लिए त्याग और बलिदान के प्रतीक शहीद-ए-आजम भगत सिंह किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं। अंग्रेजों के साम्राज्य विस्तार की नीतियों और पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ भगत सिंह एक मजबूत चट्टान के रूप में खड़े हुए थे। भारतीय इतिहास  में 23 मार्च 1931 का दिन बड़े ही श्रद्धा और आदर के साथ याद किया जाता है। यही वह दिन था जब दुनिया ने देखा कि हिन्दुस्तानी देश के लिए किस तरह से अपना सबकुछ कुर्बान कर देते हैं। लेकिन क्या इस कुर्बानी को हम सहेज कर रख पाए हैं? हर साल शहीदी दिवस के दिन फूल मालाएँ चढाकर औपचारिकताएं पूरी करते वक्त यही वो सवाल है जो हमें सोचने को मजबूर करता है। इससे भी बड़ा सवाल ये है कि आखिर शहीदों की शहादत अपने ही देश में वन्दनीय क्यों है?   
28 सितम्बर 1907 को पंजाब के लायलपुर में जन्मे भगत सिंह का पूरा परिवार ही  आजादी आंदोलन के संघर्षों में सक्रिय था। भगत सिंह के अंदर देशभक्ति की भावना इसी पारिवारिक माहौल का ही नतीजा थी। लेकिन अफ़सोस कि जिस व्यक्ति के नाम लेते ही हजारों लोगों की आँखें नाम हो जाती हैं,  उनके क्रान्तिकारी विचारों से प्रभावित होकर लाखों लोग सड़कों पर अन्याय और अत्याचार के खिलाफ उतर आते हैं उन्हें भुलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है  आज जिन विचारों की देश को सबसे ज्यादा ज़रूरत थी उन्ही विचारों को जड़ से मिटाने की कोशिशें हो रही हैंवर्तमान में जबकि देश में आर्थिक असमानता दिन ब दिन बढती जा रही है, घोटाले, भ्रष्टाचार और लूट में पूरा देश लिप्त है, आपसी भेदभाव पूरे समाज को पीछे धकेल रहा है,  आम लोग चाहकर भी विरोध में आवाजें नहीं उठा पाते, लोग असंगठित होकर लड़ तो रहे हैं लेकिन उनकी आवाज़ कहीं दब कर रह जाती है ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भगत सिंह और उनके साथियों की क्रान्तिकारी  विचारधारा एक नई ऊर्जा प्रदान करती है।  अन्याय और अत्याचार के खिलाफ मजबूत विचारों से लैस होकर जहाँ ज़रूरत थी एक संगठित संघर्ष की वहीँ समाज में लोग हताशा और निराशा की ज़िन्दगी जी रहे हैं। अवसाद से ग्रसित होकर लोग आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम भी उठा रहे हैं, जिसका खामियाजा पूरा समाज भुगत रहा है। भगत सिंह के बहाने सामाजिक व्यवस्था पर सवाल इसलिए क्योंकि जिन मुश्किल परिस्थितियों में भगत सिंह और उनके साथियों ने अपनी जीवटता प्रदर्शित की वह हालात से टूटते हुए इंसानों  को रास्ता दिखाने के लिए काफी था। लेकिन उनके वीरता की चर्चा  सिलेबसों में तो नहीं ही दिखती, उलटे उनके विचारों को फैलने से रोकने के लिए तमाम षड्यंत्र रचे जाते हैं। देश के महापुरुषों की इस वन्दनीय स्थिति से हमें शर्मिंदगी महसूस होती है।  भगत सिंह जिस साम्राज्यवादी व्यवस्था के खिलाफ लड़ते रहे आज हमारी व्यवस्था उसी साम्राज्यवाद की पिछलग्गू बन गयी है
भगत सिंह के विचारधारा रूपी सच को छुपाने की कोशिश की जा रही है। आज आज़ादी के इतने सालों बाद भी  उनके विचारोंं की प्रासंगिकता कायम है समाज और देश के विकास की गहरी समझ और
कार्ययोजना उनके अंदर विकसित थी। लेकिन  उनकी जीवनी दुर्लभ दस्तावेज़ का रूप ले चुकी है जिसका जिम्मेदार शासन तंत्र है। कहीं न कहीं शासकों को इस बात का भय है कि अगर भगत सिंह की विचारधारा से प्रभावित होकर लोग जागरूक होकर इस भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ एकत्रित हो गए तो फिर उस क्रांति को रोकना किसी भी सरकार के लिए संभव नही होगा। हालाँकि भगत सिंह को याद करने की सार्थकता तभी है जब हम उनके विचारों को अमल में लायें और भारत को एक समाजवादी गणतंत्र बनाने की पहल करें। क्या अपनों तक सीमित समाज देश रत्न के प्रति अपने रवैये को बदलेगा?
गिरिजेश कुमार

Thursday, March 8, 2012

अपनी पारंपरिकता खोती होली!

अपनी पारंपरिक सुंदरता और खुशियों के मिश्रण का विहंगम संगम, होली आज बदरंग हो चुकी है। अगर कुछ बचा है तो वह है परम्पराओं के नाम पर रिवाजों को ढोने की मज़बूरी और धार्मिक आस्था, जिसे मानव समाज छोड़ नहीं सकता। एक वह समय होता था, जब होली की खुमारी फागुन के पूरे महीने रहती थी। फाग गाने से लेकर एक दूसरे को अबीर गुलाल लगाने की औपचारिकता तो अभी भी है लेकिन वो चीजें नहीं दिखती जब होली के सामाजिक मायने होते थे। होली का मतलब पुरानी दुश्मनी को भुलाकर एक नये रिश्ते की शुरुआत होती थी। मुझे अभी भी याद है गाँव की गलियों में हुल्लड़ मचाती युवकों की टोली और रंग से बचने के लिए भागते लोग। उस समय मैं बच्चों की श्रेणी में आता था जिसकी अलग टोली होती थी। गाँव के बुजुर्गों को चिढ़ाने से लेकर गाली सुनने का एक अलग ही अनुभव होता था। होली सिर्फ़ होली के दिन ही नहीं खेली जाती थी उसके लगभग एक सप्ताह पहले और एक सप्ताह बाद तक होली खेली जाती थी। परन्तु आज अपनों तक सीमित सामाजिक अवधारणा और एकल परिवार ने सब गुड़ गोबर कर दिया है। अपार्टमेंटल संस्कृति में लिप्त पूरा समाज अपने मूल को खोकर सिर्फ़ दिखावों तक सीमित रह गया है। शहरी संस्कृति भले ही विकास और समृद्धि की परिचायक हो लेकिन जो चीज़ हमें जड़ से अलग करती है वह है अनजानापन। नरमुंडों के बीच दिखावटी अपनापन तो है लेकिंन इंसानी रिश्ते नहीं दिखते। सब एक दूसरे की तरक्की और अमनचैन के दुश्मन बने हुए हैं। होली के बहाने मानवीय संवेदनाओं पर सवाल इसलिए क्योंकि मनुष्य उस सामाजिक समरसताओं का प्रतिनिधित्व करता है, जिसका उदाहरण दुनिया के दूसरे जीवों में नहीं मिलता।
आज होली इलेक्ट्रोनिक ग्रीटिंग कार्ड्स और वर्चुअल दुनिया तक सीमित होकर रह गयी है। पहले घर से दूर रहने वाले लोग होली के अवसर पर इकठ्ठा होते थे। इसकी तैयारी पहले से ही होती थी। संयुक्त परिवार का कांसेप्ट था। आज अगर कोई चीज़ कचोटती है तो वह यही है। मेरे मोबाईल पर सुबह से कई मेसेजेज आ चुके हैं। यही हाल फेसबुक पर और दूसरे सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर है। लेकिन सवाल है अपनी वास्तविक सुंदरता और अपनेपन को खोकर जिस होली को हम मना रहे हैं उसके मायने क्या हैं?
आज लोग घरों से बाहर निकलने से डरते हैं। हर तरफ़ एक आशंका, डर और अनहोनी की चिंता सताए रहती है। न जाने किस दरवाजे से अकस्मात कुछ ऐसा हो जाए जिसकी कल्पना भी नहीं की हो। शक के बढते दायरे और विश्वास की कमी इतनी घरी पैठ बना चुकी है कि अगर कोई लड़की इस सामाजिक तानेबाने को तोड़कर सड़कों पर मस्ती में झूमते दिख गई तो ये तथाकथित आधुनिक समाज संस्कृति का ताना देने लगेगा। घटिया मानसिकता के बढते प्रभाव के बीच हम इस समाज को आधुनिक कैसे कहें, बड़ा सवाल यही है।
होली में पारंपरिक गीतों और अबीर गुलाल के बीच मस्ती में झूमते हुए लोग होते थे। आज उनका स्थान अश्लील और भौंडे गीतों ने ले लिया है। बेहूदे तरीके से कैमरे के सामने नाचते हुए युवक-युवतियां। आश्चर्य है कि इसी समाज को इसमें संस्कृति का कोई खतरा दिखाई नहीं देता। सभ्यता और संस्कृति कि दुहाई देकर समाज को तोड़ने का काम हो रहा है। हालाँकि सवाल यह भी है कि इस सामाजिक  विभत्सता को देखने लायक आँख और समझने लायक मन आज कितने लोगों में है?
दरअसल अपने कर्तव्य पथ से विमुख हमारा समाज इन्ही चीजों में खुश है। यहाँ न तो होली या किसी भी त्यौहार के मूल रूप को खोने की कोई बेचैनी दिखती है और न ही इस समाज को जरा भी अफ़सोस होता है। तो फिर जिम्मेदारी कौन लेगा?
गिरिजेश कुमार

Wednesday, March 7, 2012

फिर हिली धरती


क्या हम किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहे हैं?

मैं जिस बिल्डिंग में रहता हूँ वह कतई भूकंपरोधी नहीं है। ज़ाहिर है, अगर तेज झटके वाला  भूकम्प आया तो इन पंक्तियों का लेखक भी उस त्रासदी का शिकार हो सकता है। कल एक बार फिर देश के कई शहरों में भूकंप ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। देश के पाँच राज्यों में हुए चुनाव की चहल-पहल, राजनीतिक समीकरण, सरकार बनाने के लिए गठजोड़ और हार जीत के कयासों के बीच भले ही यह खबर कहीं दब गयी लेकिन इसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। ठीक है कि यह भूकंप सिर्फ़ 4.9 तीव्रता का था जो आमतौर पर खतरनाक नहीं होता है। लेकिन प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूकता की कमी जो अफरातफरी पैदा करती है , और जो नुकसान की सबसे बड़ी वजह होती है, उसपर विमर्श कौन करेगा? आमतौर पर यहाँ लोग इस बात से अनभिग्य होते हैं कि जब भूकंप आए तो क्या करना चाहिए? हमारा प्रशासनिक तंत्र इतना मजबूत नहीं है कि ऐसी विपरीत स्थितियों में तत्काल राहत और बचाव का कार्य शुरू किया जा सके। यह स्थिति सिर्फ़ राजधानी पटना की है ऐसी बात नहीं है, देश में सभी जगहों के हालात कमोबेश एक से हैं। और यह बात पिछले 15 फरवरी को दिल्ली में हुए मॉक ड्रिल में खुलकर सामने आ चुकी है। तो क्या हम किसी बड़े हादसे का इन्तजार कर रहे हैं? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बार-बार हिलती धरती और उससे होने वाले नुकसान का अंदाज़ा होते हुए भी इसपर कोई ठोस कार्ययोजना तथा उसे अमल में लाने के प्रयासों पर कोई चर्चा नहीं होती।  
पिछली बार जब 18 सितम्बर की शाम धरती हिली थी, जिसके झटके पूरे उत्तर भारत में महसूस किये गए थे, यह सवाल तब भी उठा था। यह सवाल तब भी उठा था जब 26 जनवरी 2001 को गुजरात भूकंप से तबाह हो गया था। और यह सवाल कल भी उठा, परन्तु स्थितियां न तो तब बदली और न ही आज। आनेवाले समय में इसे बदलने की उम्मीद कितनी है, पता नहीं! लेकिन इन सबके बीच सवाल यह भी है स्थितियां बदलती क्यों नहीं हैं?
हालाँकि सच यह भी है कि कर्तव्यविमुख सरकारें अपनी जिम्मेदारियों से भी मुँह मोड़ चुकी हैं। आम जनता अपनी जीवनशैली इस तरह से बना चुकी है, जहाँ इस तरफ़ सोचना उसके कार्यक्षेत्र के दायरे में नहीं आता। भूकंप जानलेवा नहीं होता, बल्कि कमजोर इमारतें भूकंप के कारण गिरकर जानलेवा बन जाती हैं। लेकिन विकास का पैमाना समझे जाने वाली ऊँची इमारतें अपने दायरे को फैलाकर पूरे शहर को जिस तरह से कंक्रीट के जंगल में तब्दील कर रही हैं, वह किसी दिन कब्रगाह में बदल जाए तो कोई आतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन बड़ा सवाल यह भी है कि अगर विकास का रास्ता इन्ही कंक्रीट जंगलों से होकर गुजरता है तो उसमे भूकंपरोधी तकनीक का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता? परन्तु आम आदमी के जान की फ़िक्र यहाँ किसे है? बिल्डर जानते हैं कि मरने के बाद हर ज़िन्दगी की कीमत तय होगी और लोग इसे भगवान का दंड समझकर चुप भी हो जायेंगे। फिर सबकुछ यूँ ही चलता रहेगा। अगर कुछ छूट जाएगा तो वह होगा न मिटने वाली यादें और न रुकने वाले आँसू। बार-बार हिलती धरती किसी बड़े खतरे का संकेत है या यह मात्र एक प्राकृतिक घटना, यह तो आनेवाला वक्त बातायेगा लेकिन इससे बचाव के पर्याप्त उपाय समय रहते नहीं किये गए तो आनेवाले समय में भूकंप से जानमाल के नुकसान का अंदाज़ा लगाना मुश्किल होगा। ज़ाहिर है खामियाजा पूरे मानव समाज को भुगतना होगा।
गिरिजेश कुमार

Sunday, February 19, 2012

विद्यालयों के पास बिकती है मौत, बेच रहे मजबूर बच्चे!


शरीर पर गंदे, मैले कुचैले कपड़े, ठंड और उचित देखभाल न होने से हाथ पैर और चेहरों के चमड़े फटे-फटे, उम्र बमुश्किल 12-13 साल, आँखे किसी खरीदार के इंतजार में। यह किसी एक की कहानी नहीं है ऐसे कई चेहरे आपको सरकारी स्कूल के बाहर मिल जायेंगे, जिनकी ज़िन्दगी गुटखा, पान मसाला और तम्बाकू बेचकर चलती है। एक तरफ़ इन्हें बेचना उन बच्चों की मज़बूरी है तो दूसरी तरफ़  पूरे समाज में धीमा जहर फ़ैल रहा है। जिस जगह  पर कल्पनाएँ  हकीकत का रूप लेती हैं उसी जगह पर मौत का सामान बेचा जाना हमें सकते में डालता है तो तस्वीर का दूसरा पहलू हमें सोचने पर मजबूर करता है। सरकार और प्रशासन सबकुछ जानते हुए भी चुप है। हालाँकि ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ बच्चे ही ऐसा करने को मजबूर हैं, स्कूल-कॉलेज से चंद कदम की दुरी पर ही ऐसी कई दुकाने सजी रहती हैं। जिनमे पान-गुटखा से लेकर शराब की दुकानें भी रहती हैं। इसका दूसरा सबसे बड़ा कारण यह है तम्बाकू उत्पादों का सबसे बड़ा खरीदार स्कूल कॉलेज के छात्र हैं। सवाल है क्या ‘धूम्रपान करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है’ तम्बाकू उत्पादों पर लिखी इस वैधानिक चेतावनी को ही हम अपने कर्तव्य की इतिश्री मान चुके हैं?
जबकि विज्ञापन पर निषेध व रेग्यूलेशन ऑफ ट्रेड एण्ड कॉमर्स उत्पादन आपूर्ति और वितरण एक्ट 2003 की धारा 6 के अनुसार तम्बाकू की बिक्री किसी अवयस्क द्वारा किये जाने पर प्रतिबन्ध  है। तथा शिक्षण संस्थानों के 100 मीटर की परिधि में तम्बाकू उत्पादों की बिक्री निषेध है। फिर भी ऐसा किया जाना और प्रशासनिक स्तर पर कोई कार्रवाई न होना हास्यास्पद है।
आँकड़ों पर अगर गौर किया जाए तो जो खौफनाक हकीकत सामने आती है उसे देखकर स्थिति की गंभीरता का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। 2000 में इंडिया-बिहार ग्लोबल यूथ टोबैको सर्वे में यह बात स्पष्ट तौर पर सामने आई कि 59 प्रतिशत प्रतिशत बच्चे किसी भी रूप में तम्बाकू उत्पाद का उपयोग कर रहे हैं। 14 प्रतिशत बच्चे सिगरेट पीते हैं, जबकि 46 प्रतिशत बच्चे तम्बाकू का दूसरे रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। वहीँ स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के मुताबिक देश में 10 वर्ष तक की उम्र के करीब 37 प्रतिशत प्रतिशत बच्चे स्मोकिंग करते हैं। जबकि स्कूल कॉलेज के 50 प्रतिशत से अधक छात्र तम्बाकू सेवन करते हैं। ज़ाहिर है ये आँकड़े हमने नहीं बनाए हैं फिर भी इसे रोकने और कानून का कड़ाई से पालन करने की दिशा में कोई प्रयास क्यों नहीं हो रहे हैं? बड़ा सवाल यही है।
क्रिकेटर युवराज सिंह को जब कैंसर की खबर आई तो हममे से हर कोई स्तब्ध था। युवराज की बीमारी तो फिर भी गंभीर नहीं थी लेकिन इसी कैंसर से कितने लोग हर साल काल के गाल में चले जाते है, इसका कोई स्पष्ट आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। फिर भी इसके जड़ को तलाशने की चर्चा कहीं नहीं  दिखी। सवाल यह भी है कि एक तरफ़ सरकार तम्बाकू मुक्त प्रदेश होने का सपना देखे और दूसरी तरफ धड़ल्ले से शराब दुकानों को लाइसेंस दिया जाए, तम्बाकू उत्पादों से राजस्व भी मिले और लोग तम्बाकू उत्पाद का उपयोग भी न करे ये दोनों एक साथ आखिर हो कैसे सकता है? जहाँ बाजार और उसके पैरोकार आड़े आते हैं वहाँ सरोकार की बात करना बेवकूफी लगती है। फिर भी इस धीमे जहर से समाज जिस अन्धकार की ओर बढ़ रहा हैं समय रहते उसपर कार्रवाई नहीं की गई तो फिर अपने आप को कोसने के अलावा कुछ भी नहीं बचेगा।
गिरिजेश कुमार

Sunday, February 12, 2012

डर्टी 'सिल्क' है या सिस्टम?


रूबी सिंह
फिल्म ‘डर्टी पिक्चर’ की ‘सिल्क’ को लोग डर्टी मानते हैं। हालाँकि सिल्क बाजारी है या विचारी, इसमें से किसी निष्कर्ष पर पहुँचना आसान नहीं है। लेकिन गंभीर और बड़ा सवाल यह है कि ‘सिल्क’ डर्टी है या सिस्टम? क्योंकि इस सिस्टम में सफलता के लिए या तो समझौता करना होता है या आत्महत्या! दो दिन पहले भोजपुरी फिल्मों की मशहूर नायिका रूबी सिंह ने मुंबई स्थित अपने फ़्लैट में आत्महत्या कर ली। कारणों के तफ्तीश की ज़िम्मेदारी पुलिस की है लेकिन इसके सामाजिक सन्दर्भ पर चर्चा कौन करेगा? अफ़सोस है कि हर ऐसी घटना मीडिया के लिए खबर बनती है और समाज के लिए विमर्श का विषय। लेकिन इस विमर्श से ठोस हल निकालने की कोशिश नहीं होती, खानापूर्ति करना ही इसका उद्देश्य होता है। बताया जाता है कि रूबी सिंह पिछले कुछ दिनों से डिप्रेशन में थी। काम न मिलना भी उसकी एक वजह बताई जा रही है। लेकिन आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठाने के पीछे छिपे रहस्य पर से पर्दा उठने में शायद वक्त लगे लेकिन निहितार्थों का चर्चा से गायब होना चौंकाता है।
नफीसा, कुलजीत रंधावा, विवेका बाबाजी, रूबी सिंह, इस लिस्ट में नामों की फेहरिस्त काफी लम्बी है। ग्लैमर की चकाचौंध में फैशन की दुनिया का स्याह सच एक बार नहीं कई बार दुनिया के सामने आ चुका है। इसे गलत माननेवालों की भी कमी नहीं है लेकिन स्थित ढाक के तीन पात वाली कहावत से आगे नहीं बढ़ती। सवाल है चमकती दुनिया के काले सच से जबकि हम सब वाकिफ हैं फिर भी इस दुनिया से काले परदे हटाने के प्रयास क्यों नहीं होते? ज़ाहिर है बाजार इसमें बड़ी भूमिका अदा करता है। रूबी सिंह के आत्महत्या की प्रारम्भिक वजहें भी इन्ही सब चीज़ों की ओर ईशारा करती हैं।
गाँव की गलियों से होकर रौशनी से नहाये हुए शहर में अपने आप को स्टार के रूप में देखने की ख्वाहिश रखने वाले लोगों की कमी नहीं है। वास्तविक सच को जाने बिना परदे पर बनावटी मुस्कान बिखेरने वाले सितारों की ज़िन्दगी में खुद को शामिल करना भी ऐसी मौत का कारण होता है। सपने टूटते हैं, टूटने के लिए ही होते हैं शायद। आखिर आत्मविश्वास की जमीन जब हिलने लगे तो ऐसे हालात में वो व्यक्ति क्या करे?
पैसे की चाहत और उच्च जीवन स्तर जीने की आकांक्षा ने लोगों के जमीर को भी बेचने का काम किया है। दिखावे में फँसे समाज के एक तरफ़ ज़िन्दगी से जंग है तो दूसरी तरफ़ झूठे मान सम्मान की फ़िक्र। मकड़े के जाल की तरह उलझी इस व्यवस्था में एक इंसान का जीना वैसे ही मुमकिन नहीं था, गला काट प्रतियोगिता, हमेशा आगे रहने की होड़ और एक झटके में दुनिया को आकर्षित कर लेने की प्रवृत्ति ने इसे और भी मुश्किल बना दिया है। एक तरफ़ देश भूख, गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार से जूझ रहा है तो दूसरी तरफ़ समाज में निराशा है, हताशा है, भविष्य का संकट है। अवसाद, मानसिक तनाव इत्यादि भी हैं।  इन सबकी वजहें चाहे जो भी हो नुकसान पूरे समाज को हो रहा है।  
देश और राज्य की सरकारों को सिर्फ़ घोटाले, कुर्सी और अपनी सत्ता बचाने में इंटरेस्ट है। मनुष्य के आत्मबल को निर्मित करने और उसे विपरीत परिस्थितियों में भी तटस्थ रहने की प्रेरणा देना कहीं किसी भी सिलेबस में शामिल नहीं है। खुद से जूझते इंसान के लिए यह और भी कठिन है। सवाल है ऐसी दमघोंटू परिस्थिति आखिर कब तक रहेगी? रूबी सिंह अंतिम नाम होगा ऐसी अपेक्षा रखना भी बेवकूफी है।
गिरिजेश कुमार

Saturday, January 14, 2012

राजनीति ही बदलेगी सियासत की सूरत


राजनीति की व्याख्या अगर परिभाषाओं की परिपाटी पर की जाए तो जो परिभाषा सबसे सटीक है वह है- यह सामाजिक ढाँचा जिस तरीके से संचालित होता है, वही राजनीति है। जाहिर है इसमें समाज की बेहतरी सबसे अहम है। प्रतिनिधि लोकतंत्र उसी राजनीति का हिस्सा है। दरअसल राजनीतिक पार्टियाँ जब इस सर्वमान्य प्रचलित परम्पराओं को तोड़कर राजनीति और सत्ता का इस्तेमाल निजी फायदे के लिए करने लगते हैं, तब यह सवाल उठता है कि आखिर राजनीति का मतलब है क्या? और राजनीति का तमगा पहनकर वर्तमान राजनेता जो कर रहे हैं, क्या वास्तव में वह राजनीति है? आम जनता के हित और समाजसेवा की साधना लिए उजली टोपी पहन लेना अगर वास्तविक राजनीति होती तो शायद हम भी सवाल न उठाते। लेकिन देश और समाज की बेहतरी के लिए जिस तरह के राजनीतिक संचालन की ज़रूरत है, वह नहीं होती। वर्तमान सत्तालोलुप पार्टियां राजनीति का अपराधीकरण और अपराधियों का राजनीतिकरण कर रही हैं। सिर्फ़ चुनाव जीतने को अपना मतलब और मकसद समझने वाली राजनीतिक पार्टियाँ इसके लिए कोई भी तरीका अपनाने से नहीं चूकते। यहाँ उम्मीदवारों की जीत मायने रखती है, उसका चरित्र नहीं। परिणामस्वरूप संसद और विधानसभाओं में ऐसे लोगों की तादाद बढ़ती जा रही है जो दबंग चरित्र के हैं। ऐसे लोग भी चुनाव जीत रहे हैं जिनपर कई आपराधिक मामले दर्ज है। ज़ाहिर है अगर लोगों को राजनीति का मतलब समझ में नहीं आ रहा है, और जिन्हें सामाजिक बहिष्कार मिलना चाहिए वो लोग जनप्रतिनिधि कहला रहे हैं तो व्यवस्था में कहीं-न-कहीं ऐसी खामी है जिसकी पड़ताल ज़रुरी है। वो खामी आखिर क्या है?
बहुदलीय प्रणाली पर आधारित वर्तमान भारतीय लोकतंत्र जनहित की बात तो करता है लेकिन वह संविधान तक ही सीमित है। धरातल पर उसकी वास्तविकता नहीं दिखती। वर्तमान चुनाव प्रणाली भी इसके लिए जिम्मेदार है। चुनाव आयोग पैसों के लूट के खेल को रोकने में नाकाम है। नियम बनाना अलग बात है उसे अमल में लाना अलग बात। खोखली हो चुकी इस व्यवस्था में सारा दोष चुनाव आयोग पर नहीं मढ़ा जा सकता। नेता, पुलिस और अपराधियों के गठजोड़ को खत्म करना होगा। हमारा समाज भयमुक्त नहीं है। यहाँ लोगों पर पुलिस का उतना ही खौफ है जितना अपराधियों का। वोट के बदले नोट जैसी सामाजिक बुराई राजनीति को हाशिए पर ले जाने के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार  है। हमारा सिस्टम इसे रोक पाने में पूरी तरह असफल है। चुनाव की घोषणा होते ही ये तत्व सक्रीय हो जाते हैं। आम भोली, निरीह और अनपढ़ जनता अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रति इतनी जागरूक नहीं है कि वह समाज के इन तथाकथित हितसोचकों के कुत्सित प्रयास को समझ सके। दरअसल, शासक वर्ग भी यह नहीं चाहता कि लोग जागरूक हों, क्योंकि अगर जनता जागरूक हो गई तो इनकी कुर्सी खतरे में पड़ जायेगी। वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था भी इसके लिए जिम्मेदार है। यहाँ हर चीज़ पर बाजार हावी है, और इस समाज को उसकी कीमत चाहिए होती है, जिसकी अदायगी ईमान, इज्ज़त और ज़मीर को बेचकर भी करनी पड़ती है। पार्टियों के चुनाव घोषणा पत्र में बेहतर समाज बनाने के तमाम वादे और दावे तो किये जाते हैं लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद सत्ता के सुख में ये सारी चीज़ें खत्म हो जाती हैं। इन सबके बीच पिसना पड़ता है उस आम जनता को जिसके लिए ये सारे प्रपंच रचे जाते हैं। परेशान होता है वह आम आदमी जिसकी तनख्वाह तो नहीं बढ़ती लेकिन ज़रूरत की चीज़ों के दाम ज़रूर बढते रहते हैं। सवाल है समाधान क्या हो?

दरअसल, सत्ता का इस्तेमाल निजी फायदे के लिए हो और जनता के हित की तथाकथित राजनीतिक ढोंग भी रचा जाए, ये दोनों काम एक ही नाव पर सवार होकर अगर कोई पार्टी करना चाहती है तो समझना यह भी पड़ेगा कि आखिर इसके मायने क्या है? अगर राजनीति का मतलब सत्ता है तो जाहिर है कोई भी पार्टी इससे खुद को अलग कर नहीं रख पाएगी। लेकिन विकास की जिस लकीर को खींचने का दावा कर ये पार्टियाँ वोट माँगने जाती हैं उसमें आम आदमी फिट होता कहाँ है, यह भी बड़ा सवाल है? 
यह विडंबना है कि आज़ादी के छह दशक बीत जाने के बाद भी देश की जनता राजनीतिक रूप से पूरी तरह जागरूक नहीं हो पायी है। जिसका नाजायज फायदा नेता उठाते हैं। इसलिए सवाल सिर्फ़ यही नहीं है कि स्थिति बदलेगी कैसे, सवाल यह भी है कि उसे कैसे लोग बदलेंगे? इस व्यवस्था से फायदे में रह रहे लोगों की तादाद भले ही ज्यादा न हो लेकिन इनके पास ताकत ज़रूर है। इसलिए ये लोग कभी नहीं चाहेंगे कि ये हालात बदले।  दूसरी तरफ़ पेट, परिवार और ज़िन्दगी की जद्दोजहद में पिसना मजदूरों की मज़बूरी है। इस मज़बूरी और लाचारी के आलम में क्रांति की मशाल को जलाना मुश्किल ही नहीं कठिन भी है। हालाँकि दुनिया का इतिहास इस बात की भी गवाही देता है कि शोले हमेशा राख में दबी चिंगारियों से भडकते हैं। असंगठित होकर इस व्यवस्था के खिलाफ़ हममे से हर कोई अपने-अपने तरीके से लड़ाई लड़ रहा है। ज़रूरत है उन्हें संगठित करने की। राजनीतिक जागरूकता दूसरी सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है।
आम जनता के मन में बनी नेताओं की नकारात्मक छवि उनमे घृणा का भाव उत्पन्न करता है। एक सभ्य लोकतान्त्रिक व्यवस्था में ऐसी स्थिति को कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता। चुनाव भी औपचारिकताओं तक सीमित रह गया है। एक वोट देश की दशा और दिशा तय करेगा यह मनोभाव न तो मतदाता के मन में होता है न नेता के मन में। भयाक्रांत यह समाज आखिर सही निर्णय लेगा तो कैसे?
हालाँकि हमारी सबसे बड़ी खासियत यह रही है कि हमने उम्मीद के दीये को कभी बुझने नहीं दिया। विपरीत परिस्थितियों में रास्ता निकालने की कला हमें विरासत में मिली है लेकिन इससे पहले कि यह धैर्य अराजकता का रूप ले ले हमें एक ठोस, गंभीर और सकारात्मक हल निकालने के प्रयास करने होंगे। निश्चित ही यह ज़िम्मेदारी उनलोगों को लेनी पड़ेगी जिनका देश, समाज, और सियासत से थोड़ा भी लगाव है।

Wednesday, December 21, 2011

सामाजिक विभत्सता की कारुणिक दास्तान


“मेरे मम्मी-पापा हमारी शादी के लिए राज़ी नहीं थे। क्योंकि हमारी जाति अलग थी। उनकी इच्छा के विरुद्ध हमने मुंबई कोर्ट में शादी कर ली। उन्होंने मुझे यह कहकर बुलाया कि हमें तुम्हारी शादी मंजूर है। मैं बहुत ही साधारण लड़की हूँ। मैं उनकी चालों को नहीं समझ पायी। उन्होंने मुझे घर में ही किडनैप कर रखा है। मेरे मम्मी-पापा ने मेरे पति को जान से मार देने की धमकी दी है। वे मुझे किसी से बात भी नहीं करने दे रहे...(क्रमशः)“  इस कहानी की हर एक पंक्ति हमें अंदर तक झकझोरती है। दर्द की दास्ताँ पढ़ते-पढ़ते कब उसके दर्द से रिश्ता जुड़ जाता है, पता ही नहीं चलता? अकेले में रोते-रोते जब किसी की आँखे सूज़ जाती हैं तो दिल में छुपे गुबार किसी भी रास्ते बाहर आने को बेताब हो उठते हैं। यह बेताबी कभी इंसान को तोड़ देती है, तो कभी उसे विद्रोही बना देती है। हालाँकि उस इंसान के लिए दोनों ही स्थिति खतरनाक है, लेकिन भींगी आँखें, अगर सिलवटों से भी बहती आँसुओं का हिसाब माँगने लगे तो फिर आखिर भरोसा किसपर किया जाए? अपने ही जब दुश्मन बन जाएँ तो मदद किससे मांगी जाए, यह बड़ा सवाल बन जाता है?

बहरहाल, यह आपबीती है, बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की रहने वाली पल्लवी पल्लू की, जिसे उसने फेसबुक पर शेयर किया है। अंत में उसने अपने और अपने पति की ज़िन्दगी की रक्षा की गुहार लगायी है। विडंबना देखिये, जो उसका हक है, उसे उसको भीख के रूप में माँगना पड़ रहा है। उसकी गलती बस इतनी है कि उसने उस व्यक्ति से शादी कर ली जिससे वो प्यार करती थी। और दुर्भाग्य से वो उसकी जाति का नहीं है। आखिर किस आधुनिकता की फटी हुई चादर ओढ़े जी रहे हैं हम? जहाँ एक लड़की सिर्फ़ इसलिए नज़रबंद है, क्योंकि उसने अंतर्जातीय विवाह जैसी सामाजिक कुरीति के मुँह पर तमाचा मारा है।
वो पूछती है, कोई इंसान अगर जातिवाद की लड़ाई लड़ता है तो क्या वह देशद्रोही है? दरअसल, सवाल सिर्फ़ यही नहीं है, सवाल उस मानसिकता का भी है जो आधी आबादी को दोयम दर्जे की निगाह से देखता है, और उसके सारे फैसलों पर परिवारवालों का नियंत्रण रहता है। अगर इस नियंत्रण से आगे निकलने की किसी ने कोशिश की तो उसकी नैतिकता पर ही सवाल उठा दिए जाते हैं, फिर यही समाज उसे घटिया, बदचलन, बाजारी और न जाने कैसे-कैसे उपनाम से संबोधित करता है? सवाल, जातिवाद जैसी सामाजिक कुरीति का भी है जिसने कभी-न-कभी हमसब को अपनी जद में लिया और हम हैं कि फिर भी उस चोले को उतार फेंकना नहीं चाहते। इसीलिए अंतर्जातीय विवाह को हम झूठी शान-ओ-शौकत में पड़कर स्वीकार करना नहीं चाहते। सामाजिक बुराई को स्टेटस सिम्बल बनाकर हम खुद को ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को विनाश की ओर धकेल रहे हैं। पल्लवी जैसी न जाने कितनी ही लड़कियाँ इस तथाकथित आधुनिक समाज से अपनी ज़िन्दगी की भीख माँगने को विवश है?
हमारी सामाजिक संरचना में झूठी अस्मिता और दिखावेपन ने इतनी गहरी पैठ बना ली है कि अगर कोई उसे तोड़ने की कोशिश करे तो, या तो उसे तोड़ दिया जाता है, या उसकी आवाज़ उसके कमरे की दीवारों से ही टकराकर रह जाती है। कोई उसके अंतर्मन में झाँकने की कोशिश नहीं करता। हताशा, निराशा और कुंठा के ऐसे ही आलम में कोई आत्महत्या जैसे जघन्य कदम उठाने को मजबूर होता है। ज़रूरत इस बात की है कि हम खुद की सोच को परिपक्व बनायें। अपनी मानसिकता में थोड़ा बदलाव कर हम कई सामाजिक बुराइयों को दूर कर सकते हैं। दूसरों को दोष देने से पहले हमें खुद के दोषों पर भी विचार करना चाहिए। इसमें माता-पिता की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है।  ताकि फिर कोई पल्लवी ज़िन्दगी की भीख माँगने को विवश न हो।
गिरिजेश कुमार

Tuesday, December 13, 2011

बेबसी की चक्की में पिसता बचपन

“मैं पढ़ता था लेकिन जब से पापा बीमार हुए तब से पढ़ाई छोड़ दी” इस कंपकपाती ठण्ड में सड़क के किनारे दीये की रौशनी में अंडा बेच रहे बमुश्किल दस साल के बच्चे से जब मैंने यह सवाल किया कि तुम पढ़ते नहीं हो? तो उसका जवाब यही था। टूटी-फूटी  भाषा में दिए इस जवाब को सुनकर अनायास ही मन उस बच्चे के प्रति करुणा, दया और ममता से भर जाता है। लेकिन सवाल है इसे कहा क्या जाए? नियति का फेर,व्यवस्था की खामी या उस बच्चे की किस्मत का दोष?
दरअसल भाग्य और भगवान के  भरोसे जीने वाला यह समाज व्यवस्थागत खामियों को भी किस्मत और कर्म के फल के निगाह से देखता है। दो जून की रोटी की तलाश,बीमार बाप के ईलाज के लिए पैसों की ज़रूरत और इन सबके बीच पिसता बचपन। समस्याएं एक नही हैं। ज़िंदगी को मज़बूरी का नाम देकर आखिर कब तक जिया जाए?
२१ वीं सदी में भले ही हमने विकास के नए पैमाने गढ़ लिए हों लेकिन बुनियादी सवाल अब भी कायम हैं। देश का भविष्य कहे जाने वाले बच्चे आर्थिक असमानता,गरीबी,मज़बूरी,लाचारी और बेबसी की उस चक्की में पिसते रहते हैं जहां से बाहर निकलना उसके वश की बात नही होती। हर चौक-चौराहे और गली-नुक्कड़ पर हमें ऐसी विवश ज़िन्दगी देखने को मिल जाती है। स्थिति बदलने और बेहतरी के तमाम सरकारी दावे होते हैं लेकिन इन दावों की वास्तविकता धरातल पर नही दिखती। नतीजतन ज़िंदगी शब्द से भी अनजान बच्चे ज़िन्दगी का बोझ उठाने को मजबूर होते हैं। जो उम्र उसके दिमागी विकास और नयी कल्पनाओं को अंजाम देने की होती है उस उम्र में उसे आटा-चक्की का भाव मालुम करना होता है। एक सभ्य लोकतान्त्रिक समाज के लिए यह स्थिति वाकई चिंताजनक है। लेकिन निजीहित जिस समाज का अंतिम लक्ष्य बन जाए उस समाज में जनहित की बात बेईमानी ज़रूर लगती है, फिर भी यह सवाल तो उठता ही है कि आखिर दोषी कौन है?
हमारा संविधान समानता और समता पर जोर देता है लेकिन आज़ादी के छः दशकों बाद भी हम इसके निहितार्थ को नहीं समझ पाए। सरकारी नीतियाँ भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। मुनाफ़ा आधारित सोच हमें गरीबों और ज़रूरतमंदों के लिए बनायीं नीतियों का लाभ उनतक पहुँचाने से रोकते हैं। फलस्वरूप ये नीतियाँ कागजों में ही रहकर सरकारी कार्यालयों की शोभा बढ़ाती रहती हैं। इस विकट,विपरीत और दमघोंटू परिस्थितियों से लड़ने के लिए जो इच्छा शक्ति चाहिए वो सरकारों में नहीं दिखती। परिणामतः सारी सुविधाओं का लाभ चंद मुट्ठी भर लोगों तक सिमट कर रह जाता है। अमीर और अमीर होते जाते हैं गरीब और गरीब।
इसी देश में एक तरफ़ ऐसे बच्चे हैं जो तमाम सुख सुविधाओं से संपन्न हैं और दूसरी तरफ़ ये बच्चे हैं जिन्हें इन शब्दों का मतलब भी नहीं पता है। एक देश के इन दो चेहरों के कालांतर में झाँकने की कोशिश आखिर कब होगी? सवाल यह भी है कि जो व्यवस्था इस देश के बच्चों को उनका बचपन नहीं दे पाता क्या उस व्यवस्था को उखाड़ नहीं फेंकना चाहिए? इस शर्मनाक स्थिति से खुद में शर्मिंदगी महसूस करनेवाले हर व्यक्ति को इस दिशा में एकसाथ मिलकर प्रयास करने चाहिए। ताकि बचपन बचाया जा सके।  
गिरिजेश कुमार